यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
वरदान माँगूँगा नहीं।।
Deoghat
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ा_दौर_ज़हर_का_व्यापार_व्यंग_कवि_की_अभिव्यक्ति #
आज कल ज़हर का व्यापार करने लगा हूँ,
मोहब्बत छोड़ नफरत से प्यार करने लगा हूँ,
क्या करूँ रोजी की मजबूरी थी,
पेट पालने को ये प्रयोग बहुत जरूरी थी,
पहले तो मोहब्बत का ही धंधा था,
पर कुछ समय से चल रहा काफी मंदा था,
सियासत नए रंग में आयी है,
हर तरफ हर मन में नफरत ही नफरत छायी है,
स्कूल की पढ़ाई में भी नफरत की नई किताब जुड़ी है,
क्यों कि मुहब्बत वाली तो अब कूड़ेदान में पड़ी है,
बच्चे बच्चे को सिखाया जा रहा नफरत का पाठ है,
ना जाने नए दौर की ये कौन सी नई साठ-गांठ है,
ऐसे में मुझे भी नए दौर का अवसरवाद वाला पाठ याद आया,
और मैंने भी थोड़ा अपना व्यापारी दिमाग लगाया
बदल दिया मैंने अपने दुकान का पूरा नक्शा,
ताकि लग जाये सबको मेरे दुकान की नफरत का चस्का,
जब से खोला मैंने ये नए दौर की दुकान है,
उस दिन से सुखी मेरे घर में हर इंसान है।।
मोको कहां ढूढे रे बन्दे
मैं तो तेरे पास में
ना तीर्थ मे ना मूर्त में
ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में
ना काबे कैलास में
मैं तो तेरे पास में बन्दे
मैं तो तेरे पास में
ना मैं जप में ना मैं तप में
ना मैं बरत उपास में
ना मैं किर्या कर्म में रहता
नहिं जोग सन्यास में
नहिं प्राण में नहिं पिंड में
ना ब्रह्याण्ड आकाश में
ना मैं प्रकति प्रवार गुफा में
नहिं स्वांसों की स्वांस में
खोजि होए तुरत मिल जाउं
इक पल की तालाश में
कहत कबीर सुनो भई साधो
मैं तो हूँ विश्वास में
23/06/2016
Prayan Geet jaishankar prasad ( Himadri Tung Shring Se Clip from Chankya ) Poem by Jai Shan Prayan Geet jaishankar prasad ( Himadri Tung Shring Se Clip from Chankya ) Poem by Jai Shan
13/05/2016
जो भरा नहीं है भावो से , बहती जिसमे रसधार नहीं |
वह हृदय नहीं वह पत्थर है , जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं ||
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