Faran Academy

Call Directions

Faran Academy Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Faran Academy, Naqi Nagar, Hisua.

Since its establishment, Faran Academy, Hisua, Nawada, has been committed to providing quality schooling at very low cost, especially for minority and economically weaker children, ensuring that financial hardship never becomes a barrier to education.

17/09/2026

Fatah Mecca k bad musalmanon ko hunain ki jung ka samna Krna pda.

17/09/2026

📖 **इतिहास की वो अज़ीम फ़तह, जिसने दुनिया को बदला: फ़तह-ए-मक्का (8 हिजरी / 630 ईस्वी)** ✨

दोस्तों! रमज़ान के मुक़द्दस महीने की 20 तारीख को इस्लाम के इतिहास की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक घटना 'फ़तह-ए-मक्का' पेश आई थी। आइए आज तफ़्सील से जानते हैं कि यह अभियान क्यों शुरू हुआ, इस दौरान क्या हुआ और अल्लाह के रसूल ﷺ ने इंसानी इतिहास में माफ़ी की कैसी बेमिसाल मिसाल कायम की।

🛑 **1. यह अभियान क्यों शुरू हुआ? (कारण)**
मक्का के क़ुरैश और मदीना के मुसलमानों के बीच 6 हिजरी में "हुदैबिया की संधि" (Treaty of Hudaybiyyah) हुई थी, जो 10 साल के लिए थी। लेकिन महज़ दो साल के भीतर ही क़ुरैश ने इस संधि को तोड़ दिया। क़ुरैश के सहयोगी कबीले 'बनु बक्र' ने मुसलमानों के सहयोगी कबीले 'बनु खुज़ाआ' पर रात के अंधेरे में हमला कर दिया और हरम (काबा के पवित्र क्षेत्र) के अंदर उनके कई लोगों को बेरहमी से क़त्ल कर दिया। इस हमले में क़ुरैश ने भी छिपकर अपने साथी कबीले की मदद की थी। बनु खुज़ाआ के सरदार ने मदीना आकर हुज़ूर ﷺ से मदद की गुहार लगाई। वायदे और संधि के उल्लंघन के बाद अल्लाह के रसूल ﷺ ने मक्का की तरफ कूच करने का फैसला किया।

🏳️ **2. इस्लामी लश्कर का हाल और झंडा किसके हाथ में था?**

* **लश्कर की तादाद:** हुज़ूर ﷺ के साथ 10,000 जांबाज सहाबा का एक अज़ीम लश्कर मदीना से रवाना हुआ। यह मदीना के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी फौज थी।
* **रणनीति:** मक्का के करीब पहुँचकर हुज़ूर ﷺ ने लश्कर को हुक्म दिया कि वे अलग-अलग जगहों पर आग जलाएं ताकि क़ुरैश को सेना की ताकत का अंदाज़ा हो जाए और वे बिना लड़े ही आत्मसमर्पण कर दें, जिससे मक्का की पाक सरज़मीन पर खून-खराबा न हो।
* **मुख्य झंडा (Alam-दार):** इस मुक़द्दस मुहीम में इस्लामी लश्कर का मुख्य झंडा (Standard) हज़रत ज़ुबैर बिन अल-अव्वम (राज़ियल्लाहु अन्हु) और कुछ अन्य प्रमुख सहाबा के हाथों में था। लश्कर को चार हिस्सों में बांटकर अलग-अलग दिशाओं से मक्का में दाखिल होने का हुक्म दिया गया था।

⚔️ **3. मक्का में प्रवेश और हुज़ूर ﷺ का फरमान**
अल्लाह के रसूल ﷺ जब मक्का में दाखिल हुए, तो उनका सर अल्लाह की बारगाह में आज़ी (विनम्रता) से इतना झुका हुआ था कि उनकी दाढ़ी मुबारक ऊंट के कजावे को छू रही थी। कोई तकब्बुर (घमंड) नहीं था। हुज़ूर ﷺ ने मक्का के लोगों के लिए अमन (शांति) का आम ऐलान करते हुए फरमा दिया:

1. "जो शख्स अबू सुफ़ियान के घर में दाखिल हो जाएगा, उसे पनाह (सुरक्षा) है।"
2. "जो अपने घर का दरवाज़ा बंद रखेगा, उसे पनाह है।"
3. "जो मस्जिद-ए-हरम (काबा) में दाखिल हो जाएगा, उसे पनाह है।"
साफ हिदायत थी कि जब तक सामने से तलवार न उठाई जाए, किसी पर हाथ नहीं उठाना है। हज़रत खालिद बिन वलीद के दस्ते पर कुछ उपद्रवियों ने तीर चलाए, जहाँ मामूली झड़प हुई, बाकी पूरा मक्का बिना खून बहाए फतह हो गया।

⚖️ **4. किसे क़त्ल करने का हुक्म था और क्यों?**
हालाँकि हुज़ूर ﷺ ने सबको माफ़ कर दिया था, लेकिन 6 से 10 ऐसे घिनौने अपराधी थे जिन्होंने अतीत में इस्लाम के खिलाफ अक्षम्य अपराध किए थे, मासूमों पर अत्याचार किए थे या रसूल ﷺ की शान में गुस्ताखी व बेअदबी की थी। हुज़ूर ﷺ ने हुक्म दिया था कि ये मुजरिम अगर काबा के गिलाफ (पर्दे) के पीछे भी छुपे मिलें, तो इन्हें न छोड़ा जाए।

* **किनके नाम शामिल थे?** इनमें इकरामा बिन अबी जहल, अब्दुल्लाह बिन खतल, मकी़स बिन सुबाबा, हब़्बार बिन असवद और कुछ गाफिला गाएिकाएं (जो नबी ﷺ की शान में गुस्ताखियाना शायरी गाती थीं) शामिल थीं।
* **नतीजा:** इनमें से अब्दुल्लाह बिन खतल और मकी़स बिन सुबाबा जैसे कुछ लोगों को उनके अपराधों की वजह से कत्ल किया गया। लेकिन, इकरामा बिन अबी जहल और हब़्बार बिन असवद जैसे कई बड़े अपराधी भाग गए और बाद में जब वे वापस आकर सच्चे दिल से इस्लाम में दाखिल हुए, तो रहमत-ए-आलम ﷺ ने उन्हें भी खुले दिल से माफ़ कर दिया! यहाँ तक कि हुज़ूर के चचा हज़रत हमज़ा का कलेजा चबाने वाली हिंदा को भी माफ़ी मिल गई।

🕋 **5. हुज़ूर ﷺ मक्का में कितने दिन रुके और वहाँ क्या-क्या किया?**
इतिहास की प्रामाणिक किताबों के मुताबिक, फतह के बाद हुज़ूर ﷺ मक्का में **19 दिन (कुछ रिवायतों में 15 से 20 दिन)** ठहरे। इस दौरान आपने निम्नलिखित ऐतिहासिक कार्य किए:

* **बुतों का खात्मा:** काबा के इर्द-गिर्द 360 बुत (मूर्तियां) रखे हुए थे। हुज़ूर ﷺ ने अपनी छड़ी से एक-एक करके सबको गिराया और कुरान की यह आयत पढ़ी: *"जा अल-हक्कु व ज़हकल बातिल, इन् नल बातिला काना ज़हूका"* (यानी हक आ गया और बातिल/झूठ मिट गया, और बेशक झूठ मिटने ही वाला है)।
* **बिलाल की अज़ान:** बुतों के सफाए के बाद हज़रत बिलाल (राज़ियल्लाहु अन्हु) को काबा की छत पर खड़े होकर इस्लाम की तौहीद (एकेश्वरवाद) की गूंज यानी अज़ान पुकारने का हुक्म दिया गया।
* **आम माफ़ी (General Amnesty):** काबा के सामने सहमे खड़े मक्का वासियों से हुज़ूर ﷺ ने पूछा, *"तुम्हें क्या लगता है, मैं तुम्हारे साथ क्या सुलूक करूँगा?"* उन्होंने कहा, *"आप शरीफ भाई हैं और शरीफ भाई के बेटे हैं।"* तब हुज़ूर ﷺ ने फरमाया, *"आज तुम पर कोई मलामत नहीं, जाओ तुम सब आज़ाद हो!"*
* **इस्लाम की तालीम और बैअत (शपथ):** इन 19 दिनों में मक्का और उसके आसपास के कबीलों के हज़ारों लोगों ने (पुरुषों और महिलाओं ने) हुज़ूर ﷺ के हाथ पर इस्लाम की बैअत की। हुज़ूर ﷺ ने आसपास के इलाकों से भी बुतखानों को तोड़ने के लिए सहाबा के दस्ते भेजे और मक्का की सीमाओं (Haram Limits) को दोबारा तय करवाया ताकि लोग सच्चे दीन को समझ सकें।

**सबक:** फ़तह-ए-मक्का हमें सिखाता है कि इस्लाम तलवार से नहीं, बल्कि सब्र, वादे की पाबंदी, रहमदिली और आला अख्लाक (उच्च चरित्र) से फैला है। सुभानअल्लाह!

👉 इस पोस्ट को ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें ताकि हर कोई इस्लाम के इस खूबसूरत इतिहास से वाकिफ हो सके!

16/09/2026

ज़िंदगी बे-बंदगी शर्मिंदगी !!

16/09/2026

خودی کو کر بلند اتنا کہ ہر تقدیر سے پہلے
خدا بندے سے خود پوچھے، بتا تیری رضا کیا ہے

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।

15/09/2026

📌 📌 ऐतिहासिक पोस्ट: इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन से 'अल्लाह की तलवार' बनने का सफर! ⚔️❤️

क्या आप जानते हैं कि वो शख़्स जिसने उहुद की जंग (Battle of Uhud) में मुसलमानों की जीती हुई बाज़ी को पलट दिया था... जिसने पीछे से ऐसा घातक हमला किया कि 70 महान सहाबा शहीद हो गए... यहाँ तक कि प्यारे नबी करीम ﷺ का चेहरा मुबारक लहूलुहान हुआ और दांत मुबारक शहीद हो गए... आख़िर उस कट्टर दुश्मन का दिल कैसे पिघला?

आइए जानते हैं इतिहास के सबसे महान जनरल हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (रज़ि.) के इस्लाम क़बूल करने की वो दास्तान, जो आँखों में आँसू और ईमान में जोश भर देती है। 👇

🧠 1. उहुद की जंग का वो ज़ख़्म और दिल की बेचैनी
उहुद और ख़ंदक़ जैसी बड़ी जंगों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ अपनी पूरी ताक़त झोंकने के बाद भी ख़ालिद बिन वलीद के दिल में एक अजीब सी बेचैनी रहने लगी थी। वह ख़ुद अपनी जीवनी में बताते हैं:
"मैंने हर जंग में मोहम्मद (ﷺ) के ख़िलाफ़ अपनी पूरी ताक़त लगाई, लेकिन हर बार जंग के बाद मेरे दिल से आवाज़ आती थी कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, वह बेकार है। मुझे पक्का यक़ीन हो चला था कि एक दिन मोहम्मद (ﷺ) ही कामयाब होंगे।"

जब 6 हिजरी में सुलाह-ए-हुदैबिया (Treaty of Hudaybiyyah) हुई और दोनों तरफ़ अमन (शांति) का माहौल बना, तो ख़ालिद बिन वलीद को मुसलमानों को बहुत क़रीब से देखने का मौक़ा मिला। उनका अनुशासन और एक अल्लाह की इबादत के प्रति समर्पण देखकर उनके दिल में इस्लाम की सच्चाई का बीज बो दिया गया।

✉️ 2. भाई का वो ख़त... जिसने तक़दीर बदल दी (The Turning Point)
ख़ालिद बिन वलीद के बड़े भाई, हज़रत वलीद बिन वलीद (रज़ि.), पहले ही मुसलमान हो चुके थे। 7 हिजरी में जब अल्लाह के रसूल ﷺ 'उमराह-तुल-क़ज़ा' के लिए सहाबा के साथ मक्का आए, तो हज़रत वलीद भी उनके साथ थे।
मक्का में वलीद ने अपने भाई ख़ालिद को ढूंढा, लेकिन ख़ालिद शर्मिंदगी या झिझक के कारण मक्का छोड़कर बाहर चले गए थे। तब हुज़ूर ﷺ ने हज़रत वलीद से पूछा था:
"ख़ालिद कहाँ है? उसके जैसा बुद्धिमान इंसान इस्लाम से इतनी दूर कैसे रह सकता है? अगर वह अपनी सैन्य समझ और ताक़त को मुसलमानों के हक़ में इस्तेमाल करे, तो यह उसके लिए कितना बेहतर होगा!"

हज़रत वलीद ने हुज़ूर ﷺ की यह बात एक भावुक ख़त में लिखकर अपने भाई ख़ालिद तक पहुँचाई: "मेरे प्यारे भाई! मुझे अचंभा है कि तुम जैसा अक्लमंद इंसान इस्लाम जैसी हक़ीक़त को पहचानने में चूक कर रहा है। अल्लाह के रसूल ﷺ ने तुम्हारे बारे में पूछा है। ऐ मेरे भाई! अब उठो और अल्लाह के रास्ते में आ जाओ..."

🛣️ 3. मदीना का सफ़र और तीन बड़े दुश्मनों का मिलन
जब ख़ालिद बिन वलीद ने अपने भाई का ख़त पढ़ा, तो उनके दिल की दुनिया बदल गई। उन्होंने चुपके से अपना घोड़ा, हथियार और ढाल ली और मदीना के लिए निकल पड़े।
अल्लाह की शान देखिए! रास्ते में उन्हें दो और ऐसे बड़े नेता मिले जो कल तक मक्का के बहुत बड़े रक्षक और मुसलमानों के दुश्मन थे—हज़रत अम्र बिन अल-आस और हज़रत उस्मान बिन तल्हा। मक्का के ये तीनों बड़े दिमाग़ बिना एक-दूसरे को बताए, एक ही रास्ते पर, एक ही नीयत से मदीना जा रहे थे। जब तीनों की मुलाक़ात हुई और पता चला कि तीनों ही कलमा पढ़ने जा रहे हैं, तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

🤝 4. मदीना का भावुक मंज़र और गुनाहों की माफ़ी
8 हिजरी में जब ये तीनों मदीना पहुंचे, तो नबी करीम ﷺ का चेहरा ख़ुशी से चमक उठा। उन्होंने सहाबा से फ़रमाया:
"मक्का ने अपने जिगर के टुकड़ों (सबसे बेहतरीन लोगों) को हमारे हवाले कर दिया है।"

ख़ालिद बिन वलीद जब हुज़ूर ﷺ के सामने पहुंचे, तो हुज़ूर ﷺ के चेहरे पर उनके लिए कोई नफ़रत नहीं थी, बल्कि एक सच्चे मार्गदर्शक की मुस्कान थी। ख़ालिद बिन वलीद ने आगे बढ़कर बड़े अदब से कहा: "मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लाय़क नहीं और आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं।"
इसके तुरंत बाद, उहुद की जंग का पछतावा उनके दिल पर भारी था, इसलिए उन्होंने कांपती आवाज़ में दरख़्वास्त की:

"ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे पिछले तमाम गुनाहों के लिए अल्लाह से माफ़ी की दुआ फ़रमा दीजिए, जो कुछ भी मैंने इस्लाम के ख़िलाफ़ और मुसलमानों को ज़ख़्मी करने के लिए किया है।"
रहमतुल-लिल-आलमीन ﷺ ने मुस्कुराते हुए फ़रमाया: "ऐ ख़ालिद! जब कोई इंसान इस्लाम स्वीकार कर लेता है, तो उसके पिछले सारे गुनाह मिटा दिए जाते हैं।" और हुज़ूर ﷺ ने अपने हाथ उठाकर दुआ की: "ऐ अल्लाह! ख़ालिद के उन सभी गुनाहों को माफ़ फ़रमा दे, जो इसने तेरे रास्ते से लोगों को रोकने के लिए किए थे।"

⚔️ 5. जब हुज़ूर ﷺ ने दिया "सैफ़ुल्लाह" (अल्लाह की तलवार) का ख़िताब
इस्लाम लाने के कुछ ही समय बाद, मुता की जंग (Battle of Mu'tah) हुई। इस जंग में मुसलमानों के तीन बड़े सेनापति एक के बाद एक शहीद हो गए और मुस्लिम सेना चारों तरफ़ से रोमन साम्राज्य की विशाल फ़ौज (लगभग 2 लाख सैनिक) से घिर गई थी।
ऐसे नाज़ुक मोड़ पर सहाबा ने सर्वसम्मति से ख़ालिद बिन वलीद को सेनापति चुना। उन्होंने अपनी लाजवाब युद्ध रणनीति से न केवल घिरे हुए मुसलमानों को सुरक्षित बाहर निकाला, बल्कि रोमानियों के छक्के छुड़ा दिए। इस जंग के दौरान उनके हाथ से 9 तलवारें टूट गई थीं।

मदीना में बैठे हुज़ूर ﷺ को जब अल्लाह ने इस जीत की ख़बर दी, तो उन्होंने सहाबा के बीच गर्व से ऐलान किया:
"आज ख़ालिद ने कमान संभाली है। वह मेरी उम्मत का एक बेहतरीन नौजवान है और वह अल्लाह की तलवारों में से एक तलवार (सैफ़ुल्लाह) है, जिसे अल्लाह ने मुशरिकों पर म्यान से निकाला है।"

✨ सबक़: इस्लाम का वह सबसे बड़ा दुश्मन, जिसने कभी मुसलमानों को गहरे ज़ख़्म दिए थे, अल्लाह की रहमत और हुज़ूर ﷺ की हिकमत से इस्लाम की सबसे मजबूत ढाल बन गया। उन्होंने अपने पूरे जीवन में 100 से अधिक युद्ध लड़े और कभी किसी जंग में शिकस्त (हार) नहीं झेली। सुभानल्लाह! ❤️

📌 ऐतिहासिक पोस्ट: सुलाह-ए-हुदैबिया (Treaty of Hudaybiyyah) — एक ऐसी संधि जो 'खुली फ़तह' बनी! ✨इस्लामी इतिहास का वो मोड़,...
14/09/2026

📌 ऐतिहासिक पोस्ट: सुलाह-ए-हुदैबिया (Treaty of Hudaybiyyah) — एक ऐसी संधि जो 'खुली फ़तह' बनी! ✨

इस्लामी इतिहास का वो मोड़, जिसे अल्लाह ने क़ुरआन में "फ़त्ह-ए-मुबीन" (खुली जीत) फ़रमाया, वो तलवार के ज़ोर से नहीं, बल्कि सब्र, हिकमत और दूरंदेशी (Strategy) से जीती गई थी। आइए जानते हैं हुदैबिया का पूरा वाक़या, जो हर मुसलमान के ईमान को ताज़ा कर देता है।

📖 1. ऐतिहासिक पस-मंज़र (Background)
ज़ुल-क़ादा 6 हिजरी (628 ईस्वी) में नबी करीम ﷺ ने ख़्वाब देखा कि आप अपने सहाबा के साथ अमन से मक्का में दाख़िल होकर उमराह कर रहे हैं। नबी का ख़्वाब वही (Revelation) होता है। हुज़ूर ﷺ 1400 सहाबा के साथ सिर्फ़ एहराम बांधकर और क़ुरबानी के जानवर लेकर मक्का की तरफ़ निकल पड़े। मुसलमानों का इरादा जंग का बिल्कुल नहीं था। लेकिन मक्का के मुशरिकों (क़ुरैश) ने अपनी अना (Ego) में आकर मुसलमानों का रास्ता रोकने के लिए एक दस्ता भेजा। ख़ून-ख़राबे से बचने के लिए अल्लाह के रसूल ﷺ ने मक्का के क़रीब 'हुदैबिया' नाम की जगह पर पड़ाव डाला।

💧 2. हुदैबिया के मैदान में मुश्किलात और मुअज़िज़ात
वहां पानी की भयंकर क़िल्लत थी। सिर्फ़ एक सूखा कुआँ था। हुज़ूर ﷺ ने अपने मुबारक हाथ का एक तीर या अपना लुआब-ए-दहन (Saliva) उस कुएं में डाला, और देखते ही देखते कुएं से पानी का चश्मा उबल पड़ा! पूरे 1400 के लश्कर और जानवरों ने सैराब होकर पानी पिया।

हुजूर ने हजरत उस्मान को अपना सफीर बनाकर कर मक्का भेजा।
जब मक्का गए हुए हज़रत उस्मान (रज़ि.) की शहादत की अफ़वाह उड़ी, तो मुसलमानों में ग़म और ग़ुस्सा फैल गया। हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया कि हम उनके ख़ून का बदला लेंगे और एक बबूल के पेड़ (Acacia Tree) के नीचे सहाबा से मौत की बय्यत ली, जिसे इतिहास में 'بَيْعَةُ الرِّضْوَانِ' (बय्यते रिज़वान) कहा जाता है। इस बय्यत की ख़बर सुनकर काफ़िर डर गए और सुलह के लिए राज़ी हुए।

📜 3. सुलह की वो शर्तें, जो बज़ाहिर मुसलमानों को झुकाने वाली थीं
मक्का के नुमाइंदे सुहैल बिन अम्र ने बड़ी ज़िद के साथ ऐसी शर्तें रखवाईं, जिससे सहाबा के दिल मगलूबियत (हार) के अहसास से छलनी हो रहे थे:
इस साल बिना उमराह किए वापसी: मुसलमान इस साल बिना उमराह किए मदीना लौट जाएंगे। अगले साल सिर्फ़ 3 दिन के लिए आ सकेंगे।

एकतरफ़ा वापसी की शर्त (सबसे तकलीफ़देह): मक्का का कोई भी शख़्स अगर (मुसलमान होकर) मदीना भागेगा, तो मदीना वाले उसे वापस मक्का भेजने के पाबंद होंगे। लेकिन मदीना का कोई शख़्स मक्का भागेगा, तो क़ुरैश उसे वापस नहीं करेंगे।

⚔️ हमले और इत्तिहाद (Alliance) की अहम शर्त: अरब का कोई भी क़बीला मुसलमानों या क़ुरैश में से किसी के भी साथ इत्तिहाद (गठबंधन) करने के लिए आज़ाद है। शर्त यह थी कि कोई भी एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हथियार नहीं उठाएगा। अगर किसी के भी साथी क़बीले पर हमला हुआ, तो वो सीधे तौर पर मुख्य फ़रीक़ (मुसलमानों या क़ुरैश) पर हमला माना जाएगा और जंग का ऐलान समझा जाएगा।

नाम पर एतराज़: जब संधि पर "मोहम्मद रसूलुल्लाह" लिखा गया, तो सुहैल ने कहा कि हम रसूल नहीं मानते। हुज़ूर ﷺ ने अपने मुबारक हाथों से 'रसूलुल्लाह' मिटाकर 'मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह' लिखवाया।

इसी दौरान सुहैल का बेटा हज़रत अबू जंदल (रज़ि.), जो मक्का की क़ैद में बेड़ियों से जकड़े हुए थे, तड़पते हुए हुदैबिया के कैंप में पहुंचे। लेकिन समझौते के तहत हुज़ूर ﷺ को रोते हुए अबू जंदल को उनके ज़ालिम बाप के हवाले करना पड़ा। इस मंज़र ने सहाबा को तड़पा कर रख दिया।

⛺ 4. हुज़ूर ﷺ का ख़ेमा (Tent) और उम्मुल मोमिनीन का वो तारीख़ी मशवरा!
सुलहनामा मुकम्मल होने के बाद, हुज़ूर ﷺ ने सहाबा को हुक्म दिया: "उठो, अपने जानवर क़ुरबान करो और अपने सर मुंडवाकर एहराम खोल दो।"
लेकिन सहाबा पर इस कदर ग़म और सदमे का पहाड़ टूटा था कि वे बुत बने बैठे रहे। हुज़ूर ﷺ ने तीन बार यह हुक्म दिया, लेकिन कोई अपनी जगह से नहीं हिला (वे उम्मीद कर रहे थे कि शायद अल्लाह की तरफ़ से कोई और वही आ जाए या यह फ़ैसला बदल जाए)।
हुज़ूर ﷺ दुखी होकर अपनी बीवी उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा (रज़ि.) (नोट: कुछ रिवायतों में उम्मे सलमा का ज़िक्र है, जो सहीह बुख़ारी की सबसे ऑथेंटिक रिवायत है) के ख़ेमे में गए और फ़रमाया कि लोग मेरा हुक्म नहीं मान रहे हैं।
तब हज़रत उम्मे सलमा (रज़ि.) ने एक बेमिसाल और हिकमत भरा मशवरा दिया:
"या रसूलुल्लाह! आप सहाबा से कुछ मत कहिए। आप बाहर निकलिए, किसी से बात किए बिना अपने क़ुरबानी के ऊंट को ज़بح कीजिए और अपने नाई (barber) को बुलाकर अपना सर मुंडवा लीजिए।"
हुज़ूर ﷺ ने ऐसा ही किया। जब सहाबा ने देखा कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने ख़ुद क़ुरबानी कर दी और सर मुंडवा लिया, तो उनके सारे वहम दूर हो गए। वे समझ गए कि अब यह फ़ैसला अटल है। सहाबा दीवानों की तरह उठे, क़ुरबानी की और एक-दूसरे के बाल मूंडने लगे—ग़म और अफ़सोस का ऐसा समां था कि डर था कि कहीं एक-दूसरे को (जल्दबाज़ी में) ज़ख़्मी न कर बैठें।

🏜️ 5. 'सीफ़ुल बहर' की वो आज़ाद गूरिल्ला फ़ोर्स (हज़रत अबू बसीर का वाक़या)
समझौते के बाद मक्का के एक और मुजाहिद हज़रत अबू बसीर (रज़ि.) भागकर मदीना आए। क़ुरैश के दो लोग उन्हें लेने आए, तो हुज़ूर ﷺ ने वादे के मुताबिक़ उन्हें वापस कर दिया। लेकिन रास्ते में अबू बसीर ने हिकमत से एक काफ़िर को हलाक कर दिया और मदीना जाने के बजाय मक्का-शाम के व्यापारिक मार्ग पर "सीफ़ुल बहर" (El-Eis) नाम के तटीय इलाके में बैठ गए।
धीरे-धीरे मक्का के जितने भी अज़ीयत झेल रहे मुसलमान थे (जिनमें हज़रत अबू जंदल भी शामिल थे), वो मक्का से भागकर इसी पहाड़ी इलाक़े में जमा होने लगे। देखते ही देखते 300 जांबाज़ों की एक आज़ाद गूरिल्ला आर्मी बन गई। चूंकि वे मदीना की रियासत का हिस्सा नहीं थे, इसलिए उन पर हुदैबिया की संधि लागू नहीं होती थी।
उन्होंने मक्का के व्यापारिक काफ़िलों को लूटना और काफ़िरों को काटना शुरू कर दिया। मक्का की अर्थव्यवस्था (Economy) तबाह हो गई। काफ़िर इस कदर तंग आ गए कि अबू सुफ़ियान ने ख़ुद मदीना हाथ जोड़कर पैग़ाम भेजा कि: "ख़ुदा के लिए इन लोगों को मदीना बुला लो, हम वह एकतरफ़ा वापसी वाली शर्त ख़ुद ख़त्म करते हैं!" सुभानल्लाह!

🕋 6. अगले साल का वो मंज़र (उमरा-तुल-क़ज़ा - 7 हिजरी)
अगले साल वादे के मुताबिक़ हुज़ूर ﷺ 2000 सहाबा के साथ उमराह के लिए मक्का पहुंचे। यह इतिहास का सबसे अद्भूत मंज़र था:
पहाड़ों पर चढ़े काफ़िर: मक्का के मुशरिक इस बात पर हैरान थे कि जिन मुसलमानों को हम भूखा और कमज़ोर समझते थे, वे कैसे शान से आ रहे हैं। क़ुरैश के बड़े-बूढ़े, मर्द और औरतें मक्का के आस-पास के पहाड़ों और चोटियों पर चढ़ गए ताकि मुसलमानों का तमाशा देख सकें।
शान-ए-मुस्तफ़ा ﷺ: हुज़ूर ﷺ अपनी ऊंटनी 'क़स्वा' पर सवार थे और हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा (रज़ि.) ऊंटनी की नकेल थामे शान से सीना ताने चल रहे थे। हुज़ूर ﷺ ने सहाबा से फ़रमाया कि अपने दाहिने कंधे को नंगा करो (रमल करो) और शान से तेज़ी से चलो, ताकि मुशरिक तुम्हारी ताक़त देखें।
जब सहाबा ने लब्बैक की सदाओं से मक्का की वादियों को गूंजा दिया, तो पहाड़ों पर बैठे काफ़िर दंग रह गए। इसी पर अमन माहौल को देखकर हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (रज़ि.) का दिल पिघला (जिन्हें उनके भाई वलीद बिन वलीद ने ख़त भी लिखा था) और उन्होंने मदीना आकर इस्लाम क़बूल कर लिया।

💥 7. यह संधि आख़िर कैसे टूटी?
सुलह के दो साल बाद, क़ुरैश के साथी क़बीले 'बोनू बक्र' ने मुसलमानों के साथी क़बीले 'बोनू ख़ुज़ाआ' पर रात के अंधेरे में हमला कर दिया। मक्का के काफ़िरों ने परदे के पीछे से बोनू बक्र को हथियार दिए और ख़ुद छुपकर इंसानों का क़त्ल किया, यहाँ तक कि हरम (काबा) की सीमा में भी ख़ून बहाया।
यह हुदैबिया की संधि की सबसे बड़ी शर्त (हमला न करने की शर्त) का खुला उल्लंघन था। बोनू ख़ुज़ाआ के लोगों ने मदीना आकर फ़रियाद की। क़ुरैश की इसी ग़द्दारी के जवाब में रमज़ान 8 हिजरी में हुज़ूर ﷺ ने 10,000 के लश्कर के साथ मक्का पर चढ़ाई की और बिना ख़ून बहाए 'फ़त्ह-ए-मक्का' (Conquest of Mecca) मुकम्मल हुआ।

✨ सबक़: जो फ़ैसला बज़ाहिर मुसलमानों की हार लग रहा था, अल्लाह ने अपनी हिकमत से उसे इस्लाम की सबसे बड़ी जीत में बदल दिया। बेशक, अल्लाह का हर फ़ैसला हिकमत से भरा होता है! ❤️

“हम रोज़ किताबें पढ़ते हैं, मगर असल में हर इंसान अपनी ज़िंदगी की एक किताब लिख रहा है।”:“अपनी ज़िंदगी ऐसी लिखो कि क़यामत ...
13/09/2026

“हम रोज़ किताबें पढ़ते हैं, मगर असल में हर इंसान अपनी ज़िंदगी की एक किताब लिख रहा है।”:
“अपनी ज़िंदगी ऐसी लिखो कि क़यामत के दिन अपना ‘आमालनामा’ पढ़कर शर्मिंदा नहीं, मुतमइन हो सको।”

“A little help can mean a lot to someone.”
13/09/2026

“A little help can mean a lot to someone.”

12/09/2026

Our identity & dignity

12/09/2026

#“बअरे मऊनह” का वाक़िया

हिजरत के चौथे साल, नबी ﷺ के पास कुछ लोगों की तरफ़ से यह ज़रूरत सामने आई कि ऐसे लोग भेजे जाएँ जो उन्हें क़ुरआन और दीन की शिक्षा दें।
नबी ﷺ ने इसके लिए 70 सहाबा को रवाना किया। ये कोई साधारण लड़ाकू दस्ते के सैनिक नहीं थे। सहीह मुस्लिम उन्हें “क़ुर्रा” कहता है—यानी क़ुरआन पढ़ने, समझने और दीन की शिक्षा देने वाले सहाबा। हदीस बताती है कि ये ज़्यादातर अंसार में से थे।

और “क़ुर्रा” का मतलब यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि आज की तरह हर व्यक्ति का पूरा क़ुरआन याद होना ही ज़रूरी था। उनका विशेष परिचय यह था कि वे क़ुरआन और दीन के जानकार/शिक्षक थे। दिन में वे लकड़ियाँ जमा करते और बेचते, और रात को क़ुरआन पढ़ते, उसका अध्ययन करते और इबादत करते। उस कमाई से अहले-सुफ्फ़ा और ज़रूरतमंदों के लिए खाना भी खरीदा जाता था।

यानी ये 70 लोग केवल “हाफ़िज़” कहकर छोड़ देने वाले लोग नहीं थे—ये उस दौर के दीन के प्रशिक्षित शिक्षक और इबादतगुज़ार सहाबा थे।

उन्हें कहाँ भेजा गया था?

वे नज्द की तरफ़ निकले और बअरे मऊनह नाम की जगह पर पहुँचे। सहीह बुखारी में आता है कि रिअल, ज़कवान, उ़सय्या और बनी लहयान से संबंधित लोगों ने नबी ﷺ से सहायता माँगी थी और नबी ﷺ ने उनके लिए 70 अंसारी क़ुर्रा भेजे।

सीरत की विस्तृत रिवायतों में अबू बराअ आमिर बिन मालिक का भी ज़िक्र आता है। वह बनी आमिर का एक प्रभावशाली सरदार था। उसने नबी ﷺ से अपने इलाके के लोगों तक दीन की बात पहुँचाने के लिए लोगों को भेजने का अनुरोध किया और उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी का भरोसा दिलाया।
“दीन की शिक्षा और इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाने के लिए नबी ﷺ ने 70 क़ुर्रा सहाबा को नज्द की ओर भेजा।”

फिर बअरे मऊनह पर क्या हुआ?
जब ये सहाबा बअरे मऊनह के पास पहुँचे तो उन्होंने वहाँ अपना मिशन शुरू किया।
इन्हीं में हज़रत हराम बिन मिल्हानؓ भी थे—हज़रत अनसؓ के मामू।
उन्होंने नबी ﷺ का पैग़ाम लेकर सामने वाले लोगों तक पहुँचने की कोशिश की। लेकिन वहाँ दगा किया गया।
सहीह बुखारी साफ़ कहती है कि उन लोगों ने इन सहाबा को धोखे से घेर लिया और उन्हें क़त्ल कर दिया।
हज़रत हराम बिन मिल्हानؓ को भी नेज़ा मारा गया।
उनके शरीर से खून बह रहा था। उन्होंने अपने चेहरे और सिर पर अपना खून लगाया और कहा:
فُزْتُ وَرَبِّ الْكَعْبَةِ
“काबा के रब की क़सम! मैं कामयाब हो गया।”
यह कोई कहानी या बाद की किताब का कथन नहीं है—
यह सहीह बुखारी 4092 में हज़रत अनसؓ से साबित है।
सोचिए...
दुश्मन समझ रहा था कि उसने एक आदमी को मौत दे दी।
लेकिन वह शहीद अपने खून में लथपथ होकर कह रहा था—
“मैं कामयाब हो गया!”
क्योंकि उसकी निगाह दुनिया की मौत पर नहीं, आख़िरत की कामयाबी पर थी।
और फिर एक-एक करके 70 क़ुर्रा शहीद कर दिए गए
सहीह मुस्लिम में आता है कि ये 70 लोग वहाँ धोखे से क़त्ल कर दिए गए। मरते समय उन्होंने अल्लाह से अर्ज़ की:
“ऐ हमारे रब! हमारे भाइयों को हमारी तरफ़ से बता दे कि हम अपने रब से मिले हैं और हम उससे राज़ी हैं और वह हमसे राज़ी है।”
और जब नबी ﷺ तक यह खबर पहुँची तो आपने एक महीने तक फ़ज्र की नमाज़ में उनके क़ातिलों के खिलाफ़ क़ुनूत किया।

सहीह बुखारी में अनसؓ से यह भी आता है कि बअरे मऊनह में 70 अंसारी शहीद हुए थे।

बाद में जब इस घटना की खबर सामने आई, तो आमिर बिन तुफ़ैल ने आमिर बिन फ़ुहैराؓ के बारे में कहा कि उसने उन्हें क़त्ल किए जाने के बाद आसमान की तरफ़ उठते हुए देखा, फिर उन्हें नीचे रखा गया।
यह विवरण सहीह बुखारी

लेकिन इसे लिखते समय हम यह नहीं कहेंगे कि “रसूल ﷺ ने फरमाया कि उनकी लाश आसमान पर उठा ली गई।” बुखारी में यह उर्वा की रिवायत के रूप में आया है—इसलिए attribution सही रखना जरूरी है।
और सबसे दिलचस्प मोड़...
बाद की सीरत की रिवायतों में आता है कि आमिर बिन फ़ुहैराؓ को नेज़ा मारने वाला जَب्बार बिन सलमा था और आमिरؓ के शब्द:

“فُزْتُ وَرَبِّ الْكَعْبَةِ”"काबा के रब की क़सम! मैं कामयाब हो गया।"
उसके दिल में बैठ गए।
उसने सोचा—जिस आदमी को मैंने मार दिया, वह “मैं कामयाब हो गया” क्यों कह रहा था?
जब उसे पता चला कि आमिरؓ जन्नत की कामयाबी की बात कर रहे थे, तो इस घटना ने उसके दिल पर ऐसा असर डाला कि उसने बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया।
इस आख़िरी हिस्से को हम सीरत की रिवायत के रूप में लिखेंगे, न कि सहीह बुखारी की रिवायत कहकर।

Address

Naqi Nagar
Hisua
805103

Opening Hours

Monday 8am - 1pm
Tuesday 8am - 1pm
Wednesday 8am - 1pm
Thursday 8am - 11pm
Saturday 8am - 1pm
Sunday 8am - 1pm

Telephone

+917274047900

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Faran Academy posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share