04/09/2025
हम तो डूबेंगे सनम साथ में तुम्हे भी ले डूबेंगे। 😄😄
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04/09/2025
हम तो डूबेंगे सनम साथ में तुम्हे भी ले डूबेंगे। 😄😄
महाभारत के बारे में एक दिलचस्प व्याख्या है।
संजय, जिसने अपनी तीसरी आंख से महान युद्ध देखा, युद्ध के अंत में उस स्थान पर जाने का निर्णय किया जहाँ यह सबसे बड़ा युद्ध हुआ था; कुरुक्षेत्र। उन्होंने चारों ओर देखा और सोचा कि क्या यह युद्ध वास्तव में हुआ था, क्या पांडव और कृष्ण वास्तव में यहाँ खड़े थे, क्या कृष्ण ने वास्तव में भगवद्गीता का उपदेश इसी मैदान में दिया था जहाँ की मिट्टी ने हजारों लोगों का खून सोखा है।
'आप इसकी वास्तविक सच्चाई सच्चाई कभी नहीं जान पाओगे!', पीछे से किसी ने शांत स्वर में कहा।
संजय घूमे और देखा कि सफेद वस्त्रों में एक वृद्ध सूर्य कि चमकदार रौशनी और मैदान के धूल से घिरे उन्हें देख रहे हैं। वह बूढ़े थे। संजय को ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे समय किसी महत्वपूर्ण चीज़ के लिए कुछ पल के लिए ठहर गया हो।
बूढ़े आदमी ने गूढ़ रूप से कहा, 'मुझे पता है कि आप कुरुक्षेत्र युद्ध के बारे में जानने के लिए यहाँ आये हैं, लेकिन आप उस युद्ध के बारे में तब तक नहीं जान सकते जब तक आपको पता न हो कि असली युद्ध क्या है।'
संजय ने जवाब दिया, 'आपका क्या मतलब है?'
'महाभारत एक महाकाव्य है, एक गाथा है, शायद एक वास्तविकता है लेकिन निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह एक दर्शन है।'
संजय ने पूछताछ की, 'क्या आप मुझे बता सकते हैं कि इसमें दर्शन क्या है?'
'निश्चित रूप से', वृद्ध ने कहा।
'पांडव कुछ नहीं बल्कि आपकी पाँच इन्द्रियाँ हैं - दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श और ध्वनि। क्या आप जानते हैं कि कौरव क्या हैं?'
संजय शांत खड़े रहे।
'कौरव वो सौ बुराइयाँ हैं जो हर रोज आपकी इंद्रियों पर हमला करते हैं लेकिन आप उनसे लड़ सकते हैं। क्या आप जानते हैं कैसे?'
संजय ने फिर से अपना सर नहीं में हिलाया।
'जब कृष्ण आपके रथ की सवारी करते हैं!'
वृद्ध मुस्कुराये और संजय को और पूछने के लिए लालसा दी। वह संजय के अंदर आनंद उमड़ता देख सकते थे।
'कृष्ण आपकी आंतरिक आवाज, आपकी आत्मा, आपका मार्गदर्शक प्रकाश हैं और यदि आप अपने जीवन को अपने मार्गदर्शक के हाथों में देते हैं तो आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है।
संजय यह परिभाषा सुनकर आश्चर्य थे। उनके मन में एक और सवाल आया।
'अगर कौरव दोष हैं तो द्रोणाचार्य और भीष्म उनके लिए क्यों लड़ रहे हैं?'
वृद्ध ने दुखी होकर अपना सर हिलाया।
'इसका यही अर्थ है कि जैसे जैसे आप बड़े होते हो, अपने बुजुर्गों के प्रति आपकी धारणा बदलती है। जिन बुजुर्गों को अपने बढ़ते वर्षों में आपने सोचा था कि ये उत्तम है, निष्कलंक हैं, वे उतने भी निर्दोष नहीं हैं। उनमें भी दोष हैं। और एक दिन आपको यह तय करना होगा कि वे दोष अच्छे के लिए हैं या बुरे के लिए। तब आपको समझ आएगा कि आपको उनसे अच्छे के लिए लड़ना पड़ सकता है। यह बड़े होने का सबसे कठिन हिस्सा है और यही कारण है कि गीता महत्वपूर्ण है। '
संजय ज़मीन पर बैठ गए, इसलिए नहीं कि वो थक गए थे परन्तु इसलिए कि वो महाभारत की वास्तविकता और दर्शन को महसूस करने में असफल रहे और अब जो उन्हें सब समझ आ रहा था तो वो इन बातों कि विशालता के तले दबे जा रहे थे।
'कर्ण के बारे में क्या?' उन्होंने मंद आवाज में पूछा।
'आह!', वृद्ध ने कहा। 'आपने सर्वश्रेष्ठ को आखिरी के लिए बचाया था। कर्ण आपकी इंद्रियों का भाई है, वह आपकी इच्छा है, वह आपकी बुद्धि का हिस्सा है लेकिन वह बुराइयों के साथ खड़ा है। वह गलत महसूस करता है और दोष का साथ देने के लिए बहाने देता है, ठीक वैसे ही जैसे आपकी इच्छाएं करती हैं हर समय।'
महाभारत के व्यावहारिक सत्य को जानकर संजय अचंभे में पड़ गए।
संजय ने जमीन पर देखा, उनके मन में हजारों विचार चल रहे थे और वो उन सबको एक साथ बुन कर चीज़ों को समझने का प्रयत्न कर रहे थे। फिर जब उन्होंने ऊपर देखा तो पाया कि वह वृद्ध वहाँ से जा रहे थे। जैसे जैसे वो जा रहे थे, अँधेरा हो रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे प्रकाश जा रहा हो।
तीसरी आँख जिसने उन्हें आज तक सब कुछ दिखाया, उसी ने संजय को जीवन का अंतिम दर्शन भी दिखाया, जो आगे चल कर इस दुनिया के लिए शिक्षण बन जाएगा।
21/03/2025
🕉️ नमो नारायण 🕉️
महर्षि वेद व्यास पाठशाला (ऑनलाइन गुरुकुल) सत्र एक बार फिर संस्कारों की कक्षा 7 अप्रैल से प्रारंभ करने जा रहा है।
आप सभी अपने बच्चे अपने परिवार, मित्रों, पड़ोसियों के बच्चों का शीघ्र से शीघ्र पंजीकरण करवा कर उन्हें संस्कारवान बनाएं।
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राजीव गुरू जी
MVVP गुरुकुल अध्यक्ष
8447567583
3 मनोरंजक लघु कथाएँ :
जरूर पढ़ें और आनंद लें।।
1. "दखल"
मैंने लिफ्ट में एक छोटे बच्चे को आइसक्रीम खाते देखा। चिंता के कारण, मैंने सहजता से कहा, "आज बहुत ठंड है; इसे खाने से तुम बीमार हो जाओगे!"
बच्चे ने उत्तर दिया, "मेरी दादी 103 साल तक जीवित रहीं।"
मैंने पूछा, "आइसक्रीम खाने से?"
उसने कहा, "नहीं, क्योंकि उसने कभी दूसरों के काम में दखल नहीं दिया!"
कितना गहन! मुझे आखिरकार समझ में आ गया कि मैं इतनी तेज़ी से बूढ़ा क्यों हो रहा हूँ - बहुत ज़्यादा अनावश्यक दखलंदाज़ी।
2. "तनाव"
आजकल हर जगह घोटालेबाज हैं। मैंने अभी-अभी समाचारों में लोगों की बचत के बारे में देखा - सायबर क्राईम से रुपए, चीजें गायब हो गए।
घबराकर, मैं अपनी बाइक पर बैंक गया, अपना कार्ड डाला, अपना पासवर्ड डाला और अपना बैलेंस चेक किया। शुक्र है, मेरे 750 रुपये अभी भी वहाँ थे। मैंने राहत की सांस ली।
यह सोचना तो बहुत ही तनावपूर्ण था! बहुत तनावपूर्ण!
जब मैं बैंक से बाहर निकला, तो मैं और भी थक गया था: मेरे 750 रुपये सुरक्षित थे, लेकिन मेरी बाइक गायब थी।
3. "संयम"
एक युवती ट्रेन में चढ़ी और उसने अपनी सीट पर एक आदमी को बैठे देखा। उसने विनम्रता से अपना टिकट चेक किया और कहा, "सर, मुझे लगता है कि आप मेरी सीट पर हैं।"
उस आदमी ने अपना टिकट निकाला और चिल्लाया, "ध्यान से देखो! यह मेरी सीट है! क्या तुम अंधी हो?"
लड़की ने ध्यान से उसका टिकट चेक किया और बहस करना बंद कर दिया। वह चुपचाप उसके पास खड़ी हो गई।
ट्रेन चलने के बाद, लड़की झुकी और धीरे से बोली, "सर, आप गलत सीट पर नहीं हैं, लेकिन आप गलत ट्रेन में हैं। यह मुंबई जा रही है, और आपका टिकट अहमदाबाद का है।"
😃
06/01/2025
घर में सब हैं पर यह हाल है उस बुजुर्ग का,
जिस दिन अखबार न आये अकेला हो जाता है!!
31/10/2024
बचपन वाली दीवाली!!
बचपन की दीपावली का मतलब छोटी दीवाली, बड़ी दिवाली और उसके बाद गंगा स्नान (कार्तिकी) की तैयारी हुआ करता था। धनतेरस और भैया दूज कम से कम हमारे गांव में तो उस समय तक तो नहीं मनाया जाता था। शायद टेलीविजन और वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण ये दोनों त्यौहार बाद में मनाए जाने लगे ।
उन दिनों दीपावली से लगभग 15 दिन पहले से ही इस त्यौहार की तैयारी शुरू हो जाती थी। सबसे पहले घर की पुताई के लिए दुकनहा गांव से बैलगाड़ी में भरकर सफेद मिट्टी लाई जाती थी और उस मिट्टी से घर के दरवाजे की पूरी दीवार पोती जाती थी। इस मिट्टी से पोतने के बाद दीवारें चांदी सी खिल उठती थी । पूरे घर के अंदर भी खूब जमकर साफ -सफाई की जाती थी।
घर के जो सदस्य शहर में रहते थे, उनका भी आगमन शुरू हो जाता था। घर की बहन बेटियां भी दीपावली में बुलाई जाती थी। हम बच्चों के लिए दीपावली का त्यौहार किसी वरदान से कम नहीं होता था। क्योंकि चाचा, भैया, बुआ आदि से हम किसी न किसी बहाने कुछ पैसे ऐंठ लिया करते थे और उन पैसों से अपने लिए छुरछुरी, छोटा तमंचा, उसमें चुटपुट करके दगने वाली रील की डिब्बी, दीवार पर फेंककर मारे जाने वाले आलू बम/ मिर्ची बम खरीद लिया करते थे।
चिटपुटिया पटाखे को पत्थर से मारकर जमीन पर भी फोड़ सकते थे। कुछ बहादुर लोग उसे जमीन पर रगड़कर पिट्ट-पिट्ट की आवाज निकाल लिया करते थे। एक सांप की टिक्की भी आती थी जो जलाने पर काले सांप जैसी राख छोड़ती थी।
जब हम कुछ बड़े हुए तो तमंचे का साइज बड़ा हो गया था। अब उसमें नली भी हुआ करती थी तथा चुटपुट करके दगने वाली रील की जगह इस बड़े तमंचे में एक बार मे प्रयोग होने वाली गोली (काग) का प्रयोग होने लगा था। दीपावली के इन दो- चार दिनों हम अपने को किसी सैनिक या दस्यु सम्राट से कम न समझते थे और ढूंढ ढूंढ कर निशाने लगाया करते थे। ज्यादातर निशाने कुत्तों पर लगते थे। यह तो अच्छा था कि हमारे गांव में कोई कुत्ता प्रेमी नहीं था, अन्यथा हम बचपन में ही जेल की हवा खा लेते।
दीपावली के दिन गाय के गोबर से आंगन की लिपाई की जाती थी। ऐसा लगता है कि उस पुताई और लिपाई की विलक्षण गंध अभी भी नथुनों में भरी हुई है। शाम को मिट्टी की बनी लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति का पूजन होता था और उसके बाद चिरैया, गट्टा, लाई आदि का प्रसाद तथा मिठाई खाने को मिलती थी।
पूजा के बाद सभी खेतों में दीपक रखे जाते थे। भगवान शंकर के चबूतरे, चरही, नाद, कुँवा, आफर (खलिहान), नल, चारा काटने की मशीन, चक्की, रहट, कोल्हू, हंसिया,खुरपा, फरुआ आदि पर भी दिए रखे जाते। घर के दरवाजे, पिछवारे, हर ताख, खिड़की और छत पर दिये या मोमबत्ती रखी जाती थी। इस काम में हम बाबा, पापा, चाचा का कुछ सहयोग कर दिया करते थे ।
शाम गहराते-गहराते पूरा घर, मोहल्ला और गांव दीयों की रोशनी से जगमगा उठता था। उस दिन दीपावली की रोशनी में पढ़ना विद्यार्थियों के लिए अत्यंत शुभ और आवश्यक माना जाता था। ऐसी मान्यता थी कि जो इस दिन पढ़ाई करेगा, उसका पूरे साल पढ़ाई में खूब मन लगेगा।
दीपावली के दिन हम जी भरकर पटाखे फोड़ते थे। उस समय किसी सुप्रीम कोर्ट या सरकार का कोई प्रतिबंध नहीं हुआ करता था। बस कभी असावधानी से पटाखे फोड़ने पर बड़ों की डांट जरूर मिल जाया करती थी।
हमारे मोहल्ले में एक राठौर फूफा थे (अभी भी हैं) जो मेरे दरवाजे से अपने दरवाजे के बीच बिना गांठ वाला एक मजबूत धागा या रस्सी बांधकर उसमें आग उगलती रेलगाड़ी दौड़ाया करते थे। यह दीपावली की रात की सबसे महंगी, आकर्षक और अंतिम आतिशबाजी हुआ करती थी।
दीपावली के दिन खूब स्वादिष्ट भोजन बनता था। पूरी/कचौड़ी, सब्जी और खीर बनना तो लगभग तय हुआ करता था। हम सभी बच्चे खूब भरपेट भोजन करते और जल्दी ही सो जाया करते थे क्योंकि सुबह जल्दी उठना होता था। लेकिन सोने से पहले उसी रात दीये में पारा हुआ काजल आंख में लगाना न भूलते थे क्योंकि ऐसा माना जाता था जो दीपावली के दिन काजल नहीं लगाता था, वह अगले जन्म में छछूंदर बनेगा।
दीपावली के अगले दिन हम सब बच्चे एक दूसरे से जल्दी सोकर उठने की कोशिश करते थे क्योंकि पहले उठने वाले बच्चे को ही सबसे ज्यादा दियाली मिलती थी। जिसके पास सबसे ज्यादा दियाली इकठ्ठा हो जाती, वह अपने को उस दिन का शहंशाह समझता था। फिर हम उन दियाली से जीत- हार का खेल खेलते थे।
खेल कुछ इस तरह होता था- दियाली को मिट्टी के एक कूरा (ढेर) में गाड़ दिया जाता। दूसरा वैसा ही मिट्टी का ढेर उसी के बराबर बनाकर खाली छोड़ दिया जाता। जिस खिलाड़ी की बारी होती, वह किसी एक ढेर पर उंगली रखता और अगर उसकी किस्मत अच्छी होती तो दियाली उसे मिल जाती थी, नहीं तो वह दियाली दूसरे खिलाड़ी की हो जाती थी। इस प्रकार यह खेल एक खिलाड़ी के सारे दिये जीतने या घरवालों के डांटने/ पीटने तक चलता रहता था।
इन दियों का हार-जीत का खेल खेलने के अलावा एक उपयोग यह होता कि हम लोग इन दियों को पानी में भिगोकर गीला करते तथा सुआ से इसमें तीन तरफ से छेद करके इसे तराजू बनाकर खेला करते थे। हालांकि यह दियों से हार-जीत का खेल और तराजू बनाना कुछ ही दिनों की मौज हुआ करती थी। दो-चार दिनों बाद दीये टूट जाते या फिर उनसे मन भर जाता था, उनके प्रति आकर्षण खत्म हो जाता था।
26/10/2024
अब पहुंचीं हो सड़क तुम गाँव?
जब पूरा गाँव शहर जा चुका है।
ुगाड़
आयकर अधिकारी ने एक वृद्ध करदाता को अपने कार्यालय बुलाया। वृद्ध करदाता ठीक समय पर पहुँच गया अपने वकील के साथ।
आयकर अधिकारी- आप तो रिटायर्ड हो चुके हैं, हमे पता चला। है आप बड़े ठाठ-बाट से रहते हैं, इसके लिए पैसा कहाँ से आता है?
वृद्ध करदाता- जुगाड़ में जीतता हूँ....
आयकर अधिकारी- हमे यकीन नहीं ....
वृद्ध करदाता- मैं साबित कर सकता हूँ! क्या आप एक नमूना देखना चाहते हैं?
आयकर अधिकारी- अच्छी बात है, जरा हम भी तो देखें...शूरू हो जाइए।
वृद्ध करदाता- एक हजार रूपए की शर्त लगाने के लिए क्या आप तैयार हैं? मैं यह दावा कर रहा हूँ कि मैं अपनी ही एक आँख को अपने ही दांत से काट सकता हूँ।
आयकर अधिकारी- क्या? नामुमकिन लग गई शर्त।
वृद्ध करदाता अपनी शीशे की एक कृत्रिम आँख निकालकर अपने दाँतों से काटता है!
आयकर अधिकारी ने हार मान ली और एक हजार रूपए वृद्ध करदाता को दे दिए।
करदाता- अब दो हजार की शर्त लगाने के लिए तैयार हैं?
मैं अपनी दूसरी आँख को भी काट सकता हूँ!
आयकर अधिकारी ने सोचा, जाहिर है कि यह अंधा तो नहीं है, इसकी दूसरी आँख शीशे की नहीं हो सकती! कैसे कर पायेगा? देखते हैं।
और बोला- लग गई शर्त!
करदाता ने अपनी नकली दांत मुंह से निकालकर अपनी आँख को काटा।
आयकर अधिकारी हैरान हुआ पर कुछ कह नहीं सका और चुप-चाप दो हजार रूपए दे दिए।
करदाता ने आगे कहा- आपके कमरे कोने पर जो कचरे का डिब्बा है मेरा दावा है कि मैं यहाँ आपकी मेज के सामने खड़े होकर सीधे उस डिब्बे के अंदर थूक सकता हूँ
और आपकी टेबल पर एक बूंद भी नहीं गिरेगी।
तभी वृद्ध के वकील ने जोर से चिल्लाया- मत लगाओ शर्त, मत लगाओ।
लेकिन आयकर अधिकारी नहीं माना ।
उसने देखा कि दूरी पन्द्रह फिट से भी ज्यादा है और कोई भी यह काम नहीं कर सकता! और इस बुड्ढे से तो ये बिल्कुल भी नहीं हो सकेगा!
इस तरह बहुत सोच-समझकर अपने खोए हुए पैसे को वापस जीतने की उम्मीद से वह शर्त लगाने के लिए तैयार हो गया।
वृद्ध के वकील ने माथा ठोक लिया।
वृद्ध मुंह नीचे करके शुरु हो गया, पर उसकी कोशिश नाकाम रही।
उसने आयकर अधिकारी की टेबल थूक से लबालब कर दिया, लेकिन आयकर अधिकारी बहुत खुश हुआ।
उसने देखा कि वृद्ध का वकील रो रहा है और वह शर्त जीत गया है।
उसने पूछा- क्या बात है वकील साहब?
वृद्ध के वकील ने कहा- आज सुबह इस शैतान ने मुझसे पचास हजार की शर्त लगाई थी कि वह इनकम टैक्स वालों की टेबल पर थूकेगा और बजाय नाराज होने के उल्टे खुश होंगे......
😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂
क्या आप जानते हैं , कि शब्दों का भी अपना एक संसार होता है?
*शब्द*
#शब्द *रचे* जाते हैं,
शब्द *गढ़े* जाते हैं,
शब्द *मढ़े* जाते हैं,
शब्द *लिखे* जाते हैं,
शब्द *पढ़े* जाते हैं,
शब्द *बोले* जाते हैं,
शब्द *तौले* जाते हैं,
शब्द *टटोले* जाते हैं,
शब्द *खंगाले* जाते हैं,
... इस प्रकार
शब्द *बनते* हैं,
शब्द *संवरते* हैं,
शब्द *सुधरते* हैं,
शब्द *निखरते* हैं,
शब्द *हंसाते* हैं,
शब्द *मनाते* हैं,
शब्द *रुलाते* हैं,
शब्द *मुस्कुराते* हैं,
शब्द *खिलखिलाते* हैं,
शब्द *गुदगुदाते* हैं,
शब्द *मुखर* हो जाते हैं
शब्द *प्रखर* हो जाते हैं
शब्द #मधुर* हो जाते हैं
... इतना होने के बाद भी
शब्द *चुभते* हैं,
शब्द *बिकते* हैं,
शब्द *रूठते* हैं,
शब्द #घाव देते* हैं,
शब्द *ताव देते* हैं,
शब्द *लड़ते* हैं,
शब्द *झगड़ते* हैं,
शब्द *बिगड़ते* हैं,
शब्द *बिखरते* हैं
शब्द *सिहरते* हैं
... परन्तु
शब्द कभी *मरते नहीं*
शब्द कभी *थकते नहीं*
शब्द कभी *रुकते नहीं*
शब्द कभी *चुकते नहीं*
... अतएव
शब्दों से *खेले नहीं*
*बिन सोचे बोले नहीं*
शब्दों को *मान दें*
शब्दों को * #सम्मान दें*
शब्दों पर *ध्यान दें*
शब्दों को *पहचान दें*
ऊंची लंबी *उड़ान दें*
शब्दों को *आत्मसात करें*
उनसे उनकी *बात* करें,
शब्दों का * #अविष्कार* करें
गहन सार्थक * #विचार करें ... क्योंकि
शब्द * #अनमोल* हैं
ज़ुबाँ से निकले *बोल* हैं
शब्दों में *धार* होती है
शब्दों की #महिमा *अपार* होती है
शब्दों का *विशाल भंडार* होता है
और
... सच तो यह है कि
*शब्दों *का* *भी*
*अपना एक #संसार है🌹🙏
18/10/2024
पूज्या व्यास कृष्णांगी गोमती जी द्वारा संचालित महर्षि वेद व्यास पाठशाला के माध्यम से गांव तीतरपुर रेवाड़ी हरियाणा में दस दिवसीय शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर लगाने का उद्देश्य गांव गांव गुरुकुल के माध्यम से गांव के बच्चो में संस्कारो का विकास हो और सनातन धर्म आगे बड़े। शिविर के चौथे दिन बच्चो ने संस्कारों के साथ साथ योग भी सीखा। आप सभी बच्चो से उम्मीद है आप सब इस संस्कार पाठशाला में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेंगे और पूज्या व्यास जी द्वारा दी जाने वाली शिक्षा और संस्कारों को अपने जीवन में उतारेंगे।
राजीव अग्रवाल
अध्यक्ष
महर्षि वेद व्यास पाठशाला
*जीवन के इन तीन चरणों में दुखी न हों:*
*(1) पहला कैंप :-58 से 65 वर्ष*
कार्यस्थल आपसे दूर हो जाता है।
अपने करियर के दौरान आप चाहे कितने भी सफल या शक्तिशाली क्यों न हों, आपको एक साधारण व्यक्ति ही कहा जाएगा। इसलिए, अपनी पिछली नौकरी या व्यवसाय की मानसिकता और श्रेष्ठता की भावना से चिपके न रहें
*(2) दूसरा कैंप :-65 से 72 वर्ष*
इस उम्र में, समाज धीरे-धीरे आपको दूर कर देता है। आपके मिलने-जुलने वाले दोस्त और सहकर्मी कम हो जाएँगे और आपके पिछले कार्यस्थल पर शायद ही कोई आपको पहचानता हो।
यह न कहें कि "मैं था..." या "मैं कभी था..." क्योंकि युवा पीढ़ी आपको नहीं पहचानेगी, और आपको इसके बारे में बुरा नहीं मानना चाहिए!
*(3) तीसरा कैंप :-72 से 77 वर्ष*
इस कैंप में, परिवार धीरे-धीरे आपको दूर कर देगा। भले ही आपके कई बच्चे और नाती-नातिन हों, लेकिन ज़्यादातर समय आप अपने साथी के साथ या अकेले ही रह रहे होंगे।
जब आपके बच्चे कभी-कभार आते हैं, तो यह स्नेह की अभिव्यक्ति है, इसलिए उन्हें कम आने के लिए दोष न दें, क्योंकि वे अपने जीवन में व्यस्त हैं!
और अंत में 77+ के बाद,
धरती आपको नष्ट करना चाहती है। इस समय, दुखी या शोक मत करो, क्योंकि यह जीवन का अंतिम चरण है, और हर कोई अंततः इसी मार्ग का अनुसरण करेगा!
*इसलिए, जब तक हमारा शरीर अभी भी सक्षम है, जीवन को भरपूर जिएँ!*
*आपका*
*जो पसंद है वो खाएँ,*
*पीएँ, खेलें और जो पसंद है वो करें।*
*खुश रहें, खुशी से जिएँ..*
*प्रिय वरिष्ठ नागरिक भाइयों और बहनों*,
*उपरोक्त लेख लेखक द्वारा बहुत बढ़िया लिखा गया है।*
*लेखक को बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई*।
58+ के बाद दोस्तों का एक समूह बनाएँ और कभी-कभार एक निश्चित स्थान पर, एक निश्चित समय पर मिलते रहें। टेलीफोनिक संपर्क में रहें। पुराने जीवन के अनुभवों को याद करें और एक-दूसरे के साथ साझा करें।
*हमेशा खुश रहें।🙏*
04/10/2024