06/02/2026
मीणा हाईकोर्ट सिर्फ पचवारा क्षेत्र नहीं बल्कि संपूर्ण मीणा आदिवासी समुदाय की सामाजिक परंपरा और अस्मिता का एक ऐसा प्रतीक है जो हमें सत्ता के ज़ुल्म और अन्याय के खिलाफ रचनात्मकता संघर्ष की याद दिलाता है. आज कोई भी व्यक्ति आकर उसके अस्तित्व और अस्मिता पर सवाल खड़े कर रहा है तो एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि पचवारा के लोग अभी भी खामोश बैठे हैं.
जिस पचवारा के लोगों ने सामंती और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ कभी घुटने नहीं टेके, क्रिमिनल ट्राइब एक्ट के खिलाफ सबसे अधिक तीव्र विरोध करने वाले, आजादी के बाद सामाजिक सुधारों रचनात्मक कार्यों में सबसे आगे रहने वाला क्षेत्र आज मीणा आदिवासी हाईकोर्ट का अपमान होने पर चुप्पी साध कर बैठा है.
पचवारा क्षेत्र के पंच पटेलों ने राजस्थान की बड़ी से बड़ी ताकत को झुकाया है. जिसका जीता जागता उदाहरण मीणा आदिवासी हाई
कोर्ट है.
बाबा किरोड़ी ने सही कहा है कि पचवारा अब अपने अवसान की ओर है. शायद पचवारा अब अपने स्वार्थों में इतना उलझ गया है कि वो अपनी मान, मर्यादा और ताकत को भूल गया है.
21/09/2025
आदिवासी का स्टेटस कोई गरीबी हटाओ योजना नहीं
पिछले कुछ दशकों से भारत में सबको आदिवासी वर्ग में शामिल होने की चाहत होने लगी है। लगभग हर राज्य में ऐसे समुदाय हैं जो आदिवासी बनने की चाहत रखते हैं। मणिपुर, आसाम, बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों में ऐसी जमात मौजूद है जो आदिवासी बनना चाहता है और आदिवासी बन कर आदिवासी सूची में शामिल होना चाहता है।
2006-07 में राजस्थान में गुर्जर समुदाय जोकि पहले से ओबीसी वर्ग में है उसने आदिवासी वर्ग में शामिल होने के आन्दोलन का रास्ता अपनाया। जिसके प्रतिरोध में राजस्थान का मीणा आदिवासी समुदाय उठ खड़ा हुआ। हाल ही में मणिपुर में इसी तरह का घटानक्रम देखने को मिला है।
वर्तमान में झारखण्ड में कुर्मी/कुडमी जाति जोकि पहले से ओबीसी में शामिल है तो आदिवासी क्यों बनना चाहती है। इस समुदाय को भी 1965 में लोकुर समिति आदिवासियत के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश कर चुकी है। झारखण्ड में कुर्मी/कुडमी समुदाय ही सबसे अधिक पांचवी अनुसूची क्षेत्रों और पेसा कानून का विरोध करने में सबसे आगे रही है।
पिछड़े वर्ग के समुदायों के द्वारा आदिवासी वर्ग में शामिल होने के लिए तत्कालीन जम्मू और कश्मीर सरकार ने वहां निवास करने वाली गुर्जर, बक्करवाल समुदायों को एसटी का दर्जा देने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डाल कर 1991 में संविधान संशोधन (अनुसूचित जनजाति)1991 पारित कराया।
जबकि 1965 में लोकुर कमेटी ने जम्मू और कश्मीर के गुर्जर, बक्करवाल, हिमाचल प्रदेश की गद्दा ब्राह्मण, कोली समुदायों के बारे में स्पष्ट लिखा था कि ये समुदाय आदिवासियत के दायरे में नहीं आती है। उसके बाद भी इनको शामिल किया गया। इसी को आधार मानकर राजस्थान में 2006-07 में हिंसक आन्दोलन हुआ।
गुजरात में 2020-21 में वहां आदिवासी समुदायों ने गैर आदिवासियों को ST वर्ग के फर्जी तरीके से सर्टिफिकेट जारी करने के खिलाफ आदिवासी नेता Raju Valvai की अगुवाई में व्यापक आंदोलन किया था.
सवाल यह सामने आता है कि सबको आदिवासी क्यों बनना है ?
जबकि ये समुदाय पहले से ही किसी न किसी आरक्षित कोटे में शामिल हैं। इसके बावजूद इसके वे आदिवासी सूची में शामिल क्यों होना चाहते हैं? जबकि देश में आदिवासियों को आरक्षण उनकी आबादी के लिहाज सबसे कम आरक्षण है। केंद्र में ओबीसी को 27 फीसदी, एससी को 16 फीसदी और आदिवासियों के लिए सिर्फ 7.5 फीसदी आरक्षण है।
इस दायरे के भीतर अलग-अलग राज्यों में आरक्षण का प्रतिशत घटता बढ़ता भी है । लेकिन मामला सिर्फ आरक्षण का नहीं है नहीं तो आरक्षण कोटे में सुधार के लिए आंदोलन हुआ होता।
लेकिन पिछले 3 दशकों से जिस तरह से आदिवासी विर्मश के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक जागरूकता के चलते भाजपा और आरएसएस के फर्जी राष्ट्रवाद को चुनौती आदिवासी संस्कृति से मिलने लगी है उससे सब घबराए हुए हैं।
आदिवासी का दर्जा कोई गरीबी हटाओ योजना नहीं है। यह आदिवासी समुदायों का रक्षा कवच है जिसके लिए ब्रिटिश हुकूमत से आदिवासियों से 300 वर्षों तक संघर्ष किया।
आदिवासी शब्द चेतना का प्रतीक है, इतिहास का आख्यान है, पीढ़ियों से संघर्ष से सृजन की बढ़ता हुआ सशक्त कदम है।
सामाजिक, साँस्कृतिक और युग चेतना के मूल्य हैं।
जिनको आजादी के बाद संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा की अगुवाई में इसे सुरक्षित एवं सरंक्षित किया गया।
यह मामला सिर्फ आरक्षण का नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति के वैशिष्ट को मिटाने का है। जिसमें फर्जी राष्ट्रवादी ताकतें लगी हुई हैं।
कुर्मी/कुड़मी जाति का आदिवासी स्टेटस मांग के खिलाफ
झारखंड के आदिवासी समुदायों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। झारखंड आदिवासियों के साथ राजस्थान एवं अन्य राज्यों के आदिवासियों को पूरी ताकत खड़ा होना चाहिए।
21/08/2025
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत पंजाब स्टेट (ब्रिटिश भारत सरकार) के द्वारा 344 मीणा आदिवासियों को जेल में डाल दिया गया था.
नोट - यह चित्र फोटो 19वीं सदी के एक मीणा आदिवासी गाँव का है.
31/05/2025
राजस्थान में नकली खाद फैक्ट्रियों सत्ता और प्रशासन की शह बिना इतने वर्षों से चलना असंभव है. हज़ारों टन नकली खाद पकड़ा गया है. स्थानीय प्रशासन से लेकर सत्ता के मुखिया तक मलाई पंहुचे बिना इनका चलना कैसे सम्भव हो सकता है?
ऐसा नहीं हो सकता है कि सरकार के मंत्री के पास ऑफर नहीं होगा. ऑफर जरूर आया होगा लेकिन बाबा किरोड़ी मीणा ने अपने ज़मीर को जिंदा रख कर लाखों किसानों को बचा ले गया. लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को बंजर होने से बचा ले गया.
यह सब एक किसान का मज़बूत और ईमानदारी बेटा ही कर सकता है. वरना अपने आप को किसान परिवार से बताने वाले कई लोग सत्ता और विपक्ष में बैठे हैं.
Kirodi Lal Meena Jagmohan Meena
09/06/2024
झारखण्ड के आदिवासियों ने पूरे मुल्क को यह संदेश दिया है कि वे असल मायने में बाबा बिरसा मुंडा के वंशज हैं. जिस तेवर, आक्रमकता और कलेवर के साथ बिरसा मुंडा ब्रिटिश हुकूमत के साथ साथ पूँजीवादी एवं शोषक ताकतों के खिलाफ संघर्ष किया था उसी अंदाज में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी है.
ब्रिटिश हुकूमत के सामने ना बिरसा मुंडा झुके थे, ना इस पूंजीपतियों के सरकार के सामने हेमंत सोरेन झुके हैं.
खूंटी, लोहरदगा, चाईबासा, राजमहल, दुमका जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग करके अपने नेता को समर्थन दिया है और इन्डिया गठबंधन को जीता कर दिल्ली भेजा है.
आजाद भारत की 18 वीं लोकसभा के इस चुनावी संघर्ष में कल्पना सोरेन मुर्मू ने नायक बनकर झारखण्ड के मान, सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए जमकर मुकाबला किया है.
झारखण्ड के आदिवासियों ने सही मायने में बाबा बिरसा मुंडा की विचारधारा को आगे बढ़ाया है.
Hemant Soren
27/04/2024
गुजरात प्रदेश से इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार
आदिवासियों की बुलंद आवाज़ भाई Anant Patel MLA (लोकसभा क्षेत्र, वलसाड़), भाई Mla Chaitar Vasava जैसे युवाओं का समर्थन करके संसद में भेजिए.
जब तक आदिवासियों की आवाज़ संसद में बुलंद नहीं होगी तब तक हमारे समुदाय के हक और अधिकार को दबाया जाएगा.
इसलिए संसदीय व्यवस्था में आदिवासी अधिकारों की आवाज़ पुरज़ोर तरीके से उठाने वाले लोगों को अपने संसदीय क्षेत्र से पूरी तरह से समर्थन दीजिए.
जोहार
06/08/2022
सड़क से लेकर सदन तक और गुजरात से लेकर दिल्ली तक आदिवासी अस्मिता, अस्तित्व, अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले साथी Anant Patel Mla (विधायक, वांसदा विधानसभा क्षेत्र, गुजरात ) को जन्मदिन की हार्दिक बधाई