20/07/2026
लाठियों से जिस्म ज़ख़्मी हो सकते हैं, इरादे नहीं,
सच की राह में झुक जाएँ, ऐसे हमारे वादे नहीं।
सर से लहू बहा तो हर क़तरा ये पुकार उठा,
ज़ुल्म की हर एक रात के आगे उजाले हारते नहीं।
शहीद होकर भी अगर लौटना पड़े, लौट आएँगे,
हम ख़ामोशियों के सौदागर नहीं, सदा बनकर आएँगे।
तुम तख़्त संभालो, हम सच की मशाल संभालेंगे,
तारीख़ लिखेगी—हक़ की आवाज़ को दबाया नहीं जा सका।
#जन्तर_मंतर_आंदोलन