16/06/2021
OF SHIVA .. ENDLESS
(also known as Dal Lake) is situated in the of the Himalayas, in the subdivision of district of . Nestled at an elevation of 4,080 meters, it is considered only second in significance to the Lake Mansarovar in Tibet. Manimahesh literally means "SHIVA'S JEWELS". According to a local legend, on a full moon night, one can see the reflection of this jewel in the magnificent lake.
Most of the year, it remains closed due to the snow. To reach the lake, one has to trek a distance of 13 km through enchanting mountains and greenery. Shaped like a saucer, the Lake is divided into two main parts - the larger part is the Shiv Katori (the bathing place of Lord Shiva), and the lower part is called Gauri Kund (the bathing place for Goddess Parvati).
The mighty Lake is situated in proximity to the virgin peak of Manimahesh Kailash Parbat, which is considered to be the holy abode of Lord Shiva. It is said that he created both the landforms as his marital home with Goddess Parvati, and he is believed to be residing here still. There is even a marble image dedicated to the Lord in the periphery that is also called Chaumukha.
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16/06/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
Remnants of Our glorious past...!
Very spiritual Shivlinga at , about 37 km north-west of , .
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22/05/2021
OF SHIVA .... ENDLESS
7th CENTURY ,
#मारुंडेश्वरर_मंदिर,
ALLMOST EVERY DISEASES ENDS HERE !!!
Marundeeswarar Temple or Temple is a Hindu temple dedicated to the deity Shiva, located in , a village in district in the South Indian state of Tamil Nadu. Shiva is worshipped as Marundeeswarar, and is represented by the lingam. His consort Sati is depicted as Anjanakshi. The presiding deity is associated with the 7th century Tamil Saiva Nayanars Sundarar. The temple is counted as a twin temple along with Kachabeswarar temple, the place where Lord Vishnu did penances to Lord Shiva to incarnate into his Kachaba (Tortoise) Avatar.
The original complex is believed to have been built by Cholas, while the present masonry structure was built during the 16th century. In modern times, the temple is maintained and administered by the Hindu Religious and Charitable Endowments Department of the Government of Tamil Nadu.
Legend and history
As per Hindu legend, Anjanakshi as the skin of Matha Sati fell on Mount Rudragiri on which the temple is situated. Anjanakshi means "Destroyer of Darkness," owing to two legends, one the burst of fire that happened when the mother's skin fell on the mountain; the other belief is that Matha Sati provided bright light from the sky to Brahma and Vishnu when they searched for a lost weapon in the area in the dark. Also, the Devas, the celestial deities, including Indra got cured of their illness by worshiping Shiva at this place and by the holy herbs obtained from the Mount Rudragiri on which Matha Satí's skin fell off and merged with Bhumadevi creating precious medicinal herbs. The present temple is situated on Rudragiri. The Devas were treated by Aswani Devata, the divine doctor at the behest of Shiva. Also, Lord Shiva appeared during a plague, during which the sage there was unable to make medicines for a lot of people. The Lord told people to eat a little of the mud of the holy Mount Rudragiri on which His consort Satí's skin merged, to get cured and this saved the people from the plague. Shiva henceforth obtained the name Marundeeswarar (Oushadheeshwar), Marundu literally means a Medicine.The temple has a recorded history from the 10th century, but scholar attribute the presence of the temple at least from the 8th century, pertaining to the period of Sundarar, the famous Saiva Nayanar. Sundarar has glorified the temple in his verses in 11th Thirumurai of Thevaram. The temple is counted as a twin temple along with Marundeeswarar Temple located in the same village.
मारुंडेश्वरर या औषधेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध ये शिव मन्दिर तमिलनाडु के कांचीपुरम के थिरुकाचुर गाँव में है।
इस मंदिर में शिव जी को मारुंडेश्वरर के रूप में पूजा जाता है।
मारुंड का अर्थ है एक चिकित्सा, मारुंडेश्वरर अर्थात चिकित्सा के ईश्वर और मारुंडेश्वरर मंदिर अर्थात "दिव्य चिकित्सा का मंदिर।"
कथाओं के अनुसार, माता सती की त्वचा अंजनक्षी रुद्रगिरि पर्वत पर गिरी थी, इसी पर्वत पर ये चमत्कारी औऱ दैवीय मंदिर स्थित है।
एक बार इंद्र सहित स्वर्ग में समस्त देवता बीमार हो गए। सभी देवताओं ने इस स्थान पर शिव की पूजा की।
देवों का इलाज शिव के कहने पर दिव्य चिकित्सक अश्वनी देवता ने किया था।
मन्दिर से जुड़ी सभी पौराणिक कथाएँ ये इशारा करती है कि मन्दिर रोगों के निवारण से जुड़ा है।
यहाँ आने वाले भक्तों का मानना है कि वो यहाँ की मिट्टी और पानी के उपयोग से निरोगी हो जाते है।
दिलचस्प बात ये है कि इस मंदिर की संरचना हिंदू मंदिर की तरह बिल्कुल नहीं लगती है।
यह एक वर्ग संरचना है।इसके विशिष्ट पिरामिड आकार के टावर ग्रेनाइट पत्थरों से बने हैं।अन्य हिन्दू मंदिरों की तरह यहाँ शिखर भी नही मिलता।
मन्दिर प्रांगण में एक गुप्त स्थान है जहाँ पहले आम जनता को प्रवेश करने की अनुमति नही थी।
यहाँ एक गोल भूमिगत कुआँ है जहाँ अभी भी पानी भरा रहता है। कुँए तक जाने के लिए छड़नुमा सीढ़ियाँ है। ये एक ऐसी जगह थी जहाँ केवल साधु संत ही जा सकते थे। ये लोग यहाँ पर रस-विधा( रसायन विद्या) और औषधियो पर कार्य करते थे।
इस स्थान पर दवाइयाँ और अजीब रसायन तैयार किए जाते थे जिनकी सहायता से गंभीर बीमारियों से ग्रसित पीड़ितों को ठीक किया जाता था।
यही कारण है कि इस हिंदू मंदिर का नियमित स्वरूप नहीं है।
कुछ सौ साल पहले इस स्थान को भी सामान्य जनता के लिए खोल कर पूर्ण रूप से मंदिर में बदल दिया गया।
मंदिर में एक ध्वज पद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह किसी प्रकार के रहस्यमयी विकिरण का उत्सर्जन करता है। पोस्ट के आधार पर, एक छोटा आयताकार गड्ढा होता है, जो एक प्रकार की धूल से भरा है। इस मिट्टी या धूल को दवा माना जाता है, एक क्यूरेटिव पाउडर जो कई बीमारियों को ठीक कर सकता है। जो लोग मंदिर जाते हैं, वे धूल घर ले जाते हैं। और किसान भी अपने खेती में इसका उपयोग करते हैं।
यहाँ जो संत रहते थे उनमें प्रशिक्षुता की परंपरा थी उन्हें सिखाया जाता था कि विभिन्न यौगिकों को बनाने के लिए विभिन्न जड़ी-बूटियों और रसायनों को कैसे मिलाया जाए।
उन्होंने जो कीहोल जैसी संरचना है उधर 9 रसायनों से निर्मित "औषध लिंगम" नामक बेलनाकार लिंगम पानी मे रखा। ये लिंगम पूर्वजो ने कुएं ने रखा ये लिंगम उन रसायनों से मिलकर बनाया था जो व्यक्तिगत रूप से सेवन किए जाने पर जहरीले होते हैं, लेकिन जब एक साथ जुड़े होते हैं, तो इसमें बहुत अधिक उपचार गुण होते हैं।
जिन रसायनों ने लिंगम को बनाया, वे बहुत धीरे-धीरे पानी में घुल जाते है,जिससे पानी में उपचार करने के गुण आ जाते है यही कारण है कि इस पूरे ढाँचे को 'ओषध तीर्थ"के रूप में जाना जाता है।
अब सवाल ये उठता है ये कीहोल के जैसा क्यों है?
जरा इस संरचना को लिंगम को शीर्ष से देखने के नजरिये से देखिये दिखा "एक शिवलिंग"
एक अब, हम समझ सकते हैं कि इसे इस तरह क्यों बनाया गया था। तो इस संपूर्ण की होल आकार को एक योनी के रूप में डिजाइन किया गया,मध्य पानी मे रसायनों से निर्मित शिवलिंग।
स्थानीय लोगों का दावा है कि जहां यह पानी बीमार लोगों के लिए दवा का काम करता है, वहीं स्वस्थ लोगों के लिए भी खतरनाक है,इसके साथ यह भी कहते है कि यहां का पानी असामान्य रूप से भारी है।
इसके लिए विज्ञान में जाना पड़ेगा
सामान्य पानी मतलब H2O
भारी पानी मतलब D2O
इस शिवलिंग से जो पानी बनता है वो भारी पानी है
भारी पानी मे हीलिंग प्रॉपर्टीज होती है अगर कैंसर रोगी सेवन करे तो सेहत में कुछ सुधार होता हैऔर अगर स्वस्थ इंसान इनका सेवन करे तो बीमार।
आप सोच सकते है कि ये मन्दिर बहुत प्राचीन है उस समय हमारे पूर्वजों को रसायन व चिकित्सा विज्ञान का कितना ज्ञान था।
धर्म और चिकित्सा का मिश्रण कर इस मंदिर का निर्माण वाकई अद्भत है
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18/05/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
AMAZINGLY BEL PATRA GOES INSIDE WATER AT INVISIBLE SHIVLINGA
Also Shivlinga accepting Sacred food !!
#सीतापुर_उत्तरप्रदेश का एक ऐसा तीर्थ जहाँ अद्रश्य शिवलिंग स्वीकारता है प्रत्यक्ष प्रसाद !
सीतापुर में एक प्राचीन स्थान है, जो रहस्य और रोमांच से भरा है. यहां प्रतिदिन देश के अलग-अलग स्थानों से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजन करने के लिए आते हैं. #नैमिषारण्य में #रुद्रावर्त_तीर्थ करने का अपना ही महत्व है.
नैमिषारण्य की तपस्थली शिव के चमत्कारों की धरती है. इस तपोवन की भूमि पर कई पौराणिक शिवालय स्थापित हैं. नैमिषारण्य 88 हजार ऋषियों की तपोभूमि है. यहां पर गोमती नदी के तट पर स्थित प्राचीन शिव स्थान को रुद्रावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है.
नैमिषारण्य तपोभूमि पर स्थित है रुद्रावर्त तीर्थ
आदि गंगा गोमती नदी के किनारे पर नदी के अंदर एक शिवलिंग स्थापित है. शिवलिंग पर ओम नम: शिवाय के उच्चारण के साथ बेल पत्र, दूध, फल और जल अर्पित करने पर वह सीधा जल में समा जाता है. इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए देश के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं. श्रद्धालु इस कृत्य को देखकर अपने जीवन को धन्य समझते हैं. स्थानीय लोग और मंदिर के पुजारी का कहना है कि इस स्थान का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है.
हालाँकि शिवलिंग के दर्शन प्रत्यक्ष रूप में नहीं होते हैं लेकिन शिवलिंग का अरघा आसानी से दिख जाती है इस तीर्थ स्थान पर वर्षों से सेवा कर रहे बाबा की मानें तो किसी को ये ज्ञात नहीं की इस कुण्ड में शिवलिंग कितना अंदर है और न ही किसी ने देखा है। एक और विचित्र बात है उस अरघे से जल सदैव निकलता रहता है | वहां मौजूद पुजारी की माने तो उक्त स्थान पर उस अरघे में शिवलिंग मौजूद हैं | वैसे से इस स्थान पर कोई भव्य निर्माण या मंदिर नहीं है लेकिन कुंड के किनारे ही डॉ छोटे छोटे मंदिर बने हैं एक में शिवलिंग स्थापित है तो दूसरे नाग नागिन की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं | वहां मौजूद ग्रामीणों की माने तो यहाँ पर नाग नागिन प्रत्यक्ष रूप में मौजूद है कुछ समय यहाँ व्यतीत कर जिनका दर्शन आसानी से किया जा सकता है I
नदी के किनारे शिव मंदिर भी स्थापित है.
मान्यता है कि कभी इस स्थान पर पौराणिक शिव मंदिर था. कालांतर में वह मंदिर आदि गंगा गोमती में समा गया. मंदिर का अवशेष नदी में पानी कम होने पर दिखाई देता है. बताया जाता है कि उसी स्थान पर नदी के अंदर शिवलिंग स्थापित है. लोग अब इस पवित्र स्थान को रुद्रावर्त तीर्थ के नाम से जानते हैं. गोमती नदी में दूध, बेल पत्र और फल अर्पित करने पर शिवलिंग इसे स्वीकार कर लेता है. बताया जाता है कि इस विशेष स्थान के अलावा और कहीं पर बेल पत्र डालने पर वह जल के अंदर नहीं समाती, बल्कि तैरती रहती है.
देश के कोने-कोने से आते हैं श्रद्धालु
सतयुग के तीर्थ नैमिषारण्य की पौराणिक मान्यता पूरी दुनिया में विख्यात है. देश भर से श्रद्धालु इस रुद्रावर्त तीर्थ पर दर्शन करने के लिए आते हैं. रुद्रावर्त तीर्थ क्षेत्र, नैमिषारण्य क्षेत्र तपोभूमि के महत्व को और अधिक बढ़ाने में सहायक सबित हो रहा है. तीर्थ के समीप ही एक और प्राचीन शिवलिंग है. वहां कुछ वर्षों पूर्व श्रद्धालुओं ने मिलकर मंदिर का निर्माण करा दिया. तीर्थ में पूजा अर्चना के पश्चात मंदिर में शिव की अराधना की जाती है. मान्यता है कि यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होती है.
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17/05/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
MYSTERIOUS SHIVLINGA ROTATES ALL FOUR DIRECTIONS.
अद्भुत शिवलिंग
चारों दिशाअों में घूमता है,
भक्तों को मिलती सभी कष्टों से मुक्ति
ज्यादातर शिव मंदिरों में शिवलिंग की जलहरी का मुख उत्तर या दक्षिण दिशा की तरफ होता है परंतु #मध्यप्रदेश के #श्योपुर में #गोविंदेश्वर_महादेव_शिवालय में संसार का सबसे अनूठा शिवलिंग स्थापित है। यह शिवलिंग चारों दिशाअों में घूमता है। भक्त शिवलिंग को अपनी सुविधानुसार घुमाकर पूजा कर सकते हैं।
श्योपुर के छार बाग मोहल्ले में अष्टफलक की छतरी में यह अद्भुत शिवलिंग स्थित है। इस शिवलिंग का निर्माण ऐसे किया गया है कि यह अपनी धुरी पर चारों दिशाअों में घूमता है। भक्त इच्छानुसार शिवलिंग की जलहरी को दिशा देते हैं अौर भगवान शिव को खुश करते हैं।
इस शिवलिंग का निर्माण श्योपुर के गौड़ वंश के राजा पुरूषोत्तम दास ने 294 वर्ष पूर्व अर्थात सन् 1722 में करवाया था। मंदिर में लगे शिलापट्ट पर इसका निर्माण समय गड़ा हुआ है। यह शिव मंदिर गोविंदेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। इससे पहले यह शिवलिंग सोलापुर महाराष्ट्र में बाम्बेश्वर महादेव के रूप में स्थापित था। गौड़ राजा भोलेनाथ के भक्त थे इसलिए उन्होंने शिवनगरी के रूप में श्योपुर नगर को बसाया।
इस शिवलिंग का निर्माण लाल पत्थर से किया गया है। इसके दो भाग हैं, एक पिंडी और दूसरा जलहरी। यह शिवलिंग धुरी पर स्थापित है, जो चारों दिशाअों में घूमता है।
यह शिवलिंग 24 खंभों का छत्री की दूसरी मंजिल पर स्थित है। पहली मंजिल पर भगवान गणेश की अद्भुत प्रतिमा विराजमान है। कहा जाता है कि साल में एक बार रात के समय मंदिर की घंटिया अपने आप बजने लगती हैं। आरती के पश्चात शिवलिंग घूमने लगता हैं। कहते हैं कि इस शिवलिंग का मुख हमेशा दक्षिण की अोर होता है परंतु ये अपने आप उत्तर या पूर्वमुखी हो जाता है। पौराणिक कथाअों के अनुसार दक्षिणमुखी शिवलिंग का अभिषेक करने से सारे कष्टों अौर सर्पदोष, पितृदोष, गृहक्लेश से छुटकारा मिलता है।
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10/05/2021
MYSTERIES OF SHIVLINGA .. ENDLESS
जानिए शिवलिंग का रहस्य और क्यों की जाती है इसकी पूजा ....
पूरे भारत में बारह ज्योर्तिलिंग हैं जिसके विषय में मान्यता है कि इनकी उत्पत्ति स्वयं हुई। इनके अलावा देश के विभिन्न भागों में लोगों ने मंदिर बनाकर शिवलिंग को स्थापित किया है और उनकी पूजा करते हैं।
लिंग को शिव का निराकार रूप माना जाता है, जबकि उनके साकार रूप में उन्हें भगवान शंकर मानकर पूजा जाता है। आदि काल से ही मनुष्य शिव के लिंग की पूजा करते आ रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सभी देवों में महादेव के लिंग की ही पूजा क्यों होती है। इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं हैं।
शिवलिंग का रहस्य
शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है! अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि इस संसार में न केवल पुरुष का और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं।
वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है। यह सूक्ष्म शरीर 17 तत्वों से बना होता है। मन, बुद्धि, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और पांच वायु. वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है |
शिव पुराण के अनुसार
शिव पुराण में शिवलिंग की पूजा के विषय में जो तथ्य मिलता है वह तथ्य इस कथा से अलग है। शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरूष और निराकार ब्रह्म हैं। इसी के प्रतीकात्मक रूप में शिव के लिंग की पूजा की जाती है। भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई।
पौराणिक कथा के अनुसार
जब समुद्र मंथन के समय सभी देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। उन्होंने बड़ी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ‘नीलकण्ठ’ कहलाए। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई, जो आज भी चली आ रही है।
वैज्ञानिक कारण
हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने लिंग और योनी मिले हैं। एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति के पूजक थे। वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति लिंग और योनी से हुई है। इसी से लिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी।
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09/05/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
5 Mysterious Shivling Which Are Increasing Year On Year
पांच ऐसे शिवलिंग, जो साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं
भगवान शिव की लीला है कि जहां सभी देवी देवताओं के स्वरूप की पूजा होती है वहीं महादेव जो निर्विकार, निराकार और ओंकार स्वरूप हैं उनकी लिंग रूप में पूजा होती है। लेकिन यह शिवलीला यहीं पर समाप्त नहीं होती है। भारत में कई शिवलिंग ऐसे हैं जिन्हें चमत्कारी माना जाता है। कुछ शिवलिंग पर अपने आप जल की धारा बरसती है तो कुछ का आकार साल दरसाल बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे विज्ञान है या चमत्कार यह तो लोग अपनी-अपनी बुद्धि करते हैं लेकिन चर्चा तो कुछ ऐसी ही है। तो आइये देखें उन शिवलिंगों को जिनका आकार लागातर बढ़ता जा रहा है और इसके पीछे क्या मान्यता है। कुछ शिवलिंग तो ऐसे भी हैं जिनके आकार का संबंध प्रलय से माना जाता है।
#हिमाचलप्रदेश में #नाहन से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर #पौड़ीवाला_शिवमंदिर है। इसका संबंध रावण से माना जाता है। कहते हैं कि रावण ने इसकी स्थापना की थी। इसे स्वर्ग की दूसरी पौड़ी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि हर वर्ष महाशिवरात्रि के दिन यह शिवलिंग एक जौ के दाने के बराबर बढ़ता है। ऐसी धारणा है कि इस शिवलिंग में साक्षात शिव विराजते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
शिव की नगरी #काशी में कई शिव मंदिर हैं जिनके विषय अद्भुत कथाएं हैं। इनमें एक शिवलिंग है #बाबा_तिल_भांडेश्वर का। कहते हैं यह सत्युग में प्रगट हुआ स्वयंभू शिवलिंग है। कलयुग से पहले तक यह शिवलिंग हर दिन तिल आकार में बढ़ता था। लेकिन कलयुग के आगमन पर लोगों को यह चिंता सताने लगी कि यह इसी आकार में हर दिन बढ़ता रहा तो पूरी दुनिया इस शिवलिंग में समा जाएगी। शिव की आराधाना की गई तब शिव जी ने प्रगट होकर कहा कि अब से इस शिवलिंग का आकार हर साल मकर संक्रांति के दिन बढ़ेगा। कहते हैं उस समय से हर साल मकर संक्रांति के दिन इस शिवलिंग का आकार बढ़ता है।
#गुजरात के #गोधरा में स्थित #मृदेश्वर_महादेव के बढ़ते शिवलिंग के आकार को प्रलय का संकेत माना जाता है। इस शिव लिंग के विषय में मान्यता है कि जिस दिन लिंग का आकार साढ़े आठ फुट का हो जाएगा उस दिन यह मंदिर की छत को छू लेगा। जिस दिन ऐसा होगा उसी दिन महाप्रलय आ जाएगा। शिवलिंग को मंदिर की छत छूने में लाखों वर्ष लग सकते हैं क्योंकि शिवलिंग का आकार एक वर्ष में एक चावल के दाने के बराबर बढ़ता है। मृदेश्वर शिवलिंग की विशेषता है कि इसमें से स्वतः ही जल की धारा निकलती रहती है जो शिवलिंग का अभिषेक कर रही है। इस जल धारा में गर्मी एवं सूखे का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, धारा अविरल बहती रहती है।
#खजुराहो का #मतंगेश्वर_शिवलिंग जिसके बारे में मान्यता है कि भगवान श्री राम ने भी यहां पूजा की है। 18 फुट के इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि हर साल यह तिल के आकार में बढ़ रहा है।
#छत्तीसगढ़ की राजधानी #रायपुर से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है #गरियाबंद जिला यहां एक प्राकृतिक शिवलिंग है जिसे #भूतेश्वर_महादेव के नाम से जाना जाता है। इस अर्धनारीश्वर शिवलिंग को ‘भकुर्रा महादेव’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि हर साल यह शिवलिंग एक इंच से पौन इंच तक बढ़ जाता है।
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26/04/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
A RARE SHIVLINGA IS A WITNESS TO HISTORY
As per the priest of the temple, tried to damage the Shivlinga of the temple of near
Few would know that in the narrow lanes of , , lies a Shiva temple at Dashashwamedh ghat near Sangam, which witnessed and played a role in ending the brutality of Mughal emperor Aurangzeb and his forces on temples. As per the priest of the temple and other religious gurus of the city, when Aurangzeb tried to damage this Shivlinga with his sword, blood came out whooshing from the linga following which the emperor decided not to damage any more temples.
ALL THE PURANAS MENTIONS THIS PLACE WHERE LORD BRAHMA, at the time making this Shristi (world) performed ASHWAMEGHA YAGNA on the banks of river Ganga. It was during the Yagna, Brahma placed Shivlinga at the temple and since times immemorable, the temple has a special place for the devotees coming to Prayag”, explains Pundit Anil Mishra, head priest of Gaudiya Math of the city. He adds, “It was during the medieval period that Aurangzeb and his army arrived at the temple and the emperor struck the Linga with his sword, but to his surprise, instead of breaking into two pieces, blood and milk came out whooshing from the linga”.
It was after this incident, the emperor laid down his weapon in front of the deity and decided not to damage any temple or religious place of worship in future.
“Although it is a common practice that damaged idol of deity or the khandit (damaged) shivlinga is not kept at the place of worship as the same is considered inauspicious, the story here is entirely different. The impression of the strike from the emperor’s sword is clearly visible on the linga and we believe that the miracle of the deity changed the heart of the Mughal emperor and this was the last temple which he or his army tried to damage ”, said Hari Shankar Pujari, the priest of the temple.
Likewise, Vikas Sharma, a local devotee of the temple says, “It is not about the stories of the legends but here we can see the proof right in the middle of the linga which makes our belief stronger”. NOWHERE IN THIS WORLD, ONE FINDS A SHIVLINGA THAT IS DAMAGED RIGHT INTO THE MIDDLE and still people worship it, he adds.
The popularity of the temple could be gauzed by the fact that during Mahashivratri, a lot of people, dressed in the attire of Kanwariya, offer holy water of river Ganga on this rare linga with their prayers and wishes.
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07/04/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
300-YEAR-OLD SHIVA LINGAM FOUND IN FARMLAND
A farmer from , a village in , dug up a five feet tall Shiva Lingam on Friday evening not knowing that he had unearthed a treasure that is believed to be 300-year-old.
Puduppattan (56), levelling his field for agricultural purpose using an earthmover, stopped the work when the tractor struck a hard object under the soil. Much to the surprise the farmer and other local people found a stone idol at four feet depth with no platform. Some bricks were also found nearby the Shiva Lingam. Immediately they informed the revenue officials, who rushed to the place and inspected the idol.
Cyril Antony, former curator of Puducherry museum, who visited the place following the invitation from revenue officials, said the idol may be more than 300 years old.
“Shiva Lingam normally will have a platform (which is known as the ‘yoni peeda’), which is missing here. A detailed search in the area might be helpful to find the missing parts if any, which can be done with the help of Archeological Survey of India. An assumption is that it might be belonging to later Chola period. Better to wait for ASI to do a scientific study,” as Mr Antony told.
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07/04/2021
OF SHIVLINGA .. CONTINUES
ANCIENT TEMPLE AND LINGAM RESURFACE IN RIVER !!!
Remains of an ancient Shiva temple, submerged in Baitarani river, have resurfaced in block, . The discovery of the temple and a three feet long Sahashra lingam was made during sand mining on the river bed near temple last month.
Locals said the lingam was partially visible during Shivaratri when a JCV machine was digging sand on the river bed. When water further receded, the lingam became visible near the ruins of the ancient temple.
“Three ancient structures of a Shaivite shrine including the lingam resurfaced during lifting of sand in the mid-river, around 200 metre from the famous Siddheshwar temple,” said Rabindra Dikhit, a local.
Meanwhile, considering it to be some divine intervention, locals and residents of nearby villages have started thronging the place to offer prayers to the lingam. The locals demanded a detailed investigation of the temple remains by the Archaeological Survey of India (ASI). It is believed that the Shiva temple submerged in Baitarani when the river changed its course.
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