Manish Gupta

Manish Gupta

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प्रांत कार्यकारिणी सदस्य व विभाग संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच, दिल्ली प्रांत

12/10/2024

सन 1925 विजयादशमी के दिन मैंने अपनी यात्रा प्रारंभ की और इस वर्ष विजयादशमी के दिन मैं अपनी यात्रा करते हुए शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा हूं...

मेरा यह मानना है की भारतमाता का हर सपूत मेरी प्राण वायु का एक हिस्सा है...

मेरा यह भी मानना है की संपूर्ण समाज की सेवा संकल्प के माध्यम से जुड़े हुए बंधुओं भगिनियों की आंतरिक शक्तियों में मैं विद्यमान हूं।

मैं कोई आपसे अलग नहीं हूं, मैं आप सब में ही तो हूं...

कोटि-कोटि जन से मिलकर मेरा निर्माण हुआ है, सज्जन शक्ति को बढ़ाने तथा दुर्जन शक्ति से सावधान करने ही तो मैं आप सब में विद्यमान हूं..

मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हूं।

# राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।🚩🙏

12/10/2024

सन 1925 विजयादशमी के दिन मैंने अपनी यात्रा प्रारंभ की और इस वर्ष विजयादशमी के दिन मैं अपनी यात्रा करते हुए शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा हूं...

मेरा यह मानना है की भारतमाता का हर सपूत मेरी प्राण वायु का एक हिस्सा है...

मेरा यह भी मानना है की संपूर्ण समाज की सेवा संकल्प के माध्यम से जुड़े हुए बंधुओं भगिनियों की आंतरिक शक्तियों में मैं विद्यमान हूं।

मैं कोई आपसे अलग नहीं हूं, मैं आप सब में ही तो हूं...

कोटि-कोटि जन से मिलकर मेरा निर्माण हुआ है, सज्जन शक्ति को बढ़ाने तथा दुर्जन शक्ति से सावधान करने ही तो मैं आप सब में विद्यमान हूं..

मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हूं।

# पूजनीय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।🚩🙏

09/07/2024

एक महान क्रन्तिकारी की कहानी जिनका नाम है "सेठ रामदास जी गुड़वाले"

इतिहास के पन्नों में कहाँ हैं ये नाम??

सेठ रामदास जी गुड़वाले - 1857 के महान क्रांतिकारी, दानवीर जिन्हें फांसी पर चढ़ाने से पहले अंग्रेजों ने उनपर शिकारी कुत्ते छोड़े जिन्होंने जीवित ही उनके शरीर को नोच खाया।

सेठ रामदास जी गुडवाला दिल्ली के अरबपति सेठ और बेंकर थे. इनका जन्म दिल्ली में एक अग्रवाल परिवार में हुआ था. इनके परिवार ने दिल्ली में पहली कपड़े की मिल की स्थापना की थी।

उनकी अमीरी की एक कहावत थी “रामदास जी गुड़वाले के पास इतना सोना चांदी जवाहरात है की उनकी दीवारो से वो गंगा जी का पानी भी रोक सकते है”

जब 1857 में मेरठ से आरम्भ होकर क्रांति की चिंगारी जब दिल्ली पहुँची तो

दिल्ली से अंग्रेजों की हार के बाद अनेक रियासतों की भारतीय सेनाओं ने दिल्ली में डेरा डाल दिया। उनके भोजन और वेतन की समस्या पैदा हो गई । रामजीदास गुड़वाले बादशाह के गहरे मित्र थे ।

रामदास जी को बादशाह की यह अवस्था देखी नहीं गई। उन्होंने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति बादशाह के हवाले कर दी और कह दिया

"मातृभूमि की रक्षा होगी तो धन फिर कमा लिया जायेगा "

रामजीदास ने केवल धन ही नहीं दिया, सैनिकों को सत्तू, आटा, अनाज बैलों, ऊँटों व घोड़ों के लिए चारे की व्यवस्था तक की।

सेठ जी जिन्होंने अभी तक केवल व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया उनकी संघठन की शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी हैरान हो गए ।
सारे उत्तर भारत में उन्होंने जासूसों का जाल बिछा दिया, अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया।

उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया। देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की कि इस संकट काल में सभी सँगठित हो और देश को स्वतंत्र करवाने में बहाद्दुर शाह जफ़र के नेतृत्व में चल रही क्रांति को सफल बनाएं .
रामदास जी की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत परेशान होने लगे।
कुछ कारणों से दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः कब्जा होने लगा। दुखी होकर, फिर एक दिन सेठ जी ने, चाँदनी चौक की दुकानों के आगे जगह-जगह ज़हर मिश्रित, शराब की बोतलों की पेटियाँ रखवा दीं, अंग्रेज सेना उनसे प्यास बुझाती और वही लेट जाती। अंग्रेजों को समझ आ गया कि भारत पे शासन करना है तो रामदास जी का अंत बहुत ज़रूरी है।
सेठ रामदास जी गुड़वाले को धोखे से पकड़ लिया गया और जिस तरह से मारा गया, वो तो क्रूरता की जीती जागती मिसाल है।
पहले उन्हें रस्सियों से खम्बे में बाँधा गया, फिर उन पर शिकारी कुत्ते छुड़वाए गए उसके बाद उन्हें उसी अधमरी अवस्था में दिल्ली के चांदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया।
सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट' में लिखा है -
"सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे।अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी। वह मुग़ल बादशाहों से भी अधिक धनी थे। यूरोप के बाजारों में भी उनकी अमीरी की चर्चा होती थी"।
लेकिन भारत के इतिहास में उनका जो नाम है, वो उनकी अतुलनीय संपत्ति की वजह से नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने की वजह से है।
जिसे आज बहुत ही कम लोग जानते हैं! इतिहास के पन्नों में कहाँ हैं ये नाम?? सेठ रामदास जी गुड़वाले - 1857 के महान क्रांतिकारी, दानवीर जिन्हें फांसी पर चढ़ाने से पहले अंग्रेजों ने उनपर शिकारी कुत्ते छोड़े जिन्होंने जीवित ही उनके शरीर को नोच खाया।

आजादी के बाद जब इतिहास लिखा गया तो अनेक लोगों के योगदान को भुलाया गया और अनेक समाजों को इतिहास में नकारात्मक दिखाया गया . लेकिन आप इन इतिहास में छुपे नामों को आगे लाने की जो मुहीम मैंने शुरू की है उसे आगे बढाने में मुझे सहयोग दें और इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें .

15/06/2024

भारतीय मुद्रा का इतिहास

Photos from Manish Gupta's post 08/06/2024

बेहद दुःखद….श्री श्याम बाबा की परमभक्त आरती दीदी को भावभीनी श्रद्धांजलि।🙏🙏🙏

04/06/2024

हे राम दुबारा मत आना
अब यहाँ लखन हनुमान नही।।

सौ करोड़ इन मुर्दों में
अब बची किसी में जान नहीं।।

भाईचारे के चक्कर में,
बहनों कि इज्जत का भान नहीं।।

इतिहास थक गया रो-रोकर,
अब भगवा का अभिमान नहीं।।

याद इन्हें बस अकबर है,
उस राणा का बलिदान नही।।

हल्दीघाटी सुनसान हुई,
अब चेतक का तूफान नही।।

हिन्दू भी होने लगे दफन,
अब जलने को शमसान नहीं।।

विदेशी धरम ही सबकुछ है,
सनातन का सम्मान नही।।

हिन्दू बँट गया जातियों में,
अब होगा यूँ कल्याण नहीं।।

सुअरों और भेड़ियों की,
आबादी का अनुमान नहीं।।

खतरे में हैं सिंह सावक,
इसका उनको कुछ ध्यान नहीं।।

चहुँ ओर सनातन लज्जित है,
कुछ मिलता है परिणाम नहीं।।

वीर शिवा की कूटनीति,
और राणा का अभिमान नही।।

जो चुना दिया दीवारों में,
गुरु पुत्रों का सम्मान नही।।

हे राम दुबारा मत आना,
अब यहाँ लखन हनुमान नही।।
🙏🏻 🚩

19/05/2024

अखंड भारत के सम्राट महाराजाधिराज विक्रमादित्य

“विक्रमादित्य” जिन्हें विक्रमसेन के नाम से भी जाना जाता है। यह भारतीय सम्राट थे। उनके साम्राज्य कि राजधानी उज्जैन थी।

विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की शुरुआत 57 ई.पू. में शकों को हराने के बाद की थी। उन्होंने उत्तर भारत पर अपना शासन व्यवस्थित किया था। उनके पराक्रम को देखकर ही उन्हें महान सम्राट कहा गया और उनके नाम की उपाधि कुल १४ भारतीय राजाओं को दी गई।

"विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध थे) उल्लेखनीय हैं। राजा विक्रमादित्य नाम, 'विक्रम' और 'आदित्य' के समास से बना है जिसका अर्थ 'पराक्रम का सूर्य' या 'सूर्य के समान पराक्रमी' है।उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क) भी कहा जाता है (संस्कृत में अर्क का अर्थ सूर्य है)।

भारतीय परंपरा के अनुसार धन्वन्तरि, क्षपनक, अमरसिंह, शंकु, खटकरपारा, कालिदास, वेतालभट्ट (या (बेतालभट्ट), वररुचि और वराहमिहिर उज्जैन में विक्रमादित्य के राज दरबार का अंग थे। कहते हैं कि राजा के पास "नवरत्न" कहलाने वाले नौ ऐसे विद्वान थे।

कालिदास प्रसिद्ध संस्कृत राजकवि थे। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य की बेटे की मौत की भविष्यवाणी की थी। वेतालभट्ट एक धर्माचार्य थे। माना जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य को सोलह छंदों की रचना "नीति-प्रदीप" ("आचरण का दीया") का श्रेय दिया है।

30/04/2024

भारत का गौरवशाली इतिहास

मौर्य सम्राट……क्या हमें इन सबके बारे में बताया/पढ़ाया गया?

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