14/01/2024
राजकमल प्रकाशन से आज ही आई है ये सौग़ात 🙂🙂
कामये दुःख ताप्तानाँ प्राणिनांमर्ति?
14/01/2024
राजकमल प्रकाशन से आज ही आई है ये सौग़ात 🙂🙂
चुप की साज़िश / अमृता प्रीतम
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रात ऊँघ रही है...
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।
चोरों के निशान —
हर देश के हर शहर की
हर सड़क पर बैठे हैं
पर कोई आँख देखती नहीं,
न चौंकती है।
सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह
एक ज़ंजीर से बँधी
किसी वक़्त किसी की
कोई नज़्म भौंकती है।
10/03/2022
05/11/2018
पैंसठ वर्षीया इला बनर्जी हृदय-रोग से कई सालों से पीड़ित हैं , लेकिन इधर कुछ दिनों से वे अपनी दवाओं के प्रति लापरवाह हो गयी हैं। नतीजन कुछ समय से उन्हें एक अजीब लक्षण से जूझना पड़ रहा है और इसी कारण उनकी नींद दूभर हो गयी है।
इला लेटने पर ढंग से साँस नहीं ले पातीं ; उनका दम फूलने लगता है। नतीजन उनकी नींद बार-बार खुल जाती है। इसी वजह से वे सिर के नीचे तकिया लगाकर सोने लगीं हैं। लेकिन अब हालत यह है कि दो या तीन तकिया लगाने के बाद भी साँस में कुछ समस्या रहती ही है। न जाने यह दिक्कत क्यों हुई ? पहले तो यह न थी।
डॉक्टर इला से सख़्त भाषा में कहते हैं कि उन्होंने अपने-आप हृदय की दवाएँ छोड़कर बड़ी गलती की है। वे कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर की पुरानी मरीज़ हैं और अतिरिक्त काम करने पर उनकी साँस फूलने लगती है। इधर कुछ दिनों से --- जबसे उन्होंने दवाएँ बन्द कर दी हैं --- साँस फूलने की यह समस्या काफ़ी बढ़ गयी है।
साँस फूलने को डॉक्टर डिस्निया कहते हैं। लेटने पर साँस लेने में हो रही तकलीफ़ ऑर्थोप्निया कहलाती है। ऑर्थोप्निया के रोगियों को बैठने पर राहत मिलती है और उनकी साँस काफ़ी-कुछ सामान्य हो जाती है। कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर इस ऑर्थोप्निया के कारणों में से एक प्रमुख कारण है। दमा ( ब्रॉन्कियल ऐज़्मा ) , ब्रॉन्काइटिस , पैनिक अटैक व अन्य कई रोगों में भी यह ख़ास लक्षण देखा जा सकता है।
इला डॉक्टर से ऑर्थोप्निया को थोड़ा और समझना चाहती हैं। उन्हें बताया जाता है कि हमारे शरीर का अशुद्ध कार्बनडायऑक्साइड-युक्त खून शिराओं द्वारा हृदय के दाहिने हिस्से में लौटता है। यहाँ से इसे फेफड़ों में हृदय भेजता है ताकि कार्बनडायऑक्साइड इससे निकल सके और ऑक्सीजन इसमें आ सके। फिर यह ऑक्सीजन-युक्त ख़ून हृदय के बाएँ हिस्से में लौटता है और यहाँ से हृदय इसे पूरे शरीर में पम्प करता है।
इला का हृदय ( विशेषकर उसका बायाँ हिस्सा ) बीमार और कमज़ोर है। इस कारण हृदय का बायाँ हिस्सा अधिक ख़ून को समेट कर शरीर में पम्प करने में अक्षम है। खड़े होने पर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण कम ख़ून हृदय के दाहिने हिस्से में लौट पाता है। लेकिन जब इला लेट जाती हैं , तब अधिक मात्रा में ख़ून हृदय के दाहिने हिस्से से लौटकर फेफड़ों की रक्तवाहिनियों में एकत्र हो जाता है। यहाँ ख़ून से द्रव रिसकर फेफड़ों में जमा भी हो सकता है , जिसे डॉक्टर पल्मोनरी इडिमा कहते हैं।
डॉक्टर का कहना है कि यह ख़तरनाक लक्षणों की ओर इशारा है। जिन रोगियों का हृदय कमज़ोर हो , उन्हें दवाएँ डॉक्टर के निर्देश के अनुसार ढंग से लेनी चाहिए और उन्हें कदापि बन्द नहीं करना चाहिए। इला के फेफड़ों की रक्तवाहिनियों में जमा हो रहा अतिरिक्त ख़ून व उस ख़ून से फेफड़ों में रिस कर एकत्रित हो रहा द्रव-रूपी पल्मोनरी इडिमा कदापि हलके में लेने वाली बातें नहीं हैं और बड़ी मुसीबत बन सकती हैं।
इला को अपने स्वास्थ्य के प्रति पूरी तरह सचेत हो जाना चाहिए। रात को लेटने पर साँस फूलने की यह समस्या मामूली मामला नहीं है।
05/10/2018
बीमार दिमाग़ होगा , तो नहीं पचेगा खाना !
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रूपमती को लगता है कि डॉक्टर उसकी बीमारी के बारे में सुनते नहीं। सुनते भी हैं , तो वे उसे समझते नहीं। पिछले कई सालों से वे न जाने कितने ही डॉक्टरों को दिखाती आ रही हैं , लेकिन फ़ायदा आधा-अधूरा ही होता है। आज इसलिए वे गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजिस्ट से जानना चाहती हैं कि उन्हें दरअसल बीमारी कौन सी है।
रूपमती को बताया जाता है कि उन्हें इरिटेबल बावल सिण्ड्रोम नाम का रोग है। इसी के कारण उन्हें पेट में रह-रह कर हलका दर्द , ऐंठन , मरोड़ की समस्याएँ रहती आयी हैं। साथ ही शौच के बाद उन्हें लगता है कि पेट पूरी तरह से खारिज नहीं हो रहा है। कभी कब्ज़ तो कभी हल्के दस्त होते रहते हैं। इन सब समस्याओं के बाद भी उनकी सभी जाँचें सामान्य आती हैं। इसी कारण उन्हें लगता है कि डॉक्टर या आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान उनकी समस्याओं को समझने और उनका निदान-उपचार करने में विफल है।
रूपमती को जो बीमारी है , उसे समझने के लिए हमें यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि अन्य सभी अंगों की तरह पाचन-तन्त्र से तार मस्तिष्क से जुड़े हैं। मस्तिष्क के निकलने वाली ढेरों तन्त्रिकाएँ भोजन के पाचन और आमाशय-आँतों के चालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खाना कैसे पचता है और किस तरह से वह मल बन कर गुदा से बाहर आ जाता है : ये सभी गतिविधियाँ केवल पाचन-तन्त्र अकेले नहीं तय करता। इसके लिए उसे दिमाग़ का भरपूर सहयोग चाहिए होता है। इस मस्तिष्क-पाचन-तन्त्र के अक्ष ( ब्रेन-गट-एक्सिस ) की इरिटेबल बावल सिण्ड्रोम में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है , जिसे जानना सभी के लिए ज़रूरी है। आसान भाषा में यों समझें कि रूपमती की आँतें झुँझलायी हुई हैं। वे इरिटेटेड हैं। कई बार उनकी यह झुँझलाहट ऊपर से मस्तिष्क द्वारा उन पर थोपी जा रही है।
इरिटेबल बावल सिण्ड्रोम के मरीज़ों में चिन्ता , बेचैनी ( एंग्जायटी ) , अवसाद ( डिप्रेशन ) और अनिद्रा जैसे लक्षण बहुत देखने को मिलते हैं। यक़ीनन इन लोगों का मस्तिष्क अस्वस्थ होता है और इसी का प्रभाव इनके पाचन-तन्त्र पर पड़ने लगता है। इसी लिए इनमें ये लक्षण पैदा होते हैं , जिन्हें ये डॉक्टर को दिखाने पहुँचते हैं।
इरिटेबल बावल सिण्ड्रोम के रोगी को यह बात भली भाँति समझनी होगी कि इस बीमारी में केवल पेट की दवाएँ खा लेने भर से रोग से मुक्ति नहीं मिलने वाली। बल्कि रोगी को अपनी मानसिक समस्याओं से निजात पाने के लिए व्यवहार और जीवनशैली में परिवर्तन करने की बड़ी ज़रूरत होती है। साथ ही कई बार मनोरोग चिकित्सक के सहयोग के बाद ही इन रोगियों का बेहतर उपचार गैस्ट्रोएन्टेरोलॉजिस्ट कर पाते हैं।
रूपमती को स्वास्थ्य के लिए केवल दवाओं पर निर्भर नहीं रहना होगा। उन्हें यह भी समझना होगा कि केवल पेट के उपचार से इस बीमारी को परास्त नहीं किया जा सकता। उन्हें मस्तिष्क को स्वस्थ करने के लिए पहल करनी होगी और आवश्यकता पड़ने पर इसके लिए दवाओं का सेवन भी करना पड़ सकता है। तभी मस्तिष्क से निकलते तारों को दुरुस्त करके पाचन को ठीक और सुचारु किया जा सकेगा और वे इरिटेबल बावल सिण्ड्रोम से राहत पा सकेंगी।
ओटाइटिस मीडिया कान के बीच वाले हिस्से यानी मध्य कर्ण ( मिडिल इयर ) का संक्रमण है। मध्य कर्ण और नाक के पिछले हिस्से नेज़ोफैरिंक्स को एक नली जोड़ा करती है , जिसे यूस्टेचियन ट्यूब के नाम से जाना जाता है। एलर्जी-रोगों एवं वायरल बुखारों में यह यूस्टेचियन ट्यूब सूज कर कई बार बन्द हो जाती है , जिससे मध्य कर्ण के भीतर एक नेगेटिव दबाव बनने से उसमें द्रव जमा हो जाता है। फिर इस द्रव में कीटाणुओं की वृद्धि हो जाने से रोगी में वैसे ही लक्षण पैदा हो जाते हैं , जैसे गोपिका में हुए हैं।
गोपिका कक्षा दो में पढ़ती है लेकिन पिछले चार दिनों से बीमार होने के कारण स्कूल नहीं जा सकी है। उसे तेज़ बुख़ार के साथ कान में दर्द की शिकायत हुई और पापा उसे नाक-कान-गले के विशेषज्ञ के पास ले गये। वहाँ कान को जाँचने के बाद उन्होंने बताया कि गोपिका को एक्यूट ओटाइटिस मीडिया नामक संक्रमण हो गया है।
मनुष्य के कान हमें जितने दिखायी देते हैं , इतने ही नहीं होते। जितना हिस्सा बाहर नज़र आता है , उसे बाह्य कर्ण या पिन्ना कहा जाता है जिसका काम ध्वनि-तरंगों को समेटकर भीतर भेजना है। पिन्ना द्वारा समेटी गयी ध्वनि-तरंगें इयर-कैनाल से होती हुई कान के परदे से टकराती हैं। इस परदे के पीछे का हिस्सा मध्य कर्ण कहलाता है , जिसमें तीन नन्हीं हड्डियों की झंकार से ध्वनि-तरंगों का सन्देश आगे आन्तरिक कर्ण से होते हुए फिर मस्तिष्क को चला जाता है।
ओटाइटिस मीडिया कान के बीच वाले हिस्से यानी मध्य कर्ण ( मिडिल इयर ) का संक्रमण है। मध्य कर्ण और नाक के पिछले हिस्से नेज़ोफैरिंक्स को एक नली जोड़ा करती है , जिसे यूस्टेचियन ट्यूब के नाम से जाना जाता है। एलर्जी-रोगों एवं वायरल बुखारों में यह यूस्टेचियन ट्यूब सूज कर कई बार बन्द हो जाती है , जिससे मध्य कर्ण के भीतर एक नेगेटिव दबाव बनने से उसमें द्रव जमा हो जाता है। फिर इस द्रव में कीटाणुओं की वृद्धि हो जाने से रोगी में वैसे ही लक्षण पैदा हो जाते हैं , जैसे गोपिका में हुए हैं।
एक्यूट ओटाइटिस मीडिया अमूमन शिशुओं एवं छोटे बच्चों में देखने को मिलता है , जहाँ कान में तेज़ दर्द के साथ बुख़ार , नींद न आना या रोते रहना जैसे लक्षण भी ( शिशुओं में ) देखने को मिलते हैं। जिन घरों में धूमपान किया जाता है या जहाँ बच्चों को धुएँ के बीच रहना पड़ता है , वहाँ भी यह रोग अधिक देखने को मिलता है। आधुनिक रहन-सहन में डेकेयर में बच्चों को छोड़ने से भी इस रोग की प्रचलन-दर में वृद्धि देखी जाती है।
कान में अचानक उठा तेज़ दर्द , बुख़ार , अनिद्रा व चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण मिलने पर ईएनटी-विशेषज्ञ से तुरन्त सम्पर्क करना चाहिए। कई बार एक्यूट ओटाइटिस मीडिया में समय से उपचार न मिलने पर कान में कुछ समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। आगे हम ओटाइटिस मीडिया के सन्दर्भ में कई अन्य बातों पर चर्चा जारी रखेंगे।
- स्कंद शुक्ला की फेसबुक वाल से
जानिए अज्ञात कारणों से चल रहे लम्बे बुखार को !
राहुल को पिछले दो महीनों से बुख़ार आ रहा है। साथ में कोई अन्य लक्षण नहीं। केवल हल्का बुख़ार। जिसके साथ उसके वज़न में थोड़ी गिरावट आयी है। भूख भी थोड़ी कम हुई है। उसने इस समस्या के लिए चार डॉक्टरों को दिखाया है। लेकिन तमाम जाँचों के बावजूद कोई नतीजा नहीं निकल सका है। किसी जाँच में किसी भी अंग में कोई रोग-जैसी बात सामने नहीं आयी है। ऐसे में लगातार चल रहे बुख़ार के लिए निदान और उपचार को कैसे दिशा दी जाए ?
एक विशेषज्ञ ने राहुल को एंटीट्यूबर्कूलर थेरेपी यानी तपेदिक के लिए दवाएँ शुरू की हैं। ऐसे में राहुल यह जानना चाहता है कि इस तरह के लक्षण के लिए उसे डॉक्टर टीबी की ये दवाएँ क्यों दे रहे हैं। क्या कोई और जाँच नहीं , जिससे बुख़ार के सही कारण का ठीक-ठीक निर्णय किया जा सके ?
डॉक्टर राहुल को समझाते हैं कि जितनी भी जाँचें सम्भव एवं आवश्यक थीं , करायी जा चुकी हैं। इस तरह के रोगी की स्थिति को एफयूओ ( फ़ीवर ऑफ़ अननोन ओरिजिन यानी अज्ञात स्रोत का बुख़ार ) कहा जाता है। ऐसे में टीबी की दवाओं को शुरू करने के निर्णय के पीछे भी कुछ ख़ास वजह है। इस तरह से आरम्भ किये गये इलाज --- जिसे इम्पिरिकल एंटीट्यूबर्कूलर थेरेपी कहते हैं --- से भी राहुल के रोग की पुष्टि की जा सकती है। अगर उसे टीबी होगी , तो उसका बुख़ार कुछ हफ़्तों में ठीक हो जाएगा। इसके अलावा इस मामले में आगे बढ़ने का और कोई चारा नहीं है।
राहुल तपेदिक ( टीबी ) के विषय में और जानना चाहता है। डॉक्टर उसे बताते हैं कि यह रोग शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। आम तौर पर लोग सोचते हैं कि केवल फेफड़ों या गाँठों में ही यह रोग होता है। लेकिन त्वचा-हड्डियों-आँतों-आँखों-मस्तिष्क-इत्यादि तमाम अन्दरूनी अंगों को भी यह अपनी चपेट में ले सकता है। ऐसे में कई बार बुख़ार के सिवा रोगी में अन्य कोई लक्षण नहीं होते। भारत में चूँकि टीबी के रोगी बहुत मिलते हैं , इसलिए ऐसे रोगियों की भी आबादी बड़ी होती है , जो डॉक्टरों के पास बुख़ार और केवल बुख़ार लेकर आते हैं।
भारत में तपेदिक का बहुतायत में मिलना और राहुल-जैसे रोगियों के मामलों में बुख़ार के अलावा लक्षण का न पाया जाना व जाँचों का बार-बार सामान्य आना , डॉक्टर को टीबी के उपचार की तरफ बढ़ने की वजह है। ऐसे में कुछ ही हफ़्तों में राहुल इस उपचार के सम्भावित लाभ के बारे में बता पाएगा। उसे ठीक तरह से दवाएँ लेनी होंगी और अपने लक्षण पर नज़र रखनी होगी। बेहतर होगा कि वह बुख़ार का एक चार्ट बनाए ताकि उसपर नज़र रख सके। यदि कोई नये लक्षण बीच में पैदा हों , तो उन्हें डॉक्टर को तुरन्त बताए और मिले।
- स्कंद शुक्ला की वाल से
01/07/2016