Team UPYogi

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जनहित के मुद्दे क्या है? सरकार तक लोगों की बात कैसे पहुंचें? सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीति चर्चा।

31/12/2023

जय श्री राम।

24/12/2023

पहले विमान की लैंडिंग, श्रीराम एयरपोर्ट अयोध्या जी।

22/12/2023

विश्वप्रसिद्ध नालन्दा विश्वविद्यालय को जलाने वाले जे हादी #बख्तियार खिलजी की मौत कैसे हुई थी ???
असल में ये कहानी है सन 1206 ईसवी की...!
1206 ईसवी में कामरूप (असम) में एक जोशीली आवाज गूंजती है...
"बख्तियार खिलज़ी तू ज्ञान के मंदिर नालंदा को जलाकर #कामरूप (असम) की धरती पर आया है... अगर तू और तेरा एक भी सिपाही ब्रह्मपुत्र को पार कर सका तो मां चंडी (कामातेश्वरी) की सौगंध मैं जीते-जी अग्नि समाधि ले लूंगा"... राजा पृथु
और , उसके बाद 27 मार्च 1206 को असम की धरती पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी गई जो मानव #अस्मिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है.
एक ऐसी लड़ाई जिसमें किसी फौज़ के फौज़ी लड़ने आए तो 12 हज़ार हों और जिन्दा बचे सिर्फ 100....
जिन लोगों ने #युद्धों के इतिहास को पढ़ा है वे जानते हैं कि जब कोई दो फौज़ लड़ती है तो कोई एक फौज़ या तो बीच में ही हार मान कर भाग जाती है या समर्पण करती है...
लेकिन, इस लड़ाई में 12 हज़ार सैनिक लड़े और बचे सिर्फ 100 वो भी घायल....
ऐसी मिसाल दुनिया भर के इतिहास में संभवतः कोई नहीं....
आज भी गुवाहाटी के पास वो #शिलालेख मौजूद है जिस पर इस लड़ाई के बारे में लिखा है.
उस समय मुहम्मद बख्तियार खिलज़ी बिहार और बंगाल के कई राजाओं को जीतते हुए असम की तरफ बढ़ रहा था.
इस दौरान उसने नालंदा #विश्वविद्यालय को जला दिया था और हजारों बौद्ध, जैन और हिन्दू विद्वानों का कत्ल कर दिया था.
नालंदा विवि में विश्व की अनमोल पुस्तकें, पाण्डुलिपियाँ, अभिलेख आदि जलकर खाक हो गये थे.
यह जे हादी खिलज़ी मूलतः अफगानिस्तान का रहने वाला था और मुहम्मद गोरी व कुतुबुद्दीन एबक का रिश्तेदार था.
बाद के दौर का #अलाउद्दीन खिलज़ी भी उसी का रिश्तेदार था.
असल में वो जे हादी खिलज़ी, #नालंदा को खाक में मिलाकर असम के रास्ते तिब्बत जाना चाहता था.
क्योंकि, तिब्बत उस समय... चीन, मंगोलिया, भारत, अरब व सुदूर पूर्व के देशों के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था तो खिलज़ी इस पर कब्जा जमाना चाहता था....
लेकिन, उसका रास्ता रोके खड़े थे असम के राजा #पृथु... जिन्हें राजा बरथू भी कहा जाता था...
आधुनिक गुवाहाटी के पास दोनों के बीच युद्ध हुआ.
राजा पृथु ने सौगन्ध खाई कि किसी भी सूरत में वो खिलज़ी को ब्रह्मपुत्र नदी पार कर तिब्बत की और नहीं जाने देंगे...
उन्होने व उनके आदिवासी यौद्धाओं नें जहर बुझे तीरों, खुकरी, बरछी और छोटी लेकिन घातक तलवारों से खिलज़ी की सेना को बुरी तरह से काट दिया.
स्थिति से घबड़ाकर.... खिलज़ी अपने कई सैनिकों के साथ जंगल और पहाड़ों का फायदा उठा कर भागने लगा...!
लेकिन, असम वाले तो जन्मजात यौद्धा थे..
और, आज भी दुनिया में उनसे बचकर कोई नहीं भाग सकता....
उन्होने, उन भगोडों #खिलज़ियों को अपने पतले लेकिन जहरीले तीरों से बींध डाला....
अन्त में खिलज़ी महज अपने 100 सैनिकों को बचाकर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठकर क्षमा याचना करने लगा....
राजा पृथु ने तब उसके सैनिकों को अपने पास बंदी बना लिया और खिलज़ी को अकेले को जिन्दा छोड़ दिया उसे घोड़े पर लादा और कहा कि
"तू वापस अफगानिस्तान लौट जा...
और, रास्ते में जो भी मिले उसे कहना कि तूने नालंदा को जलाया था फ़िर तुझे राजा पृथु मिल गया...बस इतना ही कहना लोगों से...."
खिलज़ी रास्ते भर इतना बेइज्जत हुआ कि जब वो वापस अपने ठिकाने पंहुचा तो उसकी दास्ताँ सुनकर उसके ही भतीजे अली मर्दान ने ही उसका सर काट दिया....
लेकिन, कितनी दुखद बात है कि इस बख्तियार खिलज़ी के नाम पर बिहार में एक कस्बे का नाम बख्तियारपुर है और वहां रेलवे जंक्शन भी है.
जबकि, हमारे राजा पृथु के नाम के #शिलालेख को भी ढूंढना पड़ता है.
लेकिन, जब अपने ही देश भारत का नाम भारत करने के लिए कोर्ट में याचिका लगानी पड़े तो समझा जा सकता है कि क्यों ऐसा होता होगा.....
उपरोक्त लेख पढ़ने के बाद भी अगर कायर, नपुंसक एवं तथाकथित गद्दार धर्म निरपेक्ष बुद्धिजीवी व स्वार्थी हिन्दूओं में एकता की भावना नहीं जागती...

02/12/2023

"लोग मेरा मज़ाक उड़ाते थे, मुझसे दूर भागते थे लेकिन मेरे केवल दो ही मकसद थे; एक अपने माँ-पापा की सेवा करना और दूसरा बाजरे के बीज को बचाकर इसकी खेती को बढ़ावा देना।"
- लहरी बाई

लहरी बाई मध्य प्रदेश के सिलपाड़ी गांव की एक बैगा आदिवासी महिला हैं, जो अपने माता-पिता के साथ दो कमरे के एक घर में रहती हैं। जहां एक कमरा लिविंग रूम और किचन की तरह इस्तेमाल किया जाता है; वहीं दूसरे कमरे को बीज बैंक में बदल दिया गया है जिसमें उन्होंने कोदो, कुटकी, सनवा, मढ़िया, सालहर और काग सहित बाजरा के लगभग 150 से ज़्यादा दुर्लभ बीजों को संरक्षित रखा है।

लहरी बाई इन बीजों को अपनी ज़मीन पर उगाती हैं, फिर उससे जो बीज मिलते हैं, वह उन्हें अपने गाँव के किसानों और आस-पास के 15 गाँवों में बाँट देती हैं। वह बीज बांटने का काम मुफ़्त में करती हैं, लेकिन कई बार इसके बदले किसान उन्हें अपनी फसल का कुछ हिस्सा दे देते हैं।

लहरी बाई को जोधपुर आईसीएआर की 10 लाख रुपये की स्कॉलरशिप के लिए नॉमिनेट करने वाले डिंडोरी के जिला कलेक्टर विकास मिश्रा कहते हैं- "अगर उन्हें स्कॉलरशिप मिलती है, तो लहरी बाई पीएचडी छात्रों को इन बीजों की जानकारी देती नज़र आएगी।"

Photos from Team UPYogi's post 09/10/2023

े_इंडिया

ऑस्ट्रेलिया को रौंदने पर टीम इंडिया को हार्दिक शुभकामनाएं💥❤️ Well Played Kohli and Rahul ❤️💥

तीन विकेट जीरो पर आउट हो जाने के बाद मुश्किलों में घिरी टीम इंडिया को जिस तरह के एल राहुल और चेज़ मास्टर विराट कोहली ने न सिर्फ संभाला बल्कि जीत की दहलीज तक क्रीज छोड़कर नही गए ये इस अभियान के लिए अच्छे संकेत है विराट कोहली के बारे में ज्यादा कुछ भी लिखना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है हां मगर जिस तरह के एल राहुल ने प्योर क्रिकेटिंग शॉट्स और पूरे आत्मविश्वास के साथ भारत को मैच जिताया साथ साथ मैच के किसी भी मोड़ पर विराट पर दवाब नही आने दिया काबिले तारीफ है इस अजयी विश्वकप अभियान की जीत के साथ शुरुआत सम्पूर्ण भारत को बधाई....🇮🇳🇮🇳




03/09/2023

शहीद गंगू मेहतर बाल्मीकि।

नाना साहब पेशवा के सैनिक दस्ते में गंगू मेहतर का नाम भी बेहतरीन लड़ाकों में से एक माना जाता था।

उन्हें शुरुआत में नगाड़ा बजाने के लिए शामिल किया गया था।

लेकिन उनके बहादुरी और पहलवानी को देखते हुए सूबेदार का पद मिल गया।

वो सैनिकों को पहलवानी के गुर भी सिखाते थे जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और 200 के लगभग अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था ।

उन्हें 18- 9 -1857 को कानपुर में चौराहे पर फाँसी दी गई थी इन वीर क्रांतिकारी योद्धा को शत शत नमन ।

बताते हैं इनका नाम इतिहास में गुमनाम है और नाही कोई ऊनकी याद मे प्रतिमा।

क्युकि आजादी तो चरखे से आई है और महान तो अकबर है।

आइए इन महान राष्ट्रभक्त के नाम पर "भारत माता की जय" बोलते हैं।

27/07/2023

कहानी उस महिला की जिसने टाटा स्टील कंपनी को दी थी अलग पहचान।

टाटा ग्रुप कंपनी से तो आज हम सब परिचित हैं। इस कंपनी ने देश के लिए कई दान-धर्म के काम किए हैं। एक वक्त ऐसा भी था,जब यह कंपनी डूबने के कगार पर थी। उस समय जो महिला सबसे आगे निकल कर आई थीं, वह महिला थीं मेहरबाई टाटा उनकी बदौलत टाटा स्टील कंपनी को आज अपनी अलग पहचान मिली है। उन्होंने अपनी सबसे बेशकीमती चीज को गिरवी रख कंपनी को आर्थिक तंगी से बचाया था।

लेडी मेहरबाई टाटा जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा की पत्नी थीं। उस दौर में ही उनकी सोच बहुत आगे बढ़कर थी। उन्होंने बाल विवाह, महिला मताधिकार, लड़कियों की शिक्षा से लेकर पर्दा प्रथा तक को हटाने में भी अपनी आवाज बुलंद की थी।

उन्हें खेल में भी बहुत रुची थी। शुरू से उन्हें टेनिस, घुडसवारी और पियानो बजाने का शौक था। उन्होंने टेनिस टूर्नामेंट में 60 से अधिक पुरस्कार अपने नाम किए थे। इसके अलावा ओलम्पिक में टेनिस खेलने वाली भी वो पहली भारतीय महिला थीं। खास बात यह है कि वो सारे टेनिस मैच पारसी साड़ी पहनकर खेलती थीं।


23/07/2023

जयंती विशेष ॥

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद ॥

अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जी की जन्म जयंती कोटि-कोटि नमन जय हिंद जय भारत शहीदों को कोटि कोटि नमन हिंदुस्तान अमर शहीद क्रांतिकारियों का ऋणी है और ऋणी रहेगा मरते दम तक क्रन्तिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) में हुआ था। उनके पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी थीं। सीताराम तिवारी तत्कालीन अलीराजपुर की रियासत में सेवारत थे (वर्तमान में मध्य प्रदेश में स्थित है) और चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन भावरा गाँव में बीता। उनकी माता जगरानी देवी की जिद के कारण चंद्रशेखर आज़ाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां काशी विद्यापीठ संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी।

क्रन्तिकारी जीवन :-
चंद्रशेखर आज़ाद 1919 में अमृसतर में हुए जलियां वाला बाग हत्याकांड से बहुत आहत और परेशान हुए। सन 1920-21 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की तब चंद्रशेखर आज़ाद ने इस क्रांतिकारी गतिविधि में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्हें पंद्रह साल की उम्र में ही पहली सजा मिली। उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन में कार्यरत चंद्रशेखर आज़ाद ने कसम खाई थी कि वह ब्रिटिश सरकार के हांथों कभी भी गिरफ्तार नहीं होंगे और आज़ादी की मौत मरेंगे।

इसके बाद कुछ युवकों ने यह समझा दिया कि इस प्रकार अहिंसा से देश को आजादी नहीं मिलेगी। उनका विचार था कि ब्रिटिश शासकों के अन्याय और अत्याचार के विरुध्द शस्त्र व्दारा ही मुकाबला करके आजादी हासिल की जा सकती है। इस विचारधारा के युवकों में सरदार भगतसिंह, सुखदेव, शचीन्द्रनाथ सान्याल और रामप्रसाद बिस्मिल आदि के नाम प्रसिध्द हैं।

जिस समय सरदार भगत सिंह ने पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन की शुरुआत की उस समय चन्द्रशेखर आजाद उत्तर प्रदेश में सक्रिय थे। वे भगत सिंह का सहयोग करने के लिए उनकी ओर आगे बढ़े। उन्होंने किसी भी कीमत पर देश को आज़ादी दिलाने के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया। चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसे ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाया जो सामान्य लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध दमनकारी नीतियों के लिए जाने जाते थे।

चंद्रशेखर आज़ाद काकोरी ट्रेन डकैती (1926), वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने के प्रयास (1926), किए। और लाहौर में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स को गोली मारने (1928) जैसी घटनाओं में शामिल थे। इतना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों खूब सराहा गया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए सरकारी खजाने को भी लूटा। उनका नाम पुलिस के लिए एक आतंक का सूचक था। पुलिस उनके नाम से थर्राती थी। वे गोरी सरकार से लोहा लेते रहे।

चंद्रशेखर आज़ाद ने भगत सिंह और दूसरे देशभक्तों जैसे सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सभा’ का गठन किया। इसका उद्देश्य भारत की आज़ादी के साथ भारत के भविष्य की प्रगति के लिए समाजवादी सिद्धांतों को लागू करना था।

अंग्रेज चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके लेकिन बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां एवं ठाकुररोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फांसी पर लटकाकर मार दिया। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी को छुड़ाने की योजना भी बनायी, लेकिन आजाद उसमें सफल नहीं हो पाये।

दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड के आरोपियों भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाये जाने पर आजाद काफी आहत हुए। आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया।

अमर शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद जी की शहादत
27 फरवरी 1931 को वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से मिले और आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। वे अपने भुनभुनाते हुए बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क चले गये।

जिस समय सैकड़ों पुलिस अफसरों और सिपाहियों ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्हें घेर लिया तो उन्होंने घंटो वीरता पूर्वक मुकाबला किया। लेकिन जब चंद्रशेखर के पास मात्र एक ही गोली शेष रह गई तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा और उन्होंने जो संकल्प किया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी। इसी संकल्प को पूरा करने के लिए इसी पार्क में 27 फरवरी, 1931 को उन्होंने स्वयं को गोली मारकर मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दी। जब यह क्रांतीकारी मौत के आगोश में सो गया तो भी ब्रिटिश पुलिस अफसरों को उसके पास तक जाने की हिम्मत न हुई। इस प्रकार इस क्रांति के वीर सिपाही ने अंतिम दम तक अपनी आन की लाज रखी। उनका सर्वोच्च बलिदान देश के युवाओं को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

23/07/2023

✍️अदभुत दृश्य।

इंसान कितना भी निर्दयी बन जाये लेकिन प्रकृति फिर भी माफ कर देती हैं और दया दिखाती हैं।
इंसान ने जरूर इस पेड़ को काट दिया लेकिन इस पेड़ ने फिर भी हार नही मानी और खाने के लिए फल दिए हैं।
इसी तरह प्रकृति के प्रति दया प्रेम रखे तो जल्द ही हमारी प्रकृति फिर से खिल उठेगी।

16/07/2023

भ्रष्टाचार के लिए केवल सरकारी अधिकारी ही नहीं राजनीतिक पार्टियां भी जिम्मेदार हैं। जो पार्टी फंड के नाम पर अधिकारियों/जनता से पैसा वसूलतीं हैं। इस भ्रष्टाचार के दुष्प्रभाव को जनता को भोगना पड़ता है।

भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता लेकिन भ्रष्टाचार के लिए सख्त कानून बनाकर इस पर नियंत्रण किया जा सकता है।

16/07/2023

अपने इतिहास और संस्कृति पर गर्व करिए। हम वामपंथियो के लिखे इतिहास पर भरोसा करते हैं, अपने संस्कृति को हीन समझते हैं।

ईसा से 600 साल पहले आचार्य कणाद ने परमाणु संरचना का आधार रखा, अणु की खोज की। डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया और कहा कि मैंने भारतीय ग्रंथों को पढ़कर इसे बनाया।

आइंस्टीन, न्यूटन, रदरफोर्ड, ग्राहम बेल, टेस्ला, डाल्टन, गैलीलियो, नील्स बोर, एडिसन, डार्विन, एनरिको फर्मी समेत तमाम वैज्ञानिकों की सारी खोज 17 वीं शताब्दी से शुरू हुई ।

15वीं शताब्दी तक आक्रांताओं की तरह अंग्रेज भी जाहिलो की तरह दुनिया में मारकाट करते थे। 16 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में प्रवेश किया।

भारतीय ग्रंथो पुस्तकों को अंग्रेजों ने पढ़ना शुरू किया। मैकाले एक तरफ गुरुकुल शिक्षा और शोध संस्थानों को उन्नति के रास्ते पर बाधक बोल बंद कराता रहा, दूसरी तरफ गोरों को संस्कृत पढ़ाया गया ।

गीता से लेकर उपनिषद तक का अनुवाद अंग्रेजो, फ्रेंच, जर्मनी द्वारा करवाया गया। पश्चिम देशों के विश्व विद्यालयों में संस्कृत केंद्र खोले गए।

वहीं से वैज्ञानिक खोज की भरमार हो गई। हर वैज्ञानिक ने किसी न किसी भारतीय पुस्तक या ऋषि के खोज का अनुसरण किया।

भारतीय अंग्रेजी में मस्त होकर अपनी भाषा और ऋषियों का मजाक बनाते रहे और पश्चिमी देशों ने भारतीय शास्त्रों से बहुमूल्य रत्न निकाले और हमने शास्त्रों को पढ़ने वालों को जाहिल गंवार घोषित किया।

बोधायन, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, कणाद, वहारमिहिर, नागार्जुन, सुश्रुत, चरक, पतंजलि के शोध को अपना आधार बनाकर अंग्रेज वैज्ञानिक, डॉक्टर, सर्जन बन गए।

हमने से कितने लोगों को अपने वैज्ञानिकों के बारे में जानकारी हैं ?

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