पोखडा ब्लाक विकास मंच
We wish to initiate a movement for upliftment of POKHRA block area. All r requested to put his/her suggestions and join this movement.
23/01/2026
अब AI बोलेगा गढ़वाली में भी!
उत्तराखंड के दो IT इंजीनियरों ने रच दिया इतिहास 🏔️🤖
उत्तराखंड के दो होनहार IT इंजीनियर युवाओं ने वो कर दिखाया है, जिस पर हर पहाड़ी को गर्व होगा।
सुमितेश नैथानी और आदित्य नौटियाल ने मिलकर एक ऐसा पहाड़ी AI मॉडल तैयार किया है, जो किसी भी भाषा में सवाल पूछने पर जवाब गढ़वाली में देता है।
आज जब AI पूरी दुनिया में छाया हुआ है, उसी दौर में इन युवाओं ने गढ़वाली जैसी लोकभाषा को तकनीक से जोड़कर उसे नई पहचान दी है। यह AI न सिर्फ भाषा को समझता है, बल्कि पहाड़ी संस्कृति, भाव और बोलचाल को भी ज़िंदा रखता है।
👉 यह पहल सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं,
👉 अपनी मातृभाषा और संस्कृति को बचाने का प्रयास है।
पहाड़ की बोली अब डिजिटल दुनिया में भी गूंजेगी।
यही है असली Make in Uttarakhand, Make for Uttarakhand 🇮🇳🏔️
प्राय आजकल यह देखा गया है कि उत्तराखंडी संस्थाओं में होड़ लगी है “ उत्तरायणी “ के नाम पर अनाप सनाप प्रोग्राम करने की। यद्यपि यह समाज को एक तरह से जागरूक करने की दिशा में एक अच्छा कदम दिखता है लेकिन क्या यह वास्तव में समाज को कुछ सार्थक देकर जा रहा है कि नहीं , यह एक यक्ष प्रश्न है।
मेरे विचार से यदि कुछ सार्थकता से देखा जाय तो अपनी वास्तविक उत्तरायणी- संस्कृति के बारे में विस्तृत रूप से बतलाने का यह एक बहुत सुंदर अवसर होता है
सभी संस्थाओं व सांस्कृतिक समूहों से आग्रह है कि बी इन अवसरों पर अधिक से अधिक अपने उत्तराखंडी महापुरुषों , रीति रिवाजों , ख़ान पान , पहनावे , सांस्कृतिक - विविधताओं और इतिहास से नई पीढ़ी को अवश्य अवगत करवायें ताकि उत्तराखंड अभी से एक ‘इतिहास’ न बन जाए।
इसी संदर्भ में नाटकों की अभिव्यक्ति व वक्ताओं का चयन करके प्रस्तुत किया जा सकता है।
17/11/2025
उत्तराखंड ने शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य सरकार ने मदरसा बोर्ड को समाप्त करते हुए “वन नेशन, वन एजुकेशन” के सिद्धांत की दिशा में बड़ा निर्णय लिया है। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक 2025 को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत अब सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान — जिनमें मदरसे भी शामिल हैं — उत्तराखंड स्कूल शिक्षा बोर्ड के अंतर्गत आ जाएंगे।
इस फैसले के बाद अब मदरसों में भी गणित, विज्ञान, कंप्यूटर और अंग्रेज़ी जैसे आधुनिक विषयों की पढ़ाई धार्मिक शिक्षा के साथ कराई जाएगी। इससे हर बच्चे को समान अवसर और आधुनिक शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित होगी। यह बदलाव न केवल शिक्षा व्यवस्था को एकीकृत करेगा, बल्कि समाज में समावेशिता और समानता की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।
इस कानून के तहत राज्य में उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाएगा, जो सभी अल्पसंख्यक संस्थानों की निगरानी और नियमन करेगा। इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के अनुरूप लागू किया जाएगा, जिससे शिक्षा में पारदर्शिता और एकरूपता लाई जा सके।
समर्थक इसे समानता और सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक सुधार बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग पारंपरिक शिक्षा की स्वायत्तता को लेकर चिंतित हैं। फिर भी, यह फैसला भारत में एकीकृत और आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नई शुरुआत माना जा रहा है।
16/05/2025
पलायन ..
धीरू पलायन पर परेशान देहरादून स्थित अपने किराये के मकान की छत पर शाम को ठंडी बियर और के एफ सी चिकन के तन्दूरी लेग पीस के साथ उत्तराखंड के पहाड़ी गावों से हो रहे पलायन पर फेसबुक में अपने क्रांतिकारी विचार लिखते हुए सरकारों को कोस रहा था !!! कि अचानक ग्रुप में एक मैसेज पढ़कर वह चौंक गया , लिखा था पहाड़ी गाँवों में जमीन चाहिए , और कीमत देहरादून के बराबर , नीचे नम्बर लिखा था !! तुरन्त उसने नम्बर पर सम्पर्क किया ओर अगले दिन मिलने जा पहुंचा उस न0 के बताए पते पर जो एक सरदार जी थे !!
धीरू उनको अपने गाँव ले गया और अपनी पुश्तेनी जमीन दिखाई ,पूरी जमीन का सौदा तय हो गया ,धीरू को 25 लाख मिल गए !!
धीरू पूछे बिना भी न रह पाया कि सरदार जी पहाड़ों से सारे लोग छोड़कर जा रहे हैं और आप यहां इतनी महंगी जमीन ले रहे हो ?? सरदार भी उख्खड़ दिमागी थे , कहन लगे ..तू आम खा ...पेड़ रहने दे !!!!
उसने भी फटाफट एक छोटा सा प्लाट देहरादून में लिया और 2 कमरे डाल दिए अब वह भी देहरादून वाला हो गया ।
इस बात को 10 साल गुजर गए !! धीरू सरदार को बेची अपनी जमीन देखने गया तो वहां अब शानादार कॉटेज बने थे ,जहां अंग्रेज बाँज के पेड़ों पर गोवा जैसे झूले लटकाकर आराम फरमा रहे थे , कॉटेज के रिसेपशन में पहुँच कर जब उसने वहाँ स्टे का भाड़ा पूछा तो पता चला , कोदे की रोटी ,झंगोरे की खीर ओर मुला की थिचोनी और हिमालयन बकरी की कचमोली के साथ कुल मिलाकर सात से दस हजार हर रोज का किराया था !!! ओर योगा क्लाश के एक हप्ते के 10 हजार अलग से । उसने वहां एक कप घरेलू गाय के दूध की चाय पी जिसके 50 रु का बिल आया।
धीरू के बच्चे भी अब बड़े हो गए थे जो अब दिल्ली में जॉब कर रहे थे ओर दिल्ली की एक पुरानी बस्ती में 8x10 के एक कोठरी में रात काट रहर थे क्योकि वे सुबह शाम तो डीटीसी की बसों में लटके रहते ओर दिन भर फेक्ट्रियो में शरीर गलाते । थकान से चूर वे रात काटने ही अपने इस क्वाटर में आते।
इधर धीरू की देहरादून वाली छत के आस पास अब ऊँची छते उग आई थी , खुद उसकी छत उसकी कुंवें की सी मांद सी हो गई थी , वह दिनभर 10x12 के कमरे और टीवी तक सीमित था , अब उसे गाँव की बड़ी याद आती थी , वो खुलापन , वो हरियाली , वो हवा पानी , वो सकूँ ?? पर अब धीरू की जड़ें गाँव से उखड़ चुकी थी , दुबारा उन जड़ों को वहां रोपना असम्भव था , क्योंकि अब उन जड़ों का अपने गांव की जमीन से अस्तित्व कब का खत्म हो चुका था ।
जय देवभूमि जय उत्तराखण्ड
चलो गांव की ओर वरना पछताओगे
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