29/07/2022
‘केस तो बनता है’ फ़िल्म है या सीरीयल, है समय का सच
जिस तरह से बात-बात में केस हो रहे हैं, उसने हमारे न्याय तंत्र को कॉमेडी में बदल दिया है। आज के दैनिक जागरण के पहले पन्ने पर जब यह लाइन देखी तो ठहर गया। ‘अब कोर्ट में खुलेगी कॉमेडी की दुकान’। यह कोई साधारण पंक्ति नहीं है। हाल के वर्षों में न्याय व्यवस्था को लेकर जिस तरह से सवाल उठे हैं, मज़बूती की जगह उसकी कमज़ोरी दिखी है, किसी न किसी को यह लाइन लिखनी ही थी और क़िस्मत देखिए कि दैनिक जागरण में छप गई।
पूर्व चीफ़ जस्टिस का क़िस्सा है। अदालत से बाहर आते हैं, आरोप लगाते हैं कि बाहर से अदालत में दखल हो रहा है। उन पर एक महिला आरोप लगाती है, तो कोर्ट का इन हाउस पैनल जस्टिस को बरी करता है। फिर राम मंदिर का फ़ैसला आता है। जस्टिस रिटायर करते हैं और राज्य सभा का सदस्य बन जाते हैं। उसी बाहरी शक्ति की कृपा से जिस पर वे कोर्ट में दखल देने का आरोप लगाते हैं।
हाल के दिनों में कोर्ट पर विचारधारा के हिसाब से आरोप लगे हैं। बकायदा जजों को पत्र लिखा गया है और नूपुर शर्मा की आलोचना करने को ग़लत बताया गया। पत्र लिखने वाले पूर्व जजों को एक और पत्र प्रधानमंत्री मोदी को लिखना था कि नूपुर की क्या ग़लती है जो बीजेपी से निकाला? लेकिन पत्र लिख रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के जज को।
कई बैर कोर्ट ने पुलिस की गिरफ़्तारियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बार-बार कहा है। जैसे तैसे केस बनाए जा रहे हैं। जिस तरह से इस देश में अवैध रूप से NSA लगाया जा रहा है, किसी पर भी UAPA लगाया जा रहा है, ट्विट करने से केस हो रहे हैं, कोर्ट की प्रक्रिया का उपहास ही हो रहा है।
लिहाज़ा इस समय में इसी पर कोई फ़िल्म या सीरीयल बना दे तो उसे साहसी माना जा सकता है। इस विज्ञापन की पहली लाइन अदालतों का इम्तहान लेने आ रही है। देखना होगा कि हमारी अदालतें, अभिव्यक्ति की इस आज़ादी को किस उदारता से लेती हैं।
अब कोर्ट में खुलेगी कॉमेडी की दुकान।
यह हमारे समय का सच है और सच ने अपना समय चुनना शुरू कर दिया है। कोर्ट में कॉमेडी की दुकान खुल रही है। बहस का केस तो बनता है!

29/07/2022
29/07/2022
26/06/2022