10/09/2026
यह तस्वीर शायद लंबे समय तक दिल में एक टीस बनकर रहेगी।
एक माँ की इच्छा थी कि वह अपने बीमार जीवन की अंतिम घड़ियों में अपने बेटे को एक बार देख सके। लेकिन बताया जा रहा है कि जेल में बंद चिन्मय प्रभु अपनी अस्वस्थ माँ से अंतिम बार नहीं मिल सके और बेटे को देखने की आस लिए उनकी माँ इस दुनिया से विदा हो गईं।
माता-पिता को खोने का दर्द शब्दों में नहीं समझाया जा सकता। लेकिन उससे भी अधिक पीड़ादायक यह विचार है कि कोई माँ अपनी अंतिम साँसों तक अपने बेटे की प्रतीक्षा करती रहे और उसकी आखिरी इच्छा अधूरी रह जाए।
राजनीति और विचारधारा अपनी जगह हैं, लेकिन मानवता, संवेदना और निष्पक्ष न्याय उनसे ऊपर होने चाहिए।
सवाल किसी एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था उसके साथ भेदभाव, उत्पीड़न या उसके मौलिक अधिकारों से वंचित किए जाने का आधार बन सकती है?
बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू समुदाय सहित प्रत्येक अल्पसंख्यक नागरिक को वही सुरक्षा, सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय मिलना चाहिए, जिसका अधिकार किसी भी देश के प्रत्येक नागरिक को है।
चिन्मय प्रभु के मामले में भी कानून के अनुसार निष्पक्ष और पारदर्शी न्याय सुनिश्चित होना चाहिए। यदि उनके या किसी अन्य व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर अन्याय या भेदभाव हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच और उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
यह केवल एक बेटे और उसकी माँ की कहानी नहीं है। यह हमारे सामने एक बड़ा मानवीय प्रश्न रखती है—
क्या धर्म और राजनीति की दीवारें इंसानियत से इतनी बड़ी हो सकती हैं कि एक माँ की अंतिम इच्छा भी उनके सामने छोटी पड़ जाए?
भारत सरकार से आग्रह है कि वह बांग्लादेश में हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से ध्यान दे और उचित राजनयिक स्तर पर उनकी सुरक्षा और न्याय की आवाज़ उठाए।
न्याय चिन्मय प्रभु के लिए।
न्याय हर उस व्यक्ति के लिए, जिसके अधिकार उसकी आस्था के कारण प्रभावित होते हैं।
और सबसे बढ़कर—इंसानियत के लिए न्याय।