विचाराभिव्यक्ति

विचाराभिव्यक्ति

Share

यह विचारों का कर्मक्षेत्र है।

17/03/2026

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
किसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ

न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं
न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ

मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया
जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ

न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

19/01/2026

मौन का अर्थ चुप रह जाना नहीं, बल्कि अंदर की स्थिरता है।
जब कोई परिस्थिति हमें चुनौती देती है—अपमान, हानि, असफलता, गलतफ़हमी, या विरोध—तो हमारा मन तुरंत प्रतिक्रिया देना चाहता है। क्रोध, डर, सफ़ाई, तर्क, आरोप… ये सब मन के शोर हैं।
और शोर में कभी सही निर्णय नहीं होता।
मौन वह स्थिति है जहाँ
आप परिस्थिति के भीतर नहीं, उसके ऊपर खड़े हो जाते हैं।
उस क्षण आप प्रतिक्रिया नहीं करते, आप उत्तर देते हैं।
प्रतिक्रिया बाहर से आती है, उत्तर भीतर से।
जब व्यक्ति मौन में रहता है, तब:
वह दूसरे के शब्दों से नहीं हिलता
वह परिस्थिति की ऊर्जा में नहीं बहता
वह अपनी शक्ति को बचाए रखता है
यही कारण है कि मौन कमजोर नहीं, अत्यंत शक्तिशाली है।
जब आत्मा स्वयं को शांत, स्थिर और साक्षी रूप में अनुभव करती है, तब कोई भी बाहरी तूफ़ान उसे हिला नहीं सकता।
जिसके भीतर शांति है, उसके सामने परिस्थिति हार जाती है।
और जिसके भीतर अशांति है, वह छोटी-सी बात से भी टूट जाता है।
मौन हमें तीन अद्भुत क्षमताएँ देता है:
पहली – स्पष्टता
मौन में बुद्धि साफ़ देख पाती है कि क्या सही है, क्या नहीं।
शोर में हम केवल भावनाओं से सोचते हैं।
दूसरी – ऊर्जा संरक्षण
बहस, शिकायत और प्रतिक्रिया हमारी शक्ति चुरा लेते हैं।
मौन उस शक्ति को बचाकर रखता है।
तीसरी – आत्मसम्मान
जब आप हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देते,
तो आप दूसरों को सिखाते हैं कि आपकी शांति सस्ती नहीं है।
जब आप आत्मा-चेतना में, परमात्मा की याद में स्थिर रहते हैं,
तब बाहर चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, अंदर विजय बनी रहती है।
इसलिए मौन का अर्थ हार मानना नहीं,
बल्कि यह कहना है—
“मैं परिस्थिति नहीं हूँ, मैं उसे देखने वाला आत्मा हूँ।”
यही वास्तविक विजय है।
ओम शांति।

05/01/2026
21/02/2025

क्यों विलासी भावना से
तुम मलिन मन कर रही हो ?
प्रेम दर्शन का विषय है
तुम प्रदर्शन कर रही हो !

क्या नही तुमने सुनी है प्रीत की पावन कहानी ?
कृष्ण की बनकर रही हैं राधिका , मीरा दीवानी ?
राम ने मां जानकी हित सिंधु पर था सेतु बाँधा।
क्या नही तुमने पढ़ी है शिव सती की पुण्य गाथा ?

तुम समय के केंद्र में क्यों
व्यर्थ नर्तन कर रही हो ?
प्रेम दर्शन का विषय है
तुम प्रदर्शन कर रही हो !

प्रीत के सच्चे उपासक प्रेयसी सब जानते हैं।
एक स्नेहिल दृष्टि को वो सृष्टि अपनी मानते हैं।
हाथ के स्पर्श तक को पाप की संज्ञा बताते।
आह ! ये निश्छल रसिक अब हैं कहां जीवन बिताते ?

क्यों प्रणय की इस प्रथा का
मान मर्दन कर रही हो ?
प्रेम दर्शन का विषय है
तुम प्रदर्शन कर रही हो !

जानती हो , इस सदी के ये युगल क्या कर रहे हैं ?
चेतना की पीठिका पर वासना को धर रहे हैं।
प्रेमियों ! सच में तुम्हारी मर चुकी संवेदना है।
नेह में क्यों देह का ही ध्येय तुमको भेदना है ?

नेह से निर्मित भवन का
क्यों प्रभंजन कर रही हो ?
प्रेम दर्शन का विषय है
तुम प्रदर्शन कर रही हो !
© Sameer Tiwari ❤️

18/02/2025

इस चित्र को देखकर कुछ काव्य पंक्तियां कमेंट में लिखें~

15/02/2025

चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं सिर्फ चार कौए थे काले ,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले ,
उनके ढंग से उड़ें , रुकें , खायें और गायें,
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें



कभी – कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया – भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए
इनके नौकर चील , गरुड़ और बाज हो गए



हंस , मोर , चातक , गौरैयें किस गिनती में
हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगाए
पिऊ – पिऊ को छोड़ें कौए – कौए गायें

बीस तरह की काम दे दिए गौरैयों को
खान–पीना मौज उड़ाना छुट भैयों को
कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में
बड़े बड़े मनसूबे आए उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ रह गए बैठे ठाले

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौवों का दिन है
उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना

– भवानीप्रसाद मिश्र .

27/12/2024

निखिल सचान ने आईआईटी निकाला. आईआईएम भी.
हम निखिल सचान को ऐसे जानते हैं कि वो किताबें लिखते हैं. हिंदी की किताबें, जिनके कवर की फोटो को फिल्टर लगाकर इंस्टाग्राम पर डालो तो कोई चूं नहीं करता. निखिल कानपुर के हैं. आइए आज एक कविता रोज़ में पढ़ते हैं उनकी एक कविता.

मेरा इक दोस्त अक्सर कहता था, कि ये
कौमी एकता की बातें
बस कहने में अच्छी लगती हैं.
कहता था, कि तुम कभी
मुसलमानों के मोहल्ले में
अकेले गए हो ?
कभी जाकर देखो. डर लगता है.
वो मुसलमानों से बहुत डरता था
हालांकि उसे शाहरुख़ खान बहुत पसंद था
उसके गालों में घुलता डिम्पल
और उसकी दीवाली की रिलीज़ हुई फ़िल्में भी
दिलीप कुमार यूसुफ़ है, वो नहीं जानता था
उसकी फिल्में भी वो शिद्दत से देखता था
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो इंतज़ार करता था आमिर की क्रिसमस रिलीज़ का
और सलमान की ईदी का
गर जो ब्लैक में भी टिकट मिले
तो सीटियां मार कर देख आता था
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो मेरे साथ इंजीनियर बना
विज्ञान में उसकी दिलचस्पी इतनी कि
कहता था कि अब्दुल कलाम की तरह
मैं एक वैज्ञानिक बनना चाहता हूं
और देश का मान बढ़ाना चाहता हूं
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो क्रिकेट का भी बड़ा शौक़ीन था
ख़ासकर मंसूर अली खान के नवाबी छक्कों का
मोहोम्मद अज़हरुद्दीन की कलाई का
ज़हीर खान और इरफ़ान पठान की लहराती हुए गेंदों का
कहता था कि ये सारे जादूगर हैं
ये खेल जाएं तो हम हारें कभी न पाकिस्तान से
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो नरगिस और मधुबाला के हुस्न का मुरीद था
उन्हें वो ब्लैक एंड व्हाईट में देखना चाहता था
वो मुरीद था वहीदा रहमान की मुस्कान का
और परवीन बाबी की आशनाई का
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो जब भी दुखी होता था तो मुहम्मद रफ़ी के गाने सुनता था
कहत था कि ख़ुदा बसता है रफ़ी साहब के गले में
वो रफ़ी का नाम कान पर हाथ लगाकर ही लेता था
और नाम के आगे हमेशा लगाता था साहब
अगर वो साहिर के लिखे गाने गा दें
तो ख़ुशी से रो लेने का मन करता था उसका
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो हर छब्बीस जनवरी को अल्लामा इकबाल का
सारे जहां से अच्छा गाता था
कहता था कि अगर
गीत पर बिस्मिल्ला खान की शहनाई हो
और ज़ाकिर हुसैन का तबला
तो क्या ही कहने!
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

उसे जब इश्क़ हुआ तो लड़की से
ग़ालिब की ग़ज़ल कहता
फैज़ के चंद शेर भेजता
उन्ही उधार के उर्दू शेरों पर पर मिटी उसकी महबूबा
जो आज उसकी पत्नी है
वो इन सब शायरों से नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

बड़ा झूठा था मेरा दोस्त
बड़ा भोला भी
वो अनजाने ही हर मुसलमान से
करता था इतना प्यार

फिर भी न जाने क्यों कहता था, कि वो
मुसलमानों से डरता था
वो मुसलमानों के देश में रहता था
ख़ुशी ख़ुशी, मोहोब्बत से
और मुसलमानों के न जाने कौन से मोहल्ले में
अकेले जाने से डरता था

दरअसल
वो भगवान के बनाए मुसलमानों से नहीं डरता था
शायद वो डरता था, तो
सियासत, अख़बार और चुनाव के बनाए
उन काल्पनिक मुसलमानों से
जो कल्पना में तो बड़े डरावने थे
लेकिन असलियत में ईद की सेंवईयों से जादा मीठे थे
(आभार ~निखिल सचान ने आईआईटी निकाला. आईआईएम भी.
हम निखिल सचान को ऐसे जानते हैं कि वो किताबें लिखते हैं. हिंदी की किताबें, जिनके कवर की फोटो को फिल्टर लगाकर इंस्टाग्राम पर डालो तो कोई चूं नहीं करता. निखिल कानपुर के हैं. आइए आज एक कविता रोज़ में पढ़ते हैं उनकी एक कविता.

मेरा इक दोस्त अक्सर कहता था, कि ये
कौमी एकता की बातें
बस कहने में अच्छी लगती हैं.
कहता था, कि तुम कभी
मुसलमानों के मोहल्ले में
अकेले गए हो ?
कभी जाकर देखो. डर लगता है.
वो मुसलमानों से बहुत डरता था
हालांकि उसे शाहरुख़ खान बहुत पसंद था
उसके गालों में घुलता डिम्पल
और उसकी दीवाली की रिलीज़ हुई फ़िल्में भी
दिलीप कुमार यूसुफ़ है, वो नहीं जानता था
उसकी फिल्में भी वो शिद्दत से देखता था
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो इंतज़ार करता था आमिर की क्रिसमस रिलीज़ का
और सलमान की ईदी का
गर जो ब्लैक में भी टिकट मिले
तो सीटियां मार कर देख आता था
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो मेरे साथ इंजीनियर बना
विज्ञान में उसकी दिलचस्पी इतनी कि
कहता था कि अब्दुल कलाम की तरह
मैं एक वैज्ञानिक बनना चाहता हूं
और देश का मान बढ़ाना चाहता हूं
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो क्रिकेट का भी बड़ा शौक़ीन था
ख़ासकर मंसूर अली खान के नवाबी छक्कों का
मोहोम्मद अज़हरुद्दीन की कलाई का
ज़हीर खान और इरफ़ान पठान की लहराती हुए गेंदों का
कहता था कि ये सारे जादूगर हैं
ये खेल जाएं तो हम हारें कभी न पाकिस्तान से
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो नरगिस और मधुबाला के हुस्न का मुरीद था
उन्हें वो ब्लैक एंड व्हाईट में देखना चाहता था
वो मुरीद था वहीदा रहमान की मुस्कान का
और परवीन बाबी की आशनाई का
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो जब भी दुखी होता था तो मुहम्मद रफ़ी के गाने सुनता था
कहत था कि ख़ुदा बसता है रफ़ी साहब के गले में
वो रफ़ी का नाम कान पर हाथ लगाकर ही लेता था
और नाम के आगे हमेशा लगाता था साहब
अगर वो साहिर के लिखे गाने गा दें
तो ख़ुशी से रो लेने का मन करता था उसका
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

वो हर छब्बीस जनवरी को अल्लामा इकबाल का
सारे जहां से अच्छा गाता था
कहता था कि अगर
गीत पर बिस्मिल्ला खान की शहनाई हो
और ज़ाकिर हुसैन का तबला
तो क्या ही कहने!
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

उसे जब इश्क़ हुआ तो लड़की से
ग़ालिब की ग़ज़ल कहता
फैज़ के चंद शेर भेजता
उन्ही उधार के उर्दू शेरों पर पर मिटी उसकी महबूबा
जो आज उसकी पत्नी है
वो इन सब शायरों से नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था

बड़ा झूठा था मेरा दोस्त
बड़ा भोला भी
वो अनजाने ही हर मुसलमान से
करता था इतना प्यार

फिर भी न जाने क्यों कहता था, कि वो
मुसलमानों से डरता था
वो मुसलमानों के देश में रहता था
ख़ुशी ख़ुशी, मोहोब्बत से
और मुसलमानों के न जाने कौन से मोहल्ले में
अकेले जाने से डरता था

दरअसल
वो भगवान के बनाए मुसलमानों से नहीं डरता था
शायद वो डरता था, तो
सियासत, अख़बार और चुनाव के बनाए
उन काल्पनिक मुसलमानों से
जो कल्पना में तो बड़े डरावने थे
लेकिन असलियत में ईद की सेंवईयों से जादा मीठे थे
(फेसबुक वॉल)

08/07/2024

शब्द किस तरह

कविता बनते हैं

इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए

आदमी को पढ़ो

क्या तुमने सुना कि यह

लोहे की आवाज़ है या

मिट्टी में गिरे हुए ख़ून

का रंग

लोहे का स्वाद

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो

जिसके मुँह में लगाम है।
" धूमिल "

02/05/2024

स्त्री सिर्फ़ तब तक
हमारी होती है
जब तक वो हमसे
रूठ लेती है,
लड़ लेती है
आँसू बहा बहा कर,
और दे देती है
दो चार उलाहना हमें /

कह देती है
जो मन में आता है उसके
बिना सोचे, बेधड़क
लेकिन जब वो देख लेती है
उसके रूठने का,
उसके आँसुओं का
कोई फर्क़ नहीं है
तो एकाएक वो
रूठना छोड़ देती है
रोना छोड़ देती है /

मुस्कुरा कर देने लगती है
ज़वाब हमारी बातों पर,
समेट लेती है वो ख़ुद को
किसी कछुए की तरह
अपने ही कवच में,
और हम समझ लेते हैं कि
सब कुछ ठीक हो गया है /

हम जान ही नहीं पाते
कि ये शान्त नहीं है
मृतप्राय हो चुकी है,
कहीं न कहीं
गला घोंट दिया है
उसने अपनी भावनाओं का,
और अब जो हमारे पास है,
वो हमारी हो कर भी
हमारी नहीं है /

क्योंकि स्त्री,
सिर्फ तब तक
हमारी होती है
जब तक प्रेम फैल रहा होता है //

【साभार - ओशो विचार 】

22/03/2024




एक दिन
चिरनिद्रा में सो कर ,
मैं मौन हो जाऊंगा ।

अधर सूख जाएंगे,
कंठ रुध जाएगा,
जिह्वा ठहर जाएगी,
रक्त की दौड़ ठहर जाएगी,
और माटी की तपिश ,
शीतलता प्राप्त कर लेगी।

उस दिन से
मैं अवश्य मौन हो जाऊंगा,
किंतु उससे पूर्व मौन होना!
मेरे बस में नहीं,
खून मे नहीं ,
और ,सोच में भी नहीं!

जिस दिन मैं
पूर्णतः मौन हो जाऊं
समझो कि मैं,
मैं हूं ही नहीं
पुष्कर
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

17/02/2024

वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया,
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

ना गिला किया ना ख़फ़ा हुए, युँ ही रास्ते में जुदा हुए,
ना तू बेवफ़ा ना मैं बेवफ़ा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

तुझे एतबार-ओ-यकीं नहीं, नहीं दुनिया इतनी बुरी नहीं,
ना मलाल कर, मेरे साथ आ, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

वो वफ़ाएँ थीं, के जफ़ाएँ थीं, ये ना सोच किस की ख़ताएँ थीं,
वो तेरा है, उसको गले लगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

वो ग़ज़ल की कोई किताब था , वो गुलों में एक गुलाब था,
ज़रा देर का कोई ख़्वाब था, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर,
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

वो उदास धूप समेट कर कहीं वादियों में उतर चुका,
उसे अब न दे मिरे दिल सदा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

ये सफ़र भी किताना तवील है , यहाँ वक़्त कितना क़लील है,
कहाँ लौट कर कोई आएगा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

कोई फ़र्क शाह-ओ-गदा नहीं, कि यहाँ किसी को बक़ा नहीं,
ये उजाड़ महलों की सुन सदा , जो गुज़र गया सो गुज़र गया!!

~बशीर बद्र साहेब 💐

Want your business to be the top-listed Government Service in Delhi?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Website

Address


Delhi
110092