08/06/2022
हरि ॐ ,
सादर वन्दे ,
६ जून १६७४ , भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन | हिन्दू ह्रदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज़ का राज्याभिषेक इस पावन दिन हुआ था | आज के सन्दर्भ में राज्याभिषेक दिन का क्या महत्व है ? अगर आज शिवाजी महाराज होते तो आज की युवा पीढ़ी , तरुण पीढ़ी को देखकर क्या सोचते ? इन्ही सब बातों का वर्णन निम्नलिखित काव्य में करने का प्रयास किया है | कविता की पृष्ठभूमि ऐसी है , कि समुद्र किनारे एक व्यक्ति , ग़मगीन खड़ा | जीवन की परेशानियों से निराश वह नशे में डूबा हुआ है | शिवाजी महाराज जब उसे देखते है , तो क्या कहते हैं , यहाँ से कविता की शुरुआत है
हाथ लिए मदिरा की बोतल , मनुज नशे में पड़ा हुआ
बेसुध होकर सुधबुध खोकर , सागर सम्मुख खड़ा हुआ
तभी किनारे पर घोड़ो का शोर सुनाई देता है ,
क्षण भर में उस तट पर, कोटि सूर्य का, तेज दिखाई देता है
अन्धकार को चीर वहां जब दिव्य रूप वह प्रकट हुआ
छत्रपति महाराज दिखे, मानो भू पर भानु प्रकट हुआ
नैनों में अंगार , हाथ में वह तलवार भवानी थी
और आज मनुज को शिक्षित करने की राजे ने ठानी थी
देख क्रोध में राजे को , कपकंपी मनुज को छूट गयी
मदिरा की बोतल वह , हाथ से गिरकर टूट गयी
बोले राजे -हे मनुज , निज धर्म भूलकर , कैसे तुमने कर्म किये |
निज स्वार्थ साध्य ही करना था, मनुष्य जन्म क्यों लिए हुए |
जीवन की परिभाषा तुमसे , जानता बेहतर वह कीड़ा |
देता दुनिया को रेशम ,जीवन भर सह कर पीड़ा |
जीवन के कर्त्तव्य भूलकर आलस में तुम पड़े हुए
ध्येयहीन , पुरुषार्थहीन हो मेरे सम्मुख खड़े हुए
क्षमा शील और दया रहित हो , सत्य धर्म से डरे हुए
रक्त मांस का देह लेकिन अंतरतम से मरे हुए
क्या यही दिन देखने हेतु , हमने स्वराज्य का ध्यास किया
प्रगतिशील उन्नत राष्ट्र हो, जीवन भर प्रयास किया
आज उसी पावन पुनीत का, है तुमने उपहास किया
सच कहता हूँ , प्रिय मनुज , तुमने मुझे उदास किया
शब्दबाण राज़े के मुख से , हो गए मनुज के आरपार ,
कंप देह , करबद्ध विनीत, नष्ट हो गया अहंकार
जीवन की निज दशा देखकर , आया खुद पर तिरस्कार
अश्रु नेत्र हो गया तभी वह , सुनकर राजे से फटकार
बोला युवक , सब ओर मुझे संताप दिखाई देते हैं
इधर उधर , चहु ओर सदा बस पाप दिखाई देते हैं
बुद्धिमान विद्वान यहाँ सत्य भक्षक बनकर बैठे हैं
रिश्वतखोर और चोर लुटेरे , रक्षक बनकर बैठे हैं
मानव के इस पिशाच रूप ,सिहर उठा है तन मेरा
निज परिवार की चिंता हेतु , भयभीत होता मन मेरा
हत्या दंगे उन्मादो से , सुलग रहा चन्दन मेरा
बस इसी तरह से कुछ राजे , निकल रहा जीवन मेरा
दो राय नहीं इसमें कोई , है मानव की अतृप्त प्यास
लख कर दिल मेरा रोता है , देख मलिन मन का यह ह्रास ,
पर बाधाओं से लड़ने , क्या तुमने कभी कुछ यत्न किये ,
निज जीवन को बेहतर करने , क्या तुमने कभी प्रयत्न किये
पूजा करते , हार चढ़ाते , गीत मेरे तुम गाते हो ,
पर मेरे आदर्शो पर , संकल्पित हो चल पाते हो ?
मेरे बच्चे , मेरे नाम पर अपनों से लड़ जाते हो
पर एकत्रित होकर चलने हेतु , क्या तुम हाथ बढ़ाते हो ?
कितनी आखों से आंसू पोंछे ,? कितनों को मुस्कान दी ?
अपने कर्मो से आज तक , कितनों को पहचान दी ?
अन्यायों के विरुद्ध तुमने कब आवाज़ उठाई है ?
सच्चे मन से भारत माँ की जयकार लगाई है ?
कायरों की श्रेणी में तुम , पंक्तिबद्ध हो खड़े हुए
इस जीवन को व्यर्थ बनाकर मदिरा रत हो पड़े हुए
क्षणिक सुखो और दुर्व्यसनों में ,लिप्त होकर बड़े हुए
चरस गांजा तम्बाकू , तुम ठोंक ठोंक कर पड़े हुए
क्षमा करो महाराज गहन गंभीर अपराध हुआ है
अपने कर्मो पर मन मेरा शर्मसार हुआ है
शायद अब खुद से कभी न नज़रे मिला पाउँगा
लगता नहीं मुझे मै जीवन में कुछ कर पाउँगा
राजे बोले -उठो प्रिय , यह शोक विलाप का समय नहीं है
अकर्मण्य हो रहने वालो ,की इस जग में जगह नहीं है
आँखे खोलो, पहचानों , अवसरों का बाजार खड़ा है
जग का नेतृत्व करने हेतु , भारत फिर तैयार खड़ा है
नेतृत्व के लिए नहीं कभी उन्माद दिखाना पड़ता है
शुभ भविष्य , समृद्धि पर जन को विश्वास दिलाना पड़ता है
केवल विश्वास है निराधार , मेहनत का जोर लगाना पड़ता है
तूफानों चट्टानों से अड़कर , पार लगाना पड़ता है
पथ के आवर्तों से थककर, मन भटके आधे पथ पर
राह धुंधली , रस्ता संकरा , कंटक ही कंटक हो पथ पर
नित प्रयास और संयम से मार्ग दिखाना पड़ता है
जनमानस के अंतिम तक व्यवहार बनाना पड़ता है
हो पथ में गर अत्याचारी , यमलोक दिखाना पड़ता है
क्षण भर के लिए नहीं कभी , संकल्प डिगाना पड़ता है
संकट आने पर अपना सामर्थ्य दिखाना पड़ता है
अपनों के लिए कभी कभी , मृत्यु को, गले लगाना पड़ता है
बोला युवक- हे राजे , आदेश मुझे देकर ,धन्य करें जीवन मेरा
तेजपुंज के इन चरणों में, शत शत बार नमन मेरा |
बोले राजे -पढ़कर मेरे आदर्शो को , केवल इतना काम करो
कर्त्तव्य मार्ग पर चलकर सारे जग में अपना नाम करो
राज्योत्सव का अनुपम दिन यह , उन्नत सार्थक तब होगा ,
जब हर एक नारी जीज़ा माँ , और युवक में शिवबा होगा