19/07/2022
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Satya
19/07/2022
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16/05/2022
बुद्ध पूर्णिमा
महान आत्म ज्ञानी का धरती पर आगमन ।
महान योद्धा को ज्ञान की प्राप्ति ।
सिद्धार्थ गौतम का बुद्ध बनना ।
राजकुमार का सन्यासी बनना ।
नवीन चेतनाओ की सृष्टि ।
बुद्धम शरणम गच्छामि ।
धम्मम शरणम गच्छामि ।
संघम शरणम गच्छामि ।
आप सभी को इस पावन दिन पर शुभकामनाएं ।
02/05/2022
मरणोपरान्त जीने की है यदि चाह तुझे,
तो सुन, बतलाता हूँ मैं सीधी राह तुझे,
लिख ऐसी कोई चीज कि दुनिया डोल उठे,
या कर कुछ ऐसा काम,ज़माना बोल उठे।
16/04/2022
Hanuman janamatosav ki shubhkamnaye.
Jayanti nhi janamotsav .
Har har Mahadev.
15/04/2022
আপনাদের সবাইকে বাংলা নববর্ষের শুভেচ্ছা
14/04/2022
सतुआन पूजा विधि और महत्व
आम की बौरियां, कैरियों को पीसकर चटनी बनाना और साथ में सत्तू घोलकर पहले सूर्य देव को चढ़ाना और फिर प्रसाद में ग्रहण करना। ये है दिव्य पर्व सतुआन, जो गर्मी के आ जाने की घोषणा करता है और बताता है कि अब मौसम तेजी से गर्म होगा, आने वाले दिनों में नौतपा होने वाला है, जब खेतों की मिट्टी बिल्कुल सूखकर कड़ी हो जाएगी। मनुष्य जब गर्मी से त्रस्त हो जाएगा, तो ऐसे में सत्तू ही एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो शीतलता दे पाएगा। बिहार की लोक संस्कृति में यह प्रकृति से जुड़ाव का पर्व है, जो अब सिर्फ बड़े-बुजुर्गों की याद में ही रह गया है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में 14-15 अप्रैल को सतुआन मनाया जाता है। यह ग्रीष्म ऋतु के स्वागत का पर्व है। इस दिन सूर्यदेव राशि परिवर्तन करते हैं। इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं। सतुआन के दिन सत्तू खाने की परंपरा बहुत पुराने समय से रही है. यह पर्व कई मायने में महत्वपूर्ण है। इस दिन लोग अपने पूजा घर में मिट्टी या पित्तल के घड़े में आम का पल्लो स्थापित करते हैं। सत्तू, गुड़ और चीनी से पूजा की होती है। पूजा के उपरांत लोग सत्तू, आम प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है। बिहार-झारखंड एक दिन बाद 15 अप्रैल को जूड़ शीतल का त्योहार मनाया जाएगा। 14 अप्रैल को इस दिन पेड़ में बासी जल डालने की भी परंपरा है। जुड़ शीतल का त्योहार बिहार में हर्षोलास के साथ मनाया जाता है। पर्व के एक दिन पहले मिट्टी के घड़े या शंख में जल को ढंककर रखा जाता है, फिर जूड़ शीतल के दिन सुबह उठकर पूरे घर में जल का छींटा देते हैं। मान्यता है की बासी जल के छींटे से पूरा घर और आंगन शुद्ध हो जाता है।दक्षिण भारत में 14-15 अप्रैल या सूर्य के राशि परिवर्तन दिवस मनाते हैं विषु पर्व। तमिलनाडु और कर्नाटक में विषु कानी पर्व के तौर पर मनाते हैं। यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित है और दक्षिण भारत में नव वर्ष का प्रतीक है। दरअसल विषु कानी पर्व कृषि आधारित पर्व है, जिसमें खेतों में बुआई का उत्सव मनाते हैं। श्रद्धालु सुबह उठकर स्नान-ध्यान के बाद सबसे पहले आस-पास के मंदिर में विष्णु देव प्रतिमा का दर्शन करते हैं और झांकी भी निकालते हैं। घरों में इस दिन नए अनाज से भोजन बनाया जाता है और देव को 14 प्रकार को व्यंजन का भोग लगाते हैं। अर्थात नाम भले ही अलग अलग हो हिन्दू नववर्ष का स्वागत देश के सभी राज्य करते है।
आप सभी को सत्तू सक्रांति , सत्तुआनी की बधाईयां।
Namaskaram to everybody.
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