Er. S. P Gautam

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Life is batter rather than long

Photos from Er. S. P Gautam's post 27/05/2026

*त्याग और बलिदान की देवी माता रमाबाई जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि* 🙏 🙏

*भारत के इतिहास में जब भी डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के महान संघर्ष और उपलब्धियों की चर्चा होती है, तब उनकी जीवनसंगिनी माता रमाबाई आंबेडकर का त्याग, संघर्ष और बलिदान भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।*
*माता रमाबाई जी केवल बाबासाहेब की पत्नी ही नहीं थीं, बल्कि वे उस संघर्षमय यात्रा की मौन शक्ति थीं, जिन्होंने हर कठिन परिस्थिति में बाबासाहेब का साथ निभाया।*

*माता रमाबाई जी का प्रारंभिक जीवन -*
माता रमाबाई जी का जन्म 7 फरवरी 1898 को एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने गरीबी, भूख, अभाव और सामाजिक अपमान को बहुत करीब से देखा। कम उम्र में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया, जिसके कारण जीवन और भी कठिन हो गया।
उस समय समाज में दलित वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। शिक्षा, सम्मान और समान अधिकारों से वंचित समाज में रमाबाई जी ने जीवन बिताया। बचपन में ही उन्होंने संघर्ष करना सीख लिया था।

*बाबासाहेब से विवाह-*
सन् 1906 में उनका विवाह युवा भीमराव आंबेडकर से हुआ। उस समय बाबासाहेब भी आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे थे। घर की स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार भोजन तक के लिए संघर्ष करना पड़ता था।
लेकिन रमाबाई जी ने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने अपने पति के सपनों को अपना सपना बना लिया। वे समझती थीं कि भीमराव केवल अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों शोषित और वंचित लोगों के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

*संघर्ष और त्याग की अद्भुत मिसाल*
जब बाबासाहेब उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए, तब पूरे परिवार की जिम्मेदारी रमाबाई जी के कंधों पर आ गई। घर में गरीबी थी, बच्चों की बीमारी थी, सामाजिक तिरस्कार था, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति को साहस से सहन किया।
कई बार घर चलाने के लिए उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ा। ऐसा भी समय आया जब खाने के लिए पर्याप्त अन्न नहीं था। फिर भी उन्होंने बाबासाहेब की पढ़ाई और मिशन में कभी बाधा नहीं आने दी।
उनका त्याग इतना महान था कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-दुख को समाज की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया।

*मातृत्व का दर्द*-
माता रमाबाई जी ने अपने कई बच्चों को बीमारी और गरीबी के कारण खो दिया। यह पीड़ा किसी भी माँ के लिए असहनीय होती है। लेकिन इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी उन्होंने बाबासाहेब का मनोबल टूटने नहीं दिया।
उनका जीवन लगातार दुखों और कठिनाइयों से भरा रहा, फिर भी वे धैर्य और साहस की प्रतिमूर्ति बनी रहीं।

*बाबासाहेब के संघर्ष में सबसे बड़ी शक्ति*-
डॉ. आंबेडकर दिन-रात समाज परिवर्तन के कार्य में लगे रहते थे। वे पढ़ाई, आंदोलन, लेखन और सामाजिक संघर्ष में व्यस्त रहते थे। ऐसे समय में रमाबाई जी ने पूरे परिवार को संभाला और बाबासाहेब को मानसिक शक्ति प्रदान की।
यदि रमाबाई जी का त्याग और सहयोग न होता, तो शायद बाबासाहेब इतने बड़े सामाजिक क्रांतिकारी नहीं बन पाते।
बाबासाहेब स्वयं भी माता रमाबाई जी के त्याग को स्वीकार करते थे। वे जानते थे कि उनकी सफलता के पीछे रमाबाई जी का अपार योगदान है।
*बीमारी और परिनिर्वाण*-

लगातार संघर्ष, गरीबी और कठिन जीवन के कारण माता रमाबाई जी का स्वास्थ्य कमजोर होता गया। उचित इलाज और आराम न मिलने के कारण उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई।
27 मई 1935 को माता रमाबाई जी का परिनिर्वाण हो गया। उनके निधन से बाबासाहेब गहरे दुःख में डूब गए। उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी ही नहीं, बल्कि अपने संघर्ष की सबसे बड़ी साथी को खो दिया था।

*माता रमाबाई जी का महत्व*-
माता रमाबाई जी का त्याग, धैर्य, नारी शक्ति और समर्पण की जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि किसी महान परिवर्तन के पीछे एक महान त्याग छिपा होता है।
वे उन करोड़ों महिलाओं की प्रेरणा हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिवार और समाज के लिए संघर्ष करती हैं।
*उनके जीवन से मिलने वाली सीख*-
कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए।
महान कार्यों के पीछे त्याग और संघर्ष आवश्यक होता है।
शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पण जरूरी है।
महिलाओं का योगदान समाज निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निस्वार्थ प्रेम और सहयोग किसी भी व्यक्ति को महान बना सकता है।

*श्रद्धांजलि*
माता रमाबाई जी का जीवन हमें सिखाता है कि इतिहास केवल मंच पर दिखने वाले नायकों से नहीं बनता, बल्कि उन मौन त्यागियों से भी बनता है जो पीछे रहकर संघर्ष की नींव मजबूत करते हैं।
माता रमाबाई जी को उनके परिनिर्वाण दिवस पर शत-शत नमन।🙏🙏🌷🌷🌹🌹

उनका संघर्ष, साहस और बलिदान सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
नमो बुद्धाय जय भीम 🙏 🙏
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इंजी एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

06/05/2026

👉 समस्त देशवासियोंको #भारत में #सच्चे_प्रजातंत्रवादी और #समाज_सुधारक #आरक्षण_के_जनक #छत्रपति_शाहूजी_महाराज (26 जून 1874; 6 मई, 1922) के #परिनिर्वाण_दिवस पर बहुजन जागरूकता मिशन की और से कोटिशः #वंदन एवं #नमन..👏👏
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#जीवन :
👉शाहूजी कोल्हापुर के इतिहास में एक अमूल्य मणि के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। छत्रपति शाहूजी महाराज ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने राजा होते हुए भी दलित और शोषित वर्ग के कष्ट को समझा और सदा उनसे निकटता बनाए रखी। उन्होंने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की थी। गरीब छात्रों के छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों को शरण प्रदान करने के आदेश दिए। शाहूजी महाराज के शासन के दौरान 'बाल विवाह' पर ईमानदारी से प्रतिबंधित लगाया गया। उन्होंने अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में समर्थन की आवाज उठाई थी। इन गतिविधियों के लिए महाराज शाहूजी को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। शाहूजी महाराज ज्योतिबा फुले से प्रभावित थे और लंबे समय तक 'सत्य शोधक समाज', फुले द्वारा गठित संस्था के संरक्षण भी रहे।

#जन्म_परिचय
छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 ई. को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबासाहब घाटगे था। छत्रपति शाहूजी महाराज का बचपन का नाम 'यशवंतराव' था। छत्रपति शिवाजी महाराज (प्रथम) के दूसरे पुत्र के वंशज शिवाजी चतुर्थ कोल्हापुर में राज्य करते थे। ब्रिटिश षडयंत्र और अपने ब्राह्मण दीवान की गद्दारी की वजह से जब शिवाजी चतुर्थ का कत्ल हुआ तो उनकी विधवा आनंदीबाई ने अपने जागीरदार जयसिंह राव आबासाहेब घाटगे के पुत्र यशवंतराव को मार्च, 1884 ई. में गोद ले लिया। बाल्य-अवस्था में ही यशवंतराव को शाहूजी महाराज की हैसियत से कोल्हापुर रियासत की राजगद्दी को सम्भालना पड़ा। यद्यपि राज्य का नियंत्रण उनके हाथ में काफ़ी समय बाद अर्थात 2 अप्रैल, सन 1894 में आया था।

#विवाह
छत्रपति शाहूजीहू महाराज का विवाह बड़ौदा के मराठा सरदार खानवीकर की बेटी लक्ष्मीबाई से हुआ था।

#शिक्षा
शाहूजी महाराज की शिक्षा राजकोट के 'राजकुमार महाविद्यालय' और धारवाड़ में हुई थी। वे 1894 ई. में कोल्हापुर रियासत के राजा बने। उन्होंने देखा कि जातिवाद के कारण समाज का एक वर्ग पिस रहा है। अतः उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए योजना बनाई और उस पर अमल आरंभ किया। छत्रपति शाहूजी महाराज ने दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। इससे उनमें शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी। परन्तु उच्च वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया। वे छत्रपति शाहूजी महाराज को अपना शत्रु समझने लगे। उनके पुरोहित तक ने यह कह दिया कि- "आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है। छत्रपति साहू महाराज ने इस सारे विरोध का डट कर सामना किया।

#यज्ञोपवीत_संस्कार
शाहूजी महाराज हर दिन बड़े सबेरे ही पास की नदी में स्नान करने जाया करते थे। परम्परा से चली आ रही प्रथा के अनुसार, इस दौरान ब्राह्मण पंडित मंत्रोच्चार किया करता था। एक दिन बंबई से पधारे प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम शास्त्री भागवत भी उनके साथ हो लिए थे। महाराजा कोल्हापुर के स्नान के दौरान ब्राह्मण पंडित द्वारा मंत्रोच्चार किये गए श्लोक को सुनकर राजाराम शास्त्री अचम्भित रह गए। पूछे जाने पर ब्राह्मण पंडित ने कहा की- "चूँकि महाराजा शूद्र हैं, इसलिए वे वैदिक मंत्रोच्चार न कर पौराणिक मंत्रोच्चार करते है।" ब्राह्मण पंडित की बातें शाहूजी महाराज को अपमान जनक लगीं। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। महाराज शाहूजी के सिपहसालारों ने एक प्रसिद्ध ब्राह्मण पंडित नारायण भट्ट सेवेकरी को महाराजा का यज्ञोपवीत संस्कार करने को राजी किया। यह सन 1901 की घटना है। जब यह खबर कोल्हापुर के ब्राह्मणों को हुई तो वे बड़े कुपित हुए। उन्होंने नारायण भट्ट पर कई तरह की पाबंदी लगाने की धमकी दी। तब इस मामले पर शाहूजी महाराज ने राज-पुरोहित से सलाह ली, किंतु राज-पुरोहित ने भी इस दिशा में कुछ करने में अपनी असमर्थता प्रगट कर दी। इस पर शाहूजी महाराज ने गुस्सा होकर राज-पुरोहित को बर्खास्त कर दिया।

#आरक्षण_की_व्यवस्था
सन 1902 के मध्य में शाहूजी महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे। उन्होंने वहीं से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये। महाराज के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी। उल्लेखनीय है कि सन 1894 में, जब शाहूजी महाराज ने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिकीय पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। शाहूजी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी। सन 1903 में शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर स्थित शंकराचार्य मठ की सम्पत्ति जप्त करने का आदेश दिया। दरअसल, मठ को राज्य के ख़ज़ाने से भारी मदद दी जाती थी। कोल्हापुर के पूर्व महाराजा द्वारा अगस्त, 1863 में प्रसारित एक आदेश के अनुसार, कोल्हापुर स्थित मठ के शंकराचार्य को अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पहले महाराजा से अनुमति लेनी आवश्यक थी, परन्तु तत्कालीन शंकराचार्य उक्त आदेश को दरकिनार करते हुए संकेश्वर मठ में रहने चले गए थे, जो कोल्हापुर रियासत के बाहर था।

#स्कूलों व छात्रावासों की स्थापना
मंत्री ब्राह्मण हो और राजा भी ब्राह्मण या क्षत्रिय हो तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन राजा की कुर्सी पर वैश्य या फिर शूद्र शख्स बैठा हो तो दिक्कत होती थी। छत्रपति शाहूजी महाराज क्षत्रिय नहीं, शूद्र मानी गयी कुर्मी से आते थे। कोल्हापुर रियासत के शासन-प्रशासन में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नि:संदेह उनकी अभिनव पहल थी। छत्रपति शाहूजी महाराज ने सिर्फ यही नहीं किया, अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठा, महार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ईसाई, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएँ खोलने की पहल की। शाहूजी महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये। जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज लग सकते हैं, किंतु नि:संदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं। उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। शाहूजी महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी। कोल्हापुर के महाराजा के तौर पर शाहूजी महाराज ने सभी जाति और वर्गों के लिए काम किया। उन्होंने 'प्रार्थना समाज' के लिए भी काफ़ी काम किया था। 'राजाराम कॉलेज' का प्रबंधन उन्होंने 'प्रार्थना समाज' को दिया था।

#कथन
छत्रपति शाहूजी महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। इस पर उन्होंने कहा था कि- "वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते।"
शाहूजी महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- "उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि- "छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।"
15 अप्रैल, 1920 को नासिक में 'उदोजी विद्यार्थी' छात्रावास की नीव का पत्थर रखते हुए शाहूजी महाराज ने कहा था कि- "जातिवाद का अंत ज़रूरी है. जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है। जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं। निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए|"

#समानता की भावना
छत्रपति शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर की नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी। यह पहला मौका था की राज्य नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था। उन्होंने हमेशा ही सभी जाति वर्गों के लोगों को समानता की नज़र से देखा। शाहूजी महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने एक आदेश से इनके लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करा करवा दिया और उन्हें सामान्य व उच्च जाति के छात्रों के साथ ही पढने की सुविधा प्रदान की।

#भीमराव_अम्बेडकर_के_मददगार
ये छत्रपति शाहूजी महाराज ही थे, जिन्होंने 'भारतीय संविधान' के निर्माण में महत्त्वपूर्व भूमिका निभाने वाले भीमराव अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए विलायत भेजने में अहम भूमिका अदा की। महाराजाधिराज को बालक भीमराव की तीक्ष्ण बुद्धि के बारे में पता चला तो वे खुद बालक भीमराव का पता लगाकर मुम्बई की सीमेंट परेल चाल में उनसे मिलने गए, ताकि उन्हें किसी सहायता की आवश्यकता हो तो दी जा सके। शाहूजी महाराज ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के 'मूकनायक' समाचार पत्र के प्रकाशन में भी सहायता की। महाराजा के राज्य में कोल्हापुर के अन्दर ही दलित-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, महाराजा के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी।

#परिनिर्वाण
छत्रपति शाहूजी महाराज का निधन 6 मई, 1922 मुम्बई में हुआ। महाराज ने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी थी। उनका समाज के किसी भी वर्ग से किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं था। शाहूजी महाराज के मन में दलित वर्ग के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये थे, वह इतिहास में याद रखे जायेंगे।

#अन्य_जानकारी
ब्रिटिश कालीन भारत के 10 सर्वाधिक प्रभावशाली राज्यों मे से एक कोल्हापुर के शासक थे, राजऋषि छत्रपति शाहूजी महाराज। उनके शासनकाल मे लिये गये जनकल्याणकारी फैंसलों की गूंज लंदन तक सुनाई पड़ती थी। उनकी लोककत्याणकारी नीतियों से प्रभावित होकर कैंब्रिज यूनीवर्सिटी ने उन्हें डाॅक्टर ऑफ लाॅ ('LLD) की उपाधि से सम्मानित किया। ऐसे महापुरुष को शत-शत नमन।

सयाजी राजे गायकवाड़, गंगाधर तिलक, गाँधी जी और अंबेडकर पर उनका गहरा प्रभाव था। उन्होंने अपने जीवन काल मे हर एक अपराधी को उचित दंड और हर विद्वान को यथायोग्य सत्कार दिया। धूर्त लोगों की कुटिलता को सही दंड देने मे वह कभी पछे नहीं रहे, भले ही अपराधी शंकराचार्य के पद पर ही क्यों न बैठा हो।

महाराजा कोल्हापुर का यह दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा मे मानव समाज के सभी दुःखों को हरने की अपार शक्ति है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने अपने राज्यक्षेत्र मे सभी के लिए निशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करवाई। माध्यमिक व उच्च शिक्षा केलिए कोल्हापुर शहर मे महाराजा ने 22 छात्रावासों का निर्माण कराया।

कोल्हापुर राज्य को सूखे और बाढ़ से निजात दिलाने के लिए उन्होंने प्रख्यात इंजीनियर विश्वेशरैया जी से एक विशालकाय बांध का निर्माण करवया। इस बाध की सिचाई सुविधाओं का लाभ कोल्हापुर के किसान आज भी ले रहे हैं। कृषि के उचित प्रबंधन केलिए उन्होंने कई यूरोपीय विशेषज्ञों को अपनी राजकीय सेवा में रखा हुआ था।

अछूत समझे जाने वाले समाज के लोगों को समाज की मुख्यधारा जोड़ने के लिए उनका सर्वाधिक क्रांतिकारी निर्णय था उस समाज के लोगों को संपत्ति और भूमि का अधिकार देना। उन्होंने अनेकों दलितों को भूमिधरी स्तर प्रदान किया।

विठ्ठलभाई पटेल का हिंदू कोड बिल नेशनल असेंषली मे अस्वीकृत होने पर भी कोल्हापुर पहला ऐसा राज्य बना जहाँ हिंदू कोड बिल प्रभाव मे आया। इसके माध्यम से महाराजा ने विधवा पुनर्विवाह पर जोर दिया। उनके द्वारा शुरू किये गये अनेकानेक प्रयास आधुनिक भारत के निर्माण मे नींव का पत्थर साबित हुए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उनके अधिकांश प्रकल्पों को भारत के समग्र विकास के लिये उपयोगी व प्रभावी मानते हुए स्वीकृति प्रदान की गई।

परजीवी समाज के निकम्मेपन को खत्म करने तथा राजकीय सेवाओं मे दक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए उन्होंने श्रमजीवी समाज के लोगों को राजकीय सेवा मे लेना सुरू किया। इस उद्देश्य मे अड़चन डालने वालों को किनारे करने के लिए महाराजा ने राजकीय सेवाओं मे श्रमजीवी समाज के लोगों केलिए पहले 50% और फिर बाद मे 90% आरक्षण की व्यवस्था लागू की। लेकिन आरक्षण लागू करते हुए महाराजा ने कभी भी दक्षता और कार्यकुशलता से समझौता नहीं किया। आरक्षण लागू करते समय उन्होंने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उनका अपना समाज भी इतना कमजोर और लाचार सो जाएगा कि उसे भी आरक्षण की जरूरत पड़ेगी।

शिक्षा की समुचित व्यवस्था मे अपना सहयोग प्रदान कर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं। उनका कहना था
ै_होंऊगा, न_आप होंगे, न राजा होंगे, न रजवाड़े होंगे। मगर यह राष्ट्र हमेशा रहेगा और हमे इसको आगे बढ़ाने का काम करते रहना है। समाज मे सबको सम्मान मिले, सभी शिक्षित होकर राष्ट्र के उत्थान मे भागीदार बनें। तभी हमारा जीवन सफल माना जायेगा।"

🔺👉भारत में सच्चे प्रजातंत्रवादी और समाज सुधारक छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून 1874; 6 मई, 1922) की पुण्यतिथि पर साथी मिशन परिवार कोटिशः वंदन एवम नमन करता है..👏👏
नमो बुद्धाय जय भीम जय भारत जय संविधान 🤝🇮🇳🇮🇳
इंजी. एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

05/05/2026

゚viralシfypシ゚viralシalシ ゚viralシviralシfypシ゚viralシalシ ゚viralシfypシ゚viralシ ゚viralシalシ बहुजन जागरूकता मिशन Bahujan Ek Awaz TV डॉ बी आर अंबेडकर समिति सेवा नगर - रजि0 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश Er. S. P Gautam Er S P Gautam

Photos from Er. S. P Gautam's post 30/04/2026

बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी प्रमुख और महत्वपूर्ण घटनाएँ विस्तार से इस प्रकार हैं:
🌼 1. जन्म (563 ईसा पूर्व – लुंबिनी)
भगवान बुद्ध का जन्म लुंबिनी (आज का नेपाल) में राजा शुद्धोधन और रानी मायादेवी के यहाँ हुआ।
उनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। जन्म के समय ही ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि वे या तो महान सम्राट बनेंगे या महान संन्यासी।
🌼 2. चार दृश्य (जीवन का मोड़)
राजमहल में सुख-सुविधाओं के बीच पले-बढ़े सिद्धार्थ ने एक दिन चार दृश्य देखे:
एक वृद्ध व्यक्ति
एक बीमार व्यक्ति
एक मृत व्यक्ति
एक संन्यासी
इन दृश्यों ने उन्हें जीवन के दुख, बीमारी और मृत्यु की सच्चाई का एहसास कराया और यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।
🌼 3. महाभिनिष्क्रमण (गृह त्याग – 29 वर्ष की आयु)
29 वर्ष की आयु में उन्होंने राज-पाट, पत्नी और पुत्र को छोड़कर सत्य की खोज के लिए संन्यास ले लिया।
इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है।
🌼 4. कठोर तपस्या और मध्य मार्ग
सिद्धार्थ ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, लेकिन उन्हें ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ।
तब उन्होंने समझा कि अत्यधिक भोग और अत्यधिक तपस्या दोनों गलत हैं, और उन्होंने मध्यम मार्ग (Middle Path) अपनाया।
🌼 5. ज्ञान प्राप्ति (बोधि – 35 वर्ष की आयु)
बोधगया में पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें ज्ञान (बोधि) प्राप्त हुआ।
इसके बाद वे “बुद्ध” (अर्थ: जाग्रत/ज्ञान प्राप्त व्यक्ति) कहलाए।
🌼 6. पहला उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन)
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने पहला उपदेश सारनाथ में अपने पाँच साथियों को दिया।
इसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है, जहाँ उन्होंने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया।
🌼 7. बौद्ध धर्म का प्रचार
बुद्ध ने लगभग 45 वर्षों तक पूरे भारत में घूम-घूमकर:
शांति
अहिंसा
करुणा
समानता
का संदेश दिया।
उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई और बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ।
🌼 8. महापरिनिर्वाण (483 ईसा पूर्व – कुशीनगर)
अंत में कुशीनगर में उन्होंने 80 वर्ष की आयु में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
इसका अर्थ है जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति।
🌼 निष्कर्ष (बुद्ध पूर्णिमा का महत्व)
बुद्ध पूर्णिमा इसलिए विशेष है क्योंकि इसी दिन:
बुद्ध का जन्म
ज्ञान प्राप्ति
और महापरिनिर्वाण
तीनों घटनाएँ जुड़ी मानी जाती हैं।
👉 यह दिन हमें सिखाता है:
अहिंसा अपनाएं
सत्य का मार्ग चुनें
करुणा और प्रेम फैलाएं
नमो बुद्धाय जय भीम 🙏🙏
इंजी. एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

Photos from Er. S. P Gautam's post 13/04/2026

समस्त देशवासियों को बहुजन जागरूकता मिशन की और से विश्व रत्न, बोधिसत्व, भारतीय संबिधान निर्माता, बहुजन नायक, नारी के मुक्तिदाता, भारत भाग्य विधाता, आधुनिक भारत के निर्माता, सामाजिक, चिकित्सक, क्रांतिकारी महापुरुष, ज्ञान के प्रतीक महामानव परम पूज्यनीय बाबा साहब डॉ० भीम राव अम्बेडकर जी के 135 वे जन्मदिवस के पावन अवसर पर उन्हें शत-शत नमन 🙏🙏 और आप सभी देशवासियों को बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर जी के जन्मदिवस की बहुत-बहुत बधाई व हार्दिक मंगलकामनाएँ । 🎂🎂🎂🎂💐💐💐💐💐🌹🌹🌷🌷🌷🎁🎁🎊🎊

*नमो बुद्धाय जय भीम जय भारत जय संविधान🙏🙏
इंजी एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन
🎂🎈💐🎂🎈💐🎂🎈

04/04/2026

वीरांगना झलकारी बाई जी की पुण्यतिथि पर विशेष लेख
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक वीरों और वीरांगनाओं के अद्भुत साहस, त्याग और बलिदान से भरा पड़ा है। इन्हीं महान योद्धाओं में एक नाम अत्यंत सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है—वीरांगना झलकारी बाई। उनका जीवन संघर्ष, पराक्रम और देशभक्ति की ऐसी मिसाल है, जो आज भी हर भारतीय को प्रेरित करती है।
🔶 प्रारंभिक जीवन
झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को झांसी के निकट एक साधारण कोली (दलित) परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सदोबा (या मन्नू) और माता का नाम जमुना देवी था। बचपन से ही झलकारी बाई अत्यंत साहसी, निडर और आत्मनिर्भर थीं।
कहा जाता है कि उन्होंने कम उम्र में ही जंगल में अकेले शेर का सामना किया और उसे मार गिराया। यह घटना उनके अद्भुत साहस का प्रतीक मानी जाती है।
🔶 रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ाव
झलकारी बाई का जीवन उस समय बदल गया जब उनका संपर्क रानी लक्ष्मीबाई से हुआ। उनकी बहादुरी और युद्ध कौशल से प्रभावित होकर रानी ने उन्हें अपनी सेना “दुर्गा दल” में शामिल कर लिया।
झलकारी बाई न केवल एक कुशल योद्धा थीं, बल्कि उनकी शक्ल भी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलती-जुलती थी—जो आगे चलकर इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
🔶 1857 की क्रांति में भूमिका
सन् 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब अंग्रेजों ने झांसी पर हमला किया, तब झलकारी बाई ने अद्भुत साहस का परिचय दिया।
जब स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई और रानी लक्ष्मीबाई को किले से सुरक्षित निकलना पड़ा, तब झलकारी बाई ने एक रणनीतिक निर्णय लिया—
👉 उन्होंने स्वयं रानी लक्ष्मीबाई का रूप धारण कर लिया और अंग्रेजों के सामने जाकर उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
इस साहसिक कदम से रानी लक्ष्मीबाई को सुरक्षित निकलने का समय मिल गया। झलकारी बाई ने अंग्रेजों के खिलाफ जमकर युद्ध किया और अंततः वीरगति को प्राप्त हुईं (कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्हें कैद किया गया था, पर उनकी वीरता निर्विवाद है)।
🔶 बलिदान और प्रेरणा
झलकारी बाई का बलिदान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस संकल्प का प्रतीक है जिसमें एक साधारण महिला भी देश के लिए असाधारण योगदान दे सकती है।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि—
साहस और देशभक्ति किसी जाति या वर्ग की मोहताज नहीं होती
महिलाएं भी युद्ध और नेतृत्व में पुरुषों के समान सक्षम हैं
सच्चा देशप्रेम त्याग और बलिदान से ही सिद्ध होता है
🔶 समाज के लिए संदेश
आज के समय में झलकारी बाई का जीवन विशेष रूप से दलित, वंचित और पिछड़े समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने यह साबित किया कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास और साहस से इतिहास रचा जा सकता है।
🔶 निष्कर्ष
वीरांगना झलकारी बाई केवल एक नाम नहीं, बल्कि साहस, त्याग और नारी शक्ति की अमर गाथा हैं। उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते हैं और उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं।
शत-शत नमन 🙏 वीरांगना झलकारी बाई जी को एवं विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🙏🙏🌷🌷🌹🌹
नमो बुद्धाय जय भीम जय भारत जय संविधान 🙏 🙏
इंजी. एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

Photos from Er. S. P Gautam's post 04/04/2026

भारत के महान समाज सुधारक, संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी का जीवन केवल संघर्षों से भरा ही नहीं था, बल्कि उनके पीछे एक ऐसी महान नारी का त्याग और समर्पण भी था, जिनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है—माता रमाबाई अंबेडकर।
📅 विवाह और जीवन की शुरुआत
डॉ. अंबेडकर और रमाबाई जी का विवाह वर्ष 1906 में हुआ था। उस समय बाबा साहब मात्र 15 वर्ष के थे और रमाबाई जी लगभग 9 वर्ष की थीं। यह विवाह उस दौर की सामाजिक परंपराओं के अनुसार हुआ, लेकिन आगे चलकर यह संबंध त्याग, संघर्ष और समर्पण की मिसाल बन गया।
🌿 रमाबाई जी का त्याग और संघर्ष
माता रमाबाई जी ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन व्यतीत किया। गरीबी, अभाव और सामाजिक उपेक्षा के बावजूद उन्होंने कभी अपने पति के सपनों को टूटने नहीं दिया।
जब बाबा साहब उच्च शिक्षा के लिए विदेश (अमेरिका और इंग्लैंड) गए, तब घर की सारी जिम्मेदारियां रमाबाई जी ने अकेले संभालीं।
उनके जीवन में कई दुखद घटनाएं भी आईं—उनके बच्चों का असमय निधन हुआ, लेकिन उन्होंने अपने दुःख को अपने भीतर समेटकर बाबा साहब को उनके मिशन से भटकने नहीं दिया।
📚 बाबा साहब की सफलता में योगदान
डॉ. अंबेडकर जी ने स्वयं स्वीकार किया था कि यदि रमाबाई जी का सहयोग और त्याग न होता, तो वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते।
रमाबाई जी ने न केवल एक पत्नी का कर्तव्य निभाया, बल्कि एक सच्ची सहयात्री बनकर उनके हर संघर्ष में साथ दिया।
🌸 एक आदर्श दांपत्य जीवन
यह संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि एक मिशन का था—समाज को बदलने का, समानता स्थापित करने का।
जहाँ बाबा साहब ने समाज के लिए संघर्ष किया, वहीं रमाबाई जी ने चुपचाप अपने त्याग से उस संघर्ष को शक्ति दी।
🙏 आज के लिए प्रेरणा
आज उनकी शादी की सालगिरह हमें यह सिखाती है कि—
जीवन में सफलता अकेले नहीं मिलती, उसके पीछे किसी का त्याग होता है
एक मजबूत जीवनसाथी किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है
संघर्षों में साथ निभाना ही सच्चे रिश्ते की पहचान है
💐 निष्कर्ष
बाबा साहब और माता रमाबाई जी का दांपत्य जीवन हमें प्रेम, त्याग, समर्पण और संघर्ष की अनमोल सीख देता है।
उनकी शादी की सालगिरह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है—हर उस व्यक्ति के लिए जो अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है।
ऐसे महान दंपत्ति को कोटि-कोटि नमन 🙏
नमो बुद्धाय जय भीम जय संविधान 🙏🙏🙏
इंजी. एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

Photos from Er. S. P Gautam's post 02/04/2026

🔴 2 अप्रैल 2018 का SC/ST आंदोलन (भारत बंद)

📌 पृष्ठभूमि क्या थी?
20 मार्च 2018 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) में कुछ बदलाव किए थे।
⚖️ कोर्ट के फैसले में क्या बदलाव हुए?
कोर्ट ने कहा:
तुरंत गिरफ्तारी पर रोक (पहले जांच जरूरी)
सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी के लिए अनुमति जरूरी
जमानत (Anticipatory Bail) की अनुमति
👉 इन बदलावों को दलित और आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों को कमजोर करने वाला माना।
✊ आंदोलन क्यों हुआ?

इन फैसलों के विरोध में देशभर के SC/ST संगठनों ने 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद का आह्वान किया।
🌍 आंदोलन का असर
यह आंदोलन पूरे भारत में फैल गया — खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा में।
लाखों लोग सड़कों पर उतर आए।
कई जगहों पर हिंसा, तोड़फोड़ और झड़पें हुईं।
लगभग 13 से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हुए।
🚨 सरकार की प्रतिक्रिया
तब की केंद्र सरकार (नेतृत्व: Narendra Modi) ने:
कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की
बाद में संसद में कानून पास कर पुराने प्रावधान फिर से बहाल किए
📜 SC/ST एक्ट क्या है?
SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का उद्देश्य:
दलित और आदिवासी समाज को अत्याचार से बचाना
उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर सख्त सजा देना
📊 आंदोलन का महत्व
यह दलित अधिकारों के इतिहास का बड़ा आंदोलन माना जाता है
इसने दिखाया कि समाज अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो सकता है
सरकार को अपने फैसले बदलने पर मजबूर किया
⚠️ निष्कर्ष
👉 2 अप्रैल 2018 का आंदोलन ही SC/ST समाज का प्रमुख ऐतिहासिक आंदोलन है।
2 अप्रैल 2018 के आंदोलन में शहीद हुए सभी वीर सपूतों को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🙏🌷🌷🌹
जय भीम जय भारत जय संविधान 🙏 🙏
इंजी. एस पी गौतम (संयोजक)
बहुजन जागरूकता मिशन

01/04/2026

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