ध्यान योग यज्ञ अभ्यास के साधना कैसे करें?
ध्यान योग यज्ञ, राजयोग, सहजयोग, पंतजलियोग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, अष्टांगयोग आदि-- ये सब वेद के अनुसार ही साधना बताते है। अब पातंजल योग सूत्रों का विस्तार से अन्य ग्रंथों से मिलान करते हुए व्याख्या करते है। इसको चार भागों में बांटा गया है। 1. समाधिपाद 2. साधनापाद 3. विभूतिपाद 4. कैवल्यपाद ।, जैसे भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए उसे तैयार करके उसमे श्रेष्ठ बीज बोते है, उसी प्रकार ध्यानयोगयज्ञ अभ्यास के लिए अपने शरीर को कैसे तैयार करना है, इसके लिए महान ऋषि पंतजली जी सम चित्त वाले उत्तम साधकों के लिए सबसे प्रथम ,”समाधिपाद “ का आरंभ करते है। अर्थात परमात्मा की उपासना अपने शरीर के अंदर कैसे करनी है? इसके लिए योग के ग्रंथ का आरंभ किया जाता है।
समाधिपाद
समाधिपाद सूत्र .1 अथ योगानुशासनम
शब्दार्थ: (अथ )=अब आरंभ करते है। (अनुशासनम)=योग की शिक्षा देने वाले ग्रंथ को।
अर्थात योग की व्याख्या करते है। योग आत्मा और परमात्मा के मिलन को कहते है। जो मिलन समाधि अवस्था में होता है। यह योग की शिक्षा प्राचीन परंपरा से चली आ रही है। श्रुति और स्मृतियों अर्थात वेदों और उपनिषदों मे इस योग का वर्णन किया गया है। जैसे श्वेतातरउपनिषद अ.2/8,” शरीर के तीन अंगों (छाती, गर्दन, और सिर ) को सीधा रखकर इंद्रियों को मन के साथ अंतःकरण में प्रवेश करके, ॐ की नौका पर सवार होकर भय के लाने वाले सारे प्रवाहों से पार उतर जाए,”। अ.2/9,” शरीर की सारी चेसटाओ को वश में करके प्राणों की गति को धीमी करके रोके और प्राण के क्षीण होने पर नासिका से श्वाश ले। सचेत सारथी जैसे घोड़ों की चंचलता रोकता है, उस प्रकार बाहर जाने वाले मन को अंदर रोके। अ.2/10,” ऐसे स्थान पर योग का अभ्यास करें, जो सम है, शुद्ध है, कंकड़, बालू, और अग्नि से रहित है, जो शब्द, जलाशय और लता आदि से मन के अनुकूल है, आँखों को पीड़ा देने वाला नहीं हो, एकांत हो और वायु के झोंकों से रहित हो। अ.2/11,” जब अभ्यास का प्रभाव होने लगता है, तब पहले यह रूप दिखते है—कुहरा, धुआ, सूर्य, वायु, अग्नि, विद्धुत, जुगनू, बिल्लौर और चंद्र आदि—यह सब दीख कर जब शांत हो जाते है, तब ब्रह्म रूपी चेतन परमात्मा का प्रकाश होता है।“ अ.2/12,” जब पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश प्रकट होते है, अर्थात पांचों तत्वों का जय (विजय) हो जाता है, तब फिर योगी के लिए न रोग है, न जरा है, न दुख है, क्योंकि उसने वह शरीर पा लिया है, जो योग की अग्नि से बना है,” अ.2/13,” योग का पहला फल यह कहते है, की शरीर हल्का हो जाता है, आरोग्य रहता है, विषयों की लालसा मिट जाती है, कान्ति बढ़ जाती है, स्वर मधुर हो जाता है, गंध शुद्ध होता है और मल-मूत्र थोड़ा होता है।“ अ.2/14,” इसके पीछे उस आत्मा के शुद्ध स्वरूप का साक्षात होता है, जैसे वह रत्न जो मिट्टी से लिथड़ा हुआ होता हो, जब धोया जाता है तो फिर तेजोमय होकर चमकता है, इस प्रकार साधक आत्मतत्व (आत्मा के असली स्वरूप) को देख कर शोक से पार हुआ करिथार्थ हो जाता है”। अ.2/15,” फिर जब योग युक्त होकर दीपक के तुल्य आत्म तत्व से ब्रह्मतत्व को देखता है, जो अजन्मा, अटल (कूटस्थ) और सब तत्वों से विशुद्ध है, तब उस शुद्ध स्वरूप प्रमात्मतत्व को जान कर सब फाँसों से छूट जाता है,”। सारांश यह है की अपने शरीर के अंदर जाकर, मस्तिसक के आकाश मे बैठ कर अंतःकरण (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार) की गति को ठहराना है, चुप कराना है, समाधिस्थ होना है, यही परमात्मा की तरफ योग (मिलन) का कदम है, उसकी ओर चलना है। इसी प्रकार कठोउपनिषद: अ.2, वल्ली 3, मंत्र: 10-, 11,” जब पांचों ज्ञान इंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती है और बुद्धि भी चेष्टारहित हो जाती है, उसको परमगति (सबसे उच्ची अवस्था) कहते है। उसी को योग मानते है, जो इंद्रियों की निश्चल धारणा है, उस समय वह योगी प्रमाद से रहित होता है, अर्थात शुद्ध परमात्मा के स्वरूप मे अवस्थितः होता है, क्योंकि योग मे इंद्रियों, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार की गति का निरोध (ठहराव) करना होता है,”। इसी प्रकार मंत्र 12,13,” वह आत्मा न वाणी से, न मन से, न आँखों से पाया जा सकता है ,” वह है” ऐसा कहने के सिवा उसे कैसे उपलब्ध करे। ,” वह है” इस रूप से और तत्व रूप से उसको जानना चाहिए। जब ,”वह है”- इस प्रकार अनुभव कर लिया है, तब उसका तत्व स्वरूप सपस्ट हो जाता है,”। सारांश यही है की योग में अपने शरीर के अंदर मस्तिसक के आकाश मे बैठ कर अपने अंतःकरण और प्राणों की गति को ठहराना है, रोकना है। जैसे ही अंतःकरण की गति ठहरती है, आत्मा प्रकाशित हो जाती है।
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अध्यातम का अर्थ है अपने शारीर के अंदर रमण करना, एकाग्रता करना और जागना..... ये सब काम सभी मानव करते हैं लेकिन सो जाते हैं, यदि जागकर किया जाये तो धर्म बन जाता है..........
वैदिक धर्म --पार्ट -11
शुरू में वह परमात्मा की चेतना शक्ति अक्रिय थी, अचल थी , स्पंदनरहित थी और जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तब वह स्पंदित होने लगी और उसी शांत, अद्वितीय सत्ता से यह सृष्टि बाहर निकल आई, उसके परे कुछ नहीं है। उस समय न सत था, न असत था, न वायु थी, न आकाश, न अन्य कुछ ही। यह सब किस्से ढका था? सब किसके आधार पर स्थित था? तब मृत्यु नहीं थी, न अमरता थी, और न रात्री और दिन का परिवर्तन ही था । वह परमात्मा की चेतन सत्ता, वह प्राण ही मानो आवरण के रूप में परमात्मा को ढके हुए था और उसका चलायमान होना प्रारंभ नही हुआ था। तब परमात्मा की सत्ता किरीयरहित होकर स्थित थी । सृष्टि का कारण ,” इच्छा ,” बताई गई है। जो सबसे पहले आस्तीतत्व में था, व्ही ,” इच्छा,” में परिणत हो गया और वह इच्छा कामना के रूप मे प्रकट होने लगी,और ये कामना ही सृष्टि का कारण है। अब पहले इच्छा की उत्पत्ति हुई, जो मन का प्रथम बीज है। ऋषियों ने अपने अंतःकरण में प्रज्ञा द्वारा खोजते खोजते सत रूपी परमात्मा और असत रूपी प्रकर्ति के बीच का संबंध का पता लगाया। (नसदीयसूक्त 110/129/4,” ) सर्जन के पूर्व उसी एक परमात्मा का अस्तित्व था। वही सब पदार्थों के एकमात्र अधिस्वर है, वही इस विश्व का आधार है, वही, जो जीव-सृष्टि का जनक है, समस्त शक्ति का मूल है, समस्त देव- देवता जिसकी पूजा करते है, जीवन जिसकी छाया है। मृत्यु जिसकी छाया है, उसको छोड़ कर किसकी पूजा करे? पर्वत , समुंदर सब उसकी महिमा की घोषणा करते है।–(ऋग्वेद 10/121) पहले ऋषियों ने परमात्मा को प्रकर्ति में खोजना शुरू किया। सम्पूर्ण प्रकर्ति अधिक से अधिक उन्हें केवल इतना ही ज्ञान दे सकी की उन्हें एक से एक सुख एसवर्य की वस्तुओ का विज्ञान पता चलने लगा। परन्तु वह इस विश्व के नियंता एक परमात्मा को न जान पाए। बस वह इतना जान पाए की इस जगत को चलाने वाली कोई तो सत्ता है। जो इसको अपने बनाए हुए नियमों में चला रहा है। फिर वे ऋषि बाह्य जगत को छोड़ कर अपने शरीर के अंदर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करने लगे। तब उनके जानने में आया की जो कुछ हम बाहर इस ब्रह्मांड में विशाल रूप में देखते है, व्ही इस शरीर में सूक्ष्म रूप से विधमाण है। उन्होंने अपने अंतःकरण व प्राणों के गति ठरहा कर समाधिस्थ होकर परमात्मा का चेतन प्रकाश देखा। तब उन्होंने घोषणा की मैंने प्रकर्ति के पीछे छिपे चेतन परमात्मा को देख लिया है। तुम भी देख सकते है। जैसे ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके मैंने देखा। इसमें बहिर्मुखी इंद्रियों और मन की गति को अंदर करके रोकना होगा। जब मन की गति रुक जाएगी तो प्राणों की भी गति रुक जाएगी। क्योंकि मन और प्राण का जोड़ा है। एक की गति रुक जाएगी तो दूसरे की गति अपने आप रुक जाएगी। इस प्रकार ऋषि काभी प्राण ठहरा कर तो काभी अंतःकरण ठहरा कर अपने अंदर जाकर समाधिस्थ होने लगे और साक्षात परमात्मा के प्रकाश के दर्शन करने लगे। इसमें किसी भी बाहरी कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। जो बाहर इंद्रियों और मन को करते है। वह सुख एसवर्य तो प्राप्त कर सकते है परन्तु परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते है। उसकी शांति – आनंद को प्राप्त नहीं कर सकते है। क्योंकि हर कोई मनुष्य धन पाना चाहता है, और वह बहिर्मुखी होकर बाहर जाने से ही मिलता है। परमात्मा को कोई बिरला ही पाना चाहता है, इसलिए वह अपने शरीर के अंदर अंतर्मुखी होकर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करता है। ऋषि स्पष्ट घोषणा करते है। की हमे धन भी चाहिए और परमात्मा भी चाहिए। इसलिए उन्होंने दोनों मार्गों का समन्वय कर लिए। वह प्रतिदिन दोनों संध्याकालों में परमात्मा का ध्यान करने लगे और दिन में अपनी रोजी रोटी कमाने लगे। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की परमात्मा तो सबके अंदर है। लेकिन इंद्रियों और अंतःकरण और तीनों गुणों के आवरण उसे देखने नहीं देते है। उन्होंने बीच मे पर्दा सा डाल रखा है। वह कहते है की सत्य परमात्मा तो सदा से ही हमारे अंदर विध्यमान था, लेकिन इनके आवरण ने ही उसे ढाक रखा था। जब हम इन आवरणों के पार गए तो परमात्मा वहाँ मौजूद ही था। और वो मैं ही था। उसने घोषणा कर दी की ,” अहम ब्रह्म असमी ,” मैं तो ब्रह्म ही हूँ। लेकिन जब वह समाधि से नीचे उतरे तो अपने को जीव ही पाया। लेकिन उसके अंतःकरण और शरीर में भूत कुछ परिवर्तन हो गया। फिर तो वो शांति आनंद लेने के लिए बार बार समाधिस्थ होने लगा। यही वेदान्त दर्शन की नीव है, आधार है। सत्य परमात्मा को प्रकर्ति में बाहर नहीं खोज जा सकता है, उसे तो अपने शरीर के अंदर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके खोज जाता है। मनुष्य का आत्मा ही परमात्मा है। यह आत्मा अद्भुत है। समस्त ज्ञान का भंडार है।, इस आत्मा को अग्नि जला नहीं सकता। वायु सुख नहीं सकता, जल डुबो नहीं सकता। कोई भी शस्त्र काट नहीं सकता है। अर्थात कोई भी इसे हानी नहीं पहुचा सकता है। वह तो पहले से ही शुद्ध, बुद्ध, पवित्र है, सूक्ष्म है और विशाल भी है। बस मनुष्यों में जो अंतर है वह उनके अंतःकरण रूपी जीव का है। अभी तक मानव का अंतःकरण 2% से 17% के बीच है। इसी कारण जीवों के मस्तिसक के कारण अंतर है। आत्मा के कारण नहीं है। आत्मा तो सबकी एक है। यह आत्मा बाहर भीतर सब जगह फैली हुई है।। इस आत्मा – परमात्मा को एक जानने के बाद सब कुछ ही जाना हुआ सा लगता है।(मुंडकों उपनिषद 1/1/3)
vaidik dharm --part-7
इस ध्यान योग यज्ञ अभ्यास के साधन में किसी भी प्रकार के विश्वास की आवश्यकता नहीं हो। इसमे स्वयं की अनुभूति प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता है। जब तक स्वयं अनुभूत न करो तब तक उस पर विश्वास न करो। वेद यही ज्ञान देता है। सत्य परमात्मा को जानने के लिए तुम्हें कहीं बाहर धक्के खाने की आवश्यकता नहीं है, बस तुम्हें अपने शरीर के अंदर जाकर लंबे समय तक अभ्यास करना है। मन बुद्धि को एकाग्र करना है। वेदों के अनुसार एक सिद्धांत काम कर रही की जो कुछ तुम इस ब्रह्मांड में देख रहे हो वही सूक्ष्म रूप से तुमहरे शरीर के अंदर भी है। इस तरह तुम ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके सम्पूर्ण प्रकर्ति को वक्ष मे कर सकते हो। सम्पूर्ण जगत को वशीभूत करना और सारी प्रकर्ति पर अधिकार हासिल करना—एक पूर्ण योगी ही कर सकता है। उन पर फिर प्रकर्ति के नियम काम नहीं करते , वे प्रकर्ति के गुणों के पार चले जाते है। वे प्रतिदिन ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके प्रकर्ति के पार जाकर परमात्मा के प्रकाशमय लोक मे जाकर वापिश आते है,। वे इस प्रकीरिया में हररोज मरते है और जीवित होते है। इसीलिए वेद घोषणा करते है की मानना ठीक नहीं, कोर विश्वास नहीं ,स्वयं प्रत्यक्ष करके देखो की वेद मे सत्य लिखा है की नहीं। वेद का धर्म एक विज्ञान है, जब वेद के ऋषियों ने अपनी जानी हुई अनुभूतिया लिख दी, उसे छुपाया नहीं तो तुम क्यों नहीं अनुभूति कर सकते। इसमे गुप्त रखने की कोई बात ही नहीं है, यह तो स्वयं के अभ्यास पर खडा है। कोई लग्न तड़फ से पूछे तो उसे ये मार्ग बताना चाहिए। इसका प्रचार करना आवश्यक है। परमात्मा के मार्ग पूछने वाले को यदि नहीं बतावों गए तो तुम्हें अनेक प्रकार की विपतियों का सामना करना पड़ सकता है। तुम्हें परमात्मा को जानने वाले पिपासूओ की सहायता करनी होगी, यह पुण्य का काम है। जो सांख्य दर्शन के ग्रंथ है, वह भी वेद के ज्ञान पर आधारित है। इसलिए उनका भी साधक को अध्ययन करना चाहिए। साधक को भोजन भी सात्विक करना चाहिए। योगी को अधिक विलास और कठोरता, दोनों का ही त्याग देना चाहिए। उनके लिए उपवश करना या शरीर को किसी प्रकार का कस्ट देना उचित नहीं है।
वैदिक धर्म-पार्ट -5
वेद के अनुसार प्रकर्ति मे दो प्रकार की अभिव्यक्तियाँ है, एक स्थूल और दूसरी सूक्ष्म। सूक्ष्म कारण है और स्थूल कार्य है। स्थूल सहज ही इंद्रियों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है पर सूक्ष्म नहीं, वेद इस सूक्ष्म को ध्यान योग यज्ञ अभ्यास द्वारा पाने को कह रहा है। वेद का मत है की सबका एक ही लक्ष्य है, और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका केवल और केवल एक ही उपाय है की अपने शरीर के अंदर जाकर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करना | ध्यानयोग, राजयोग, सहजयोग, सांख्य योग, ये सब वैदिक धर्म के ज्ञान का ही प्रचार करते है, पांतजल सूत्र भी वेद का ही प्रचार करते है। बल्कि उसका प्रमाणिक ग्रंथ है। इस ध्यानयोग को सीखने के लिए किसी सिद्ध गुरु की आवश्यकता होती है। वैदिक धर्म में समस्त ज्ञान स्वयं की अनुभूति पर आधारित है। जिसको निश्चित विज्ञान भी कहता है। की जब मैंने पाया है तो तुम भी उसी रास्ते पर चल कर प्राप्त कर लो। वे कहते है की तुम स्वयं ध्यान योग यज्ञ का अभ्यास करके देख लो, की यह बात सत्य है की नहीं। और तब उस पर विश्वास करो। यह वैदिक धर्म केवल श्रद्धा और विश्वास पर आधारित नहीं है। इसमे तो स्वयं वेद के ऋषियों की गवाही है, प्रमाण है। उन ऋषियों ने जो सत्य परमात्मा के अनुभव प्राप्त किये है, वे उन्ही का मंत्र के रूप मे प्रचार कर गए है। वे सपस्ट कहते ही की हमारा ये वैदिक धर्म प्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित है। परंतु आज के समय मे ये लगता है की ये अनुभूतिया असंभव है। केवल थोड़े से साधक ही इसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करते है। लेकिन इसमे धर्म की गलती नहीं है, अभ्यास की कमी है। जब एक व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, तो सभी क्यों नहीं कर सकते। वेद के ऋषि कहते है की स्वयं की अनुभूति के बिना कोई धार्मिक नहीं हो सकता। जिस विधा के द्वारा ये अनुभव प्राप्त होते है, उसका नाम है ,”ध्यानयोगयज्ञ” का अपने शरीर के अंदर अभ्यास करना। वेद के ऋषि कहते है की जिन्हे परमात्मा के प्रकाश का अनुभव प्राप्त नहीं हुआ, उन्हे यह कहने का अधिकार नहीं है की परमात्मा है? यदि परमात्मा को मानते हो तो उसका अनुभव प्राप्त करना होगा। अन्यथा विश्वास न करना ही भला होगा। ढोंगी होने से नास्तिक होना अच्छा है।
वेद के अनुसार सब मनुष्य ध्यान योग यज्ञ साधना में क्या चाहते है? केवल और केवल सत्य परमात्मा के प्रकाश का अनुभव करना चाहते है। और जब वह अपने मस्तिसक के आकाश में स्थितः अंतःकरण में समाधिस्थ होकर परमात्मा के प्रकाश को देख लेता है तो वेद उसकी स्थिति का वर्णन इस प्रकार करते है, मुंडकोंउपनिषद 2/2/8 ,”तभी उसके सारे सन्देह दूर होते हो, सारा तमो गुण का जाल छिन्न भिन्न हो जाता है, उसका सारा अहंकार चला जाता है” तब वह परमात्मा का प्रकाश देखने वाला ऋषि अन्य मनुष्यों के लिए घोषणा करता है,” श्वेताशवतउपनिषद 2/5,3/8:,” हे अमृत के पुत्रों! तुम परमात्मा के धाम मे निवास कर सकते हो, उसका रास्ता सुनो,-मैनें अज्ञान रूपी अंधकार से निकल कर परमात्मा के प्रकाश रूपी धाम मे जाने का रास्ता प्राप्त कर लिया है| तो समस्त गुणों का पार है, उसको अपने शरीर के अंदर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके ही जाना जा सकता है, उसके अलावा मुक्ति का और कोई दूसरा उपाय नहीं है।“ इस प्रकर्ति में छुपे चेतन परमात्मा को प्राप्त करने के लिए अपने शरीर के अंदर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करना अति आवश्यक है। इसके लिए शरीर के अंदर दिव्य गुणों वाले देवतावों का मार्ग है। जो रीड के हड्डी के साथ साथ है, जिस पर नीचे मूलाधार चक्र से ऊपर ससत्ररचक्र तक का मार्ग है, जिस पर ध्यान साधना करना है, इसका वर्णन आगे कारेगे। तुम यदि इस देवतावों के मार्ग पर ध्यान योग यज्ञ अभ्यास नहीं करोगे तो तुम कभी धार्मिक नहीं हो सकोगे, कभी भी परमात्मा के प्रकाश देखने का अनुभव नहीं कर सकोगे। वेद के सभी ऋषियों ने इसी मार्ग पर निष्काम, निस्वार्थ होकर अभ्यास किया है और परमात्मा को जाना है और उसका प्रचार भी किया है। इस प्रचार करने में भी उन्होंने मनुष्यों का हित ही सामने रखा है। उसे छोड़ कर उन्मे कोई कामना नहीं थी। वे स्पष्ट कहते थे की आवो और इस देवो के मार्ग मे ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करो, यदि तुम्हें परमात्मा का सत्य ज्ञान नहीं मिले तो कह देना की यह मार्ग कपोल कल्पित है, लेकिन बिना अभ्यास के यह तो मत कहो की कोई कहीं परमात्मा नहीं है। तुम श्रद्धापूर्वक अपने शरीर के अंदर देवो के मार्ग मे नीचे से ऊपर की ओर यात्रा करके अभ्यास तो करो। तभी तो तुम्हें अपने मस्तिसक के आकाश मे सोम ऊर्जा का अनुभव होगा, जिससे तुमहरे इंद्रियों, मन, बुद्धि, प्राणों की गति ठहर कर समाधि प्राप्त होगी, और तुम तीनों गुणों से पार जाकर परमात्मा के प्रकाश वाले धुलोक में निवास करके वापिश इस सांसारिक लोक में आ जावोगे, और फिर बार बार उस परमात्मा के लोक में शांति-आनंद प्राप्त करने जावोगे।
वैदिक धर्म -पार्ट -3
वेद का ऋषि परमात्मा से प्रार्थना करता है,” हे परमात्मन ! मुझे मेरे ध्यान मे सोम ऊर्जा रूपी दिव्य धन दे, जिसके कारण में समाधि में जाकर आपका प्रकाश देख सकु| और इस सोम ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए में नित्य ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करता रहु | और संसार में फल के आशा छोड़ कर नि:स्वार्थ भाव से कर्म करता रहूँ| वेद कहते है की आत्मा दिव्य स्वरूप है, वह केवल पाँच भूतों के बंधनों मे बंध गई है, और उन बंधनों के टूटने पर वह अपने पूर्णत्व को प्राप्त कर लेगी| इस अवस्थ का नाम मुक्ति है, जिसका अर्थ है जन्म-मृतउ से छुटकारा| यह मुक्ति केवल और केवल परमात्मा की कृपा से ही मिलती है| और यह कृपा पवित्र लोगों को प्राप्त होती है, और यह पवित्रता ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करने से मिलती है| क्योंकि ध्यान मे ही वह परमात्मा अपने को प्रकाशित करता है| ध्यान से ही अंतःकरण (मन-बुद्धि-चित्त-अंहकार ) पवित्र और विकसित होता है। पवित्र और विकसित अंतःकरण मे ही पमात्मा के प्रकाश के दर्शन होते है, और साधक शांति और आनंद से भर जाता है| तब उसकी सारी कुटिलता नष्ट हो जाती है, सारे संदेह दूर हो जाते है—-मुंडोकोपनिषद 2/2/8; तब वह प्रकर्ति के नियमों का खिलौना नहीं रह जाता है, यही वैदिक धार्म का मूल बहुत सिद्धांत है, वेद को मानने वाले लोग शब्दों और सिद्धांतों के जल मे जीना नहीं चाहते, वह तो प्रकर्ति के पीछे छिपे परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते है| इसके लिए वह ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके अवश्य देखेगा| तभी उसकी समस्त शंकाय दूर होगी| अतः वेद का ऋषि आत्मा के विषय में ,परमात्मा के विषय में यही सर्वोतम प्रमाण देता है की ,” मैनें आत्मा का दर्शन किया है, मैंने परमात्मा का दर्शन किया है।“ और यही पूर्णत्व की एकमात्र शर्त है। वैदिक धर्म परमात्मा के साक्षात्कार पर जोर देता है, वह मानता नहीं, वह केवल विश्वास कर लेना नहीं, वह देखना चाहता है|
इस प्रकार वैदिक धर्म की सारी साधना ध्यानयोगयज्ञ अभ्यास की है, जिसका लक्ष्य है निरंतर अभ्यास करके पूर्ण बन जाना, दिव्य बन जाना, परमात्मा के प्रकाश को देखना, उसके दर्शन कर लेना और अपने को अपने पिता के समान पूर्ण हो जाना=यही वेद का धर्म है।| जो साधक ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करके अपने को पूर्ण बना लेता है, तब उसके जीवन में एक विशेष शांति-आनंद प्राप्त होता है, जो अलग ही झलकता है| क्योंकि जब आत्मा पूर्ण और निरपेक्ष हो जाती है, तब वह परमात्मा के साथ एक हो जाती है, और वह परमात्मा सतचित्तआनंद है, और आत्मा भी आनद मे रहने लगती है।| अंत मे वेद आत्मा के संबंध मे द्वेत से निकल कर अद्वेत ही मानता है। साधक जब ध्यान योग यज्ञ का अभ्यास करके जब पूर्णता का अनुभव करता है, तब उसकी परमात्मा की खोज समाप्त हो जाती है, वह तो नित्य उसमें रमण करने लगता है| वह तब शरीर की मृतउ को जीवन का अनिवार्य अंग मानने लग जाता है, वह जान जाता है की इस जीव- जगत में परिवर्तन होता रहता है, लेकिन इसके मूल मे एक शाश्वत आधार परमात्मा की चेतना है| एक मात्र परमात्मा ही इनके अंदर प्रवेश करके निवास कर रहा है| इस प्रकार उसे परम अद्वेत की प्राप्ति होती है। वैदिक धर्म इससे आगे नहीं जाता, यही समस्त योग-विज्ञान का चरम लक्ष्य है। वेद के ऋषि की सारी धर्म भावना परमात्मा के प्रकाश को अपने मस्तिष्क के आकाश मे प्रत्यक्ष अनुभूत करना है| इस परमात्मा का साक्षात्कार करके ही वह दिव्य गुणों से भर जाता है, उसका अंतःकरण विकसित और पवित्र हो जाता है|
वैदिक धर्म -भाग -2
वेद हमें यह सिखाते है की इस सृष्टि का न आदि है, न अंत| ऐसा कोई समय कभी भी नहीं था, जब यह सृष्टि नहीं थी| इस तरह स्रष्टा और सृष्टि अर्थात परमात्मा और प्रकर्ति का न कोई आदि है और न अंत, ये दोनों सदा से ही है और रहेगी| परमात्मा नित्य क्रियाशील विधाता है, जिसकी शक्ति से प्रकर्ति से ब्रह्मांड का सर्जन, पालन और प्रलय होता रहता है| फिर बार बार ऐसा होता रहता है| वेदों के अनुसार जीव एक शरीर नहीं है बल्कि उसमें रहने वाली चेतन आत्मा है| ये शरीर मर जाएगा, पर आत्मा कभी मारती नहीं है| अतः वेद का ऋषि कहता है की मैं इस शरीर मे विधमाण हूँ और जब इस शरीर का पतन होगा, तब भी मैं विधमाण रहूँगा ही| मेरा एक अतीत भी है, आत्मा कभी पैदा नहीं होती है।| वह तो सदा सबकी एक समान रहती है, हाँ जो स्थूल शरीर मे सूक्ष्म व कारण शरीर है, वह भी कभी मरता नहीं है, उसे ही जीव कहते है, उसी का विकास होता है, उसी का पूर्णजन्म होता है, एक जन्म मे जितना उसके मस्तिसक रूपी अंतःकरण का विकास हुआ , वही विकास उसे अगले जन्म मे मिल जाता है| अतः वेद के ऋषियों का यह विश्वास है, मानना है की वह आत्मा है, शरीर नहीं, और इस आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि दग्ध नहीं कर साकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सूखा नहीं सकती—गीता 2/23, | वैदिक धर्म का मानना है की आत्मा एक ऐसा वृत है, जिसकी परिधि कहीं नहीं है, किन्तु जिसका केंद्र शरीर मे विधमाण है, और मृत्य का अर्थ है, इस आत्मा के केंद्र का एक शरीर से दूसरे शरीर मे स्थानांतरित हो जाना| यह आत्मा जड़ प्रकीर्त की उपाधियों से बद्ध नहीं है| वह तो स्वरूप से नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त है परंतु किसी कारण से वह अपने को प्रकर्ति जड़ से बंधी हुई पाती है, और अपने को जड़ ही समझती है।
वेदों के अनुसार मनुष्य की आत्मा अनादि है, अर्थात जो सदा से है और सदा रहेगी, और अमर है, पूर्ण है और अनंत है और मृत्यु का अर्थ है—एक शरीर से दूसरे शरीर मे केवल केंद्र-परिवर्तन | वर्तमान मे जो हम है, वह हम पूर्व जन्मों के कर्म के कारण है, और भविष्य मे जो होंगे इस वर्तमान जीवन के कर्मों के अनुसार होंगे| यह जीव जन्म और मरत्यु के चक्र मे लगरत घूमती हुई कभी ऊपर विकास की ओर जाती है और कभी नीचे की ओर जाती है।| यही प्रकर्ति का नियम है| तो फिर क्या कोई आशा नहीं है ,इस नियम से बचने का? इसका उत्तर वेद देता है ,”हे अमृत के पुत्रों! सुनो, तुम उस अनादि पुरातन सनातन परमात्मा को प्राप्त करो, जो समस्त अज्ञान-अंधकार और माया से परे है| केवल उस परमात्मा को जान कर ही तुम मरत्यु के चक्र से छूट सकते हो| दूसरा कोई मार्ग नहीं है। वह परमात्मा अमृत है और तुम भी उसके पुत्र हो , तो तुम भी अमृत हो | आप तो परमात्मा की संतान हो, अमर-आनंद के भागी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो | आप अमर आत्मा है, मुक्त है, आनंदमय और नित्य है| आप जड़ नहीं है, आप शरीर नहीं है | अतः वेद यही घोषणा करते है की इन सब प्रकर्ति के नियमों के मूल मे, प्रकर्ति के अणु अणु मे वही एक परमात्मा की चेतना विराजमान है, जिसके आदेश से वायु चलती है, अग्नि दहकती है, बादल बरसते है और मरत्यु पृथ्वी पर नाचती है—कठो उपनिषद 2/3/3.
वेद मे ऋषियों ने परमात्मा का स्वरूप बताया है,” वह सर्वत्र है, शुद्ध है, निराकार है, सर्वशक्तिमान है, सब पर उसकी पूर्ण दया है।| वह हमारा पिता है, माता है, सखा है, वह सभी शक्तियों का मूल है| उस परमात्मा की उपासना अपने शरीर के अंदर ध्यानयोगयज्ञ अभ्यास द्वारा करनी चाहिए| उस ध्यान में नीचे पड़ी वीर्य ऊर्जा को उधर्वगमन करके देवो के मार्ग से मस्तिसक के आकाश मे ले जाकर अंतःकरण और प्राणों की गति ठहरा कर, समाधिस्थ होकर परमात्मा के प्रकाश के दर्शन करने चाहिए| वेद हमें परमात्मा का ध्यान यज्ञ करने के लिए कहते है, और उसमे ऋषियों की अनुभूतिया का वर्णन किया गया है| वेद का ऋषि कहता है की हमें भौतिकवाद और अध्यात्मिकवाद का समन्वय करना चाहिए| मनुष्य को संसार में कमल के फूल की तरह रहना चाहिए| कमल का फूल पानी मे रहकर भी नहीं भीगता, उसी प्रकार मनुष्य को भी संसार में रहना चाहिए| उसे प्रतिदिन नित्य दोनों संध्यकालों में ध्यान योग यज्ञ का अभ्यास करना चाहिए और उसका अंतःकरण परमात्मा मे लगा रहे और उसके हाथ कर्म करने मे लगे रहें| उसे स्वयं अपनी रोजी रोटी को कमा कर खाना चाहिए, उसे भीख मांग कर नहीं खानी चाहिए, उसे संसार मे पुरुषार्थ करना चाहिए| वेद के ऋषियों का मानना है की भौतिक संसार मे पुरुषार्थ करने से ही सुख-एसवर्य मिलेगा और परमात्मा का ध्यान योग यज्ञ अभ्यास करने से ही शांति-आनंद मिलेगा | और हमें दोनों चाहिए, अतः दोनों मार्गों का समन्वय कर लो| यही मनुष्य के लिए उत्तम है| अकेले अकेले मार्ग पर चलने वाला जीवन मे सफल नहीं होता है, दुख पाता है, और वेद दुखी मनुष्य के पक्ष मे नहीं है, अगर कोई दुखी है तो वह अपने गलत कर्मों के कारण दुखी है।|
42 वी विवाह की वर्षगांठ मनाते हुए।
वैदिक धर्म
भारत वर्ष में वैदिक धर्म का जन्म हुआ है | और उन वेदों मे स्पष्ट लिखा है की ये धर्म मानव मात्र के लिए है।| जो इस धर्म का सिद्ध पुरुष है, उसको ये प्रयास-पुरुषार्थ करना चाहिए की ये धर्म विश्व के सभी मानवों तक जाए | यह वैदिक धर्म एक सच्चा धर्म है, जो परमात्मा से मिलन करवाता है।| धर्म की परिभाषा यदि समझे तो जैसे अग्नि का धर्म जलाना है, कोई भी उसमें हाथ डालेगा तो उसका हाथ जलेगा| इसी तरह पानी का धर्म प्यासे की प्यास बुझाना है, कोई भी पिएगा तो उसकी प्यास बुझेगी| इसी तरह मानव मात्र का एक ही धर्म है की वह अपने शरीर के अंदर जाकर चेतन परमात्मा से मेल करे| अब देखा जाए तो सभी जीव अपने अंदर जाते है, लेकिन सो जाते है, योगी अंदर जा कर जागता रहता है, उसको परमात्मा के प्रकाश के दर्शन हो जाते है, उसके लिए वह धर्म बन जाता है।| अत: यह परमात्मा से मिलन करवाने वाला वैदिक धर्म जितना मेरा है, उतना ही मानव मात्र के लिए भी है।
शिव महिमा स्तोत्र -7,” जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्तोत्रों से निकल कर समुन्द्र मे मिल जाती है, उसी प्रकार हे परमात्मा! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत मे तुझ में ही आकर मिल जाते है।“ फिर योगिराज कृष्ण जी गीता जी में कहते है,अ.4/11,” जो कोई भी परमात्मा की ओर आता है—चाहे किसी प्रकार से हो—परमात्मा उसको प्राप्त होता है, लोग भिन्न भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अंत मे परमात्मा की ओर ही आते है,”| फिर भी वैदिक धर्म नाक की सिद्ध का सरल मार्ग है, सीधा बतलाता है की वो रहा परमात्मा, और यह रहा मार्ग, करले अभ्यास और मिल ले परमात्मा को| तेरा अभ्यास ही तुझे उससे मिलवाएगा| लेकिन इसमे मानने मे एक कठिनाई सदा से रही है, हर कोई अपने मत- संप्रदाय को सच्चा और उत्तम बतलाता है| मैं वैदिक हूँ, मैं अपने मत को ही सम्पूर्ण समझता हूँ, इसी तरह से अन्य मत वाले अपने को सम्पूर्ण मानते है। लेकिन बुद्धिमानों को चाहिए की छोटी- छोटी सीमाओ को तोड़ने का प्रयत्न करे और जो सच लगता है, उसको मानो और उस पर चलने का प्रयत्न करें|
भारत वालों ने वैदिक धर्म वेदों से प्राप्त किया है| और उनकी धारणा है की वेद अनादि और अनंत है। अब लोगों को इस बात पर हंसी आ सकती है की कोई पुस्तक अनादि और अनंत कैसे हो सकती है। किन्तु वेदों का अर्थ कोई पुस्तक है ही नहीं| वेदों का अर्थ है की भिन्न-भिन्न समय मे अनेक व्यक्ति हुए है, जिन्होंने परमात्मा को अपनी अनुभूति से जाना है, उन्होंने उस ज्ञान को संचित कर लिया, तो वेद ऐसे ऋषियों का आध्यात्मिक संचित कोश है जिन्होंने परमात्मा को अपनी साधना से जाना | और वह साधना एक जीवात्मा से दूसरी जीवात्मा में चलती चली आ रही है| क्योंकि उनका मानना है की पूर्व के ऋषियों ने जब परमात्मा का साक्षात दर्शन किया है, तो हम क्यों नहीं कर सकते | जीवात्मा का अपने परम पिता परमात्मा से नैतिक और आध्यात्मिक संबंध है। हम उन परमात्मा का प्रकाश देखने वाले को ऋषि कहते है, वेदों के हर मंत्र का एक ऋषि है, अर्थात ये उसकी अपनी अनुभूति है| इसलिए हम उनको पूर्ण तत्व परमात्मा तक पहुंची हुई आत्मा मान कर आदर मान सम्मान देते है।|
Rajinder Kumar Vedic 23-2-26
गुरु की आवशकता :-
सभी जीवों का उद्देश्य एक ही है की वो पूर्ण परमात्मा को जान कर अंत तक पूर्णता को प्राप्त कर ले| हम वर्तमान जीवन मे जो कुछ भी है, वह हमारे पिछले जीवन के कर्मों और विचारों का फल है।| और हम जो भविष्य मे होंगे अर्थात जब पूर्णजन्म लेगे, वह हमारे इस जीवन के कर्मों और विचारों का फल होगा| इस तरह हम स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माण कर रहे है।| इससे हमें यह न समझ लेना चाहिए की हमे किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जयदातार स्थानों पर हमे अन्य की सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है।| इसी संदर्भ मे जब हम किसी आध्यात्मिक उच्च स्थितः प्राप्त मनुष्य प्राप्त होता है, उससे सहायता प्राप्त होती है, तो हमारा अंतःकरण (मन-बुद्धि-चित्त-अंहकार ) भी विकसित और पवित्र होने लगता है। हमारा आध्यात्मिक जीवन जाग्रत हो जाता है, उसकी उन्नति वेग से होने लगती है और अंत मे वह साधक समाधिस्थ होकर परमात्मा का चेतन प्रकाश देखने लगता है, वह मुक्त अवस्था मे जीने लगता है, उसके बंधन टूटने लगते है।| यह ऐसी शक्ति शास्त्र रूपी पुस्तकों से पढ़ने से नहीं मिल सकती| इस शक्ति की प्राप्ति तो एक अंतःकरण दूसरे अंतःकरण से ही प्राप्त कर सकती है। जो उस ध्यान योग यज्ञ का सिद्ध पुररूष हो ? अन्य किसी से नहीं | इसलिए जीवात्मा की शक्ति को जाग्रत कने के लिए किसी दूसरी जीवात्मा से ही शक्ति का संचार होना चाहिए| इस सारी दुनिया के जोवों मे अंतर समझो| हमारे शास्त्र कहते है की सब जीवों मे एक ही चेतन आत्मा (परमात्मा) स्थितः है, जिससे शक्ति प्राप्त करके उसके तीनों शरीर कार्य करते रहते है| लेकिन सबके अंतःकरण अलग अलग है। किसी का अंतःकरण 2% विकसित है और किसी का अंतःकरण 15% विकसित है | मान लो सब मनुष्यों का अंतःकरण (मस्तिसक) 2% से 15% के बीच विकसित है| और सब आधे अधूरे है, अपने अपने फील्ड के मास्टर है| यदि मुझे परमात्मा की और यात्रा करनी है तो जो मेरे से पहले के इस मार्ग मे चल रहे है उनसे मुझे सहायता लेनी चाहिए | अतः जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा मे शक्ति का संचार होता है, वह गुरु कहलवाता है और जिसकी आत्मा मे यह शक्ति संचारित होती है, उसे शिष्य कहते है|
इसके लिए एक ही शर्त होती है की शक्ति का संचार करने वाला योग्य गुरु हो और उस शक्ति को ग्रहण करने वाला योग्य शिष्य हो? बीज अच्छी भूमि मे गिरे तो ऊपजाऊ होता है, वरना बिना उगे ही रह जाता है,| कठोउपनिषद 1/2/7," यथार्थ धर्म गुरु मे अपूर्व योग्यता होनी चाहिए और उसके शिष्य को भी कुशल होना चाहिए "| जब दोनों ही अद्भुत होते है तभी आध्यात्मिक जागृति होती है, अन्यथा नहीं ? ऐसे ही पुरुष वास्तव मे सच्चे गुरु होते है।| और ऐसे ही व्यक्ति सच्चे शिष्य होते है।| अन्य सब तो अध्यात्म मे खेल मात्र करते है। कहने का अभिप्राय है की इस मार्ग मे लग्न तड़प जुरुरी है। वरगायी और अभ्यासी जुरुरी है।|
09/02/2026
वेद के अनुसार पत्नी कैसी होनी चाहिए ?
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Govt. P. G. College Karnal
Karnal
132001
