31/05/2026
शुक्रिया
Hindinama
कुनमुनाहट हिमेल शाम की उपज है
रात में यह कम्पन में बदल जाती है
जिससे बचने के लिए
दिन भर भटकता रहता है धूप का एक टुकड़ा
पोरस छलनी सा मन
चाहता तो है संसार समेटना
पर हर बार अँजुरी में रेत भर जाती है
उसे पता है
रेत और मिट्टी मिलकर रचती हैं
अमूर्त प्रेम की मूरत
जिसकी मुस्कान
धान की बाली को देखते हुए
आयी किसान की मुस्कान सी आशावान होती है।
यतीश कुमार
24/05/2026
माँ क्या आप मुझे टिफिन लाकर दोगी
फूल तोड़ सकती हूँ पर तोड़ूंगी नहीं
एक हाथ दबाने से माँ रस्ते में खो जाती है
माँ पक्का ये दूसरा हाथ ही है न
गया था वह हुनर बेचने आज तक नहीं लौटा
एक अनकही कहानी का अंतहीन हिस्सा
जाने कितनी बातें हैं जो आपके जेहन में पैठ जायेंगी,
मन घेर जाएंगी।
पेड़ा सिर्फ एक मिठाई नहीं है इस फिल्म में
बेटे के पटना जाने के बाद उसका मफलर जिस तरह से माँ लपेटती है वह मन को छू जाता है।
सत्तू है
बहुत है
प्रेम के भीतर सच्चाई की खिड़की को खोलता संवाद ।
एक मच्छरदानी का चेन लगाना कितना सुरक्षित और सुकून दायी महसूस करवा सकता है।
दूसरे दृश्य में साथ- साथ मच्छरदानी लगाना साथ का विस्तार दिखता है।
इन दृश्यों से भाव का कितना सुंदर विस्तार देखने को मिलता है।
कितने सारे रंग पर एक भी काला रंग नहीं।
कितना अच्छा बोलती हो - बोला करो
एक संवाद
और कितने व्यापक अर्थ
फिल्म के संवाद को कथा के जुड़ाव के साथ लिखा गया है।
"मजदूर नहीं है वह"
माँ की यह चीत्कार में उसका आत्मविश्वास और संबल भी छिपा है। उसे सही और गलत का पूरा ज्ञान भी है।
चूक को उसे सुधारना भी आता है।
फिल्म में रह- रह कर माँ का स्वाभिमान का पक्ष उभरता है। भीतर का कलाकार( चित्रकार) उसका असली साथी है।
ताड़ के पत्ते से पोखर साफ करने का संदेश का रूपक भी निर्देशक के अंतर्मन की दृष्टि को दर्शाता है। पर्यावरण वातावरण और बच्चे का साथ।
ये दृश्य इन सब का मिश्रित दृश्य है।
बेनू का सिंगापुर
गाँव से जाना
गाँव की कई सच्ची कहानियों का प्रतिधिनित्व कर रहा है।
भावनाओं की चाशनी में लपेटकर बच्चों की तस्करी का काम आज भी जारी है इस यथार्थ के उसी छिछले रूप में दिखाया गया है।
लोटस ब्लूम दरअसल मन का खिलना
भीतर के स्वाभिमान को अपना संबल बनाना है
फिल्म में कला का जीवन में कितना महत्व है दिखलाया गया है पर उसके दूसरे पक्ष यानी पति का शहर जाना और फिर न लौटने के पक्ष को भी दिखलाया गया है।
पेंटिंग करते हुए बिना संवाद उसके गिरे हुए सॉल को यूँ उठाना अबोले प्रेम को कितने सुंदर ढंग से चित्रण करता है। बाद का यथार्थ भले चौंकाने वाला है पर उन पलों में तो प्रेम की परिभाषा गढ़ रहे दृश्य हैं।
इस परिवेश में रहे लोगों को खासकर यह फिल्म उनके अपने समय में जरूर ले जाएगी। मुझे तो ले गई। मेरे अस्सी के दशक में।
एक माँ के संघर्ष के लोक में।
प्रेम के पीले रंग में रंगने,
सरस्वती और वेणु की दुनिया में एक अबोला प्रेम शक्ल बदल कर यथार्थ के सबसे पथरीले जमीन पर ला पटकता है। यह सर्वथा अनएक्सपेक्टेड आशा से परे था।
एक्टिंग, निर्देशन, संगीत, गीत सब में परिपक्वता की झलक मिलेगी। बहुत दिल से जब कोई काम किया जाय तो एक अजीब अलग सा संतोष लिप्त हो उठता है, वैसा ही इस फिल्म के साथ हुआ है।
कोलकाता में जब इस फिल्म का प्रीमियर हुआ था तब ही इसे मुझे देखना था पर उस दिन कहीं और रह गया । आज सपरिवार देखा और अजब गजब की संतुष्टि मिली देखते हुए।
एक बार आप सभी लोग इस फिल्म को जरूर देखें।
Asmita Sharma और पूरे टीम को सलाम
17/05/2026
एक दिन Mohsin Khan sir से बात हो रही थी। उन्होंने किताब पढ़ते ही बात की और कई बातों पर उनकी राय- प्रतिक्रिया मिली। मेरे जैसे नए लेखक के लिए यह बहुत बड़ी बात थी। मोहसिन खान सर ने बहुत ध्यान से Syed Mohd Irfan sir के ऑडियो बुक वर्जन लिस्टन विथ इरफान पर इसे सुना भी था।
अगली बार उनका जब फोन आया तो खुर्शीद आलम सर से उनकी सारी बातें हो चुकी थी।
अब खुर्शीद आलम सर इस किताब को पढ़ रहे थे और यूँ पढ़ रहे थे जैसे मैने खुद एडिट करते हुए भी नहीं पढ़ा होगा। देशज शब्दों के सही मायने हो या किसी खास घटना पर मेरी प्रतिक्रिया। अनुवाद का काम कितनी गंभीरता से शुरू हो चुका था इसका अंदाजा लग चुका था मुझे।
तीसरी बार जब मोहसिन खान साहब का फोन आया तो यह बताने कि यह किताब अब Rekhta से आ रही है।
मैं हर बार सोचता मैं अभी तक मोहसिन खान sir से एक बार नहीं मिला और यह आज भी सच है बहुत चाहने पर भी अपने महबूब लेखक से नहीं मिल पाया हूँ फिर भी अग्रज कथाकार किताब के माध्यम से मुझ जैसे आगंतुक की किताब के अनुवाद पर इतना एकाग्र चिंतित क्यों है।
साहित्य हमें बेहतर इंसान बनाता है मिलवाता है इस बात पर मुहर लग चुकी थी।
मैं आप दोनों अग्रज खुर्शीद आलम sir और मोहसिन खान sir को दंडवत प्रणाम करता हूँ।
अल्लाह मियां का कारखाना यूँ नहीं रचा आपने सर ।
अमेजन का लिंक कमेंट बॉक्स में है।
इस अनूदित किताब को मैं आपको समर्पित करता हूँ sir 🙏🙏
10/05/2026
हर आदमी के पास
उसकी अपनी नदी
उसका अपना वसन्त
और अपना पतझर है
सच यही है, अकेला होना
निर्वाण का अन्तिम रास्ता है
प्रकृति साथ चलती है
अन्तिम अरण्य तक
इस रास्ते में उसका हमसफ़र
उसकी अपनी नींद है
ईश्वर का पहला काम है नींद की रक्षा
और ईश्वर हर बार हार जाता है
उनींदे निष्प्राण सम्बन्ध
रह-रह कर क़ब्र से उठ आ मिलते हैं
क़ब्र में लेटते हुए यह जान पाया
कि मेरा अकेला होना भी मेरा भ्रम ही है
(आविर्भाव से)
08/05/2026
यश-अपयश का अंतर्विरोध
अब पहले सा नहीं रहा …
प्रमथ्यु का गिद्ध थक चुका है बेतरह
गिलगमेश बुद्ध से मिलकर ख़ुद को ढूंढ रहा है
अंधे अदीब को सब साफ-साफ दिख रहा है
कबीर पोखरण में बौद्ध वृक्ष लगा रहा है
और आदम मोक्ष की बजाए
मृत्यु के अन्वेषण में
ज़्यादा दिलचस्पी ले रहा है
जरायमान का फैलाव इस कदर है
कि नारा दीवारें लगा रही हैं
आज हौसलों से नहीं
इश्तेहार से लड़े जा रहे हैं युद्ध
युद्ध के बाहर और भीतर
पराजय और दुर्भाग्य
रेल की दो पटरियों-से
साथ-साथ चल रहे हैं
इन सभी दृश्यों के बीच
सवाल अब भी आँखे तरेरे खड़ा है
कि और कितने पाकिस्तान ???
(आविर्भाव से)
06/05/2026
मन्नतों की टकराहट
कोसनों की लंबी फ़ेहरिस्त
और मन्नतों के आपसी जंग का बोझ लिए
समय थका मारा घूम रहा है
चीथड़ों में यह पयाम है
कि युगों से यात्रा में हैं लोग
फिर भी
सही जगह नहीं पहुँच पाते
आँसुओं की नमी से
मंदिर की दीवार मसक रही है
अरमान के कमल
बिना पानी के सूख रहे हैं
सोग अब शब्द भर नहीं है
सुमिरनी की लड़ी बन
जँगली बेलों सी फैल रही है
असली जंगल दफ्न हो रहें हैं
इंसानों को दफ्न करने के लिए
यह हतक अब मुझसे देखी नहीं जा रही
प्रार्थना है
कि या ख़ुदा कम से कम
मन्नतों की टकराहट तो बंद कर
28/04/2026
हिम्मत के दरकते हिमालय को लीपने के लिए
नदी की जो मिट्टी थी
वो अब पोखर में बदल गयी है
और पोखर की माटी से मूर्तियां नहीं बनती
नदी का सुरीलापन
भीतर बजता है और कहता है
मूर्ति की दरार वही भर पाता है
जिसे मिट्टी से बातें करनी आती है
मरगिल्ला मन कमबख्त दरकता भी नहीं
लोंदा बन जाता है
अशरीरी होने की इच्छा का रेत
मूर्तियों की किरकिरी बन जाता है
खंडन और मंडन के बीच
जिंदगी रोज थोड़ा-थोड़ा खुरचती है
इसे ज्यादा मरम्मत करने की कोशिश में
घर, घर नहीं, ओसारा बनता जा रहा है
07/04/2026
दाल में पानी की मात्रा
निर्धारित कर रहा है
गरीबी की सीमा
और लोग नमकीन पानी में दाल पका रहे हैं
घुटना फूटने और टूटने के अंतर को
पहाड़ी डोली के कहार
ज्यादा बेहतर बता सकते हैं
वो यह भी बेहतर जानते हैं
कि चढ़ाई से ज्यादा मुश्किल है
सुरक्षित उतर आना
भीतर की आग को टटोल कर
कोई यूँ बुझा देता है
जैसे लिट्टी बनते वक़्त आंच तेज होने से
गोयठा पटक देता है
खाली घोसलें में कराहती है
डैना टूटी गौरैया
धर्म घोंसला है
और मन गौरैया
21/12/2025
एक झिर्री से ताकती हैं
दो नज़रें आर-पार
एक की आँखें पारदर्शी
और दूसरी दर्पणी
मनाता हूँ कि आँखों से गुज़रते हुए
जिस्म पारदर्शी हो जाए और
सारे लबादे एक-एक कर उतार दूँ