21/06/2026
दिवालिया जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी का अंत हो चुका है। 2008 में अपने प्राइम पर ये स्टॉक 340 रुपये तक गया।
फिर 1-2 रुपये का पेनी स्टॉक बन गया।
अब तो मार्केट से डीलिस्ट भी हो गया यानी आखिरी निशानी भी मिट गई। इसका मतलब है कि अगर आपके जेपी एसोसिएट्स के 1 लाख रुपये के शेयर होंगे तो उनकी वैल्यू आज जीरो है।
इस हीरो के जीरो बनने की कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है।
एक वक्त था, जब सड़क, बांध, बिजली, रियल एस्टेट से लेकर सिर्फ जेपी ग्रुप का सिक्का चलता था, खासकर उत्तर प्रदेश में।
इसकी बुनियाद रखी थी जयप्रकाश गौड़ ने 1970 के दशक में, जयप्रकाश गौड़ उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार से निकले इंजीनियर थे। उस वक्त अपने देश में लाइसेंस राज का दौर था।
मतलब कि इसमें सरकार तय करती थी कि कौन क्या बनाएगा, कितना बनाएगा, कहां बनाएगा और कई मामलों में किस कीमत पर बेचेगा भी।
ऐसे में प्राइवेट सेक्टर के मौके सीमित थे लेकिन बांधों और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की जरूरत बढ़ रही थी।
जेपी ग्रुप ने मुश्किल और जटिल प्रोजेक्ट्स लेने शुरू किए। यही उसकी पहचान भी बन गई कि जहां बाकी कंपनियां हाथ खड़े कर देती हैं, वहां जयप्रकाश पहुंच जाता है।
फिर नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने 1990 के दशक में उदारीकरण किया। भारतीय अर्थव्यवस्था को पंख लगे।
चंहुओर विकास की बयार थी। हाईवे बन रहे थे, बिजली की मांग बढ़ रही थी, रियल एस्टेट उफान पर था। जेपी ग्रुप भी बांध और कंस्ट्रक्शन से आगे बढ़कर सीमेंट, पावर, रियल एस्टेट, एक्सप्रेसवे, होटल और खेल प्रोजेक्ट तक कदम बढ़ गया।
2007-08 का दौर जयप्रकाश एसोसिएट्स का स्वर्णकाल था। शेयर लगभग ₹340 तक पहुंच गया।
निवेशकों को लगता था कि यही कंपनी देश के इंफ्रास्ट्रक्चर बूम की सबसे बड़ी कहानी लिखेगी। नोएडा से आगरा तक बनने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भविष्य का प्रतीक था। पावर प्लांट्स की योजनाएं थीं।
सीमेंट कारोबार तेजी से बढ़ रहा था। हमारे तरफ तो जेपी का सीमेंट चलता था। बड़े नेताओं से भी ग्रुप की नजदीकियां थीं।
लेकिन, जब सबकुछ अच्छा चलता है, तो आपकी बड़ी खामियां भी हुनर लगता है। असल इम्तिहान तो बुरे वक्त में होता है। दिग्गज अमेरिकी निवेशक वॉरेन बफेट ने एक बड़ी दिलचस्प बात कही है, 'जब समुद्र का पानी उतरता है तभी पता चलता है कि कौन बिना कपड़ों के तैर रहा था।'
बुल मार्केट में हर स्ट्रैटजी जीनियस लगती है। असली परीक्षा मंदी में होती है।
2008 का वैश्विक वित्तीय संकट आया, जिसे पूरी दुनिया को हिला दिया। अमेरिका के बड़े-बड़े बैंक डूब गए।
कर्ज देने वालों का अकाल पड़ गया। भारत बेशक काफी हद तक बच गया, लेकिन झटका तो यहां भी लगा।
कई ऐसे प्रोजेक्ट्स में निवेशकों की दिलचस्पी खत्म हो गई, जिन पर कभी वो आंख बंद करके भी पैसे लगाने को तैयार थे।
कर्ज को अच्छा नौकर बताया जाता है। मतलब कि उसे आपके काबू में रहना चाहिए। लेकिन, अगर वो मालिक बन गया, तो फिर आप पाई-पाई के मोहताज हो सकते हैं।
जेपी ग्रुप का भी जब कारोबार बढ़ रहा हो, तो कर्ज रॉकेट का ईंधन लग रहा था। लेकिन जब हालात बदले, तो वही कर्ज गले का पत्थर बन गया।
जेपी ग्रुप ने ग्रोथ बढ़ाने के लिए भारी उधार लिया था। लेकिन, प्रोजेक्ट से उम्मीद के मुताबिक पैसा नहीं आया। फिर वही हुआ, जिसकी आपको सैकड़ों मिसाल मिल जाएंगी।
नए कर्ज से पुराने कर्ज को संभालने की कोशिश शुरू हुई। प्रॉपर्टीज बेची जाने लगीं। सीमेंट कारोबार का बड़ा हिस्सा बेचा गया। पावर प्रोजेक्ट्स में हिस्सेदारी घटाई गई। जमीनें बेची गईं।
मगर जेपी ग्रुप का कर्ज जंगल की आग बन चुका था, जो अब दो-चार बाल्टी पानी से नहीं बुझने वाला था।
लिहाजा... पावर प्रोजेक्ट अट गए। जमीन और रियल एस्टेट बाजार धड़ाम हो गया। कई प्रोजेक्ट वक्त पर पूरे नहीं हुए, तो उनसे कोई पैसा भी नहीं आया। आखिर में जब पानी सिर से ऊपर निकल गया, तो कंपनी 'दिवालिया' हो गई।
जेपी ग्रुप ने जो कुछ भी बनाया, उनमें से कई चीजें आज भी मौजूद हैं। जैसे कि बांध, सड़कें, एक्सप्रेसवे, बुद्ध सर्किट।
पावर प्लांट्स और सीमेंट प्लांट्स किसी और के मालिकाना हक में ही सही लेकिन चल तो रहे हैं। अगर इतने साल में कुछ खत्म हुआ है, तो वो खुद जेपी ग्रुप ही है। जो अब अदाणी ग्रुप में विलीन हो गया।