11/10/2026
यह केवल एक त्योहार की शुरुआत नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत जागरण का शंखनाद है।
गंगा के पावन तटों पर भोर के तर्पण की सनातन परंपरा से लेकर शाम को ईडन गार्डन्स के ऐतिहासिक प्रांगण तक, बंगाल की माटी ने वह दृश्य देखा जिसकी प्रतीक्षा सदियों से थी। जब हज़ारों ढाकों की गूंज एक साथ उठी, जब लाल-सफेद साड़ियों में सजी मातृशक्ति की 'उलुध्वनि' और शंखनाद से आकाश गुंजायमान हुआ, तो लगा मानो माँ दुर्गा का साक्षात आगमन हो गया हो। आधुनिक भारत के ड्रोन जब आसमान में माँ जगदंबा, श्री गणेश, कार्तिकेय, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती के दिव्य स्वरूप रच रहे थे,तो यह संदेश स्पष्ट था—हमारी सनातन आस्था अब किसी कोने में सिमट कर नहीं, बल्कि गर्व के साथ सीना तानकर खड़ी है।
यह दृश्य अनायास नहीं उभरा है। दशकों तक जिस भूमि पर अपनी ही संस्कृति, अपने ही पर्वों और अपनी ही आस्था को संदेह और तुष्टीकरण के साए में जीने पर मजबूर किया गया, आज उसी बंगाल की चेतना खुलकर सांस ले रही है। जहाँ कभी विसर्जन की तारीखों और जुलूसों पर पहरे लगा दिए जाते थे, आज उसी धरती पर आस्था का यह विराट जनसैलाब गर्व से उद्घोष कर रहा है। केंद्र में मोदी सरकार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संकल्प और सनातन पुनर्जागरण की जो बयार बही है, उसने बंगाली जनमानस के भीतर सोए हुए आत्मसम्मान को जगाया है। यूनेस्को के मंच से दुर्गा पूजा को वैश्विक पहचान दिलाने से लेकर जन-जन के मन से भय मिटाने तक, यह परिवर्तन उसी वैचारिक बदलाव का प्रमाण है।
यह केवल एक उत्सव नहीं, उस सांस्कृतिक विजय का प्रतीक है जिसने साबित कर दिया कि बंगाल की आत्मा को दबाया नहीं जा सकता। माँ आ चुकी हैं, और उनके साथ लौट आया है बंगाल का खोया हुआ गौरव। शुभो महालया!
भाजपा खगड़िया !
सोशल मीडिया जिला संयोजक
• अविनाश केसरी 🙏