अभिषेक तिवारी

अभिषेक तिवारी

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जनतासेवक
भारतीय जनता पार्टी, उत्तर प्रदेश,
भारत वर्ष

व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करने के लिए की गयी राजनीति हमेशा ख़तरनाक होती हैं, समाज हित ही राजनीति का उद्देश्य होना चाहिए।

19/10/2022



बापू से राजघाट के बग़ल में “ठेका” खोलने की इजाज़त माँगते हुए दिल्ली के “ठेकेदार” 😂

आप एक बात हमेशा याद रखियेगा कि अगर कोई बिजली या किसी तरह की फ्री 🆓 सेवा दे रहा है तो आपको समझना होगा कि कहीं न कहीं से भरपाई करेगें जरुर, गरीबों के फ्री राशन की तुलना मत करें इस से!

श्री लंका का हाल बहुत ज्यादा बुरा है।।

🆓 फ्री के लालच से बाहर आईए।।

Narendra Modi
Amit Shah

Swatantra Dev Singh
Sunil Bansal
Brajesh Pathak

13/04/2022



देश के वीर सपूतों को जितना प्रेम सम्मान दिया जाए वो कम है।।

जवान अपने देश और अपने देशवासियों के लिए हर मुश्किल मैं खड़े रहते हैं । हृदय से नतमस्तक हूं जवानो के लिए..

जय हिंद 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

अभिषेक तिवारी

13/04/2022



13 अप्रैल
*महान सेनानी ोरावर_सिंह जी के जन्म दिवस पर शत.शत नमन करते हैं 🙏🙏

लद्दाख जिस वीर सेनानी के कारण आज भारत में है, उनका नाम है जनरल जोरावर सिंह। 13 अप्रैल, 1786 को इनका जन्म ग्राम अनसरा (जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश) में ठाकुर हरजे सिंह के घर में हुआ था।

ठाकुर हरजे सिंह बिलासपुर की कहलूर रियासत में काम करते थे। अतः गाँव की खेती उनके भाई देखते थे। 16 वर्ष की अवस्था में जोरावर का अपने चाचा से विवाद हो गया। अतः ये घर छोड़कर हरिद्वार, लाहौर और फिर जम्मू पहुँचकर महाराजा गुलाब सिंह की डोगरा सेना में भर्ती हो गये।

राजा ने इनके सैन्य कौशल से प्रभावित होकर कुछ समय में ही इन्हें सेनापति बना दिया। वे अपनी विजय पताका लद्दाख और बाल्टिस्तान तक फहराना चाहते थे। अतः जोरावर सिंह ने सैनिकों को कठिन परिस्थितियों के लिए प्रशिक्षित किया और लेह की ओर कूच कर दिया। किश्तवाड़ के मेहता बस्तीराम के रूप में इन्हें एक अच्छा सलाहकार मिल गया।

यह समाचार सुनकर सुरू के तट पर वकारसी ने 200 सैनिकों के साथ तथा दोरजी नामग्याल ने 5,000 सैनिकों के साथ सुनकू में मुकाबला किया; पर हारकर वे रूसी दर्रे (जोत) से होकर शोरगुल की ओर भाग गये। डोगरा सेना लेह में घुस गयी। इस प्रकार लद्दाख जम्मू राज्य के अधीन हो गया।

अब जोरावर ने बाल्टिस्तान पर हमला किया। लद्दाखी सैनिक भी अब उनके साथ थे। अहमदशाह ने जब देखा कि उसके सैनिक बुरी तरह कट रहे हैं, तो उसे सन्धि करनी पड़ी। जोरावर ने उसके बेटे को गद्दी पर बैठाकर 7,000 रु. वार्षिक जुर्माने का फैसला कराया। अब उन्होंने तिब्बत की ओर कूच किया। हानले और ताशी गांग को पारकर वे आगे बढ़ गये।

अब तक जोरावर सिंह और उनकी विजयी सेना का नाम इतना फैल चुका था कि रूडोक तथा गाटो ने बिना युद्ध किये हथियार डाल दिये। अब ये लोग मानसरोवर के पार तीर्थपुरी पहुँच गये। 8,000 तिब्बती सैनिकों ने परखा में मुकाबला किया, पर वे पराजित हुए। जोरावर सिंह तिब्बत, भारत तथा नेपाल के संगम स्थल तकलाकोट तक जा पहुँचे। वहाँ का प्रबन्ध उन्होंने मेहता बस्तीराम को सौंपा तथा वापस तीर्थपुरी आ गये।

इसी बीच जनरल छातर की कमान में दस हजार तिब्बती सैनिकों की 300 डोगरा सैनिकों से मुठभेड़ हुई। राक्षसताल के पास वे सब मारे गये। जोरावर सिंह ने गुलामखान तथा नोनो के नेतृत्व में सैनिक भेजे; पर वे सब भी मारे गये।

अब वीर जोरावर सिंह स्वयं आगे बढ़े। वे तकलाकोट को युद्ध का केन्द्र बनाना चाहते थे; पर तिब्बतियों की विशाल सेना ने 10 दिसम्बर, 1841 को टोयो में इन्हें घेर लिया। दिसम्बर की भीषण बर्फीली ठण्ड में तीन दिन तक घमासान युद्ध चला।

12 दिसम्बर को जोरावर सिंह को गोली लगी और वे घोड़े से गिर पड़े। घोड़े से गिरने के बाद ज़ोरावर सिंह ने अपनी तलवार निकली और उससे दुश्मनो पर टूट पड़े , जो उनूंके नज़दीक आया वो स्वर्ण दीथारता गया इस बीच एक तिब्बती सैनिक ने उनकी पीठ पर भाले से वार किया और वह भाला जनरल साहब की छाती के आर पार हो गया , ये देख सभी डोगरा सेना तितर-बितर हो गयी। तिब्बती सैनिकों में जोरावर सिंह का इतना भय था कि उनके शव को स्पर्श करने का भी वे साहस नहीं कर पा रहे थे। बाद में उनके अवशेषों को चुनकर एक स्तूप बना दिया गया।

‘सिंह छोतरन’ नामक यह खंडित स्तूप आज भी टोयो में देखा जा सकता है। तिब्बती इसकी पूजा करते हैं। इस प्रकार जोरावर सिंह ने भारत की विजय पताका भारत से बाहर तिब्बत और बाल्टिस्तान तक फहरायी।
#जनरल ोरावर_सिंह

13/04/2022



ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पर, जिसने अपना जीवन काटा बढ़ची और कटारों पर, ये प्रताप का वचन पला है आजादी के नारों पर, कूद गई थीं यहां हजारों पदमिनियां अंगारों पर...

भूलना मत इस देश के वीरों का बलिदान!

#जयहिंद 💐🙏🇮🇳🚩

1971 भारत पाक युद्ध मे अदम्य साहस का परिचय देने वाले महावीर चक्र से सम्मानित संत लेफ्टिनेंट जनरल हणुत्त सिंह जसोल कि जयंती पर सादर नमन।।

हज़ारों सालों से क्षत्रिय कौम वीरता – महानता – राष्ट्रवाद की अजीबोगरीब मिशाल करती आयी है फिर भी हमेशा इस कौम से कुछ ऐसा देखने को मिलता जो गर्व को भी गौरवमयी कर देता है आज हम आपको बताएंगे 1971 भारत – पाक के युद्ध के हीरो इतिहास के सबसे महान टैंक योद्धा जिंसने 1971 के युद्ध मे पाकिस्तान की सेना में हाहाकार मचा दिया था . पाकिस्तान सेना के 48 टैंक को नेस्तनाबूद करने वाला ये महावीर अपनी वीरता के साथ इतना बड़ा राष्ट्रभक्त था जिसने कभी देश सेवा के लिए ना शादी की ना ही फौज से तनख्वाह ली .

लेफ्टिनेंट-जनरल हनूत सिंह राठौड़

यही है क्षत्रित्व देश के लिये आजीवन अविवाहित रहे और बिना वेतन फ़ौज की नौकरी की लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह राठौड़

(वीर हनूत सिंह इस राजस्थानी संत ने तबाह किए थे 48 पाक टैंक)

राजस्थान की मिट्टी ने जहां महाराणा प्रताप और वीर दुर्गादास जैसे वीरों को जन्म दिया है वहीं भक्त शिरोमणि मीराबाई की भी जननी है। वीर हनूत सिंह में राजस्थानी मिट्टी के दोनों गुण थे। इन्हीं की अगुवाई में पूना हॉर्स रेजीमेंट ने वर्ष 1965 तथा 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के 48 टैंक नष्ट कर दिए थे जिसके बाद पाक सेना के सामने हार स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई ऑप्शन नहीं बचा।

ले. जनरल हनूत सिंह का जन्म 6 जुलाई 1933 को ले. कर्नल अर्जुन सिंह जी राठौड़ ठिकाना जसोल,राजस्थान के घर हुआ था। वह देश के पूर्व विदेश एवं रक्षामंत्री जसवंत सिंह के चचेरे भाई थे। देहरादून के कर्नन ब्राउन स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह 1949 में एनडीए में दाखिल हुए। वहीं से उन्होंने सेना ज्वॉइन की। यहां वह सैकण्ड लेफ्टिनेंट पद पर नियुक्त हुए। इसके बाद वह सीढ़ी दर सीढ़ी तरक्की करते रहे।

भारत-पाक युद्ध में दिखाई ताकत-
वर्ष 1965 व 1971 में हनूत सिंह ने भारत-पाक युद्ध में पूना हॉर्स रेजीमेंट की ओर से भाग लिया। इनके नेतृत्व में ए.बी. तारपारे व सैकण्ड लेफ्टिनेंट अरूण क्षेत्रपाल ने युद्ध कौशल का परिचय देते हुए पाकिस्तान सेना के 48 टैंक ध्वस्त कर पाक सेना के छक्के छुड़ा दिए।

पाक ने कहा फक्र-ए-हिंद-
युद्ध में हनूत सिंह के कौशल से प्रभावित पाकिस्तान की यूनिट ने भारत की इस रेजीमेंट को फक्र-ए-हिंद के टाइटल से नवाजा जो कि भारतीय सेना के इतिहास में पहली बार किसी विरोधी सेना की ओर से नवाजा गया था। युद्ध में उन्हें बहादुरी दिखाने के लिए महावीर चक्र से भी नवाजा गया था।

आजीवन रहे बाल-ब्रहमचारी-
रेजीमेंट में हनूत सिंह गुरूदेव के नाम से जाने जाते थे। सभी लोग उन्हें यह कहते हुए सम्मान देते थे। उन्होंने शादी नहीं की। उनसे प्रभावित होकर उनकी यूनिट के अधिकतर अधिकारियों ने भी शादी नहीं की।

सिपाही से बन गए साधु-
उनका बचपन से ही आध्यात्म व योग की ओर रूझान था। सेना के दौरान उनका परिचय देहरादून के शैव बाल आश्रम से हुआ। सेना से रिटायर्ड होने के बाद उन्होंने वहीं रहना शुरू कर दिया। उन्हें गुरूजी के नाम से जाना जाता था। शराब तथा मांस के वह सख्त खिलाफ थे।

देहरादून के बाल शिवयोगी से प्रभावित होकर उन्होंने उनसे दीक्षा ली। इसके बाद वह वहीं बस गए। वह वर्ष में दो महीने के लिए जोधपुर के बालासति आश्रम में आया करते थे। वहां भी वह परिवार से अधिक बात नहीं करते और अपनी आध्यात्मिक साधना में ही लीन रहते।

●सन् 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में महावीर चक्र विजेता जिन्हाेने अद्वितीय रणनीती से पाकिस्तान के 48 से अधिक टेंकाे काे नेस्तानाबूद कर दिया था।इस युद्ध के कारण ही भारतीय सेना लाहौर को घेरने में सफल हुई थी जिससे 1971 की लड़ाई में भारत पाकिस्तान के शकरगढ़ क्षेत्र में विजयी हुआ था।

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जीवन परिचय—–
हणूत सिंह राठौड़ जसोल रावल मल्लिनाथ वंशज थे,उनका वंश राठौड़ो के वरिष्ठ शाखा महेचा राठौड़ है,उनके पिता lt .col अर्जुन सिंह जी थे,इनका जन्म 6 जुलाई 1933 को हुआ था,ये जीवन भर अविवाहित रहे और सती माता रूपकंवर बाला गांव के परम भक्तों में थे,इन्हे 28 दिसंबर 1952 को भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त हुआ था,आज़ाद भारत के 12 महानतम जनरलाें में शामिल और भारतीय फाैज में जनरल हनुत के नाम से प्रसिद्ध जनरल साब अभी देहरादून में रह रहे थे।पूर्व केन्द्रीय मंत्री जसवंतसिंहजी के सगे चचेरे भाई जनरल हनुत आध्यात्मिक साधना में लीन रहते थे।
सन् 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में इन्हे असाधारण वीरता के लिए महावीर चक्र प्रदान किया गया था,वे FLAG HISTORY OF ARMOURED CORP के अधिकृत लेखक थे.
इन्हे परम विशिस्ट सेवा मेडल PVSM भी दिया गया था,
31 जुलाई 1991 में वे रिटायर हो गए.

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1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध——-
लेफिनेंट कर्नल(तत्कालीन) हणूत सिंह राठौड़ ने इस युद्ध में 47 इन्फेंट्री ब्रिगेड को कमांड किया था,इस युद्ध में जिन क्षेत्रों में सबसे घमासान युद्ध हुआ था उनमे शकरगढ़ भी एक था.

लेफिनेंट कर्नल(तत्कालीन) हणूत सिंह की 47 इन्फेंट्री ब्रिगेड को शकरगढ़ सेक्टर में बसन्तर नदी के पास तैनात किया गया था,पाकिस्तान ने इस नदी में बहुत सी लैंड माइंस लगा रखी थी,
16 दिसंबर 1971 के दिन हणूत सिंह की कमांड में सेना ने नदी को सफलता पूर्वक पार किया,पाकिस्तान ने दो दिन लगातार टैंको से हमले किये,
लेफिनेंट कर्नल(तत्कालीन) हणूत सिंह ने अपनी सुरक्षा की परवाह किये बिना एक खतरनाक सेक्टर से दूसरे खतरनाक सेक्टर में जाकर सेना का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया।
इस युद्ध में इनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 48 टैंक ध्वस्त कर दिए,और पाकिस्तान का आक्रमण विफल कर दिया।
उन्होंने आश्चर्यजनक वीरता, नेतृत्व और कर्तव्यपरायणता का परिचय दिया और इस विजय के फलस्वरूप हणूत सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.……

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने अपनी पुस्तक LEADERSHIP IN THE INDIAN ARMY
में हणूत सिंह जी के बारे में लिखा है कि.……
“Hanut will be remembered as one of the finest armour commanders of the indian army.His simplicity,courage,boldness,high sense of moral values and professionalism will always be a source of inspiration for generations of officers to come”

#जयहिंद #जयभारत 🚩🙏🇮🇳💐

13/04/2022



जोधपुर रिसाले का रियासतकालीन सुंदर दृश्य,
अपने देश को जानते रहिए, बड़ा महान है देश मेरा,

#जयहिन्द 🚩💐🇮🇳

13/04/2022



महाराज लाल सिंह जी चत्तरगढ़ अपने दोनो पुत्रों के साथ - महाराजा डुंगर सिंहजी व बाल महाराजा गंगा सिंहजी बीकानेर। ( वर्ष 1885ई॰)

महाराजा डुंगर सिंहजी का शासनकाल 1872ई॰ से 1887ई॰ तक था, उसके पश्चात महाराजा गंगा सिंहजी बीकानेर का बाल्यकाल में ही राजतिलक हुआ जिनका शासनकाल 1887ई॰ से 1943ई तक रहा।


Narendra Modi
MYogiAdityanath
Swatantra Dev Singh
Dayashankar Singh
Sunil Bansal

Photos from अभिषेक तिवारी's post 12/03/2022



आदरणीय श्री Dayashankar Singh (भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष, उत्तर प्रदेश) जी भाई साहब को लखनऊ आवास पर मिल कर #बलिया #सदर सीट जीतने पर बधाई एवं शुभकामनाएं दी।।

खूब उन्नति प्रदान करें।।
महादेव की कृपा आप पर सदैव बनी रहे।।

अभिषेक तिवारी

Narendra Modi
MYogiAdityanath
Amit Shah
Swatantra Dev Singh
BJP Uttar Pradesh
Bharatiya Janata Party (BJP)

08/03/2022



को नहि जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो।।

🚩💐🙏

#जयश्रीराम
#जयहनुमान

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