14/10/2024
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30/07/2024
हाँ जी ! मैं पुलिस हूँ ! जब आप बिना हेलमेट और तीन
सवारियां बिठाकर अपनी बहादुरी का परिचय देने सड़क
पर आते है तो कहते हैं ठुल्ले से दस बीस में निपट लेंगे। जरूर ,
पर जब आप सड़क पर गिर जाते हैं तो इसी ठुल्ले की
नाकामी को कोसते हुए पूरी व्यवस्था को गालियां देते
हैं। आपके पिताश्री आपके इन मर्दोंवाली कारनामों पर
गर्व करते हैं पर जब आप किसी गरीब को ठोकर मार देते हैं
तो इसी ठुल्ले को वह ऊपर वाले से फ़ोन करा मामले को
रफा दफा करने का दवाब बनाते हैं। जी , कभी कभार आप
आपने यार दोस्तों को अपनी नयी कार में बियर का
जश्न मनाते नाकाबंदी में इसी मामू पर रौब झाड़ने लगते
है। बियर से भी कम दाम पर इस मामू की कीमत बताने से
आप नहीं शरमाते और चालान काटने पर मोबाइल घुमाने
लगते है । जब कोई बदमाश आपकी इसी कार में बैठी गर्ल
फ्रेंड को घूरने लगता है तब इसी मामू से उम्मीद करते है कि
वह इन बदमाशों से लोहा ले और आपका मोबाइल भी
शायद साइलेंट हो जाता है। कुछ देर मामू की औकात का
मजाक उड़ाती आपकी दोस्त भइया प्लीज़ पर उत्तर
आती हैं।आपका दोस्त मोटरसाइकिल पर बैठ लड़कियों के
दुपट्टे भले खींचता रहे पर मेरी नासमझी पर आपको बड़ा
क्रोध आता है जी हाँ , मैं वही आपका ठुल्ला , आपका
मामू पुलिस वाला हूँ । मैं वही हूँ , जब आप टीवी स्क्रीन
पर पॉपकॉर्न खाते हुए आतंकवादी हमले देख रहे थे , मैं
कसाब की एके 47 की गोलियां अपने सीने पर ले रहा
था। किसी ठेले के सामने कार रोक कर ट्राफिक जाम
करने के पहले सोचिये की कौन निकम्मा और असली में
कौन देश का ठुल्ला है। आप तो सौ सौ की नोट
निकाल लेते हो पर मैं तो एक पानी की बोतल भी नहीं
खरीद सकता। भूख बेबस कर देती है खोमचेवाले से दो तीन
दोना उठा लेने की क्योंकि १० घण्टे किसी अनजान
जगह पर खड़े होने पर कोई टिफ़िन लेकर नहीं आता।
आप अपने मोहल्ले की टूटी सड़क के लिए ठेकेदार से नहीं
लड़ पाते। राजनेताओं से उनके वादों के सवाल नहीं पूछ
पाते। गली के माफिया से बच कर रहते हैं। सामने जा रही
लड़की की छेड़खानी भी आपके लिए मनोरंजन लगती है।
थिएटर हो या रेलवे , ब्लैक की जगह खुद खोजते हैं। पर एक
पुलिस के सिपाही से उम्मीद करते हैं वह चौवीसों घंटे
आपके साथ मौजूद रहे । बीच बाजार हो रहे अपराधो को
नज़रअंदाज़ कर देते हैं और बाहुबलियों की जीप पर खड़े
नारे लगाते हैं पर मेरी लाठी से चूक हो तो मोमबत्तियों
का जुलस बड़ी संजीदगी और जिम्मेदारी से निकालते हैं।
कोई भी जुलुस निकले , नेताओं के भाषण हो , आप सडको
पर आ जाते हैं और मुझे धुप सहते हुए आपकी सुरक्षा आपके
ही लोगों से करनी है। आप अपने घरों में आराम से
त्योंहार मनाते है और बेचारे आपका यह मामू बिना छुट्टी
किये आपकी खुशियों में कोई दखल ना पड़े उसके लिए
सड़कों पर खड़े यातायात व सुरक्षा व्यवस्था में तैनात
खड़ा रहता हूँ। जिसकी फाईलों में मैं कई अपराध दर्ज़
किये , जिसे मैं ढूंढता हूँ जान की बाजी लगा कर , उसे ही
आप चुनाव जीता देते हैं और फिर मेरी ड्यूटी लगती है
उसके साथ साये की तरह रहने की और सल्यूट मारने की।
बहुत पहले एक गाना गाया जाता था " इनकी ना मानो
सिपहिया से पूछो ", बड़ा विश्वास होता था इस
सिपहिया पर. जब बच्चे रोते थे तो कभी माएं हमारा डर
दिखाती है की चुप हो जा नहीं तो पुलिस आ जायेगी।
कितना आदर और भय होता था लोगों में जैसा राजकपूर
ने गाया था " आधी रात को मत चिल्लाना नहीं तो
पकड़ लेगा पुलिसवाला " वह ज़माना कहां और कब चला
गया। चाहे आप ठुल्ला कहें या मामू पर कितना सुरक्षित
महसूस करते है जब वह हमें देख लेते हैं। मुझे इसके साथ यह भी
देखना है की आप किसी बहकावे में आकर दंगा फसाद न
करें। मुझे यह भी संभालना है की किसी राजनैतिक या
सामाजिक समस्या पर आप भीड़ न जमा करें . मुझे रेड अलर्ट
किया गया है की आप के बीच कोई आतंकवादी
गतिवधियां ना हो जाए। कुछ लोगों के वादविवाद में
भी मुझे दखल देकर शान्ति बनाये रखना है। मैं अकेला चार
किलो की बन्दूक कंधे पर लादे और हाथ में लाठी लिए इन
सब जिम्मेदारियों को निभा रहा हूँ। मुझे बड़ा सतर्क
होना है क्योंकि इस चौराहे पर खड़ी उस मूर्ति पर कोई
कबूतर ना बैठ जाए। कहीं गन्दा हो जाएगा तो लोगों
की किसी कोई भावना को आहत पहुंचेगी। आप इस
चिलचिलाती धुप में भले न निकले , सर्दियों में अपने
कम्बल से न निकले या फिर बारिश होते ही छत के नीचे
भागे पर मुझे तो इसी चौराहे में खड़ा होना है।
आपको नागरिक जिम्मेदारी पता है या नहीं पर उम्मीद
यही की जाती है पूरे संविधान का हर शब्द का पालन मैं
कर सकूँ। इस चौराहें पर दसों घंटो खड़ा होने के बाद मुझे
यह भी ध्यान रखना है की हर एक चीजों का विस्तृत
विवरण लिखूं ताकि अदालतों में बड़े बड़े कालेजों में पढ़े
बड़ी बड़ी पदवी वाले लोग उस पर बहस कर सकें। यदि
उन्होंने थोड़ी भी गलती निकाल ली तो मेरी निंदा
करने कई लोग इस चौराहे में खड़े हो जायेंगे। आपके घर में
ट्यूब वाली टीवी से कब एलईडी वाली पतली टीवी आ
गयी पता नहीं चला पर मुझे तो अपनी वही लाठी लिए
सौ साल पहले का कानून और हजार संसोधन को बखूबी
याद रखना है।कभी देखा है टेन्ट में सोते हमें। कभी झाँका है हमारी खण्डहर
सी बैरकों में। जब आप लोग ऑफिसियल काम से जाते हैं
तो होटलों में रहते हैं। हम जब अपराध की खोजबीन या
दुर्दांत अपराधियों को भी लेने जाते हैं तो बस स्टैंड या
रेल के प्लेटफॉर्म पर सोते हैं।
क्या आप जानते हैं की हर साल 2730 से अधिक सिपाही
सर्विस के दौरान प्राकृतिक मौत के शिकार होते हैं ? हमें
तो सरकारी अस्पताल के लाईन में भी लगना होता है।
आप चौंकिए नहीं यह जान कर की हर साल तनाव से 235
पुलिसवाले आत्महत्या कर लेते हैं ? सिर्फ महाराष्ट्र में एक
साल में 40 पुलिसवालों ने ख़ुदकुशी की।
आप ठुल्ला और मामू का मजाक करने के पहले यह भी जान
लें की हर साल 740 से अधिक मामू और ठुल्ले आपकी जान
बचाने के लिए अपने आप को शहीद कर देते हैं और 3750 से
अधिक घायल हो जाते हैं। सिर्फ पिछले पांच साल में
सरकार कितनी बदली वह तो नहीं जानते पर यह जान लें
की 4000 पुलिस वाले अपनी जान पर खेल गए थे। पिछले
पांच साल में 10000 सिपाही आपके पत्थरों , हिंसक
भीड़ और जनांदोलन में घायल हुए और 80 से ज्यादा
लोगों ने उग्र भीड़ के सामने अपनी जान गँवा दी।
आपका देश चल सके और इस देश के तथाकथित वीईपी
जिनके साथ फोटो खिंचवा कर सोशल साइट्स में
अपलोड कर आप अपनी महत्ता बढ़ाते हैं की दिन रात
सुरक्षा में मेरे जैसे 47500 से भी अधिक लोग लगे हैं उनकी
कारों के इर्दगिर्द भागते रहने और उनके घर की
चौकीदारी में।
किसी इलेक्शन वोटिंग डे में आप देर से उठते हैं छुट्टी समझ
कर पर आपने हमें तो बंदोबस्त में देखा होगा सूरज निकलते
ही किसी सड़क की मोड़ पर जानते हुए की रात भी ढल
जायेगी घर जाते हुए। यदि अपने शहर के बाहर जाएँ तो
वर्दी , जूते , हेलमेट और जालीदार जाल लिए सिर्फ 60
रुपये के दैनिक भत्ता के लिए खड़े रहते हैं , जिसमे आप क्या
खिला सकते हैं खुद ही समझ लें। चलिए ! आपने मेरी इतनी
सुनी इसके लिए शुक्रिया ! कहीं देर हो गयी तो
निलंबित हो जाऊँगा !
इस देश में देश की हर समस्या के लिए सिर्फ खाकी सस्पेंड
होता है या ट्रांसफर।
30/07/2024
केले लेकर अपने रिश्तेदारों के घर पहुँचने वाली आख़री पीढ़ी भी अब समाप्ति के कगार पर है शायद l
अब तो रिश्तेदारों की ऐसी स्थिति हो गई है कि ख़ाली हाथ हिलाते हुए पहुँचते हैं औऱ घर में घुसते ही कराह उठते हैं...." इस फोन का चार्जर है क्या ?"
जब 2 रूपए प्रति मिनट काल लगती थी और किसी किसी के पास फोन होते थे l
सब एक दूसरे को फोन करते थे।
आज प्रत्येक व्यक्ति के पास फोन है सबकी काल फ्री है फिर भी कोई किसी को फोन नहीं करता सिवाय जरुरत पड़ने के अलावा l
जब इतने साधन नहीं थे रिश्तेदारों के घर पर कई कई दिन रहते थे।
आज लगभग सभी के पास मोटरसाइकिल है सिर्फ एक दो घण्टे के लिए रुकते हैं।
वो भी क्या दिन थे बड़ी ख़ुशी होती थी जब कोई रिश्तेदार घर पर आता था
इस टेक्नोलॉजी के दौर में भले ही हम बहुत आगे निकल आएं हो
परन्तु रिश्तों को बहुत पीछे छोड़ आएं है।
आभार फेसबुक
कॉपी पेस्ट
पिछले दिनों मुझे व मेरे साथी को राजकार्य से दिल्ली, अमरोहा व अलीगढ़ जाना हुआ। इस दौरान दिल्ली के इंडिया गेट व लाल किला घूमने का अवसर प्राप्त हुआ ।