Acharya Aivaj Bhandare

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राष्ट्रीय कीर्तनकार, शाहीर, आचार्य ऐव?

10/09/2022

सादर वन्दे,
दिनांक 16/17/18 सप्टेंबर 2022 रोजी श्रीराम मंदिर राजेन्द्रनगर येथे तरुणांची नवोदित संस्था " राष्ट्रमेव जयते"च्या वतीने एक युवाकीर्तन महोत्सव होणार आहे.
सर्व वरिष्ठ कनिष्ठ श्रोतृ वर्गाला निवेदन असे कि अधिकाधिक संख्येने उपस्थित राहून नवोदित कीर्तनकारांना आणि कार्यकर्त्यांना आशिर्वाद द्यावे.🙏🙏
विस्तृत कार्यक्रम लवकरच जाहीर होईल 🙏
कुठला ही कार्यक्रम म्हटला कि आर्थिक आवश्यकता असतेच अनेक समर्थ देणगीदारांनी ह्या साठी सहाय्य केले आहे आपण सुद्धा पितृपक्षात दिवंगत आप्तजनांच्या आठवणी प्रीत्यर्थ सहाय्य करु शकता .
आपणास नम्र विनंती कि यथाशक्ति सहाय्य करुन तरुणांचा हा प्रयत्न यशस्वी करावा .
धन्यवाद

शुभाकांक्षी
ऐवज भांडारे

सम्पर्क-7999702168

Acharya Aivaj Bhandare - YouTube 14/08/2022

है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी

हरि ॐ ,
सादर वन्दे ,

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं | आज ही के दिन , हमारे भारत ने सदियों की दासता से मुक्ति पायी थी | आज के दिन ,हम कई सौ वर्षो के अत्याचारों और क्रूरता से मुक्त हुए थे | अपना खोया हुआ गौरव पुनः प्राप्त करने , उन्नति के उच्चतम शिखर पर पहुंचने हेतु , हमने विश्वगगन पर आज ही के दिन उड़ान प्रारम्भ की थी | असंख्य शूरवीरों ने भारत को स्वतंत्र करने हेतु इसे अपने रक्त से सिंचित किया था | अनेकानेक वर्षो के अथक प्रयासों के बाद हमे वह दिन देखने को मिला , जिस की हम कल्पना कर रहे थे |

इस सदियों, दशकों की गुलामी ने भारत को गंभीर क्षति पहुंचाई | भारत की शिक्षण व्यवस्था , व्यापार , अनुसंधान , खेल,स्थापत्य कला, जिनके बल पर भारत विश्वगुरु था उसका समूल नाश कर दिया गया | भारतभूमि पर सबसे बड़ा आघात तब हुआ , जब भारत ने अपना विघटन देखा | अखंड भारत को खंडित कर दिया गया ,एक नहीं कई कई बार भारत ने बंटवारा देखा | अफगानिस्तान , पाकिस्तान , बांग्लादेश , बर्मा , भूटान , श्रीलंका भारत से खंडित होकर अलग राष्ट्र बने | भारत के प्रमुख तीर्थ जैसे शारदा पीठ, हिंगलाज शक्तिपीठ , भबानीपुर ; भारत की सिंधु नदी , और प्रमुख शहर , लाहौर ,कराची , ढाका, कंधार आदि भारत से छिन गए | इस विभाजन के फलस्वरूप अनेक बार भीषण नरसंहार हुआ , जिसमे लाखों लोग मारे गए | भारत जब स्वतंत्र हुआ तब उसकी अवस्था कुछ वैसी ही थी जैसे गंभीर बीमारी से बाहर आने के बाद रोगी की होती है | रोग से मुक्ति तो मिल जाती है , परन्तु शरीर को अंदर से इतनी क्षति हो चुकी होती है कि पूर्ण रूप से स्वस्थ होने में लम्बा समय लग जाता है |

आज़ादी के ७५ वषों में हमने नवोन्मेष किया , हम प्रगति के पथ पर पुनः अग्रसर हुए | विभाजन का दंश झेल चुके देश पर ७५ वर्ष के अंदर ४ बड़े युद्ध और सैंकड़ों आंतकवादी हमले हुए , परन्तु हम नहीं रुके |भारत की अर्थव्यवस्था , भारत के शिक्षण , भारत की कला ने फिर से एक बार रफ़्तार पकड़ी | ५०-७० के दशक में भारत ने अनेक तकनीकी शिक्षण संस्थान , आयुर्विज्ञान संस्थान , प्रबंध संस्थान, इसरो , रक्षा अनुसंधान , कृषि संस्थानों, गुप्तचर एजेंसियों,आदि की नींव रखी जो बहुत ही कम समय में विश्व के अग्रणी संस्थानों में सम्मिलित हो गए | आज जिस बल पर विदेशी एजेंसी और विदेशी लोग , विश्व का चौधरी बनने का दवा करते हैं , उसका आधार भारत है | विश्व के सफ़लतम उत्पादों में आपको भारतीयों की बुद्धि जान पड़ेगी | दुनिया के जो देश भारत को रोगियों का ढोंगियों का , मदारियों का देश समझते थे ,वही देश आज भारत की ओर आशान्वित होकर देखते हैं , और भारत को नेतृत्व करता हुआ देखना चाहते हैं , क्योकि उन्हें पता है की सबको साथ लेकर चलने की जो शक्ति भारत में है , वह दुनिया के और किसी देश के पास नहीं है

इस नए भारत में हमारी क्या जिम्मेदारी हैं ? हमारे क्या कर्तव्य हैं ? केवल स्वतंत्र प्राप्त कर लेना भर ही नहीं है , उस स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाये रखना यह ज्यादा मायने रखता है | कुछ वर्षो पहले तक अपनी भारतभूमि के लिए प्राणों की बाजी लगाना महत्पूर्ण था , क्योकि वह समय गुलामी से मुक्त होने का था | आज भारतभूमि के लिए जीना अधिक महत्त्वपूर्ण है | इस वीर भूमि के सपूत होने के नाते यह हमारा दाईत्व है , की हम भारत को प्रगति के पथ पर अग्रसर रखें | अपनी बुद्धि , शिक्षण से , और सामर्थ्य से भारत माता को पुनः विश्वगुरु के पद पर आसीन होने में अपना सहयोग दें, पुनः एक बार अखंड भारत को साकार करें | अखंड भारत सिर्फ भौतिक सीमाओं से ही नहीं , अपितु मन से एक हुए लोगो से बनेगा | ऐसे लोगो , जो भारत के कल्याण में ही अपना कल्याण खोजते हैं , भारत के लिए जीते है और भारत के लिए ही मरते हैं |

अखंड भारत पर इसी चिंतन को ध्यान में रखते हुए , हमने अपने यूट्यूब चैनल की अगली कड़ी को प्रस्तुत किया है | आप सभी दर्शको का स्नेह और सहयोग से
हमे आगे वीडियो बनाने का उत्साह मिलता है | इसी तरह प्रेम बनाये रखिये और वीडियो को लाइक करें , चैनल को सब्सक्राइब करें ,
जय हिन्द

Acharya Aivaj Bhandare - YouTube ||वंदे मातरम|| ...

18/06/2022

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

हरि ॐ ,

सादर वन्दे ,

आज हम जिस चरित्र का अध्ययन करने वाले हैं उन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं हैं | यदि शौर्य स्वाभिमान और वीरता इन गुणों का प्रत्यक्ष चेहरा होता , तो निस्संदेह महारानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखता | आज का दिन महारानी लक्ष्मीबाई का पुण्य स्मरण दिन है | उन्ही को नमन करते हुए आज के इस विषय अपने विचार रखता हूँ | आइए मिलकर उस रणरागिनी , रणचंडी का जीवन परिचय पढ़ें और उनके जीवन हम क्या सीख सकते हैं वह देखें |

महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म १९ नवंबर १८३५ को वाराणसी में हुआ था | इनके पिता का नाम मोरोपंत ताम्बे था ,और माता का नाम भागीरथी सप्रे था | इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था , प्रेम से सभी इन्हे मनु बुलाया करते थे | बाल्यकाल से ही मनु तीक्ष्ण बुद्धि थी , उसे तलवार ,बरछी , कटार जैसे शस्त्रों से खेलना बहुत प्रिय था | मनु बचपन में गुड्डे गुड़िया नहीं अपितु मलखम्ब कुश्ती , छद्म युद्ध , व्यूह रचना जैसे खेल खेला करती थी | नाना साहेब , तात्या टोपे मनु के बचपन से मित्र हुआ करते थे | मनु इनके साथ घुड़सवारी , तलवारबाजी के गुण सीखती | बचपन से आतताई अंग्रेज़ो के अत्याचार देखने के कारण मनु के बालमन पर गहरा असर हुआ , और उसने ठान लिया की वह बड़ी होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ेगी |

मनु के जीवन पर नियति का आघात हुआ और जब वह मात्र ४ वर्ष की थी , तब माता का देहावसान हो गया | पिता मोरोपंत ताम्बे ने मनु को माता की कमी कभी महसूस नहीं होने दी और माता और पिता दोनों का स्नेह दिया | १४ वर्ष की आयु में मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हो गया | विवाह के बाद मनु का नाम बदल कर लक्ष्मी हो गया और वह झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई कहलायी गयीं |

गंगाधर राव और लक्ष्मीबाई को विवाह पश्चात् पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई | उनके पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया | लक्ष्मीबाई पर नियति फिर एक बार क्रूर हुई और पुत्र दामोदर का सिर्फ ४ महीने की अल्पायु में निधन हो गया | राजाजी और रानी निःसंतान हो गए | राजा गंगाधर राव ने अपने भाई वासुदेव राव नेवालकर के पुत्र आनंद राव को दत्तक ले लिया और उसका नाम रखा दामोदर राव | पुत्र के नामकरण के अगले ही दिन गंगाधर राव का निधन हो गया |
लक्ष्मीबाई के लिए यह बहुत कठिन समय था | और यह संकटो की शुरुआत भर थी |

डलहौजी जो उस वक़्त भारत का गवर्नर था , उसने इस घटना में एक कुटिल अवसर देखा | व्यपगत सिद्धांत या doctrine of lapse या और सटीक शब्दों में कहें तो डलहौज़ी की राज्य हड़प नीति | जिन राज्यों का कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था , उन राजाओं को दत्तक पुत्र लेने की आज्ञा नहीं थी | ऐसी स्थितियों में
अंग्रेजी शासन को यह पूर्ण अधिकार था की वह व्यपगत सिद्धांत के तहत राज्य को अपने में मिला ले | ऐसी दमनकारी नीतियों के कारण भारत ने सतारा , सम्बलपुर , जयपुर आदि राज्यों को खो दिया था | इसी निति के तहत झाँसी में भी अंग्रेजी खलीता आया और लक्ष्मीबाई को झाँसी अंग्रेज़ो के अधीनस्त करने को कहा गया | यह वही डलहौज़ी था , जो १-२ दशक पूर्व व्यापार करने के लिए हिन्दू राजाओ के समक्ष गिड़गिड़ा रहा था | और अब वही दुष्ट भारत का गवर्नर जनरल बन कर अपनी नीतियों से साम्राज्यवादी ताकतों को बढ़ा रहा था |

जब अँगरेज़ जबरदस्ती झाँसी पर कब्ज़ा करने हेतु रानी के महल आये तो रानी ने प्रतिकार किया और गरजकर कहा "मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी " | सोचिये इन शब्दों में कितनी ताकत रही होगी | उस समय भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध किसी ने भी मोर्चा नहीं खोला था | वो भी एक महिला द्वारा ,उस वक़्त जब हर जगह , पुरुषो का राज्य हुआ करता था | यह अपने आप में एक बहुत बड़ी जीत थी और नारी सशक्तिकरण का एक बहुत बड़ा उदहारण था |
हमने अपने पिछली कड़ी में शिवाजी महाराज पर एक कविता देखी थी , जिसमे कुशल नेतृत्व के बारे में कहा गया था | एक कुशल नेता वह होता है जो लोगो को अपनी बातों और कर्मो से एक सुखद भविष्य का सपना दिखा सकता है | लक्ष्मीबाई के शब्द भारतीय जनमानस में प्राणो की तरह दौड़े | देशभर में लोगों में
दमनकारी नीतियों के विरुद्ध चिंगारी सुलगने लगी |

अंग्रेज़ो ने झाँसी पर कब्ज़ा करने हेतु अपनी सेना भेजी | रानी लक्ष्मीबाई और उनके सैनिको ने जमकर लड़ाई लड़ी , और अंग्रेज़ो को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया | परन्तु अँगरेज़ सैन्य बल में अधिक होने के कारण बार बार आ जाते | रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में हार गयीं और झाँसी अंग्रेज़ो के अधीन हो गयी| परन्तु वे किसी तरह अपने विश्वस्त सैनिको के सहयोग से वहां से बचकर निकल गयी | आगे रानी ने फिर से सैन्य शक्ति जुटाई और ग्वालियर के किले पर हल्ला बोल दिया | ग्वालियर का किला सामरिक दृष्टि से अंग्रेज़ो के लिए अति महत्वपूर्ण था | ग्वालियर का किला छीन जाने पर अंग्रेज़ो ने फिर एक बार हमला बोला | रानी उस रणसंग्राम में अंग्रेज़ो पर बिजली बनकर टूट पड़ी | २३ वर्ष की वह युवती पीठ पर एक सात साल के बालक को बाँध अपनी तलवार से अंग्रेज़ो को पानी पीला रही थी | सोचिये क्या चरित्र रहा होगा उस महिला का ? हम २३ वर्ष की आयु में अपने को कहाँ पाते हैं...

रानी लक्ष्मीबाई ने वहां जमकर मारकाट मचाई | इतना पुरज़ोर विरोध देखकर अंग्रेज़ो ने दांतो तले ऊँगली दबा ली | उस क्षण जिसने भी रानी को देखा उसे एक महिला नहीं बिजली ही दिखाई दी | रानी लक्ष्मीबाई आगे बढ़ी पर एक नाले सम्मुख आकर वह घिर गयी | रानी का विश्वस्त घोड़ा कालपी में मृत हो चुका था , फलस्वरूप रानी ने नया घोडा लिया था | पर वह अभ्यस्त ना था , और समय पर नाला पार नहीं कर पाया | ढेर सारे कौरव और एक अकेला अभिमन्यु फिर घिर गया | रानी ने प्राणो के अंतिम कण तक उनका सामना किया और सभी को मार गिराया | पर घाव बहुत अधिक थे , खून काफी बह चुका था | फलस्वरूप रानी चिरनिद्रा में लीन हो गयी , वीरगति को प्राप्त हुईं | महारानी की इच्छा थी की अँगरेज़ उनके शव को भी हाथ ना लगा पाएं | रानी के शव को बाबा गंगादास की कुटिया में लाया गया और उस सन्यासी ने अपनी कुटिया में आग लगाकर रानी को मुखाग्नि दी |

महारानी लक्ष्मीबाई को हमे क्यों याद रखना चाहिए , उनके जीवन से हम क्या सीख ले सकते हैं ? तो इसका उत्तर यह है -
विश्व भर में अगर किसी को निजता और स्वाभिमान की लड़ाई लड़नी हो तो उसे एक बार झाँसी अवश्य आना चाहिए | वह किला जहाँ उस वीरांगना ने राज्य किया उसे देखना चाहिए | उस तीर्थस्थल को नमन करना चाहिए जहाँ उस विद्द्युलता ने अपने प्राण त्यागे |

कवि अमित शर्मा की कविता की पंक्तियां मुझे स्मरण आ रही है कि

देह दान योद्धा ही करते है,ना कोई दूजा जाता है
रणभूमि मे वीर मरे तो शव भी पूजा जाता है

प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर को तो किसी ने नहीं देखा , मगर मेरा अटूट विश्वास है , की ईश्वर इसी तरह भिन्न भिन्न रूपों में जन्म लेते हैं , कभी महारानी लक्ष्मीबाई के रूप में , कभी रानी पद्मिनी के रूप में , कभी हाडा रानी के रूप में और हमारा उद्धार करते हैं |

08/06/2022

हरि ॐ ,
सादर वन्दे ,

६ जून १६७४ , भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन | हिन्दू ह्रदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज़ का राज्याभिषेक इस पावन दिन हुआ था | आज के सन्दर्भ में राज्याभिषेक दिन का क्या महत्व है ? अगर आज शिवाजी महाराज होते तो आज की युवा पीढ़ी , तरुण पीढ़ी को देखकर क्या सोचते ? इन्ही सब बातों का वर्णन निम्नलिखित काव्य में करने का प्रयास किया है | कविता की पृष्ठभूमि ऐसी है , कि समुद्र किनारे एक व्यक्ति , ग़मगीन खड़ा | जीवन की परेशानियों से निराश वह नशे में डूबा हुआ है | शिवाजी महाराज जब उसे देखते है , तो क्या कहते हैं , यहाँ से कविता की शुरुआत है

हाथ लिए मदिरा की बोतल , मनुज नशे में पड़ा हुआ
बेसुध होकर सुधबुध खोकर , सागर सम्मुख खड़ा हुआ
तभी किनारे पर घोड़ो का शोर सुनाई देता है ,
क्षण भर में उस तट पर, कोटि सूर्य का, तेज दिखाई देता है

अन्धकार को चीर वहां जब दिव्य रूप वह प्रकट हुआ
छत्रपति महाराज दिखे, मानो भू पर भानु प्रकट हुआ
नैनों में अंगार , हाथ में वह तलवार भवानी थी
और आज मनुज को शिक्षित करने की राजे ने ठानी थी

देख क्रोध में राजे को , कपकंपी मनुज को छूट गयी
मदिरा की बोतल वह , हाथ से गिरकर टूट गयी

बोले राजे -हे मनुज , निज धर्म भूलकर , कैसे तुमने कर्म किये |
निज स्वार्थ साध्य ही करना था, मनुष्य जन्म क्यों लिए हुए |
जीवन की परिभाषा तुमसे , जानता बेहतर वह कीड़ा |
देता दुनिया को रेशम ,जीवन भर सह कर पीड़ा |

जीवन के कर्त्तव्य भूलकर आलस में तुम पड़े हुए
ध्येयहीन , पुरुषार्थहीन हो मेरे सम्मुख खड़े हुए
क्षमा शील और दया रहित हो , सत्य धर्म से डरे हुए
रक्त मांस का देह लेकिन अंतरतम से मरे हुए

क्या यही दिन देखने हेतु , हमने स्वराज्य का ध्यास किया
प्रगतिशील उन्नत राष्ट्र हो, जीवन भर प्रयास किया
आज उसी पावन पुनीत का, है तुमने उपहास किया
सच कहता हूँ , प्रिय मनुज , तुमने मुझे उदास किया

शब्दबाण राज़े के मुख से , हो गए मनुज के आरपार ,
कंप देह , करबद्ध विनीत, नष्ट हो गया अहंकार
जीवन की निज दशा देखकर , आया खुद पर तिरस्कार
अश्रु नेत्र हो गया तभी वह , सुनकर राजे से फटकार

बोला युवक , सब ओर मुझे संताप दिखाई देते हैं
इधर उधर , चहु ओर सदा बस पाप दिखाई देते हैं
बुद्धिमान विद्वान यहाँ सत्य भक्षक बनकर बैठे हैं
रिश्वतखोर और चोर लुटेरे , रक्षक बनकर बैठे हैं

मानव के इस पिशाच रूप ,सिहर उठा है तन मेरा
निज परिवार की चिंता हेतु , भयभीत होता मन मेरा
हत्या दंगे उन्मादो से , सुलग रहा चन्दन मेरा
बस इसी तरह से कुछ राजे , निकल रहा जीवन मेरा

दो राय नहीं इसमें कोई , है मानव की अतृप्त प्यास
लख कर दिल मेरा रोता है , देख मलिन मन का यह ह्रास ,
पर बाधाओं से लड़ने , क्या तुमने कभी कुछ यत्न किये ,
निज जीवन को बेहतर करने , क्या तुमने कभी प्रयत्न किये

पूजा करते , हार चढ़ाते , गीत मेरे तुम गाते हो ,
पर मेरे आदर्शो पर , संकल्पित हो चल पाते हो ?
मेरे बच्चे , मेरे नाम पर अपनों से लड़ जाते हो
पर एकत्रित होकर चलने हेतु , क्या तुम हाथ बढ़ाते हो ?

कितनी आखों से आंसू पोंछे ,? कितनों को मुस्कान दी ?
अपने कर्मो से आज तक , कितनों को पहचान दी ?
अन्यायों के विरुद्ध तुमने कब आवाज़ उठाई है ?
सच्चे मन से भारत माँ की जयकार लगाई है ?

कायरों की श्रेणी में तुम , पंक्तिबद्ध हो खड़े हुए
इस जीवन को व्यर्थ बनाकर मदिरा रत हो पड़े हुए
क्षणिक सुखो और दुर्व्यसनों में ,लिप्त होकर बड़े हुए
चरस गांजा तम्बाकू , तुम ठोंक ठोंक कर पड़े हुए

क्षमा करो महाराज गहन गंभीर अपराध हुआ है
अपने कर्मो पर मन मेरा शर्मसार हुआ है
शायद अब खुद से कभी न नज़रे मिला पाउँगा
लगता नहीं मुझे मै जीवन में कुछ कर पाउँगा

राजे बोले -उठो प्रिय , यह शोक विलाप का समय नहीं है
अकर्मण्य हो रहने वालो ,की इस जग में जगह नहीं है
आँखे खोलो, पहचानों , अवसरों का बाजार खड़ा है
जग का नेतृत्व करने हेतु , भारत फिर तैयार खड़ा है

नेतृत्व के लिए नहीं कभी उन्माद दिखाना पड़ता है
शुभ भविष्य , समृद्धि पर जन को विश्वास दिलाना पड़ता है
केवल विश्वास है निराधार , मेहनत का जोर लगाना पड़ता है
तूफानों चट्टानों से अड़कर , पार लगाना पड़ता है

पथ के आवर्तों से थककर, मन भटके आधे पथ पर
राह धुंधली , रस्ता संकरा , कंटक ही कंटक हो पथ पर
नित प्रयास और संयम से मार्ग दिखाना पड़ता है
जनमानस के अंतिम तक व्यवहार बनाना पड़ता है

हो पथ में गर अत्याचारी , यमलोक दिखाना पड़ता है
क्षण भर के लिए नहीं कभी , संकल्प डिगाना पड़ता है
संकट आने पर अपना सामर्थ्य दिखाना पड़ता है
अपनों के लिए कभी कभी , मृत्यु को, गले लगाना पड़ता है

बोला युवक- हे राजे , आदेश मुझे देकर ,धन्य करें जीवन मेरा
तेजपुंज के इन चरणों में, शत शत बार नमन मेरा |

बोले राजे -पढ़कर मेरे आदर्शो को , केवल इतना काम करो
कर्त्तव्य मार्ग पर चलकर सारे जग में अपना नाम करो
राज्योत्सव का अनुपम दिन यह , उन्नत सार्थक तब होगा ,
जब हर एक नारी जीज़ा माँ , और युवक में शिवबा होगा

Rajya Abhishek Ki Vartaman Sarthakta 06/06/2022

हरिःॐ
सादर वन्दे
सर्वप्रथम सभी को दिनांक अनुसार पुण्यश्लोक श्रीमंत छत्रपती शिवाजी महाराज के राज्यभिषेक दिवस अवसर पर शतशः अभिनंदन।
छत्रपती शिवाजी महाराज ने आज ही के दिन हिंदवी साम्राज्य की स्थापना कर हमे हिन्दू बने रहने का तथा जीवन पर्यंत स्वाभिमान से जीवन जीने का सुअवसर दिया ।
उन्होने हमे जो स्वराज्य दिया क्या उसका हम योग्य मूल्य जानते है और उन्होने जिस उम्मीद के साथ हमे स्वराज्य दिया क्या उनकी अपेक्षाओं को पूर्ण कर पा रहे है?
शिवाजी महाराज यदि होते तो हमे क्या उपदेश करते इस कल्पना को काव्यबद्ध कर छत्रपती शिवाजी महाराज को यह विडियो पुष्प अर्पित है ।
विडियो अधिक से अधिक लाईक करे कमेंट करे और अधिक से अधिक शेयर कर राष्ट्रवादी विचारों को जनसामान्य तक पहुचाने मे सहयोग करे और साथ ही चैनल को सबस्क्राईब करे।
हरिःॐ
जय शिवराय
लिंक-
https://youtu.be/FYza-70Ss08

स्नेहाभिलाशी
आचार्य ऐवज भांडारे

Rajya Abhishek Ki Vartaman Sarthakta शिवाजी महाराज आगमी पिढियो से क्या चाहते हैं इस विषय पर काव्य प्रयास है I

17/05/2022

हरि ॐ ,

सादर वन्दे ,

प्रथम लॉकडाउन का समय था | टीवी चैनल पर फिर से रामायण महाभारत दिखाए जाने लगे थे | एक शाम ऐसे ही मित्र से चर्चा करते हुए एक विषय निकला | विषय थे , स्वयं देवर्षि नारद | यह पूछने पर की देवर्षि नारद के बारे में वह क्या जानता है , देवर्षि नारद की उसके मन में कैसी छवि है ,मुझे अत्यंत ही नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी , कि हम में से अधिकांश लोग देवर्षि नारद को एक मसखरा , एक जोकर , झगडे लगाने वाला , इधर की बात उधर करने वाला ही समझते हैं | टीवी चैनलों में , सिनेमा में ,और गलत तरीके से वेद पुराणो के अध्ययन से हमने एक महान चरित्र को एक हास्यास्पद और व्यंगात्मक चरित्र समझ लिया | इन्ही भ्रांतियों को दूर करने हेतु प्रस्तुत है यह लेख |

सबसे पहला विचार तो यही कि देवर्षि नारद कौन ? जो भगवान नारायण के अनन्य भक्त हैं , जिनका संचार ३ लोकों में ही नहीं १४ भुवनों में यथासमय और इच्छा के अनुरूप हो सकता हैं , जो ज्ञान की पराकाष्ठा हैं और मधुर कंठ हैं , जो भक्तों की प्राथनाओं को प्रभु तक पहुंचाने का मार्ग हैं और जो स्वयं परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं , ऐसे देवर्षि नारद | नारद इस शब्द का क्या अर्थ है और देवर्षि यह उपाधि नारद मुनि को क्यों दी जाती है ?? | नार का अर्थ होता है जल और द का मतलब दान । संपूर्ण सृष्टि को जो ज्ञानदान करते हैं , जो ज्ञान का तर्पण करते हैं और जो सदैव भगवान् नारायण में रत है , वह ना-रद हैं | देवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाले ऋषिगण देवर्षि (देव ऋषि ) कहे जाते थे | नारद भगवन की विद्वता का अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं की देवता , दानव , मानव सभी इनसे परामर्श लेने आते थे |

देवर्षि नारद ने नारद भक्ति सूत्र इस ग्रन्थ की रचना की | सूत्र किसे कहते हैं ? जानकार लोग यह बताते हैं की सूत्र याने शब्दों का ऐसा समूह जिसमें , एक भी शब्द कम करने की सम्भावना ना हो , और एक भी शब्द बढ़ाने की आवश्यकता ना हो | ऐसे वाक्यों को सूत्र कहा जाता है | जो अपने आप में संपूर्ण है , तथा श्रेष्ठ पद्धति से भाव को व्यक्त करता है , वह सूत्र | ऐसे सूत्रों में भक्ति को पिरो कर विश्व को देने वाले देवर्षि नारद भगवान | भक्त कैसा होना चाहिए , भक्ति कैसे करनी चाहिए , इन सभी विषयो पर संपूर्ण ज्ञान अगर विश्व को किसी ने दिया है , तो वो है, देवर्षि नारद |

देवर्षि नारद की श्रेष्ठता ,योग्यता और अद्वितीय ज्ञान का एक उदाहरण हैं , उनके शिष्य | नारदमुनि ने जब एक साधारण बालक ध्रुव को दीक्षा दी तो विश्व को एक अचल सितारा प्राप्त हुआ और भारतवर्ष को एक चक्रवर्ती सम्राट | यही नारदमुनि जब महर्षि वाल्मीकि से संवाद करते है तो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम का चरित्र प्राप्त होता है | जिनके उपदेशित करने पर , मार्गदर्शित करने पर वाल्मीकि रामायण जैसा महान ग्रन्थ विश्व को मिला , जो युगो युगो से विश्व को प्रेरित करता रहा है | और ऐसे एक चरित्र को हमने मसखरा समझने की प्रचंड मूर्खता की है | यही नारद जब वेद व्यास को उपदेशित करते हैं तो श्रीमद भागवत पुराण जैसी अद्वितीय रचना प्रकट होती है | विश्व के कल्याण के लिए , एक दुष्ट और नराधम के कुल में भक्तश्रेष्ठ का निर्माण करने का श्रेय भी भगवान नारद को ही जाता है | यह भक्त था प्रह्लाद , जिसने विश्व के सबसे बड़े और सब पहले गुंडे या कहें विश्व के सबसे पहले आतंकवादी हिरण्यकश्यप के घर जन्म लिया | जो इतना क्रूर था की अपने सगे पुत्र की एक नहीं कई कई बार हत्या करने कोशिश की , क्योकि वह भगवान नारायण का भक्त था | भक्त को प्रभु से मिलाने वाले ऐसे गुरुवर , नारद | सोचिये जब शिष्य इतने वंदनीय हैं , तो स्वयं गुरु कितने वन्दनीय होने चाहिए | उनकी वाणी इतनी प्रबल थी , की स्वयं नारायण भी उनके शाप से नहीं बच पाए | देवर्षि नारद के भगवान् विष्णु को शाप देने के कारण राम अवतार में उन्हें माँ सीता से वियोग सहना पड़ा | जिस महाबली रावण ने सभी नवग्रहों को कालकोठरी में कैद कर रखा था , ऐसे रावण के जीवन में शनि की साढ़े साती लगाने का काम भी भगवान नारद ने ही किया

भगवान नारद षड रिपुओं काम क्रोध लोभ मद मोह मत्सर से परे हैं | संसार में उनकी उन विरले चरित्रों में गणना होती है , जिन्होंने मानव कल्याण के लिए अपनी कीर्ति का त्याग किया | ईश्वर द्वारा दी गयी जिम्मेदारियों के लिए वे सदैव तत्पर हैं और उस काम को पूर्ण करते हुए , अगर कोई उन्हें मसखरा या कलह लाने वाला , इधर की उधर करे वाला कहे तो वे इन बातो की परवाह नहीं करते |

अंत में मुझे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता के कुछ अंश स्मरण आ रहे हैं जो लिखे तो अलग भाव से गए हैं पर आज के हमारे विषय पर बिलकुल सटीक बैठते हैं , वही यहाँ प्रस्तुत करता हूँ |

मै अखिल विश्व का गुरु महान्, देता विद्या का अमरदान।
मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?
मेरा स्वर नभ मे घहर–घहर, सागर के जल मे छहर–छहर।
इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय ।
भक्ति तन–मन, भक्ति जीवन, भक्तश्रेष्ठ है मेरा परिचय!

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