13/07/2026
यह हरामखोर कुशवाहा भरत तिवारी के विषय में बोल रहा था फिर लोगों ने पड़कर इसका अच्छे से स्वागत किया।।
#सवर्ण_समाज_अपनी_पार्टी_अपना_राज
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11/07/2026
संविधान का वो अनुच्छेद कौन सा है जो कहता है कि जाति-धर्म-वर्ग-नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं होगा, सभी के साथ समानता का व्यवहार होगा। ये प्रावधान अभी भी अस्तित्व में हैं या १०६ संशोधन के चलते निष्प्रभावी हो गए हैं????
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06/07/2026
आरक्षण का कमाल👇
-40 अंक में मेडिकल
0 अंक पर बीएड
3.65% अंक में IIT
ऐसे ही तो बनेंगे हम "विश्वगुरु"!!🤔
और अधिकांश कमाल तो इस बीजेपी के शासन में देखने को मिला मगर अंधभक्त नहीं मानेंगे..🤐
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04/07/2026
🖋️ फेसबुक पोस्ट
क्या भारत अपनी प्रतिभाओं को पूरा अवसर दे पा रहा है?
आज दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियों का नेतृत्व भारतीय मूल के लोग कर रहे हैं। यह हम सभी के लिए गर्व की बात है। लेकिन साथ ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या भारत में हर प्रतिभाशाली व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार आगे बढ़ने का समान अवसर मिल रहा है?
आरक्षण पर समाज में अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग इसे सामाजिक न्याय का आवश्यक माध्यम मानते हैं, तो कुछ का मानना है कि योग्यता और अवसर के बीच बेहतर संतुलन होना चाहिए। इस विषय पर विचार-विमर्श तथ्यों, संवेदनशीलता और सम्मान के साथ होना चाहिए।
हमारा लक्ष्य ऐसा भारत होना चाहिए जहाँ— ✅ हर प्रतिभा को अवसर मिले।
✅ शिक्षा और रोजगार में पारदर्शिता हो।
✅ सामाजिक न्याय और योग्यता, दोनों का संतुलन बना रहे।
✅ किसी भी युवा को अपनी क्षमता साबित करने के लिए देश छोड़ने की मजबूरी न हो।
देश तभी आगे बढ़ेगा जब हर योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ने का निष्पक्ष अवसर मिलेगा।
आपकी राय क्या है?
क्या भारत की वर्तमान व्यवस्था में कोई सुधार होना चाहिए? अपनी बात शालीनता और तथ्यों के साथ कमेंट में रखें।
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03/07/2026
"मैं भारत समेत किसी भी दूसरे देश में CEO नहीं बन सकती थी, यह सिर्फ अमेरिका में संभव हुआ, क्योंकि वहाँ मेरिट को महत्व दिया जाता है।" - पूर्व PepsiCo CEO इंदिरा नूयी
कितने प्यार से सहला के गाल पे दिया है भारत के रिजर्वेशन पॉलिसी फेवर करने वालो पे.. 😄
भारत के लाखों बच्चे चले जाते है बाहर, क्यूँ.. क्यूंकि वहां मेरिट बेस्ड है सब, होनहार बच्चो के माँ बाप लोन लेकर चाहे जैसे भी हो अपने बच्चों को यहाँ रखना ही नहीं चाहते क्यूंकि उन्हें लगता है या भविष्य है ही नहीं मेरिट का..
दिखता भी है और सरकार की पॉलिसी भी ऐसी ही है अधिकतर.. ज़ब यहाँ इतना पैसा खर्च करना है तो बाहर विदेश में ही क्यूँ नहीं करेगा कोई.. 🙏
और अब तो नई पॉलिटिक्स चल पड़ी प्राइवेट सेक्टर में भी रिजर्वेशन...
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30/06/2026
राजपूत समाज: 'शासन' से 'मोहताजी' तक का राजनीतिक चक्रव्यूह—क्या हम अब भी नहीं जागेंगे?
आज एक कड़वा सच स्वीकार करना होगा: जो समाज कभी व्यवस्था का संचालक हुआ करता था, आज वह उसी व्यवस्था के सामने 'मोहताज' बनकर खड़ा है।
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि पिछले सात दशकों में रची गई वह राजनीतिक साजिश है, जिसने राजपूतों की उस 'ऊर्जा' को कुचलने का काम किया है।
1. पहचान का सुनियोजित खात्मा:
राजनीति ने राजपूतों की 'स्वाभिमान' की परिभाषा को बदलकर उसे 'अहंकार' का नाम दिया।
उन्होंने हमारी गौरवशाली परंपराओं को 'सामंतवाद' के नाम पर बदनाम किया ताकि समाज का युवा अपनी जड़ों से शर्मिंदा महसूस करे। जब युवा
अपनी पहचान पर गर्व करना छोड़ देता है, तो उसकी मानसिक ऊर्जा खत्म हो जाती है—यही तो वह पहला चरण था जिससे हमने अपने खोने की शुरुआत की।
2. सत्ता की मोहताजी का कड़वा सच:
हमें एक ऐसा 'पात्रता का जाल' पहनाया गया, जहाँ हमें 'धनी' और 'संपन्न' बताकर हर सरकारी योजना से बाहर रखा गया।
आज स्थिति यह है कि एक सामान्य राजपूत किसान अपनी मूलभूत समस्याओं के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है, जबकि उसे हक के बजाय 'भीख' का एहसास दिलाया जाता है।
राजनीति ने हमें आर्थिक रूप से इतना पंगु बना दिया कि हम अब अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने के बजाय 'मोहताज' बनकर रह गए हैं।
3. षड्यंत्र का अंतिम चरण—हमें टुकड़ों में बाँटना:
राजनीति का सबसे खतरनाक खेल है—राजपूत को राजपूत से लड़ाना।
उन्होंने हमारे बीच 'गोत्र', 'वंश' और 'क्षेत्र' की दीवारें खड़ी कीं ताकि हम कभी भी एक राजनीतिक शक्ति बनकर न उभर सकें।
उन्होंने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम तो 'बड़े लोग' हैं, हमें राजनीति या छोटी-छोटी बातों में नहीं पड़ना चाहिए—जबकि असलियत में, इसी सोच ने हमें सत्ता के गलियारों से बाहर फेंक दिया।
एक संदेश—अब ऊर्जा जाग्रत करने का समय है:
अब समय 'मोहताजी' का नहीं, 'वापसी' का है। अगर आप आज भी यह सोच रहे हैं कि कोई सरकार हमें 'हक' देगी, तो आप भ्रम में हैं।
राजनीति को समझो, उसका मोहरा नहीं: वे हमें केवल 'वोट' के लिए इस्तेमाल करते हैं, पर जब हमारा अपना हक मांगने का समय आता है, तो हमें 'सामंती' कहकर चुप करा दिया जाता है। इस चाल को पहचानिए।
मेहनत और तकनीक ही हमारा हथियार है: पुरानी जमीनों के भरोसे मत बैठिए।
आज की ताकत 'आधुनिक खेती', 'डिजिटल तकनीक' और 'शिक्षा' में है। जब हम आर्थिक रूप से मजबूत होंगे, तब ही हम राजनीति को अपनी शर्तों पर चला पाएंगे।
एकता ही एकमात्र रास्ता है: जातिवाद के शोर से दूर, अपने समाज के हर उस किसान और युवा को गले लगाइए जो आज अभावों में जी रहा है।
हमारा 'राज' हमारे व्यवहार और चरित्र में होना चाहिए, न कि केवल हमारे इतिहास के पन्नों में।
याद रखिए:
एक सोता हुआ शेर शिकार बन जाता है, लेकिन जब वह जागता है, तो उसे किसी की मोहताजी नहीं रहती।
राजनीति का यह षड्यंत्र तब तक काम करेगा जब तक हम अपनी 'असली ऊर्जा' को पहचान नहीं लेते।
क्या हम तैयार हैं उस 'मोहताजी' की बेड़ियों को तोड़ने के लिए? या फिर हम आने वाली पीढ़ियों को भी यही 'राजनीतिक लाचारी' विरासत में देंगे?
अब फैसला हमारा है!
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20/06/2026
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14/06/2026
प्रयागराज जोन का ALP का रिजल्ट देखिए :-
प्रतीक मीणा(ST)- 69 में पास
प्रतीक जाटव(SC)- 69 में पास
प्रतीक यादव(ओबीसी)- 75 पास
प्रतीक शर्मा(GENERA)- 79 में फेल 😭😭😭😭
यहीं इस देश में समानता का अधिकार है ।।
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08/06/2026
क्या जातिगत आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था पर पुनर्विचार आवश्यक है?
आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना था। इस उद्देश्य का सम्मान किया जाना चाहिए।
लेकिन आज अनेक सवर्ण परिवार ऐसे हैं जो आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर हैं, फिर भी उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। कई बार समान या अधिक अंक प्राप्त करने के बावजूद सामान्य वर्ग के छात्रों को अवसरों से वंचित होना पड़ता है, जिससे उनके भीतर निराशा और असंतोष बढ़ता है।
सवाल किसी वर्ग के अधिकार छीनने का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या अब आरक्षण की व्यवस्था में आर्थिक स्थिति, शिक्षा का स्तर और वास्तविक जरूरत को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए?
एक ऐसे भारत की आवश्यकता है जहाँ अवसर का आधार जाति नहीं, बल्कि योग्यता और वास्तविक आवश्यकता हो। सामाजिक न्याय और समान अवसर दोनों साथ-साथ चलें, तभी देश का संतुलित विकास संभव है।
आपकी क्या राय है?
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