17/09/2026
विश्वकर्मा जयंती-"राष्ट्रीय श्रमिक दिवसः भारतीय श्रम संस्कृति और समकालीन चुनौतियाँ"
भारतीय चिंतन में श्रम केवल पारिश्रमिक के लिए किया जाने वाला शारीरिक परिश्रम नहीं है; यह सामाजिक समर्पण और ईश्वरोपासना है। श्रम ही साधना है और राष्ट्र के लिए कार्य करना जैसे उदात्त संकल्पों को ध्यान में रखते हुए ही 17 सितंबर को विश्वकर्मा जयंती को भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में घोषित किया। पश्चिमी वर्ग-संघर्ष सिद्धांतों पर आधारित मई दिवस के विकल्प के रूप में, श्रमिक, स्वामी और राष्ट्र के बीच परस्पर पूरक संबंधों की नींव इसी भारतीय दृष्टिकोण ने रखी है।
अंत्योदय और भारतीय विकास की अवधारणा
1897 में शिकागो भाषण के बाद भारत लौटने पर, स्वामी विवेकानंद ने कोलंबो से अल्मोड़ा तक के अपने भाषणों में भारत के वास्तविक उत्थान को लेकर एक प्रमुख दर्शन सामने रखा था। स्वामीजी ने स्मरण कराया था कि भावी भारत का उदय किसान की कुटिया से, मछुआरे की झोपड़ी से और सुदूर गांवों से होना चाहिए। यही संकल्प पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित 'एकात्म मानवदर्शन' और बी.एम.एस. द्वारा प्रस्तुत 'अंत्योदय' की दृष्टि में भी झलकता है। समाज के अंतिम छोर पर खड़े अंतिम व्यक्ति तक जब विकास का लाभ पहुंचेगा, तभी यह कहा जा सकता है कि देश आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है। देश की अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने और जीडीपी के ऊपर जाने का वास्तविक प्रतिबिंब प्रत्येक श्रमिक के पारिवारिक जीवन और उसकी रसोई में दिखाई देना चाहिए। उचित अधिकार और विध्वंसक चालेंः 'दिमागी नक्सलवाद' का खतरा
श्रम क्षेत्र आज जिन सबसे खतरनाक संकटों का सामना कर रहा है, उनमें से एक है श्रमिकों की उचित समस्याओं की आड़ में चलने वाले गुप्त एजेंडे। कुछ निहित स्वार्थी तत्व औद्योगिक अशांति पैदा करके देश की आर्थिक नींव को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। ये लोग हड़तालों और विरोध-प्रदर्शनों को उद्योग बंद कराने, रोजगार के अवसर समाप्त करने और विकास को ठप करने का हथियार बना रहे हैं। बुद्धिजीवी बनकर परिसर, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और यूनियनों में घुसपैठ करने वाले 'दिमागी नक्सल' (अर्बन नक्सल) गठजोड़ की विध्वंसक चालों को श्रमिक समाज को पहचानना होगा। किसानों और श्रमिकों की स्वाभाविक शिकायतों को गलत दिशा में मोड़कर देशविरोधी भावनाओं को भड़काना इनकी शैली है। श्रमिकों का हित नहीं, बल्कि व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र को अस्त-व्यस्त करना ही इन शक्तियों का उद्देश्य है। इसलिए, केवल वर्ग-संघर्ष के नाम पर विनाश फैलाने वाले संगठनों को पहचानकर, देशभक्ति को सर्वोपरि रखने वाले श्रमिक संगठनों में दृढ़ विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। देशहित को ध्यान में रखते हुए श्रमिक हित की रक्षा का बी.एम.एस. का रुख यहीं प्रासंगिक हो जाता है। हमें इस वास्तविकता को स्वीकारना होगा कि यदि राष्ट्र नहीं है तो उद्योग नहीं है, और यदि उद्योग नहीं है तो श्रमिक भी नहीं है।
बदलता कार्यक्षेत्र और AI का युग
आज उद्योग जगत एक बड़े संरचनात्मक परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। जहां कई पारंपरिक उद्योग बंद हो रहे हैं, वहीं बाजार में उत्पादों की कोई कमी नहीं है। आधुनिक मशीनीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण उत्पादन बढ़ रहा है और साथ ही मनुष्यों के रोजगार के अवसर घट रहे हैं, जिससे 'रोजगारविहीन विकास' (Jobless Growth) का एक बड़ा संकट उत्पन्न हो रहा है। यह केवल सरकार का विषय नहीं है; यह श्रमिक संगठनों और संपूर्ण समाज के संयुक्त रूप से चर्चा करने योग्य एक राष्ट्रीय विषय है। इन परिवर्तनों का सामना करने के लिए श्रमिकों को समय के साथ अपने कौशल का विकास (Skill Development) करना होगा। नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना और निरंतर सीखना श्रमिकों की जीवनशैली का हिस्सा बनना चाहिए।
नए युग की चुनौतियाँ और संगठित शक्ति
चौथी औद्योगिक क्रांति के इस दौर में शोषण के स्वरूप भी बदल गए हैं: आईटी क्षेत्र में शोषणः काम के अनियंत्रित घंटे, मानसिक तनाव और नौकरी की असुरक्षा आईटी क्षेत्र में गंभीर हैं।
गिग वर्कर्स (Gig Workers):
डिलीवरी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म श्रमिको को उचित कानूनी संरक्षण या सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है।
प्रवासी श्रमिक (Migrant Workers): सुरक्षित आवास, समान वेतन और स्वास्थ्य बीमा अभी भी इनके लिए सुनिश्चित किया जाना बाकी है।
असंगठित क्षेत्रः भारत के श्रम बल का अधिकांश हिस्सा असंगठित क्षेत्र से है, जहां रोजगार की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और पेंशन व्यवस्था अत्यंत गंभीर विषय हैं।
कार्य सुरक्षा और स्वाभाविक न्याय सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों का सशक्त रूप से संगठित होना इस समय की अनिवार्य आवश्यकता है। नई पीढ़ी को श्रमिक गतिविधियों का दायित्व संभालना चाहिए और राष्ट्रहित के साथ खड़े रहकर श्रमिक आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए।
परस्पर विश्वास और लेबर कोड पर बी.एम.एस. का रुख
बी.एम.एस. का दृष्टिकोण यह है कि श्रमिक और नियोक्ता आपस में लड़ने वाले शत्रु नहीं हैं, बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए एक साथ खड़े होने वाले साझेदार है। 'रिस्पॉन्सिव कोऑपरेशन' (सकारात्मक सहयोग) की नीति के माध्यम से श्रमिक, मालिक और समाज को आपसी समन्वय और सहमति से आगे बढ़ना चाहिए। देश के विकास में श्रमिकों की भूमिका निर्णायक है; इसलिए उनके उचित अधिकारों का हनन करने वाले किसी भी रुख के बी.एम.एस. पक्ष में नहीं है।
नए लेबर कोड लागू करते समय श्रमिकों के अधिकारों और कार्य सुरक्षा का पूर्ण रूप से संरक्षण होना चाहिए। संगठन का स्पष्ट रुख है कि इसमें कोई भी श्रमिक-विरोधी प्रावधान नहीं होना चाहिए। उम्मीद है कि बी.एम.एस. द्वारा सरकार के समक्ष रखी गई उचित मांगों और चिंताओं को पूरी तरह समझकर सरकार आवश्यक संशोधन करेगी।
भारतीय चिंतन की वैश्विक विजयः विश्व मंचों पर बी.एम.एस. को मान्यता
आज बी.एम.एस. के दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता मिल रही है। यह वह दौर है जब कम्युनिस्ट नियंत्रण वाले वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस (WFTU) जैसे संगठनों की प्रासंगिकता
समाप्त हो रही है। इसके विपरीत, संघर्ष-मुक्त भारतीय श्रम दर्शन को दुनिया अपना रही है।
आई.एल.ओ. की मान्यताः बी.एम. एस. द्वारा निरंतर उठाई गई 'सभी के लिए सामाजिक सुरक्षा' की मांग को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के सम्मेलन ने मान्यता दी और दुनिया के देशों ने इसे अपनाया।
वैश्विक नेतृत्वः जी-20 शिखर सम्मेलन के भाग के रूप में लेबर-20 (L-20) और ब्रिक्स (BRICS) लेबर कॉन्फ्रेंस जैसे प्रमुख वैश्विक मंचों का नेतृत्व करने का अवसर बी.एम.एस. को प्राप्त हुआ।
वैश्विक सहभागिताः 40 से अधिक विदेशी देशों के श्रमिक संगठनों ने बी.एम.एस. के नेतृत्व को स्वीकार किया है और भारतीय परंपरा का सम्मान करते हुए बी.एम.एस. के साथ मिलकर काम करने के लिए आगे आए हैं।
भगवान विश्वकर्मा का संदेश और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता
शिल्पकला और तकनीक के आदिपिता भगवान विश्वकर्मा का जीवन राष्ट्रवादियों के लिए सदैव एक महान आदर्श प्रेरणा रहा है। जब उनके अपने पुत्र वृत्रासुर ने धर्म और प्रकृति के नियमों के विपरीत आचरण किया, तो व्यक्तिगत संबंधों और पारिवारिक स्नेह से ऊपर उठकर राष्ट्र और लोक-कल्याण को प्राथमिकता देने वाला व्यक्तित्व भगवान विश्वकर्मा का था। संसार की रक्षा के लिए महर्षि दधीचि की अस्थियों से अत्यंत शक्तिशाली वज्र का निर्माण कर धर्म की स्थापना सुनिश्चित करने वाले उदात्त त्याग का यह इतिहास है। व्यक्तिगत हितों और स्वार्थ से ऊपर उठकर धार्म और राष्ट्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कर्म करने की इस चेतना को श्रमिक समाज को आत्मसात करना चाहिए। श्रमिक को आत्मा से युक्त मनुष्य के रूप में स्वीकार करने वाले भारतीय चिंतन को आधार बनाकर, राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदार बनने और विघटनकारी शक्तियों का प्रतिरोध करने का इस विश्वकर्मा जयंती पर हम संकल्प लें।
सभी श्रमिक मित्रों को राष्ट्रीय श्रमिक दिवस की शुभकामनाएं!
सी. वी. राजेश क्षेत्रीय संगठन मंत्री