Chandpaar SAGRI

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Chandpaar SAGRI Vill-Chandpar
Post-Sagri
Dist-Azamgarh
Pin-276138
UP-INDIA

21/09/2026

इस्लामी शरिया और हदीस की शिक्षाओं के तहत, व्यक्तिगत या राजनीतिक स्वार्थ के लिए धर्म (मदरसे, मस्जिद या कौम के मसाइल) के हितों का सौदा करना और जिससे कौम या दीन को नुकसान पहुँच रहा हो, उसी से अपने राजनीतिक या निजी फायदे उठाना एक गंभीर नैतिक, सामाजिक और धार्मिक अपराध है।
हदीस शरीफ में इस तरह के आचरण को मुनाफिक़त (दोगलापन/कपटाचार), खियानत (अमानत में धोखा) और दीन को दुनिया के बदले बेचने की श्रेणी में रखा गया है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं और हदीस के प्रमाणों से समझा जा सकता है:
1. मुनाफिक़त (दोगलापन) और दोहरे चेहरे वाला होना
जब कोई इंसान अपनी सहूलियत और फायदे के हिसाब से रुख बदलता है—अपमान या नुकसान सहने के बावजूद केवल राजनीतिक या निजी कुर्सी/फायदे के लिए नुकसान पहुँचाने वालों से हाथ मिला लेता है—तो हदीस में ऐसे व्यक्ति को सबसे बदतर इंसानों में गिना गया है।
हदीस:

हजरत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया:

"तुम कयामत के दिन अल्लाह के नज़दीक सबसे बुरे लोगों में 'ज़ुल-वजहैन' (दो चेहरे वाले यानी दोगले लोगों) को पाओगे, जो एक गिरोह के पास एक चेहरे के साथ जाते हैं और दूसरे गिरोह के पास दूसरे चेहरे के साथ।"

— सहीह बुखारी, हदीस नम्बर: 7179 (और सहीह मुस्लिम: 2526)

यह हदीस स्पष्ट करती है कि स्वार्थ के लिए अपना स्टैंड बदलना और नुकसान पहुँचाने वाले तत्वों से दोहरा रवैया रखना एक बहुत बड़ा अपराध (मुनाफिक़त) है।
2. अमानत में खियानत (कौम और दीन के भरोसे को तोड़ना)
अगर जनता या कौम किसी को अपना नेता या नुमाइंदा बनाती है, तो मस्जिद, मदरसे और कौमी मसले उसकी अमानत होते हैं। अपने फायदे के लिए इन मसलों से आँखें मूँद लेना या नुकसान करने वालों का साथ देना अमानत में खियानत (धोखा) है।
हदीस:

हजरत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया:

"मुनाफिक (कपटाचारी) की तीन निशानियां हैं: जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो उसका खिलाफ करे, और जब उसके पास अमानत रखी जाए तो उसमें खियानत (धोखा) करे।"

— सहीह बुखारी, हदीस नम्बर: 33 (और सहीह मुस्लिम: 59)

मदरसे और मस्जिद के मसलों की अनदेखी करना सीधे तौर पर अमानत की खियानत है।
3. दीन और मिल्लत के मसले को दुनियावी फायदे के लिए बेचना
राजनीतिक फ़ायदे या ओहदे के लिए धार्मिक संस्थानों (मस्जिद व मदरसे) के हक़ को दरकिनार कर देना दीन को बहुत मामूली दुनियावी कीमत पर बेचने के बराबर माना गया है।
हदीस:

हजरत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमाया:

"अंधेरे अंधेरी रातों के टुकड़ों की तरह आने वाले fitno (फ़ितनों) से पहले अच्छे काम करने में जल्दी करो। उस समय इंसान सुबह के वक्त मोमिन होगा और शाम को काफिर हो जाएगा, या शाम को मोमिन होगा और सुबह को काफिर हो जाएगा; वह अपने दीन को दुनिया के थोड़े से सामान (फायदे) के बदले बेच देगा।"

— सहीह मुस्लिम, हदीस नम्बर: 118

4. नुकसान पहुँचाने वाले से बार-बार धोखा खाना या फायदा उठाने की कोशिश
हदीस की हिदायत के मुताबिक एक समझदार मोमिन कभी भी नुकसान पहुँचाने वाले या नुक्सान पहुँचाने वाली नीतियों से आँख मूँदकर अपना निजी फायदा तलाश नहीं करता।
हदीस:

हजरत अबू हुरैरा (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी करीम (सल्ल०) ने फरमाया:

"एक मोमिन एक ही सुराख (बिल) से दो बार डसा नहीं जाता।"

— सहीह बुखारी, हदीस नम्बर: 6133 (और सहीह मुस्लिम: 2998)

इसका अर्थ यह है कि जो व्यवस्था या व्यक्ति आपके दीन, मस्जिद या मदरसों को नुकसान पहुँचा रहा हो, उससे निजी राजनीतिक फायदा उठाने की उम्मीद रखना या उसके आगे कौम के मुद्दों को भूल जाना इस्लामी समझदारी और मोमिनाना गैरत के खिलाफ है।
निष्कर्ष
इस्लामी दृष्टिकोण से, अपने निजी या राजनीतिक लाभ के लिए मस्जिद और मदरसों जैसे धार्मिक व सामुदायिक मुद्दों की अनदेखी करना "खियानत" (Dhoka/Breach of Trust) और "मुनाफिक़त" (Hypocrisy) का अपराध है। ऐसा करने वाला व्यक्ति दुनिया में कौम के भरोसे को तोड़ता है और आखिरत (परलोक) में सख्त जवाबदेही का हकदार बनता है।

20/09/2026

# # # **ईदगाह**

**— मुंशी प्रेमचंद**

रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद आज ईद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है! वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक़ है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गांव में कितनी हलचल है! ईदगाह जाने की तैयारियां हो रही हैं।

किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना। दोपहर के पहले लौटना असंभव है। लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं; लेकिन ईदगाह जाने की ख़ुशी उनके हिस्से की चीज़ है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे, इनके लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम जपते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इनकी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना ख़ज़ाना निकालकर गिनते हैं और ख़ुश होकर फिर रख लेते हैं।

महमूद गिनता है— एक, दो, दस, बारह। उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीज़ें लाएंगे— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और न जाने क्या-क्या। और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पांच साल का दुबला-पतला, लकीर-सा लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गया और मां न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता न चला, क्या बीमारी है। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके पांव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है; फिर भी वह प्रसन्न है।

जब अभागी अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नहीं! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही थी। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को! इस घर में उसका काम नहीं। लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंदमयी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।

हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है— "तुम डरना नहीं अम्मां, मैं सबसे पहले आऊंगा। बिल्कुल न डरना।"

अमीना का दिल कचोट रहा है। गांव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है? उसे अकेले कैसे मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यूं न जाने देगी। नन्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाएंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद ले लेती; लेकिन यहां सेवइयां कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहां तो घंटे-घंटों सामग्री बटोरते लगेंगे।

गांव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब-के-सब दौड़कर आगे निकल जाते, फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर पीछे वालों का इंतज़ार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता था?

शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीर के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ों में आम और लीचियां लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहां से एक फ़रलांग पर हैं, ख़ूब हंस रहे हैं।

आगे चले। अदालत आ गई, कॉलेज आ गया, क्लब आ गया। इतने बड़े कॉलेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी, बड़े-बड़े आदमी हैं, मूंछों वाले! इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं! न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर!

अब हलवाइयों की दुकानें शुरू हुईं। इतनी मिठाइयां कौन खाता है? देखो न, एक-एक दुकान पर मनंों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर ख़रीद ले जाते हैं।

आगे ईदगाह नज़र आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फ़र्श है, जिस पर जाजम बिछी हुई है। और रोज़ेदारों की पंक्तियां एक के पीछे दूसरी न जाने कहां तक चली गई हैं, पक्के फ़र्श के नीचे तक, जहां जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की क़तार में खड़े हो जाते हैं। यहां कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की नज़र में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वज़ू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं... मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।

नमाज़ ख़त्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौनों की दुकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला है। एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगे, कभी ज़मीन पर गिरते हुए। यह चरखी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊंट छड़ों से बंधे हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मज़ा लो। महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊंटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। उसके पास तीन ही पैसे हैं। अपने कोश का एक-तिहाई ज़रा-सा चक्कर खाने के लिए वह नहीं दे सकता।

सब चरखियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। इधर दुकानों की क़तार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं— सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, धोबिन और साधु। वाह! कितने सुंदर खिलौने हैं! अब बोला ही चाहते हैं।

महमूद सिपाही लेता है, ख़ाकी वर्दी और लाल पगड़ी वाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता है अभी क़वायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है। मशक का मुंह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उंडेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वत्ता है उसके मुख पर! काला चोग़ा, नीचे सफ़ेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में क़ानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं।

यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महंगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। ज़रा-सा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के?

मोहसिन कहता है— "मेरा भिश्ती रोज़ शाम-सुबह पानी दे जाएगा।"
महमूद कहता है— "मेरा सिपाही घर की पहरेदारी करेगा। कोई चोर आएगा तो फ़ौरन बंदूक से मार देगा।"
नूरे कहता है— "मेरा वकील अदालत में मुकदमा लड़ेगा।"
सम्मी कहता है— "मेरी धोबिन रोज़ कपड़े धोएगी।"

हामिद खिलौनों की निंदा करता है— "मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाएं।" लेकिन उसकी आंखें ललचाई हुई हैं। वह चाहता है कि कुछ देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते, विशेषकर जब अभी नया शौक़ हो। हामिद ललचाता रह जाता है।

खिलौनों के बाद मिठाइयां आती हैं। किसी ने रेवड़ियां ली हैं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहनहलवा। मज़े से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागों के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आंखों से सबकी ओर देखता है।

मोहसिन कहता है— "हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी ख़ुशबूदार है!"
हामिद को संदेह हुआ, यह केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है। फिर भी वह उसके पास गया। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुंह में रख लेता है। महमूद, नूरे और सम्मी ख़ूब ताली बजा-बजाकर हंसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।

मोहसिन— "अच्छा, अबकी ज़रूर देंगे हामिद, अल्ला क़सम, ले जा।"
हामिद— "रखे रहो, क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं?"
सम्मी— "तीन ही पैसे तो हैं, तीन पैसे में क्या-क्या लोगे?"
महमूद— "हमसे गुलाबजामुन ले जा हामिद, मोहसिन बदमाश है।"
हामिद— "मिठाई कौन बड़ी चीज़ है। किताब में इसकी कितनी बुराइयां लिखी हैं!"
मोहसिन— "लेकिन दिल में तो कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?"
महमूद— "हम समझते हैं इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे ख़र्च हो जाएंगे, तो यह ललचा-ललचाकर खाएगा।"

मिठाइयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीज़ों की, कुछ गिलट और कुछ नक़ली गहनों की थीं। लड़कों के लिए यहां कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख़्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियां उतारती हैं तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उंगलियां कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी। खिलौने से क्या फ़ायदा? व्यर्थ में पैसे ख़राब होते हैं। ज़रा देर ही तो ख़ुशी होती है, फिर तो खिलौने की ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता। या तो घर पहुंचते-पहुंचते टूट-फूटकर बराबर हो जाएंगे। चिमटा कितना काम की चीज़ है! रोटियां तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो। कोई आग मांगने आए तो चटपट चूल्हे से अंगारा निकालकर उसे दे दो। अम्मां बेचारी को कहां फ़ुरसत है कि बाज़ार आएं और इतने पैसे ही कहां मिलते हैं? रोज़ हाथ जला लेती हैं।

हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबी़ल पर सब-के-सब शरबत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं! इतनी मिठाइयां लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो; मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूंगा। खाएं मिठाइयां, उनका मुंह सड़ेगा, फोड़े-फुंसियां निकलेंगी, आप ही ज़बान चटोरी हो जाएगी, तब घर से पैसे चुराएंगे और मार खाएंगे। किताब में झूठी बातें थोड़ी ही लिखी हैं। मेरी ज़बान क्यों ख़राब होगी? अम्मां चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी— "मेरा बच्चा अम्मां के लिए चिमटा लाया है।" हज़ारों दुआएं देंगी। फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएंगी। सारे गांव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है, कितना अच्छा लड़का है! इन बड़ों की दुआएं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुंचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं हैं, तभी तो मोहसिन और महमूद मिज़ाज दिखाते हैं। मैं भी इनसे मिज़ाज दिखाऊंगा। खेलें खिलौने, खाएं मिठाइयां! मैं खिलौने की निंदा नहीं करता, पर चिमटा तो बंदूक है, अगर कंधे पर रख लो तो बंदूक हो गई, हाथ में ले लिया तो फ़कीरों का चिमटा हो गया। चाहूं तो इससे मंजीरे का काम ले सकता हूं। एक चिमटा जमा दूं तो तुम सबके सारे खिलौनों की जान निकल जाए! तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएं, मेरे चिमटे का बाल भी बांका नहीं कर सकते। बहादुर शेर है— मेरा चिमटा!

हामिद ने दुकानदार से पूछा— "यह चिमटा कितने का है?"
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा— "यह तुम्हारे काम का नहीं है जी!"
"बिकाऊ है कि नहीं?"
"बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहां क्यों लाएं हैं?"
"तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?"
"छह पैसे लगेंगे।"

हामिद का दिल बैठ गया।
"ठीक-ठीक बताओ।"
"ठीक-ठीक पांच पैसे लगेंगे, लेना हो तो लो, नहीं चलते बनो।"

हामिद ने कलेजा मज़बूत करके कहा— "तीन पैसे लोगे?"
और वह आगे बढ़ गया कि कहीं दुकानदार की घुड़कियां न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियां नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया।

ज़रा सुनें, सब के सब क्या-क्या बकवास करते हैं!
मोहसिन ने हंसकर कहा— "यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?"
हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा— "ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो, सारी पसली चूर-चूर हो जाएगी बच्चे की!"
महमूद बोला— "तो यह कोई खिलौना है?"
हामिद— "खिलौना क्यों नहीं है! अभी कंधे पर रखा, बंदूक हो गई; हाथ में ले लिया, फ़क़ीरों का चिमटा हो गया। चाहूं तो इससे मंजीरे का काम ले सकता हूं। एक चिमटा जमा दूं, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएं, वह मेरे चिमटे का बाल भी बांका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है— चिमटा!"

सम्मी ने टपरी मारी थी— "मेरी खंजरी से बदलोगे? दो आने की है।"
हामिद ने खंजरी की ओर उपेक्षा से देखा— "मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खंजरी का पेट फाड़ डाले! बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। ज़रा-सा पानी लगे तो ख़त्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आंधी में, तूफ़ान में बराबर डटा रहेगा।"

चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हैं, धूप तेज़ हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी है। बाप से सिफ़ारिश करें तो भी चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए उसने अपने पैसे बचा रखे थे।

अब बालकों के दो दल हो गए। एक ओर मोहसिन, महमूद, नूरे और सम्मी हैं; दूसरी ओर अकेला हामिद। बहस हो रही है। सम्मी तो पट्ठ हो गया, एक तरफ़ हो गया। मोहसिन ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया— "तुम्हारे चिमटे का मुंह तो रोज़ आग में जलेगा।"

हामिद के पास जवाब तैयार था— "आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब! आपके यह वकील, सिपाही और भिश्ती तो घर में घुस जाएंगे। आग में कूदना वह काम है जो यह रुस्तमे-हिंद ही कर सकता है।"

महमूद ने एक ज़ोर लगाया— "वकील साहब कुर्सी-मेज़ पर बैठेंगे, आपका चिमटा तो बावर्चीख़ाने में ज़मीन पर पड़ा रहेगा।"

इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया। कितना अच्छा प्रस्ताव है! चिमटा बावर्चीख़ाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?

हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा तो उसने धांधली शुरू की— "मेरा चिमटा बावर्चीख़ाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे तो जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका क़ानून उनके पेट में डाल देगा!"

बात कुछ बनी नहीं, ख़ासी गाली-गलौज थी, लेकिन क़ानून को पेट में डालने वाली बात ऐसी उमंग-भरी निकली कि दोनों बाल-वीर मुंह तकते रह गए। क़ानून पेट में डालने की बात बिल्कुल नई और अनोखी थी।

मोहसिन ने मुंह बनाकर कहा— "हमारे भिश्ती को तो कोई हाथ भी न लगाएगा।"
हामिद— "मेरा चिमटा एक ललकार मारेगा तो तुम्हारा भिश्ती पानी भरकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।"

मोहसिन की पराजय हो गई। महमूद ने मदद पहुंचाई— "अगर बच्चा पकड़ जाए, तो अदालत में बंधे-बंधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के ही पैरों पड़ेंगे।"

हामिद इस अकाट्य तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा— "हमें पकड़ने कौन आएगा?"
नूरे ने अकड़कर कहा— "यह सिपाही बंदूक वाला!"
हामिद ने मुंह चिढ़ाकर कहा— "यह बेचारों को पकड़ेंगे? यह आप ही डरकर भागेंगे! अच्छा, आओ ज़रा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर ही इनकी सीटी-पिटी गुम हो जाएगी।"

महमूद ने चिमटे की ओर देखकर कहा— "इसकी दुम में तो आग लगती है।"
हामिद— "आग में कूदना बहादुरों का काम है। तुम्हारे यह सिपाही-वकील गीदड़ हैं, आग में न कूद सकेंगे।"

जीत हामिद की हुई। उसका चिमटा 'रुस्तमे-हिंद' है। इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। मोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी इसमें आपत्ति न थी। विजेताओं को जो सम्मान पराजितों से मिलता है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे ख़र्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ला सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाएंगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों।

संधि की शर्तें तय होने लगीं।
मोहसिन ने कहा— "ज़रा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो।"
महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए। हामिद को इन शर्तों के मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने ख़ूबसूरत खिलौने हैं!

हामिद ने हारने वालों के आंसू पोंछे— "मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह लोहे का चिमटा इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा? मालूम होता है, अभी बोला कि बोला।"

लेकिन मोहसिन की मंडली को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।

मोहसिन— "लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?"
महमूद— "दुआ को लिए फिरते हो, उल्टे मार न पड़े। अम्मां ज़रूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?"

हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी प्रसन्न न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसे ही में तो सब कुछ करना था, और उन पैसों के इस उपयोग पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी? फिर अब तो 'रुस्तमे-हिंद' है और सभी खिलौनों का बादशाह!

ग्यारह बजे सारे गांव में हलचल मच गई। मेले वाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे ख़ुशी के जो उछली, तो मियां भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दोनों ख़ूब रोए। उनकी अम्मां यह शोर सुनकर बिगड़ीं और दोनों को ऊपर से दो-दो चांटे और लगाए।

नूरे के वकील का अंत इससे भी ज़्यादा गौरवपूर्ण हुआ। वकील साहब के लिए टॉंड पर या दीवार में दो खूंटियां गाड़ी गईं। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर काग़ज़ का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भांति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने पंखा झलना शुरू किया। अदालत में पंखे की फ़ीस मिलती है, तो क्या घर में पंखा न हो! हवा का झोंका आया या पंखे की चोट लग गई, वकील साहब ऊपर से नीचे आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थियां घूरे पर फेंक दी गईं।

अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गांव की रक्षा करने का काम सौंप दिया गया। लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो था नहीं, जो अपने पैरों चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल कपड़े बिछाए गए। सिपाही साहब उसमें लेटे। महमूद ने टोकरी उठाई और अपने द्वार पर चक्कर लगाने लगा। उसके दोनों छोटे भाई 'सोने वाले, जागते रहो' पुकारते चलते हैं। महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियां सिपाही अपनी बंदूक लिए ज़मीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टांग टूट जाती है।

महमूद को आज मालूम हुआ कि वह एक अच्छा डॉक्टर है। उसे ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टांग को आनन-फानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध लाया जाता है। टांग जोड़ने की कोशिश की जाती है, पर दूध जवाब दे देता है। टांग नहीं जुड़ती। तब उसकी दूसरी टांग भी तोड़ दी जाती है। अब कम से कम एक जगह बैठकर आराम से तो रह सकता है!

अब मियां हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।

"यह चिमटा कहां था?"
"मैंने मोल लिया है।"
"कै पैसे में?"
"तीन पैसे में।"

अमीना ने छाती पीट ली— "यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, न कुछ खाया, न पिया। लाया क्या? यह चिमटा! सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?"

हामिद ने अपराधी भाव से कहा— "तुम्हारी उंगलियां तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे ले लिया।"

बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी की सारी बात कह डालता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना ज़ब्त इससे हुआ कैसे? वहां भी इसे अपनी बूढ़ी दादी की याद बनी रही! अमीना का मन गद्गद हो गया।

और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र! बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बूढ़ी अमीना बच्ची अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थी और आंसू की बड़ी-बड़ी बूंदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!

19/09/2026

इस्लाम और हदीस के सिद्धांतों के अनुसार, मस्जिद या वक्फ की जमीन पर किए गए अतिक्रमण को मुतवल्ली (Mutawalli) द्वारा माफ करने का कोई विधिक या धार्मिक अधिकार नहीं है। यदि कोई मुतवल्ली ऐसा करता है, तो यह शरीअत की दृष्टि से अमानत में खयानत (Breach of Trust) और बड़ा गुनाह माना जाता है।
इस्लामी फ़िक़्ह (कानून) और हदीस के प्रकाश में इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. वक्फ की संपत्ति अल्लाह की अमानत है
इस्लामी कानून के अनुसार, जब कोई संपत्ति (जैसे मस्जिद या उसकी ज़मीन) वक्फ कर दी जाती है, तो उस पर से किसी भी इंसान (चाहे वह वाकिफ हो या मुतवल्ली) का व्यक्तिगत मालिकाना हक खत्म हो जाता है और वह संपत्ति अल्लाह की मुल्कियत (अमानत) बन जाती है।
मुतवल्ली केवल उस संपत्ति का संरक्षक/देखरेख करने वाला (Caretaker) होता है, मालिक नहीं।
जो चीज़ मुतवल्ली की अपनी निजी संपत्ति ही नहीं है, उसे किसी को माफ करने या दान देने का अधिकार उसे शरीअत नहीं देती।
2. अमानत में खयानत पर हदीस की सख्त ताकीद
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अमानत की हिफ़ाज़त पर बेहद ज़ोर दिया है और अमानत में खयानत करने वाले के लिए सख्त चेतावनी दी है:
हदीस:
"जिसमें अमानतदारी (ईमानदारी) नहीं, उसका कोई ईमान नहीं।"

(मुसनद अहमद)

ज़मीन पर अवैध कब्जे (अतिक्रमण) पर हदीस:
नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:

"जिस किसी ने एक बालश्त (हथेली भर) ज़मीन भी किसी की नाहक (अवैध तरीके से/अतिक्रमण करके) ली, तो कयामत के दिन सात जमीनों का तौक बनाकर उसके गले में डाला जाएगा।"

(सहीह बुखारी: 2453, सहीह मुस्लिम: 1610)

3. मुतवल्ली का कर्तव्य और शरीअत का हुक्म
माफ करने का अधिकार नहीं: यदि कोई व्यक्ति मस्जिद या वक्फ की ज़मीन पर कब्ज़ा करता है, तो मुतवल्ली का फर्ज है कि वह हर मुमकिन कोशिश करके उस कब्ज़े को हटवाए। उसे यह अधिकार बिल्कुल नहीं है कि वह आपसी समझौते या किसी दबाव में आकर वक्फ की ज़मीन अतिक्रमणकारी को छोड़ दे या माफ कर दे।
गुपचुप समझौता या माफी का हुक्म: यदि मुतवल्ली अतिक्रमणकारी से कोई साठ-गांठ करता है, रिश्वत लेता है या बिना किसी जायज कानूनी वजह के वक्फ की ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए रखने देता है, तो वह गंभीर गुनाह-ए-कबीरा का मुर्तकिब (दोषी) होता है।
मुतवल्ली का ओहदे से हटना: इस्लामी फ़िक़्ह के मुताबिक, ऐसा मुतवल्ली जो वक्फ का नुकसान करे या अतिक्रमण रोकने में नाकाम/लापरवाह रहे, उसे मुतवल्ली के पद से हटा दिया जाना चाहिए और उसकी जगह किसी ईमानदार व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
शरीअत और हदीस के मुताबिक मस्जिद या वक्फ की ज़मीन पर अतिक्रमण ज़ुल्म और हराम है। मुतवल्ली को इसे माफ करने का कोई अख्तियार नहीं है; उसका इकलौता कर्तव्य वक्फ की संपत्ति के एक-एक इंच की हिफ़ाज़त करना और उसे अतिक्रमण मुक्त कराना है।

19/09/2026

इस्लामी इतिहास, कुरआन और हदीस के संदर्भ में दुनिया में इंसाफ़, अमन और शांति के साथ शासन करने वाले प्रमुख शासकों और राजाओं का ज़िक्र मिलता है:
1. हज़रत सुलैमान (अलैहिस सलाम)
हज़रत सुलैमान (अ.) अल्लाह के नबी भी थे और एक महान बादशाह भी। उनका शासनकाल असाधारण शांति, न्याय और समृद्धि के लिए जाना जाता है।
विशेषता: अल्लाह ताला ने उन्हें इंसानों के अलावा जिन्नात, हवाओं और जानवरों की ज़बान समझने और उन पर हुकूमत करने की ताक़त दी थी। उन्होंने बिना किसी ज़ुल्म के पूरी दुनिया में शांति और तौहीद (अल्लाह की इबादत) का निज़ाम फैलाया।

— ज़िक्र: सुरह अन-नम्ल और सुरह सबा (क़ुरआन)

2. ज़ुलक़रनैन (बादशाह बादशाह)
क़ुरआन में ज़ुलक़रनैन नाम के एक न्यायप्रिय और मोमिन बादशाह का ज़िक्र आता है, जिन्होंने दुनिया के एक बड़े हिस्से पर शासन किया।
विशेषता: उन्होंने पूर्व से पश्चिम तक सफ़र किया और जहाँ भी गए, कमज़ोर और मफ़लूक-उल-हाल (सताए हुए) लोगों की मदद की। उन्होंने याजूज-माजूज के उपद्रव से लोगों को बचाने के लिए एक मज़बूत दीवार (सद्द-ए-ज़ुलक़रनैन) बनाई और कभी अपनी ताक़त का तकब्बुर (अहंकार) नहीं किया।

— ज़िक्र: सुरह अल-कहफ़ (आयतः 83-98)

3. हज़रत उमर बिन अल-ख़त्ताब (रज़ि.) — दूसरे ख़लीफ़ा
यद्यपि वे नबी नहीं थे, लेकिन नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बाद इस्लामी ख़िलाफ़त के दौर में उनका शासनकाल दुनिया के इतिहास में "अदल-ओ-इंसाफ़" (न्याय और शांति) का स्वर्णिम दौर माना जाता है।
विशेषता: उनके दौर में इस्लामी साम्राज्य रोम और फारस (ईरान) तक फैल गया था। उन्होंने प्रजा के लिए रात-रात भर गश्त करके उनके हाल-चाल का जायज़ा लिया, जनहित (Welfare State) के काम किए, और गैर-मुस्लिम प्रजा (जिम्मियों) के अधिकारों और सुरक्षा की पूरी गारंटी दी।

4. हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रह.)
उन्हें "उमर-ए-सानी" (दूसरा उमर) भी कहा जाता है। बनू उमय्या के दौर में जब हुकूमत में कई ख़राबियाँ आ गई थीं, तब उन्होंने महज़ ढाई साल के शासनकाल में पूरा निज़ाम बदल दिया।
विशेषता: उनके दौर में इंसाफ़ और बरकत का यह आलम था कि लोग ज़कात (दान) देने के लिए मुफ़लिसों को ढूंढते थे, लेकिन कोई ज़कात लेने वाला गरीब नहीं मिलता था।

इतिहास में न्यायप्रिय राजाओं का मफ़हूम
हदीस और इस्लामी शिक्षाओं में ऐसे आदिल (न्यायप्रिय) शासक की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत बताई गई है। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि क़यामत के दिन जिन सात लोगों को अल्लाह के अर्श का साया मिलेगा, उनमें सबसे पहला 'इमाम-ए-आदिल' (न्यायप्रिय शासक) होगा। (सहीह बुखारी: हदीस 660)

19/09/2026

इस्लामी इतिहास और हदीस की शब्दावली में ईसाइयों/ईसाई कौम को "रूम" (Romans / ईसाई बहुल जातियाँ) कहा गया है।
हदीस में क़यामत के करीब रूमियों (ईसाई कौम/पश्चिम) की बड़ी संख्या, उनकी ताक़त और ग़लबा होने के संबंध में एक प्रामाणिक हदीस दर्ज है:
हदीस: क़यामत के वक्त रूमियों की बहुलता और ताक़त
हदीस:
Reddit

हज़रत मुस्तौरिद अल-क़ुरशी (रज़ि.) से रिवायत है कि उन्होंने हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ि.) के सामने कहा:
Tohed

"मैंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को यह फ़रमाते हुए सुना: 'क़यामत उस वक्त क़ायम होगी जब रूमी (ईसाई/पश्चिमी लोग) दुनिया में सबसे ज़्यादा तादाद (और ताक़त) में होंगे।'"

हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ि.) ने कहा: "सोच-समझकर कहो कि तुम क्या कह रहे हो!"
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उन्होंने (मुस्तौरिद रज़ि.) कहा: "मैं वही बयान कर रहा हूँ जो मैंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से सुना है।"

तब हज़रत अम्र बिन अल-आस (रज़ि.) ने फ़रमाया:
Tohed

"अगर तुम यह कहते हो तो (उनकी इस ताक़त और संख्या की वजह यह है कि) उनमें चार ख़ूबियाँ हैं:
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वे फ़ित्ने और आज़माइश (मुसीबत) के समय सबसे ज़्यादा सब्र और हिम्मत रखने वाले हैं।
मुसीबत में गिरने के बाद सबसे तेज़ी से संभलने वाले हैं।
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हारने के बाद दोबारा हमला करने में सबसे तेज़ हैं।
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वे अपने मिस्कीनों, यतीमों और कमजोरों के साथ सबसे अच्छा बर्ताव करने वाले हैं।"
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— सहीह मुस्लिम: हदीस 2898 (7279)

हदीस का मफ़हूम (अर्थ और व्याख्या)
"रूम" (Ar-Rum) का मतलब:
अरब में उस ज़माने में ईसाई साम्राज्य को "रूम" कहा जाता था। आज के ज़माने में उलेमा (विद्वान) इससे मुराद पश्चिमी/ईसाई देशों (Western/European Civilizations) को लेते हैं।
क़यामत के करीब ग़लबा:
इस हदीस में नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने भविष्यवाणी की है कि क़यामत के करीब दुनिया में ईसाइयों/पश्चिमी दुनिया की आबादी, असर और ताक़त बहुत ज़्यादा होगी।
ईसा (अलैहिस सलाम) का दोबारा नज़ूल (आगमन):
एक अन्य पहलू यह भी है कि जब हज़रत ईसा (अलैहिस सलाम) क़यामत के करीब आसमान से दोबारा दुनिया में तशरीफ़ लाएँगे (सहीह बुखारी: हदीस 3448), तो वे दज्जाल का ख़ातमा करेंगे और पूरी दुनिया पर अल्लाह का दीन (हक़) ग़ालिब हो जाएगा।

19/09/2026

नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की कई ऐसी पेशीनगोइयाँ (भविष्यवाणियाँ) प्रामाणिक हदीस ग्रंथों में दर्ज हैं जो उनके बाद पूरी हुईं या क़यामत के करीब पूरी होंगी। नीचे कुछ प्रमुख और सहीह (प्रामाणिक) हदीसों की सूची दी गई है:
1. बैतुल मक़दिस की फ़तह और उसके बाद की निशानी
रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी वफ़ात से पहले ही बैतुल मक़दिस (यरूशलम) की फ़तह और उसके बाद फैलने वाली महामारी की पेशीनगोई की थी।
हदीस:

"क़यामत से पहले छह चीज़ों को शुमार करो: (1) मेरी मौत, (2) फिर बैतुल मक़दिस की फ़तह, (3) फिर एक ऐसी बीमारी (ताऊन) जो तुममें इस तरह फैलेगी जैसे मवेशियों में बीमारी फैलती है..."

— सहीह बुखारी: हदीस 3176

नोट: हज़रत उमर (रज़ि.) के दौर में बैतुल मक़दिस फ़तह हुआ और अमवास की महामारी भी फैली।
2. फ़ारस (फारस/ईरान) और रूम (रोमन साम्राज्य) की फ़तह
जब मुसलमान बेहद ग़रीबी और तंगी की हालत में थे, तब आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दो बड़े साम्राज्यों के ख़ात्मे की पेशीनगोई की थी।
हदीस:

"जब किसरा (फारस का सम्राट) हलाक हो जाएगा तो उसके बाद कोई किसरा न होगा, और जब क़ैसरा (रोमन सम्राट) हलाक हो जाएगा तो उसके बाद कोई क़ैसरा न होगा। और उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, तुम उन दोनों के ख़ज़ाने अल्लाह की राह में ख़र्च करोगे।"

— सहीह बुखारी: हदीस 3618 / सहीह मुस्लिम: हदीस 2918

3. अरब की सरज़मीन का दोबारा हरा-भरा होना
आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अरब के रेगिस्तान में हरियाली और नदियां बहने की भविष्यवाणी की थी।
हदीस:

"क़यामत उस वक्त तक क़ायम नहीं होगी जब तक कि अरब की सरज़मीन दोबारा बाग़ात (हरियाली) और नदियों में तब्दील न हो जाए।"

— सहीह मुस्लिम: हदीस 157 (1012)

4. चरवाहों का ऊंची-ऊंची इमारतें बनाना
जिबरील (अलैहिस सलाम) के पूछने पर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने क़यामत की निशानियों में से एक यह बताई थी।
हदीस:

"और (क़यामत की निशानी यह है) कि तुम नंगे पांव, नंगे बदन, तंगदस्त चरवाहों को ऊंची-ऊंची इमारतों के बनाने में एक-दूसरे पर फ़ौक़ियत (प्रतिस्पर्धा) ले जाते देखोगे।"

— सहीह मुस्लिम: हदीस 8

5. वक़्त में तेज़ी (ज़माने का तेज़ी से गुज़रना)
क़यामत के करीब समय तेज़ी से बीतने लगेगा।
हदीस:

"ज़माना करीब आ जाएगा (वक़्त तेज़ी से गुज़रेगा), ज्ञान (इल्म) उठा लिया जाएगा, फ़ित्ने ज़ाहिर होंगे, बुख़्ल (कंजूसी/लालच) दिलों में डाल दिया जाएगा और 'हरज' बहुत बढ़ जाएगा।" सहाबा ने पूछा: "हरज क्या है?" आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: "क़त्ल व ग़ारत।"

— सहीह बुखारी: हदीस 7061 / सहीह मुस्लिम: हदीस 157

6. कुफ़्र और शिर्क का दोबारा लौटना
हदीस:

"दिन और रात उस वक्त तक ख़त्म नहीं होंगे जब तक कि 'लात' और 'उज़्ज़ा' (बुतों) की दोबारा इबादत न की जाने लगे।"

— सहीह मुस्लिम: हदीस 2907

18/09/2026
11/09/2026

इस्लाम में इस पूरे मामले को दो अलग-अलग नज़रियों से देखा जाता है—एक शरिया कानून/गुनाह के तहत और दूसरा इंसाफ व मजबूरी के तहत।
चूंकि यह लेन-देन शुरुआत से ही 'सूद' (रिबा) पर आधारित था और अब कारोबार पूरी तरह डूब चुका है, इसलिए देने वाले और लेने वाले दोनों के लिए इस्लामी अहकाम नीचे दिए गए हैं:
1. देने वाले (पूंजीपति/ब्याज लेने वाले) के लिए हुक्म व सजा
जिस इंसान ने पैसे देकर हर महीने फिक्स नफा मांगा, उसने सूद (रिबा) का लेन-देन किया।
गुनाह और सजा (आख़िरत में):
अल्लाह और रसूल से जंग: क़ुरआन में अल्लाह ताला फरमाता है: "अगर तुम सूद से तौबा नहीं करते, तो अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से जंग का ऐलान सुन लो।" (सूरह अल-बक़रह, आयत 279)
आख़िरत में भयानक अज़ाब: सूद लेने वाले पर अल्लाह और उसके रसूल की लानत है (जैसा कि सहीह मुस्लिम हदीस 1598 में बताया गया है)।
सामान और मूलधन (Principal Amount) की वसूली का हक:
केवल असल रकम लेने का अधिकार: क़ुरआन के अनुसार, अगर सूदखोर तौबा कर ले, तो वह केवल अपनी असल दी हुई रकम (Principal) वापस ले सकता है—कोई फिक्स मुनाफा नहीं।
मजबूर को तंग करने की मनाही: अगर सामने वाला बर्बाद हो गया है और पाई-पाई का मोहताज है, तो देने वाले के लिए सख्त हुक्म है कि वह उस पर ज़ुल्म या दबाव न बनाए।
क़ुरआन का फरमान: "और अगर कर्ज़दार तंगदस्त (गरीब/मजबूर) हो, तो उसे आसानी होने तक की मोहलत दो, और अगर तुम (उसका कर्ज़) सदक़ा (माफ़) कर दो, तो यह तुम्हारे लिए ज़्यादा बेहतर है।" (सूरह अल-बक़रह, आयत 280)

2. लेने वाले (कारोबारी/ब्याज देने वाले) के लिए हुक्म व सजा
कारोबारी ने जानते-बूझते सूद पर पैसा लिया और हर महीने फिक्स नफा देने का वादा किया, जो कि हराम था।
गुनाह (आख़िरत में):
सूद के लेन-देन में शामिल होने (दीगर गवाह और लिखने वाले की तरह सूद खिलाने) की वजह से वह भी गुनाहगार हुआ और अल्लाह की लानत का हकदार बना।
दुनियावी ज़िम्मेदारी (असल रकम की वापसी):
कर्ज़ चुकाने का फर्ज: कारोबार डूब जाने से सूद (फिक्स नफा) तो खत्म और हराम हो गया, लेकिन असल रकम (Principal Amount) जो उसने ली थी, वह उसके ऊपर कर्ज़ (अमानत) है।
नीयत और सजा: अगर लेने वाले की नीयत नीयत साफ है लेकिन वह सच में कंगाल हो चुका है, तो इस्लाम में उस पर कोई शारीरिक या आपराधिक सजा नहीं है, बल्कि देने वाले को हुक्म है कि उसे मोहलत दे। लेकिन अगर उसके पास देने की गुंजाइश है और वह जानबूझकर बहाने बनाकर नहीं दे रहा, तो हदीस में इसे ज़ुल्म कहा गया है:
हदीस: रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया: "मालदार (अदा करने की ताकत रखने वाले) का कर्ज़ अदा करने में टाल-मटोल करना ज़ुल्म है।"
हदीस संदर्भ: सहीह बुखारी (हदीस नंबर 2287)
इस्लामी समाधान (दोनों को अब क्या करना चाहिए?)
तौबा करें: दोनों पक्ष सबसे पहले अल्लाह से इस बात की सच्ची तौबा करें कि उन्होंने जाने-अनजाने में सूद (रिबा) का लेन-देन किया।
फिक्स नफा तुरंत खत्म करें: जो हर महीने फिक्स रकम दी जा रही थी, वह पूरी तरह हराम थी। उसका हिसाब बंद किया जाए।
केवल असल रकम का हिसाब करें:
कारोबारी ने जितना असल पैसा लिया था, उसमें से यदि पहले दिया गया फिक्स नफा केवल सूद के नाम पर था, तो कई फुकाहा (विद्वानों) के मुताबिक वह रकम असल में से घटाई जाती है।
जितना असल पैसा बाकी बचता है, देने वाला कारोबारी को आसानी से चुकाने की मोहलत दे या किश्तों में तय करे।
अगर बिल्कुल देने की हालत न हो: अगर कारोबारी सच में कंगाली के हाल में है, तो देने वाले के लिए सबसे अफ़ज़ल और बरकत वाला काम यह है कि अल्लाह की रज़ा के लिए उसे पूरी या आंशिक रकम माफ़ कर दे।

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