16/08/2026
Hathi Pahar — जहाँ मेरा बचपन आज भी खेलता है
कहते हैं पहाड़ पर चढ़ने वाले लोग मंज़िल ढूँढते हैं,
पर मैं तो यहाँ अपना बचपन छोड़ आया हूँ।
मेरा पूरा बचपन इसी पहाड़ की ढलानों पर खेलते-खेलते बीता है।
कभी पहाड़ से फिसलकर जीन्स फट जाती थी,
कभी चोट लगती थी,
और कभी बिना किसी वजह के बस यहीं आकर बैठ जाते थे।
पता नहीं इस पहाड़ में क्या था,
पर कुछ देर यहाँ बैठते ही मन अपने आप शांत हो जाता था।
इन्हीं रास्तों पर साइकिल चलाना सीखा,
इन्हीं पत्थरों पर बैठकर घंटों बातें कीं,
तेज़ धूप होती तो मंदिर प्रांगण में जाकर बैठ जाते,
और बारिश आती तो बगल के झरने से आता पानी
ही हमारे लिए किसी अमृत से कम नहीं लगता था।
फिर था वो आम का पेड
जिससे आम तोड़ना भी किसी त्योहार से कम नहीं था।
कहते हैं, वह पेड़ हमारे दादाजी से भी पहले का लगाया हुआ है।
कितनी पीढ़ियाँ बदल गईं,
कितने बच्चे आए और चले गए,
लेकिन वो पेड़ आज भी वहीं खड़ा है।
उसकी डालियों पर न जाने कितनी कहानियाँ लिखी होंगी।
उनमें एक कहानी हमारी भी है।
हमारे बचपन की।
हमारे नाम की।
हमारी शरारतों की।
शायद इसलिए Hathi Pahar मेरे लिए सिर्फ़ एक पहाड़ नहीं है।
ये वो जगह है
जहाँ मेरी जीन्स फटी, घुटने छिले, साइकिल दौड़ी, आम चोरी हुए…
और बचपन थोड़ा-थोड़ा करके बड़ा होता गया।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो लगता है—
मैं Hathi Pahar पर बचपन बिताकर बड़ा नहीं हुआ,
बल्कि Hathi Pahar ने ही मुझे बड़ा होते देखा है। ❤️