Indian Muslim & Dalit Development Front

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समाज को बेहतरी और बराबरी दिलाने की एक शुरुआत

18/05/2026

आज लोग चाहे जो कहें, #लेकिन_इतिहास_के_पन्नों_को_पलटकर देखा जाए तो #पसमांदा समाज की लड़ाई कोई आज की कहानी नहीं है।
इस संघर्ष की बुनियाद रखने वालों में सबसे पहले नाम आता है जनाब का, जिन्होंने उस दौर में पसमांदा समाज की आवाज़ बुलंद की जब इस विषय पर बोलना भी आसान नहीं था।

इसके बाद बाबा-ए-क़ौम जनाब ने सामाजिक बराबरी, सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए पूरी ज़िंदगी संघर्ष किया।
उन्होंने सिर्फ भाषण नहीं दिए, बल्कि समाज को एक सोच, एक दिशा और एक हौसला दिया।

#लेकिन_समय_के_साथ_पसमांदा समाज की आवाज़ जैसे धीरे-धीरे #ठंडे_बस्ते में डाल दी गई।
मंच सजते रहे, भाषण होते रहे, मगर ज़मीनी मुद्दे पीछे छूटते चले गए।

फिर 1990 #के_दश_में_एक_आवाज_बुलंद_हुई_वो_आवाज़_थी_जनाब_Ali_Anwar_Ansari_साहब की।

#अली_अनवर_साहब_ने_पसमांदा_समाज_के_दर्द को सिर्फ महसूस नहीं किया, #बल्कि_उसे_आंदोलन बना दिया।
उन्होंने उन लोगों को जुबान दी जिनकी बातें वर्षों से दबाई जा रही थीं।

#साल_1998_में_पसमांदा_मुस्लिम_महाज” #आंदोलन_का_जन्म हुआ और यहीं से एक नई #सामाजिक_चेतना_ने_आकार_लिया।
#अली_अनवर_साहब_ने_सड़क से लेकर #संसद तक पसमांदा समाज के #सवालों_को_मजबूती से उठाया।
उन्होंने बराबरी, शिक्षा, आरक्षण, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी जैसे #मुद्दों_को_राष्ट्रीय_बहस का हिस्सा बनाया।

आज बहुत से लोग आसानी से अली अनवर साहब पर #लेख_लिख_देते_हैं_आलोचना कर देते हैं, लेकिन शायद उन्हें यह समझना चाहिए कि —

“ #अली_अनवर_बनना_आसान नहीं होता।”

क्योंकि कोई भी आंदोलन सिर्फ नारों से नहीं बनता,
उसके पीछे वर्षों का संघर्ष, तिरस्कार, विरोध, त्याग और समाज के लिए समर्पण छुपा होता है।

#अली_अनवर_साहब_जैसे_शख्सियत_पर_टिप्पणी करने से पहले #लोगों_को_अपने_गिरेबान में झांक कर देख लेना चाहिए कि —
#हमने_समाज के लिए क्या किया है?
किस मजबूर की आवाज़ बने हैं?
किस वंचित तबके को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष किया है?

#सिर्फ_सोशल_मीडिया_पर_दो_लाइन_लिख देने से कोई #आंदोलनकारी नहीं बन जाता।
समाज के दर्द को जीना पड़ता है, अपमान सहना पड़ता है, विरोध के बीच डटे रहना पड़ता है, तब जाकर कोई शख्स एक आंदोलन की पहचान बनता है।

पसमांदा आंदोलन कोई राजनीतिक फैशन नहीं,
बल्कि उन लोगों की लड़ाई है जिन्होंने सदियों की बेआवाज़ी को आवाज़ देने की कोशिश की।

और #इतिहास_हमेशा_उन_लोगों_को_याद_रखता है
जो भीड़ का हिस्सा नहीं बने,
बल्कि #भीड़_को_रास्ता दिखाने का काम किया।

गुलरेज़ अहमद अंसारी
प्रदेश उपाध्यक्ष ईबीसी कांग्रेस बिहार

Irfaan Ali Jamiawala

10/05/2026
27/04/2026

शिक्षा का क्या महत्व है भोजपुरी में इस महान गायक ने खूब अच्छे से समझाया है।
#शिक्षा

26/04/2026

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प गिरे फिर उठे और भागे सुरक्षा कर्मी उन्हें सुरक्षित लेके गए। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को सुरक्षा कर्मी लेके भागे।
ये सब हुआ व्हाइट हाउस के डिनर के प्रोग्राम में जब किसी अनजान सख्स ने ओपन फायरिंग कर दिया।
Donald J. Trump Ivanka Trump POTUS 44

26/04/2026

I got over 500 reactions on my posts last week! Thanks everyone for your support! 🎉

22/04/2026

आप चाहे सौदेबाजी हज़ार करोड़ का कर लें लेकिन सम्मान नहीं ख़रीद सकते हैं सम्मान तो आम आदमी से ही मिलेगा हुमायूँ कबीर को अब चारों तरफ़ से नफ़रत का सामना करना पड़ रहा है और लोग उसे बीजेपी का दलाल बोल का उसका मज़ाक़ उड़ा रहे हैं और उसके मुँह पर सामने से बोल रहें हैं। बेचारा बेबस कुछ नहीं बोल पा रहा है।

19/04/2026

सम्मान सबसे बड़ा धरोहर है।

13/01/2026

ईरान के लोगों के नाम — आयशा क़ज़्ज़ाफी (वायरल पैग़ाम)

आयशा इस वक़्त सल्तनत ओमान 🇴🇲 में पनाहगज़ीर हैं
उनका ये पैग़ाम जून 2025 का है जो अब वायरल है

ए अज़ीम, बहादुर और ग़ैरतमंद ईरानी अवाम!

मैं तुमसे उस दिल के साथ मुख़ातिब हूँ जो दर्द, तबाही और फ़रेब देख चुका है—

एक ऐसी औरत की आवाज़ से, जिसने अपने वतन की मौत अपनी आँखों से देखी है।

मैं आयशा क़ज़्ज़ाफी, लीबिया के साबिक़ क़ायदे मुअम्मर क़ज़्ज़ाफी की बेटी— तुमसे यह कहना चाहती हूँ कि पश्चिमी मुल्कों की मुस्कुराहटें और वादे सिर्फ़ दिखावा होते हैं,
इनमें ना ख़ुलूस होता है और ना दोस्ती।

इन्हीं लोगों ने मेरे वालिद से कहा था , अगर तुम अपना न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम छोड़ दोगे तो दुनिया तुम्हारे लिए खुल जाएगी।

लेकिन हक़ीक़त क्या निकली? नाटो की बमबारी ने लीबिया को ख़ून, आग और राख में बदल दिया।

आज मैं तुमसे कहती हूँ

पश्चिम की झूठी बातों में मत आओ।
क़ुर्बानी और ख़ुदारी ही असली आज़ादी की निशानी हैं।
जद्दोजहद (संघर्ष) को मत भूलो, क्योंकि समझौता अक्सर आने वाली तबाही की दावत बनता है।

तारीख़ गवाह है
जो क़ौमें सीना तानकर खड़ी रहीं, वो आज इज़्ज़त से ज़िंदा हैं;
और जो झुक गईं, उन्हें ज़माना भूल चुका है।

ऐ मेरे ईरानी भाइयों और बहनों — तुम्हारी हिम्मत, सब्र और इस्तिक़ामत (स्थिरता) ही तुम्हारा असल हथियार है।

मुहब्बत और हमदर्दी के साथ,

आयशा क़ज़्ज़ाफी

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