The Ramayana’s untold Legacy

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मर्यादा पुरूषोत्तम की उपाधि श्री राम ?

रामायण जैसे महाकाब्य जो जन कल्याणकारी राज्य, राज्य का शासन, राज्य का कानून, सर्वोत्तम प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और नेतृत्व पर लिखी जाने आज तक की सबसे उत्कृष्ट पुस्तक है, उसे हम केवल एक धार्मिक पुस्तक मानकर श्रीरामचंद्र जी के द्वारा जनकल्याण और सामाजिक उथ्थान के लिए किये गए और हो सकने वाले कार्यो की उपेछा कर, श्रीरामचंद्र जी की इच्छा का अनादर कर रहे है। लेखक को रामायण जैसी कोई अन्य पुस्तक नही

13/08/2021

प्राचीन युग और रामायण काल में आश्रम रूपी शोध संस्थानों की भूमिका -
पुष्पक विमान काल्पनिक लगता है और आधुनिक विज्ञान के अनुसार पहला उड़ने वाला हवाई जहाज १९०३ में बना, परन्तु सत्य आपके समक्ष निम्न है –
आधुनिक युग में १८९९ और १९०५ के बीच, राइट बंधुओं ने वैमानिकी अनुसंधान और प्रयोग का एक कार्यक्रम चलाया, जिसके परिणामस्वरूप १९०३ में पहली बार संचालित हवाई जहाज और दो साल बाद एक परिष्कृत, व्यावहारिक उड़ाने लायक हवाई जहाज का आविष्कार उन्होंने किया।
रामायण काल या प्राचीन युग में आश्रम रूपी शोध संस्थानों ने तो आज के वायुयान से उन्नत किस्म और तेज चलने वाले हवाई जहाज बहुत पहले ही दुनिया को दे दिया था और उसका सभी ने भरपूर उपयोग किया। वायुयान के लिए कार्य करते हुए आश्रम रूपी शोध संस्थान -
महर्षि भारद्वाज और अगस्त्य ऋषि के आश्रम में विमानशास्त्र विज्ञान का विकास काफी तेजी से हुआ। महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित `यन्त्र-सर्वस्व´ के `विमान-प्रकरण´ में प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चामत्कारिक तथ्य संगृहीत है। `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रन्थ वायुयान की रचना पर एक उत्तम वैज्ञानिक पुस्तक है। उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक `अंशुबोधिनी´ में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं इसमे प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है। एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है। महर्षि ने इसमें आठ प्रकार के विमानो का वर्णन किया है -
1. शक्त्युद्गम - बिजली से चलने वाला।
2. भूतवाह - अग्नि, जल और वायु से चलने वाला।
3. धूमयान - गैस से चलने वाला।
4. शिखोद्गम - तेल से चलने वाला।
5. अंशुवाह - सूर्यरश्मियों से चलने वाला।
6. तारामुख - चुम्बक से चलने वाला।
7. मणिवाह - चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला।
8. मरुत्सखा - केवल आयु से चलने वाला।
ऋषि अगस्त्य द्वारा रचित अगस्त्य संहिता में वायुयान पर विशेष संग्रह है। उन्होंने पुष्पक विमान कुबेर के निमित बनाया था।
उस समय गुरुकुल और आश्रम सभी ज्ञान-विज्ञान के विकास के लिए निरन्तर कार्य करते रहते थे। इसका परिणाम ये हुआ कि राम के राज्यकाल में विज्ञान मानवता को आगे बढ़ाने के लिए अपने चरम तक पहुँच सका। परन्तु हम अपनी अल्पबुद्धि से उसे काल्पनिक मानकर छोड़ दिए और रामायण में दिए गए ज्ञान को धरातल पर लाने का कोई प्रयास करना तो दूर उसको पूजा तक सीमित रखना बेहतर समझा।
बाल्मीकि जी ने राम के कार्यो को रामायण में लिपिबद्ध करने का कार्य किया था, तो आप उसे काल्पनिक कैसे कह सकते है?
जरुरत है नई पीढ़ी को उस ज्ञान पर मन्थन, शोध तभी तो मस्क के भाति और अविष्कारक समाज में आकर मानवता को राम की तरह विकास के मार्ग पर ले जायेंगे।

24/02/2021

Cover Page of "The Ramayana’s untold Legacy"

27/01/2021

राजधर्म -
राज्याभिषेक के एक दिन पहले महाराज दशरथ ने अपने पुत्र राम को राजधर्म का पाठ पढ़ाया, महाराज कहते है, मैं जानता हूं कि आप राजनीति के पूर्ण ज्ञाता हैं। परंतु एक जाने वाले राजा का ये कर्तव्य है कि वह आने वाले राजा को अपने अनुभवों को बताए।
पुत्र, कल आपको राजमुकुट पहनाया जाएगा, परन्तु यह याद रखना, जो राजमुकुट पहनता है वह स्वयं को अपने राज्य और अपनी प्रजा को सौंप देता है। पुत्र, एक राजा होने का अर्थ है सन्यासी हो जाना। एक राजा का अपना कुछ नहीं होता है। सबकुछ राज्य का हो जाता है। बल्कि आवश्यकता पड़ने पर यदि राजा को अपने राज्य और प्रजा के हित के लिए अपनी स्त्री, संतान, मित्र यहां तक की प्राण भी त्यागने पड़े तो उसे संकोच नहीं करना चाहिए। क्योंकि राज्य ही उसका मित्र और राज्य ही उसका परिवार है।
राजा को देखकर प्रजा उसका आचरण करती है। राजा की मूल शक्ति दंड में नहीं अपितू पक्षपात रहित न्याय में निहित है। राजा अपने प्रत्येक न्याय सम्मत निर्णय से आदर्श और मर्यादा स्थापित करता है। राजा अगर राज्य की प्रजा के लिए अपना सबकुछ त्याग नहीं सकता तो उसे राजा बनकर अपनी प्रजा से कर लेने का कोई अधिकार नहीं है।
राजा के अंदर दया, क्षमा, उदारता एवं करुणा का भाव अवश्य होना चाहिए। वहीं युद्ध के समय राजा को अपनी सेना का नेतृत्व कर सबसे पहली पंक्ति में खड़ा होना चाहिए। क्योंकि जो राजा वीर नहीं होता, उसकी सेना भी उसका आदर नहीं करती है।
एक राजा को ऋषियों, विद्वानों, कवियों, किसानो तथा अन्य कर्मप्रधान लोगो के आगे सदा नतमस्तक रहना चाहिए, क्योंकि ये लोग ही उसके सच्चे पथ प्रदर्शक एवं मार्गदर्शक होते हैं। आलोचकों को भी संरक्षण देना राजा का कार्य है, ताकि वे उसकी खामियों को उसे बता सकें। राजा को अपने गुप्तचरों के माध्यम से अपने राज्य की पूर्ण खबर होनी चाहिए।
पिता की राजनितिक शिक्षा और अपने गुप्तचर के रूप में प्रथम राज्य कर्तव्य से श्री राम में एक अनूठी प्रजाभक्ति पैदा हुई, जो आजीवन उनके कार्यो में परिलक्षित होती रही और राम ने प्रत्येक कार्य में सिर्फ राजधर्म को ही महत्व दिया।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बड़े सुन्दर छन्दो मे ऐसे पिरोया है -
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई॥
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती॥
अर्थात राजधर्म का सार इतना ही है कि जैसे मन में सभी मनोरथ छिपे रहते हैं। श्री रघुनाथजी ने भाई भरत को बहुत प्रकार से समझाया, परन्तु कोई अवलम्बन पाए विना उनके मन में न संतोष हुआ, न शान्ति।
राजधर्म संक्षेप में - जिस प्रकार से मन में सभी मनोरथ छिपे रहते हैं, उसी प्रकार से राजधर्म में लोक कल्याण की सारी उत्कृष्ट योजनाएं और पवित्र भावनाएं छिपी रहनी चाहिए।
भारत के भारतरत्न, आधुनिक कवि, नई सोच, राजधर्म के पंडित, मर्यादा के साथ राजनीति करने वाले सदैव अटल रहने वाले पूर्व प्रधानमन्त्री स्वर्गवासी अटल विहारी वाजपेई जी ने 2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़के दंगों के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। जिसमें भारत के तात्कालिक प्रधानमन्त्री अटल जी और गुजरात के तात्कालिक मुख्य मन्त्री नरेंद्र मोदी जी एक साथ मौजूद थे।
रिपोर्टर के सवाल पर जवाब देते हुए अटलजी ने कहा 'मुख्यमंत्री के लिए एक ही संदेश है वो है राजधर्म का पालन करना। ये शब्द काफी सार्थक है। मैं भी उसी का पालन करने का प्रयास कर रहा हूं। शासक के लिए प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता। न जन्म के आधार पर, न धर्म के आधार पर, न जाति के आधार पर। मुझे विश्वास है कि नरेंद्र भाई यही कर रहे हैं।' इतने सार्थक सम्वाद को कुछ लोगो ने तोड़मरोड़ कर पेश किया, जबकि ये स्पष्ट था कि राजधर्म ही उनके लिए सर्वोच्च है और उसी का पालन हो रहा है।

11/01/2021

क्या रामायण और राम को ख़त्म करने की दिशा में बुद्धिजीविओं के द्वारा किया जाने वाला प्रयास अंतिम चरण में है?
अमीश त्रिपाठी उसके मुख्य किरदार की भूमिका निभाते नजर आ रहे है और लेखक बनकर रामायण और राम की संस्कृति को समाप्त करने पर तुले हुए है।
अमीश त्रिपाठी रामचंद्र श्रृंखला में तीन पुस्तक लिख चुके है और इसे पढ़ने पर ये स्पष्ट होता है कि अब इनकी रामायण के द्वारा मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम जी की सामाजिक और राजनितिक जीवनी रूपी महाकाब्य वाली रामायण के सारे मूल्यों को समाप्त करने की दिशा में अंतिम प्रयास है।
अमीश त्रिपाठी की रामायण और राम पर रामचंद्र श्रृंखला में लिखी पुस्तके-
राम इच्छवाकु के वंशज
सीता मिथिला की योद्धा
रावण आर्यव्रत का शत्रु
उदाहरण के लिए कुछ मुख्य झूठ –
नंदिनी गाय नहीं महिला थी। विश्वामित्र और वशिष्ठ इस नंदिनी नाम की महिला को फ़साने के चक्कर में दुश्मन हो गए।
माँ सीता विष्णु थीं। पूरी रामायण में सीता को श्रीदेवी जैसा लीड रोल में और राम पिछलग्गू बने फिरते है, कितना सत्यानाश कर दिया।
गुरु विश्वामित्र, राम नहीं सीता को सीखा रहे है।
इत्यादि... इत्यादि
अमीश त्रिपाठी, रोचक उपन्यास के रूप में रामायण और राम के लिए पूरे झूठ लिखकर अंग्रेजी में पूरे संसार में बेचकर राम को बदनाम कर रहे है। लोग जो पढ़ेंगे वही समझेंगे
इससे पहले तथाकथित प्रबुद्ध लोगो और बौद्धों ने रामायण में कुछ भ्रांतियां, उत्तरकाण्ड जो महर्षि बाल्मिकी जी के द्वारा लिखित नहीं लगती है और मूल रामायण में भी कुछ फेर बदल करके समाज के अपनी निजी समाज विरोधी, जातिवादी, स्त्रीविरोधी, पिछड़ीजाति विरोधी नीतियों को मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम से जोड़कर उनके चरित्र के साथ खेलवाड़ करके अपना उल्लू सीधा किया था। ये लोग काफी शक्तिशाली थे उनका विरोध करके उनको रोका नहीं जा सका अब दुबारा ऐसा ना होने दिया जाया।
अपने इन उपन्यास वाली रामायण में तो अमीश त्रिपाठी पुरे रामायण और राम को ही समाप्त कर दिए है, कुछ वर्षो बाद इसे ही दुनिया सत्य मान लेगी, जरुरत है श्रीरामचन्द्र जी के कोमल, प्रजाप्रिय, सशक्त, लोकहितकारी सर्वमान्य स्वरूप जिसकी अदभुत व्याख्या महर्षि बाल्मिकी, तुलसीदास, कालिदास, कम्बन इत्यादि कवियों ने की हैं उसको उसी रूप में बचाये रखने की।
मेरा सभी भाइयों से अनुरोध है कि अमीश त्रिपाठी की पुस्तकों को कही से थोड़ा पढ़े-समझे और इनके इस सोची-समझी चाल को यहीं पर रोककर, जन कल्याणकारी राज्य, राज्य का शासन, राज्य का कानून, सर्वोत्तम प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और सर्वश्रेष्ठ नेतृत्व पर लिखी जाने वाली रामायण महाकाब्य को बचाये।
इसको साधु-संत, योगी जी, समाज में प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाने की कोशिस करे ताकि हम ऐसे लोगो को आप एहि विराम दे पाएं।
जय श्री राम

10/01/2021

प्राचीन युग और रामायण काल में आश्रम रूपी शोध संस्थानों की भूमिका -
पुष्पक विमान हमको काल्पनिक लगता है और आधुनिक विज्ञान के अनुसार पहला उड़ने वाला हवाई जहाज १९०३ में बना, परन्तु सत्य आपके समक्ष निम्न है –
आधुनिक युग में १८९९ और १९०५ के बीच, राइट बंधुओं ने वैमानिकी अनुसंधान और प्रयोग का एक कार्यक्रम चलाया, जिसके परिणामस्वरूप १९०३ में पहली बार संचालित हवाई जहाज और दो साल बाद एक परिष्कृत, व्यावहारिक उड़ाने लायक हवाई जहाज का आविष्कार उन्होंने किया।
रामायण काल या प्राचीन युग में आश्रम रूपी शोध संस्थानों ने तो आज के वायुयान से उन्नत किस्म और तेज चलने वाले हवाई जहाज बहुत पहले ही दुनिया को दे दिया था और उसका सभी ने भरपूर उपयोग किया। वायुयान के लिए कार्य करते हुए आश्रम रूपी शोध संस्थान -
महर्षि भारद्वाज और अगस्त्य ऋषि के आश्रम में विमानशास्त्र विज्ञान का विकास काफी तेजी से हुआ। महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित `यन्त्र-सर्वस्व´ के `विमान-प्रकरण´ में प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चामत्कारिक तथ्य संगृहीत है। `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रन्थ वायुयान की रचना पर एक उत्तम वैज्ञानिक पुस्तक है। उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक `अंशुबोधिनी´ में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं इसमे प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है। एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है। महर्षि ने इसमें आठ प्रकार के विमानो का वर्णन किया है -
1. शक्त्युद्गम - बिजली से चलने वाला।
2. भूतवाह - अग्नि, जल और वायु से चलने वाला।
3. धूमयान - गैस से चलने वाला।
4. शिखोद्गम - तेल से चलने वाला।
5. अंशुवाह - सूर्यरश्मियों से चलने वाला।
6. तारामुख - चुम्बक से चलने वाला।
7. मणिवाह - चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला।
8. मरुत्सखा - केवल आयु से चलने वाला।
ऋषि अगस्त्य द्वारा रचित अगस्त्य संहिता में वायुयान पर विशेष संग्रह है। उन्होंने पुष्पक विमान कुबेर के निमित बनाया था।
उस समय गुरुकुल और आश्रम सभी ज्ञान-विज्ञान के विकास के लिए निरन्तर कार्य करते रहते थे। इसका परिणाम ये हुआ कि राम के राज्यकाल में विज्ञान मानवता को आगे बढ़ाने के लिए अपने चरम तक पहुँच सका। परन्तु हम अपनी अल्पबुद्धि से उसे काल्पनिक मानकर छोड़ दिए और रामायण में दिए गए ज्ञान को धरातल पर लाने का कोई प्रयास करना तो दूर उसको पूजा तक सीमित रखना बेहतर समझा।
बाल्मीकि जी ने राम के कार्यो को रामायण में लिपिबद्ध करने का कार्य किया था, तो आप उसे काल्पनिक कैसे कह सकते है?
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