01/06/2026
ब्राह्मण का पथ
मस्तक पर तिलक, सात्विकता का विस्तार है,
शीश पर चोटी, परंपरा का आधार है।
ज्ञान के सागर में जो गोता लगाता है,
वही 'ब्राह्मण' के पथ पर चल पाता है।
न कामनाओं की बेड़ियाँ, न राग का बंधन,
लोक-कल्याण में ही अर्पित, जिसका हर क्षण।
वाणी में वेद-मंत्रों की पवित्र गूँज है,
जिसकी साधना का जग में ही पूज है।
क्रोध को पिघलाकर, जिसने करुणा बनाई है,
त्याग की आग में, बुद्धि अपनी तपाई है।
स्वार्थ से ऊपर उठकर, जो धर्म निभाता है,
वही जीवन्मुक्त होकर, ब्रह्म को पाता है।
शून्य से शिखर तक का, यह कठिन सफर है,
जहाँ ज्ञान का ही, निर्मल-सा अवतरण है।
जो आत्म-अनुशासन को ही, अपना धर्म मानता,
वही 'ब्राह्मण' पद की, गरिमा को जानता।
लेखक - अश्विनी कुमार मिश्रा
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31/05/2026
बच्चा हूँ, हाँ दिल से बच्चा ही हूँ,
तेरी खुशी में हँसता हूँ,
तेरे ही दुख में रोता हूँ,
हाँ, मैं बच्चा हूँ, दिल से बच्चा ही हूँ।
दुनिया की समझदारी से मुझे क्या लेना,
मैं तो बस प्यार की भाषा ही समझता हूँ।
तेरे चेहरे पर एक मुस्कान सजाने को,
मैं अपनी हर ज़िद को भूल सा जाता हूँ।
हाँ, मैं बच्चा हूँ, दिल से बच्चा ही हूँ।
लेखक - अश्विनी कुमार मिश्रा
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30/05/2026
अपनी शर्तों पर जिएँगे
हवा का रुख बदल जाए, मगर हम नहीं मुड़ते,
परिस्थितियाँ झुकाना चाहें, पर हम नहीं झुकते।
जो गिर जाते हैं अक्सर दूसरों की महफ़िलों में,
वो अपनी ही नजर में फिर कभी ऊँचे नहीं उठते।
खरीदने को यहाँ ईमान बैठे हैं कई रहबर,
मगर जो रूह के सौदे हों, वो हमसे नहीं होते।
चमकते पत्थरों की चाह में जो खुद को खो बैठे,
वो बहते वक्त के दरिया में फिर वापस नहीं मिलते।
सफ़र चाहे अकेला हो, मगर अपनी ही शर्तों पर,
जो अपनी साख खोकर जीए, वो खुलकर नहीं जीते।
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29/05/2026
एक अंजान सा ताल्लुक
ना रास्ता एक, ना मंज़िल की कोई खबर है,
फिर भी इस अनजाने सफ़र में एक अजब सा असर है।
ना कोई दावा है हक़ का, ना ज़ंजीर है रस्मों की,
ये कैसा रिश्ता है, जो बिना नाम के ही मुकम्मल है?
वो जो कभी मिले नहीं सदियों से, वो अचानक अपने से लगते हैं,
भीड़ में इस ज़माने की, बस वही दिल के सपने से लगते हैं।
उनकी खामोशी में भी एक अजीब सी गुफ़्तगू है,
जैसे सदियों पुरानी कोई अधूरी आरज़ू है।
ना कुछ पाने की चाहत, ना कुछ खोने का डर है,
ये वो दरिया है जिसका, ना कोई किनारा ना लहर है।
बस एक अहसास है जो रूह में उतर जाता है,
बिना कुछ कहे ही, जो सब कुछ समझा जाता है।
दुनिया ढूंढती रहे मज़हब और मायने इस ताल्लुक के,
हम तो बस इतना जानते हैं...
ये वो पाक बंधन है, जो सिर्फ महसूस किया जाता है,
और बिना किसी नाम के, ता-उम्र निभाया जाता है।
लेखक - अश्विनी कुमार मिश्रा
28/05/2026
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ज़िक्र दिल का
क्या तुम्हारा भी दिल करता है,
छुप-छुप कर आहें भरता है।
ज़िक्र नहीं होता होठों पर,
पर नाम तो दिल में रहता है।
तुम दूर रहो या पास रहो,
अहसास तुम्हारा बहता है।
नज़रें जो मिलें तो झुक जाना,
यह मौन भी सब कुछ कहता है।
दुनिया जिसे समझे ख़ामोशी,
वो शोर अंदर ही रहता है।
लेखक - अश्विनी कुमार मिश्रा
#अश्विनीकीकलम
#अश्विनीकुमारमिश्रा
27/05/2026
जीवन यहाँ
धूप-छाँव के खेल में, उलझी हर तक़दीर,
कागज़ पर खिंचती रही, बस कल की तस्वीर।
पर कल की उस चाह में, छूटा हर लम्हा,
भूल गए हम ढूँढना, जो है पास खड़ा।
न यादों के साए में, न आने वाले कल में,
ज़िंदगी की धड़कन तो है, बस इसी एक पल में।
जो बह गया सो बह गया, वो पानी था कल का,
आज जो आँखों में है, वही सच है इस पल का।
कभी किसी की बात पर, चुपके से मुस्काना,
कभी पुरानी नाव ले, लहरों से टकराना।
मंज़िल की अंधी दौड़ में, मत खोना यह कारवाँ,
ठहर कर ज़रा देख लो... जीवन तो है यहाँ।
लेखक - अश्विनी कुमार मिश्रा
#अश्विनीकुमारमिश्रा
24/05/2026
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मन तो बच्चा है, दोस्तों में उलझा है...
जिम्मेदारियों के बोझ तले, ये कहाँ समझदार होता है,
जब भी मिलता है यारों से, फिर से बच्चा हर बार होता है।
दुनियादारी की सब चालें, पल भर में भूल जाता है,
जब पुराना कोई कंधा मिले, ये दिल खुलकर मुस्कुराता है।
चाय की टपरी, वो बेफ़िक्र बातें, और ठहाकों का वो दौर,
इस यारानी के आगे फीका लगता है दुनिया का हर शोर।
न कोई परदा, न कोई दिखावा, न कोई रुतबे की जंग,
यहाँ तो हर कोई रंगा है, बस अपनी मस्ती के रंग।
वक्त की इस सुई को, चलो मिलकर थोड़ा पीछे मोड़ दें,
आज फिर से इस नादान दिल को, अपनों के बीच खुला छोड़ दें।
कह दो इस ज़माने से, कि आज समझदारी का नकाब उतरा है,
क्योंकि आज ये दिल, फिर से अपने दोस्तों में उलझा है।
#अश्विनीकुमारमिश्रा #अश्विनीकीकलम