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27/09/2019
Photos from Zindagi Library & Book Bank's post 07/09/2019

कैसे कहूं धन्यवाद....यह सब कुछ आपको समर्पित है।
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जीवन में पहले परीक्षाएं होती हैं फिर उसके परिणाम आते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ गुरुवार को हुआ। मौका था गोपालगंज में शिक्षाश्री सम्मान समारोह का। शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देने वाले शिक्षकों के सम्मान में एक सफल आयोजन हुआ। आयोजन से पहले खूब परीक्षाएं हुईं। कदम-कदम पर बाधाएं आईं। रुकावटें आती रहीं। चीजें बनती रहीं और बिगड़ती रहीं।
आयोजन करने के लिए हम लोगों के पास ‘संकल्प’ के सिवाय कुछ भी नहीं था। शायद जब कोई ईश्वरीय कार्य होता है तो परीक्षा के बाद ही उसके परिणाम सामने आते हैं। ऐसा मान रहे हैं कि हम लोग इस आयोजन में सिर्फ एक माध्यम थे।
समारोह में गुरुजनों का सम्मान और सत्कार कर हम सभी अपने आप को धन्य मान रहे हैं। गुरुजनों ने अपना कीमती समय हम लोगों को दिया। इसके लिए हम सभी उनके दिल से आभारी हैं।
संकल्प के साथ हम लोगों ने कमला राय कॉलेज की प्राचार्या डॉ. रुखसाना खातून जी से मिलें। एक झटके में उन्होंने हामी भर दी। जाते-जाते आशीर्वाद से हम लोगों की झोली भरकर दीं।
ठीक इसी तरह डॉ. एके पांडेय सर ने भी तुरंत स्वीकृति दे दी। उन्होंने कहा कि हर ईश्वरीय कार्य में मैं आप लोगों के साथ हूं। समय से आना। सब चीज की जानकारी लेना और यह कहना की बहुत सुंदर आयोजन है। सच मानिए सर यही हमारी ताकत हैं और यह हमारी ऊर्जा है।
डॉ. संदीप सर आपके हम लोग आभारी हैं। सर आपकी एक-एक बातें जीवन जीने की कला जैसी थी। कल्पना से बहुत ज्यादा मिला है हम लोगों को।
सम्मान पाने वाले में सेवानिवृत शिक्षक वृंदा सिंह, श्रीमती किशोरी देवी, कमला राय कालेज की प्राचार्या प्रो. डॉ. रुखसाना खातून, प्रो.एके पांडेय, प्रो. संदीप कुमार, डिम्सलैंड पब्लिक स्कूल की प्राचार्या सुश्री मीनू सिंह, एएस पब्लिक स्कूल की प्राचार्या सुश्री अर्चना सिंह, बापू आदर्श जूनियर चिल्ड्रेंस एकेडमी की वरिष्ठ शिक्षिका सुश्री माया पूरी, बचपन प्ले स्कूल, थावे के प्राचार्य राजीव कुमार, होली चाइल्ड सीनियर सेकेंड्री स्कूल प्राचार्य इंद्रजीत कुमार, गोपलामठ राजकीय विद्यालय के नवनीत कुमार मिश्र, कुचायकोर्ट के प्रखंड शिक्षक लालदेव यादव, खेल शिक्षक विनित कुमार शर्मा, डीएन सिंह पब्लिक स्कूल के प्रार्चाय धनंजय सिंह, वृंदावन के राजकीय स्कूल के प्राचार्य रविकुमार वर्मा, सर्वोदय आईटीआई के प्राचार्य संजीत कुमार, ज्ञान दर्शन पब्लिक स्कूल के बिरेंद्र शर्मा, ज्ञान निधि पब्लिक स्कूल के परमेश्वर प्रसाद, न्यू शांति निकेतन पब्लिक स्कूल के प्राचार्य राजीव रंजन सिंह, एनपीएस पब्लिक स्कूल के डीएन प्रसाद जी आप सभी के सम्मान से हम सभी सम्मानित महसूस कर रहे हैं।
इस आयोजन में पर्दे के पीछे रहकर एक-एक चीजों पर नजर रखने वाले ओमप्रकाश मिश्र जी, राजीव कुमार सिंह जी, धीरज सिंह जी, अजेंद्र पांडेय जी, अश्विनी गर्ग जी, सुमन कुमार जी, समीर तिवारी जी जैसे साथियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। आप सब नहीं होते तो यह संभव नहीं हो पाता।
अंत में कुछ कमी रह गई हो तो उसको छोड़कर यह सब कुछ आप सभी को समर्पित है।
प्रणाम।
जय प्रकाश/कुंज बिहारी

खुद किताबों के अभाव में बड़ा हुआ यह पत्रकार आपकी रद्दी को बना रहा है ग्रामीण बच्चों का साहित्य! 23/04/2019

खुद किताबों के अभाव में बड़ा हुआ यह पत्रकार आपकी रद्दी को बना रहा है ग्रामीण बच्चों का साहित्य! जय प्रकाश मिश्र के प्रयासों से फाउंडेशन ज़िंदगी के बैनर तले लगभग दो-ढाई हज़ार किताबों के साथ, 17 जून 2017 को बिहार के गाँव ....

07/01/2019

विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली की एक रिपोट। इसमे फाउंडेशन ने अपना विचार दिया है।
https://youtu.be/BhFpKs-_QN4

Photos from Zindagi foundation's post 19/12/2018
Photos from Zindagi Library & Book Bank's post 26/10/2018

किताबों से बदलाव की राह में रघुवंश सिंह का भी नाम जुड़ा है। पूर्वांचल समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं फाउंडेशन के सलाहकार परिषद के सदस्य श्री राकेश सिंह परमार जी ने किताब देकर नई दिल्ली में इनका स्वागत किया। बधाई एवं शुभकामनाएं रघुवंश सिंह जी।


07/10/2017

|| अतीत के कर्मों का फल चुकाना ही पड़ता है ||

रामकृष्ण मरते वक्त कैंसर से मरे। गले का कैंसर था। पानी भी भीतर जाना मुश्किल हो गया, भोजन भी जाना मुश्किल हो गया। तो विवेकानंद ने एक दिन रामकृष्ण को कहा कि आप कह क्यों नहीं देते काली मां को? एक क्षण की बात है, आप कह दें, और गला ठीक हो जाएगा! तो रामकृष्ण हंसते, कुछ बोलते नहीं। एक दिन बहुत आग्रह किया तो रामकृष्ण ने कहा, तू समझता नहीं। जो अपना किया है, उसका निपटारा कर लेना जरूरी है। नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर आना पड़ेगा। तो जो हो रहा है, उसे हो जाने देना उचित है। उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है। तो विवेकानंद ने कहा कि न इतना कहें, इतना ही कह दें कम से कम कि गला इस योग्य तो रहे जीते जी कि पानी जा सके, भोजन जा सके! हमें बड़ा असह्य कष्ट हो रहा है। तो रामकृष्ण ने कहा, आज मैं कहूंगा।

और सुबह जब वे उठे, तो बहुत हंसने लगे और उन्होंने कहा, बड़ी मजाक रही। मैंने मां को कहा, तो मां ने कहा कि इसी गले से कोई ठेका है? दूसरों के गलों से भोजन करने में तुझे क्या तकलीफ है? तो रामकृष्ण ने कहा कि तेरी बात में आकर मुझे तक बुद्ध बनना पड़ा है! नाहक तू मेरे पीछे पड़ा था। और यह बात सच है, जाहिर है, इसी गले का क्या ठेका है? तो आज से जब तू भोजन करे, समझना कि मैं तेरे गले से भोजन कर रहा हूँ। फिर रामकृष्ण बहुत हंसते थे दिन भर। डाक्टर आए और उन्होंने कहा, आप हंस रहे हैं? और शरीर की अवस्था ऐसी है कि इससे ज्यादा पीड़ा की स्थिति नहीं हो सकती! रामकृष्ण ने कहा, हंस रहा हूं इससे कि मेरी बुद्धि को क्या हो गया कि खुद खयाल न आया कि सभी गले अपने हैं। सभी गलों से अब मैं भोजन करूंगा! अब इस एक गले की क्या जिद करनी है!

व्यक्ति कैसी ही परम स्थिति को उपलब्ध हो जाए, शरीर के साथ अतीत बंधा हुआ है, वह पूरा होगा। सुख-दुख आते रहेंगे, लेकिन जीवनमुक्‍त जानेगा, वह प्रारब्ध है। और ऐसा जान कर उनसे भी दूर खड़ा रहेगा; और उसके साक्षीपन में उनसे कोई अंतर नहीं पड़ेगा। उसका साक्षी - भाव थिर है।

ओशो,
अध्यात्म उपनिषद, प्रवचन #13

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