डोसा
विचार प्रवाह - एक प्रयास
आइए, मिलकर भारत के विचार प्रवाह में सक?
23/11/2025
जब चुप्पी चीखने लगे — एक गृहस्थ पुरुष का अनकहा दर्द...
आज बहुत दिनों बाद...शायद कई महीनों बाद कुछ लिख रही हूँ। जानते हैं क्यों ?
.. क्योंकि आज मन बहुत भारी हो गया। इस समय रात के 11 बज रहे हैं और आज ही शाम के सात बजे विदीर्ण हुआ मेरा हृदय अब तक सँभल नहीं पाया है।
इसलिए सोचा विचारों के इस तूफ़ान को शायद लिखकर शान्त करने की कोशिश करूँ... बस, आज का यह लेखन आपके सामने यही कोशिश मात्र है जो आज की एक वास्तविक घटना है...
कभी-कभी जीवन हमें ऐसी बातों से दो - चार करवाता है, जिसे देख - सुन कर हमारी आत्मा तक काँप उठती है। मेरा आज का अनुभव भी कुछ ऐसा ही था — अनजाने में दिल को झकझोर देने वाला...
हुआ यूँ कि आज मैंने शाम सात बजे के आसपास अपने एक मित्र को फ़ोन किया...
वो मित्र —
• बेहद संजीदा हैं
• शान्त स्वभाव के हैं
• ज़िम्मेदार व्यक्ति हैं और आज के घटनाक्रम के सन्दर्भ में सबसे बड़ी बात
• पत्नी - सन्तान से युक्त एक अच्छे फैमिली मैन हैं
तो हमारा फ़ोन उठाते ही उन्होंने कहा,
“I’m in the office.”
मैं चौंक गई।
“अरे! आज तो शनिवार है… आपका तो ऑफ़ होता है ?तो फिर आप शनिवार को ऑफिस में क्या कर रहे हैं ?”
उस तरफ़ से कुछ पल की चुप्पी रही…
और फिर एक ऐसा जवाब, जिसे सुनकर मेरा दिल धसक गया।
उन्होंने धीमी और अपनी सौम्य वाणी में कहा—
“It’s better to be in the office today.”
मैंने फिर भी कहा,
“अरे, घर जाइए… अपने परिवार के साथ समय बिताइए...”
लेकिन फिर…
शायद मुझसे अपनेपन के बहाव में उनके मुँह से जो वाक्य निकला जिसने मुझे भीतर तक तोड़ दिया और अब तक विचारों की लहरें मुझसे उठापटक कर रही हैं...
वह बोल गए—
“रूमा, घर में… आदमी की इज़्ज़त तब तक है, जब तक वह पैसा देता रहता है।”
आप समझ तो गए होंगे कि इस एक वाक्य में किसी का पूरा जीवन सिमट आया होगा...
मेरे लिए उस पल जैसे समय रुक गया। मेरे कान में जैसे किसी ने सीसा पिघला कर डाल दिया हो...
जबकि उन सज्जन की आवाज़ में न गुस्सा था, न शिकायत—
शायद सिर्फ एक ऐसा सच था, जिसे उन्हें रोज़ ही कड़वे घूँट की तरह पीना ही पड़ता है और वे फिर भी शान्त थे...
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यह सिर्फ एक आदमी का सच नहीं… शायद यह समाज के उस काँच के अनगिनत टूटे हुए प्रतिबिम्ब हैं जो हर ओर बिखरे हैं और अपनी छाया मात्र से उन सज्जन के साथ मुझ जैसे अंकिंचनों को भी रक्त - रंजित कर रहे हैं...
हम अक्सर कहते हैं कि घर प्यार से बनता है,
पर ये देख - सुनकर तो लगता है कि कई घर पैसों की दीवारों पर टिके होते हैं।
कितनी विडम्बना है न ?
घर… जिसे हम अपना कहते हैं,
रिश्ते… जिन्हें हम अपना समझते हैं,
सम्मान… जिसे हम कमाते हैं,
कैसा लगता है जब वही सब कुछ पैसे पर टिक जाता है।
जैसे आदमी नहीं—
चलता-फिरता एटीएम हो...
कई घरों में यह दर्द छुपकर पलता है...
क्योंकि उनके परिवार ने ऐसे पुरुषों से उम्मीद बाँध रखी है—
“कमा कर लाओ, बस, लाओ।”
पर कोई नहीं पूछता—
“तुम खुश हो ?”
“थक गए हो ?”
“कोई परेशानी है ?”
क्या कहीं इस पर भी चिन्तन है कि उनके भी टूटने की सीमा होती है ?
खैर, ये सब एक रूटीन बनने के बाद
धीरे-धीरे ऐसे लोग अपने इमोशन छुपाना सीख जाते हैं,
दर्द निगलना सीख जाते हैं,
खुद को खोकर बस परिवार के लिए जीना सीख जाते हैं...
इन सज्जन के काँधे से इस मानसिक बोझ को कम करने के लिए और इनके रियल वाले खुशहाल पारिवारिक जीवन के लिए आज रात की नियमित वाली अपनी संक्षिप्त साधना में परम शक्ति से सकाम प्रार्थना करूँगी ...
शायद मेरा मन भी कुछ हल्का हो...
मेरा मन निरन्तर आज इसी ऊहापोह में रहा और यहाँ तक पहुँचा कि रिश्ते जब पैसों की तराजू पर तौले जाने लगते हैं,
तो घर घर नहीं रहता—
बस एक जगह हो जाती है,
जहाँ आदमी लौटता तो है,
पर महसूस कुछ भी नहीं करता...
20/09/2025
It may sound impossible, but Indian engineer Hira Ratan Manek (HRM) claimed to survive 411 days without eating any food. In 1995, under strict medical supervision, HRM only drank water and gazed at the sun during sunrise and sunset. A team of 24 doctors, led by neurologist Dr. Sudhir Shah, carefully monitored his health. Surprisingly, all tests showed his body stayed normal, leaving doctors puzzled about how he could survive without food.
HRM said his energy came directly from the sun, like how plants survive on sunlight. Scans showed his body had unusual features, such as a bigger pineal gland and higher levels of melatonin and serotonin. Instead of weakening from starvation, his body seemed to adapt. He wrote a book called Sungazing and traveled to over 100 countries, teaching people how to gain energy and mental clarity by looking at the sun. He was also a member of the Solar Energy Society of India.
In 2002, NASA and the University of Pennsylvania studied him briefly, but the results were never published. Many people who followed his method said they felt more energetic and focused. However, most medical experts called it pseudoscience. Still, his story raises a powerful question: If plants live on sunlight, why not humans? HRM passed away in 2022 at the age of 85, leaving a mystery that continues to inspire and confuse people around the world.
17/02/2025
रविदास जी को पंजाब में रविदास कहा जाता है । उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में उन्हें रैदास के नाम से ही जाना जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग 'रोहिदास' और बंगाल के लोग उन्हें ‘रुइदास’ कहते हैं।
कई पुरानी पांडुलिपियों में उन्हें रायादास, रेदास, रेमदास और रौदास के नाम से भी जाना गया है। कहते हैं कि माघ मास की पूर्णिमा को जब रविदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। उनका जन्म माघ माह की पूर्णिमा को हुआ था।
संत शिरोमणि कवि रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा को 1376 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के गोबर्धनपुर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम कर्मा देवी (कलसा) तथा पिता का नाम संतोख दास (रग्घु) था। उनके दादा का नाम श्री कालूराम जी, दादी का नाम श्रीमती लखपती जी, पत्नी का नाम श्रीमती लोनाजी और पुत्र का नाम श्रीविजय दास जी है। रविदासजी चर्मकार कुल से होने के कारण वे जूते बनाते थे। ऐसा करने में उन्हें बहुत खुशी मिलती थी और वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे।
उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में मुगलों का शासन था चारों ओर अत्याचार, गरीबी, भ्रष्टाचार व अशिक्षा का बोलबाला था। उस समय मुस्लिम शासकों द्वारा प्रयास किया जाता था कि अधिकांश हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया जाए। संत रविदास की ख्याति लगातार बढ़ रही थी जिसके चलते उनके लाखों भक्त थे जिनमें हर जाति के लोग शामिल थे।
यह सब देखकर एक परिद्ध मुस्लिम 'सदना पीर' उनको मुसलमान बनाने आया था। उसका सोचना था कि यदि रविदास मुसलमान बन जाते हैं तो उनके लाखों भक्त भी मुस्लिम हो जाएंगे। ऐसा सोचकर उन पर हर प्रकार से दबाव बनाया गया था लेकिन संत रविदास तो संत थे उन्हें किसी हिन्दू या मुस्लिम से नहीं मानवता से मतलब था।
संत रविदासजी बहुत ही दयालु और दानवीर थे। संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जातिगत भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर बल दिया और मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी।
रविदासजी ने सीधे-सीधे लिखा कि 'रैदास जन्म के कारने होत न कोई नीच, नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की नीच' यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है। जो व्यक्ति गलत काम करता है वो नीच होता है। कोई भी व्यक्ति जन्म के हिसाब से कभी नीच नहीं होता। संत रविदास ने अपनी कविताओं के लिए जनसाधारण की ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। साथ ही इसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और रेख्ता यानी उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रविदासजी के लगभग चालीस पद सिख धर्म के पवित्र धर्मग्रंथ 'गुरुग्रंथ साहब' में भी सम्मिलित किए गए है।
कहते हैं कि स्वामी रामानंदाचार्य वैष्णव भक्तिधारा के महान संत हैं। संत रविदास उनके शिष्य थे। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं। स्वयं कबीरदास जी ने 'संतन में रविदास' कहकर इन्हें मान्यता दी है। राजस्थान की कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई उनकी शिष्या थीं। यह भी कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी उनकी शिष्या बनीं थीं। वहीं चित्तौड़ में संत रविदास की छतरी बनी हुई है। मान्यता है कि वे वहीं से स्वर्गारोहण कर गए थे। हालांकि इसका कोई आधिकारिक विवरण नहीं है लेकिन कहते हैं कि वाराणसी में 1540 ईस्वी में उन्होंने देह छोड़ दी थी।
वाराणसी में संत रविदास का भव्य मंदिर और मठ है। जहां सभी जाति के लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। वाराणसी में श्री गुरु रविदास पार्क है जो नगवा में उनके यादगार के रुप में बनाया गया है जो उनके नाम पर 'गुरु रविदास स्मारक और पार्क' बना है।
इसाई धर्म :-ईसा एक है, बाइबल एक है ।
फिर भी, लेटिन कैथलिक, सीरियन कैथलिक, मारथोमा, पेंटेकोस्ट, सैल्वेशन आर्मी, सेवेंथ डे एडवांटिष्ट, ऑर्थोडॉक्स, जेकोबाइट जैसे 146 फिरके आपस में किसी के भी चर्च में नहीं जाते।
इस्लाम धर्म :-अल्लाह एक, कुरान एक, नबी एक ।
फिर भी शिया, सुन्नी, अहमदिया, सूफी, मुजाहिद्दीन जैसे 13 फिरके एक दुसरे के खून के प्यासे ।
सबकी अलग मस्जिदें । साथ बैठकर नमाज नहीं पढ़ते ।
धर्म के नामपर एक-दूसरे का कत्ल करने को सदैव आमादा।
हिन्दू धर्म :-
1280 धर्म ग्रन्थ, 10 हज़ार से ज्यादा जातियां, अनगिनत पर्व एवं त्योहार, असंख्य देवी-देवता ।
एक लाख से ज्यादा उपजातियां, हज़ारों ऋषि-मुनि, सैकड़ों भाषाएँ । फिर भी सारे हिन्दू सभी मन्दिरों में जाते हैं और सारे त्योहारों को मनाते हुए आपस में शान्ति एवं सहनशीलता से रहते हैं ।यह है भव्यता, सुन्दरता और खूबसूरती हिन्दू धर्म की......!!
फिर क्यों ना हम सब मिलकर इस हिन्दू "धर्म "" का सम्मान करे ।।
संत रविदास जी को कोटि कोटि वंदन.....🚩🙏
17/02/2025
राजस्थान के नागौर से चालीस किलोमीटर दूर अजमेर-नागौर रोड पर कुचेरा कस्बे के पास बुटाटी धाम है,जिसे चतुरदास जी महाराज के मंदिर के नाम से जाना जाता है।
यहां हर साल हजारों लोग लकवे के रोग से ठीक होकर जाते हैं।
मान्यता है कि लगभग पांच सौ साल पहले संत चतुरदास जी का यहाँ पर निवास था।
चारण कुल में जन्में वे एक महान सिद्ध योगी थे और अपनी सिद्धियों से लकवा के रोगियों को रोगमुक्त कर देते थे।
बुटाटी गांव के चारण कुल में जन्मे संत चतुरदास महाराज आजीवन ब्रह्मचारी रहे।
युवावस्था में हिमालय पर्वत पर रहकर गहन तपस्या करने के बाद वे वापस बुटाटी गांव आ गए।
यहां तपस्या व गौ सेवा करने लगे।
बाद में वे देवलोक गमन हो गए।
प्रचलित दंत कथाओं के अनुसार उन्होंने अपने हिस्से की जमीन दान देने की बात कही।
पूर्व में गांव के पश्चिम दिशा में केवल एक चबूतरे के निर्माण से शुरू हुआ बाबा की आस्था का केंद्र अब विशाल मन्दिर व धाम बन गया है।
आज भी लोग लकवा से मुक्त होने के लिए इनकी समाधी पर सात फेरी लगाते हैं। यहाँ पर देश भर से प्रतिवर्ष लाखों लकवा मरीज एवं अन्य श्रद्धालु विशेष रूप से एकादशी एवं द्वादशी के दिन आते है।
आज भी उनकी समाधी पर परिक्रमा करने से लकवे से पीड़ित लोगों को राहत मिलती है।
यहां नागोर से अलावा पूरे देशभर से लोग आते हैं।
हर साल वैशाख, भादवा अौर माघ महीने में मेला लगता है।
मंदिर में आने वाले लोगों के लिए नि:शुल्क रहने व खाने की व्यवस्था भी है।
यहां कोई पण्डित महाराज या हकीम नहीं होता न ही कोई दवाई लगाकर इलाज किया जाता।
यहां मंदिर में 7 दिन तक रहकर सुबह शाम फेरी लगाने से लकवे की बीमारी में सुधार होता है।
हवन कुंड की भभूति लगाते हैं और बीमारी धीरे-धीरे अपना प्रभाव कम कर देती है।
इस बात को लेकर डॉक्टर और साइंस के जानकार भी हैरान है कि बिना दवा से कैसे लकवे का इलाज हो सकता है।
रोगी के जो अंग हिलते डुलते नहीं वे भी धीरे-धीरे काम करने लगते हैं।
लकवे से व्यक्ति की आवाज बंद होती है वह भी धीरे-धीरे आ जाती है।
यहां बहुत सारे लोगों को इस बीमारी से राहत मिली है। भक्त यहां दान करते हैं,
जिसे मंदिर के विकास के लिए लगाया जाता है।
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26/12/2024
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