Aparna Srivastava

Aparna Srivastava

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05/10/2023

गौरा काकी समय से पहले हीं आ गई.. झाड़ू पोंछा तो नौ बजे के बाद लगाती हैं.. बच्चों के स्कूल और पतिदेव के ऑफिस जाने के बाद हीं घर की अफरातफरी खतम होती है.. मैं चाय चढ़ा देती हूं तब तक गौरा काकी आ जाती हैं.. दो ब्रेड या मेरी गोल्ड बिस्किट के साथ गौरा काकी को चाय पकड़ा मैं भी फोन का नेट ऑन कर शांति से चाय का स्वाद लेती हूं.. गौरा काकी कभी मुहल्ले की खबर तो कभी अपने बेटे श्रवण की बातें बताती हैं और मैं मुस्कुरा कर हां हूं करती हूं..
पर आज आठ भी नही बजे हैं और गौरा काकी.. अरे काकी आप इतनी जल्दी.. काकी की सूजी हुई आंखें देख चुप हो जाती हूं…एक ग्लास पानी लाकर देती हूं, काकी अभी आती हूं... एक मिनट भी इधर से उधर हुआ तो स्कूल वैन वापस चली जायेगी.. लंच छूटा तो पूरे दिन अफसोस.. अजीब दुविधा में फंसी जल्दी जल्दी काम निपटा रही थी पर दिमाग गौरा काकी के इर्द गिर्द हीं घूम रहा था...
खैर सब जल्दी जल्दी निपटा चाय लेकर काकी के पास आई.. क्या हुआ अब बताइए मुझे.. गौरा काकी बिलख बिलख कर रोने लगी.. मैने पूछा श्रवण बहु और बच्चे ठीक है न काकी.. श्रवण काकी का इकलौता पुत्र.. सर हिलाया हां में.. संतोष हुआ चलो सब ठीक है ..
रोते रोते अस्पष्ट शब्दों में काकी ने रुक रुक कर दुःख सुनाया... मैं आश्चर्य चकित रह गई..
गौरा काकी तीन साल का विधवा पेंशन जमा की थी पोस्ट ऑफिस में. दो घर काम करती थी.. जो पैसा मिलता उसमें से कुछ पैसे रखकर बाकी जमा कर रही थी.. वर्षों से उनकी इच्छा थी चार धाम की यात्रा करने की.. पति ने वादा किया था पर असमय मृत्यु के कारण ये इच्छा अधूरी रह गई.. उनके साथ की लगभग सभी जान पहचान वाली कहीं न कहीं तीर्थ स्थल पर जा कर आ गई थी.. पर उनके उपर जिम्मेदारियां इतनी हावी हो गई थी कि अपनी इच्छाएं दब सी गई थी..
जी जान लगाकर बेटा को पढ़ाया, अपने भूखे रहकर बेटा को भरपेट खिलाया.. कर्ज लेकर बेटा को आईटीआई कराया..बेटा आईटीआई कर एक फैक्ट्री में इलेक्ट्रिसीयन के लिए चुन लिया गया... फैक्ट्री के सुपरवाइजर ने अपनी बेटी से उसका रिश्ता तय कर दिया.. गौरा काकी को श्रवण सूचित कर दिया.. इस तिथि को शादी है.. सारी तैयारी ससुराल वालों ने की... क्योंकि वो आर्थिक रूप से मजबूत थे..काकी के दिल के अरमां दिल में हीं रह गए..
शादी के बाद ससुराल वालों ने अपने पास हीं घर दिलवा दिया... श्रवण ने काकी से कहा फैक्ट्री नजदीक है इसलिए... काकी एक बार बहुत हुलसकर गई पर वहां परायेपन के अहसास से आहत हो जल्दी हीं वापस आ गई... अकेले रहने की आदत थी बहु को.. सास का आना नागवार लग रहा था.. उसने जानबूझकर परेशान करना शुरू कर दिया...
समय गुजरता गया श्रवण दो बच्चों का पिता बन चुका था.. गौरा काकी श्रवण की पढ़ाई के लिए लिए कर्जे से तीन साल पहले मुक्ति पाकर चार धाम की यात्रा के लिए पैसे जोड़ रही थी.. टिकट करवाने का #झांसा देकर #श्रवण ने गौरा काकी के साथ जाकर पोस्ट ऑफिस से पैसे निकाल अपने बेटे के प्राइवेट स्कूल में एडमिशन करवाने में लगा दिया.…बहाना बनाया तुम्हारा पोता का अगर इस बार एडमिशन नहीं होता तो एक साल पिछड़ जाता.. तुम एक साल बाद हीं चार धाम की यात्रा करोगी तो क्या अंतर पड़ेगा..
मन हीं मन सोचा नाम तो गौरा काकी ने श्रवण रखा पर….
काकी भले हीं मुंह से कोई बद्दुआ नही दे पर उनके आंसू....
उन्हत्तर साल की गौरा काकी जिन्होंने एक एक पैसा जोड़कर रखा था... एक झटके में बेटा कैसे धोखा देकर ले लिया ओह... मैं निः शब्द थी... काकी अंदर से टूट कर बिखर रही थी.. उनका सपना उनके अपने बेटे ने चकनाचूर कर दिया था... कितना बेबस हो जाता है इंसान अपनों से छले जाने पर.. काकी निरीह बेजान सी शून्य में देख रही थी और मैं उन्हें...

03/10/2023

*4 पैसे क्यों ज़रूरी हैं ?❓*

```बचपन में बुजुर्गों से एक कहानी सुनते थे कि...
इंसान 4 पैसे कमाने के लिए मेहनत करता है या...```
```बेटा कुछ काम करोगे तो 4 पैसे घर में आएँगे या...
आज चार पैसे होते तो कोई ऐसे ना बोलता,```

*आख़िर क्यों चाहिए ये चार पैसे और चार ही क्यों तीन या पाँच क्यों नहीं?❓*

*तीन पैसों में क्या कमी हो जायेगी या पांच से क्या बढ़ जायेगा?❓*

*आइये... समझते हैं कि इन चार पैसों का क्या करना है?*

*पहला पैसा भोजन है,*

*दूसरे पैसे से पिछला कर्ज़ उतारना है,*

*तीसरे पैसे का*
*आगे क़र्ज़ देना है* *और*

*चौथे पैसे को कुएं में डालना है।*

*4 पैसों का रहस्य*

*1) भोजन:-*
अर्थात अपना तथा अपने परिवार पत्नी, बच्चों का भरण-पोषण करना, पेट भरने के लिए।

*2) पिछला क़र्ज़ उतारना:-*
अपने माता-पिता की सेवा के लिए उनके द्वारा किए गये हमारे पालन-पोषण कर्ज़ उतारने के लिए।

*3) आगे कर्ज़ देना:-*
सन्तान को पढ़ा-लिखा कर क़ाबिल बनाने के लिए ताकि आगे वृद्धावस्था में वे आपका ख़्याल रख सकें।

*4) कुएं में डालने के लिए:-*
अर्थात शुभ कार्य करने के लिए दान, सन्त सेवा, असहायों की सहायता करने के लिए, यानि निष्काम सेवा करना, क्योंकि हमारे द्वारा किए गये इन्हीं शुभ कर्मों का फल हमें इस जीवन के बाद मिलने वाला है।

इन कार्यों के लिए हमें चार पैसों की ज़रूरत पड़ती है,
यदि तीन पैसे रह गए तो कार्य पूरे नहीं होंगे और पाँचवे पैसे की ज़रूरत ही नहीं है।

*यही है 4 पैसों का गणित*

#रिपोस्ट

03/10/2023

#मां_का_श्राद्ध

"सर मुझे कल की छुट्टी चाहिए।"
सुनील ने अपने बॉस अभिषेक से कहा।

"सुनील तुम्हें पता है दो दिन बाद रिपोर्ट सबमिट करनी है। छुट्टी का तो सोचो ही मत।" बॉस ने सुनील से कहा।

सर मजबूरी ना होती तो मैं कभी नहीं कहता। सुनील ने कहा।

" ऐसी क्या मजबूरी है सुनील? बॉस ने पूछा
सर कल मेरी मां का श्राद्ध है।

सुनील बोला।

ठीक है, सुबह दो घंटे लेट आ जाना । पंडित को खाना खिलाकर। बॉस ने कहा।

नहीं सर मैं पंडित को खाना नहीं खिलाता।
बॉस ने सुनील को बीच में ही टोका, तो क्या करते हो?

मैं महिला वृद्ध आश्रम जाता हूं। उन महिलाओं को अपने हाथ से खाना परोसता हूं ।
फिर तीन-चार घंटे उनके साथ ही बिताता हूं । सुनील ने आराम से बताया। ।

पर सुनील श्राद्ध में तो पंडित वगैरह को ------आधा वाक्य बॉस मुंह में ही रख गया।

आप ठीक कह रहे हैं सर।
पर मुझे लगता है मां के श्राद्ध पर वृद्ध महिला आश्रम से अच्छी जगह तो हो ही नहीं सकती ।
सुनील ने कहा ।

वह कैसे ? सुनील ।
बॉस एकदम बोला।

"उन्हें मेरे में अपना बेटा दिखता है और मैं उनकी बातों में अपनी मां पा जाता हूं।

जब मैं उनके साथ बैठता हूं तो वैसी ही हिदायतें और फिक्र उनकी बातों में होती है जो मां की बातों में होती थी।
उनकी छोटी-छोटी समस्याएं होती हैं सर। सुन लेता हूं।
हल करने की पूरी कोशिश करता हूं।

उनके चेहरे पर जब खुशी आती है तो लगता है ऊपर मां मुस्कुरा रही है और कह रही है ।शाबाश मेरे लाल, इन माँओं की यूं ही सेवा करते रहना। सुनील की आवाज में एक सकून था ।

तुम धन्य हो सुनील, बहुत अच्छी सोच है तुम्हारी।
तुम जाओ । काम हम रात को देर तक बैठकर निपटा लेंगे।

बॉस के शब्दों में शाबाशी जैसे भाव थे।

01/10/2023

* बहु हम तुम्हारे साथ नहीं बल्कि तुम हमारे साथ रहती हो*

संध्या आरती का समय हो चुका था। निर्मला जी और उनके पति भंवरलाल जी ने घर में दीया बत्ती की और फिर संध्या आरती के लिए मंदिर चले गए जो कि घर के पास ही था। पर जाने से पहले घर की बहू सुनीता को आवाज़ लगा गए कि हम मंदिर जाकर आ रहे हैं। लेकिन सुनीता अपने कमरे से निकलकर बाहर ही नहीं आई।
वो अक्सर ही ऐसा करती थी। इसलिए निर्मला जी और भंवर लाल जी ने दरवाजा बंद किया और अपने दो साल के पोते समर को लेकर दोनों वहां से रवाना हो गए। जब तक दोनों लौट कर वापस आए तब तक बेटा सूरज भी घर पर आ चुका था। उसे देखते ही भँवरलाल जी खुशी खुशी प्रसाद लेकर उसकी तरफ बढ़े,
" अरे बेटा, तु आ गया। ले प्रसाद खा। आज तो मंदिर में बहुत ही सुंदर झांकी सजी थी। समर तो देखते ही खुश हो गया। तू और बहू भी जाकर देख आ"
लेकिन सूरज ने प्रसाद ना लेकर चिल्लाना शुरु कर दिया,
" पापा, कब तक चलेगा ये सब। आप लोगों को घर की शांति रास नहीं आती ना। अब मैं ऑफिस में काम करूं या फिर आप लोगों के घर के मैटर सॉल्व करता फिरुँ"
उसकी बात सुनकर जैसे भंवर लाल जी को जोरदार झटका लगा हो। वो चुपचाप जड़त्व वही खड़े रह गए। तब निर्मला जी बोली,
" अरे बात क्या हुई है वो तो बता। क्यों चिल्ला रहा है"
" अच्छा! नाटक तो आप ऐसे कर रही है जैसे आपको कुछ पता ही नहीं है। कब तक मैं आप लोगों का बोझ अपने सिर पर ढोती रहूं। नौकरानी बनाकर रख दिया है मुझे। आप अलग क्यों नहीं हो जाती। कम से कम हम तो आजादी से जिंदगी जिए। खुद की जिंदगी तो जी ही ली। अब शांति से हमें तो रहने दो"
सूरज के बोलने के पहले ही सुनीता बीच में बोल पड़ी। उसकी बात सुनकर निर्मला जी हैरानी से पूछने लगी,
"बेटा मुझे तो अभी भी समझ में नहीं आ रहा है कि तू किस बात से नाराज है। और हमने ऐसी कौन सी टोका टाकी की है तुझ पर जिससे तेरी आजादी में खलल पड़ गया"
निर्मला जी ने कहा तो सुनीता ने सूरज की तरफ पलट कर कहा,
" देख लो अपनी मां के नाटक। आपको तो यही लगता है कि ये मुझ पर टोका टाकी नहीं करती है। अरे सुबह सिर्फ इतनी सी बात थी कि मैं दाल चावल बना रही थी। बहुत दिनों से खाने की इच्छा कर रही थी। लेकिन तुम्हारी मां ने मुझे बनाने तक नहीं दिया। अब बताओ क्या मैं अपनी मर्जी से दाल चावल बना कर नहीं खा सकती। यही औकात है मेरी इस घर में"
कहती कहती सुनीता आंखों में आंसू भर लाई। जिसे देखकर सूरज और भड़क गया,
" मां बहू को बेटी नहीं समझती हो तो बहू तो समझो। आखिर वो भी इंसान है। अरे एक दाल चावल की क्या औकात जो आपने इतनी सी बात पर इसका दिल दुखा दिया। मेरी कमाई का क्या फायदा अगर मेरी ही पत्नी दाल चावल के लिए तरस रही है तो"
सूरज की बात सुनकर निर्मला जी ने इतना ही कहा,
" मैंने बहू को दाल चावल बनाने के लिए मना नहीं किया था। मैंने सिर्फ ये कहा था कि बहू हमारे लिए रोटी बना लेना क्योंकि हमें चावल पचते नहीं है"
" हाँ तो? इसका तो यही मतलब है ना कि आपने मुझे रोटी बनाने के लिए कहा, चावल नहीं"
" बहु बात का क्यों बतंगड़ बना रही हो। मतलब तो तुमने अपनी मर्जी से निकाला हैं"
अब की बार भंवर लाल जी ने कहा।
" पापा आप बीच में मत बोलिए। अभी मैं आपसे बात नहीं कर रहा हूं"
सूरज ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की तो भंवर लाल जी ने पलटकर कहा,
" क्यों ना बोलूं? जब तुम अपनी पत्नी के लिए बोल रहे हो तो मैं भी अपनी पत्नी के लिए बोलूंगा"
" तो फिर ठीक है पापा। आप अपने ईगो के साथ खुश रहिए। हमें अपनी आजादी के साथ खुश रहने दीजिए। हमें नहीं रहना आपके साथ। हम अलग हो जाएंगे"
सूरज ने दो टूक जवाब दिया।
" ठीक है, तुम अलग होना चाहते हो तो अलग हो जाओ। क्या हमें समझ में नहीं आ रहा है कि आए दिन छोटी-छोटी बातों पर जो बतंगड़ हो रहा है घर में, वो किस लिए हो रहा है"
कहकर भंवर लाल जी अपने कमरे में आ गए। पीछे-पीछे निर्मला जी समझाने के लिए कमरे में आई तो भंवर लाल जी ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया,
" निर्मला अपनी मां की ममता से उठ कर देखो। तुम्हें समझ नहीं आ रहा कि रोज छोटी-छोटी बातों पर बतंगड़ क्यों बन रहा है। घर में तमाशा होता है। क्यों नहीं समझती कि वो लोग तो हम लोगों के साथ रहना ही नहीं चाहते। और सबसे बड़ी बात उन्हे यह गलतफहमी है कि हम लोग उनके साथ रहते हैं, तो हमारा खर्चा वो लोग उठा रहे हैं"
आखिर भंवर लाल जी के कहने पर निर्मला जी भी चुप हो गई। आखिर कुछ दिनों से यही सब तो हो रहा था घर में।
कल घर में मटर पनीर की सब्जी बनी थी तो सुनीता ने निर्मला जी और भंवर लाल जी को खाना परोसा। उनकी थाली में सिर्फ मटर थे, पनीर का एक टुकड़ा तक नहीं था। जब निर्मला जी ने कहा तो सुनीता ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा,
" माँ जी पनीर इतना सा ही था, समर ने खा लिया"
तब भी निर्मला जी चुप हो गई। अब क्या इतना भी उन्हें समझ में नहीं आता कि एक दो साल का बच्चा जो कि खाना भी खुद से नहीं खाता, अकेले ही भला ढाई सौ ग्राम पनीर खा सकता है क्या, वो भी सब्जी में डाला हुआ?
और भी ऐसी कई सारी छोटी छोटी बातें जो अक्सर घर में होने लगी थी। निर्मला जी और भंवर लाल जी को समझ में आ रहा था कि आखिर दोनों क्या चाहते हैं पर फिर भी दोनों चुप थे। लेकिन आज तो सूरज ने मुंह पर बोल ही दिया।
खैर, दूसरे दिन ही सूरज और सुनिता ने अपना सारा सामान ऊपर वाले माले में शिफ्ट कर लिया। दोनों के ही माथे पर कोई शिकन तक नहीं थी। बल्कि चेहरे पर एक सुकून था। जैसे उनकी मन की मुराद पूरी हो गई हो। उस समय हैरान परेशान बस घर में कोई था तो वो थी निर्मला जी। जो उन्हें रोकने की पूरी कोशिश कर रही थी। पर कोई रूकना चाहे तो रुके ना, जिसके मन की मंशा पूरी हो वो भला क्यों रुके।
निर्मला जी ने बड़ी उम्मीद से भंवर लाल जी की तरफ देखा कि वो बच्चों को रोक लेंगे लेकिन वो तटस्थ खड़े रहे।
अब तो सुनीता और और सूरज की मौज ही मौज थी। लेट तक सोना, मन हुआ तो घर पर खाना बनाया नहीं तो बाहर से मंगा लेना, कुछ दिन तो जैसे ऐशो आराम में ही बीते। यहां तक कि समर को अपने मायके छोड़ कर आए दिन शॉपिंग करना, बाहर घूम कर आना, बाहर ही खाना खाकर आना, कुछ दिन तो ये सब अच्छा लगा।
लेकिन लोग भूल जाते हैं कि रहना तो उन्हें धरती पर ही है। हर इंसान की अपनी एक सीमा होती है। जैसे ही पंद्रह बीस दिन बीते, सुनीता के मायके में उसकी भाभी ने साफ कह दिया कि रोज-रोज बच्चे को यहाँ छोड़कर ना जाया करें। हमें भी बहुत से काम होते हैं। इतना ही घूमने फिरने का शौक है तो बच्चे को अपने साथ लेकर ही घुमा फिरा करो।
यहां तक कि ऑफिस लेट पहुंचने के कारण और आए दिन छुट्टी लेने के कारण भी सूरज को ऑफिस में अच्छी खासी डांट पड़ चुकी थी।
अब जाकर आटे दाल का भाव पता चल रहा था। कभी सिलेंडर तो कभी बिजली का बिल, कभी सब्जियां तो कभी घर का राशन, छोटे बच्चे के साथ आए दिन के खर्चे। दिन में ही दोनों को तारे नजर आने लगे थे। आए दोनों में चिक चिक शुरू हो गई।

पहले तो भंवर लाल जी घर का अधिकतर खर्चा उठा लेते थे तो अपने पास होती सेविंग को देखकर दोनों को लगता कि हम सब खर्चा उठा सकते हैं। लेकिन अब असलियत पता चल रही थी।
अभी दोनों चिक चिक करके मुंह फुला कर बैठे ही थे कि इतने में निर्मला जी ने दरवाजा खटखटाया। सूरज में जाकर दरवाजा खोला तो निर्मला जी को खड़ी देखकर हैरान रह गया। इससे पहले कि वो कुछ बोलता निर्मला जी ने बिजली का बिल निकाल कर उसे देते हुए कहा,
" बेटा ये बिजली का बिल आया है, इसे जमा करवा देना"
कहकर वो वापस नीचे आ गई।
" ये क्या ₹5000 का बिल?"
₹5000 का नाम सुनते ही सुनीता भी खड़ी हो गई। अब सूरज और सुनीता भी नीचे आ गए। और आते ही सुनीता बोली,
" ये क्या है पापा जी, आपने ये बिजली के बिल हमारे पास क्यों पहुंचा दिया? हम क्यों आपका बिल भरेंगे"
उसकी बात सुनकर भंवर लाल जी बोले,
"देखो बहू हमारे हिस्से का बिल हम दे रहे हैं। ये तो तुम्हारे हिस्से का बिल है। तुम शायद भूल रही हो कि दोनों माले के मीटर अलग-अलग है"
" अरे तो ₹5000? क्या हम ₹5000 की बिजली फूँक गए? जरूर आपका बिल भी उसी में मिला हुआ होगा"
सुनीता अभी भी मानने को तैयार नहीं थी। भँवर लाल जी मुस्कुरा कर बोले,
" बहु ये जो तुम रात रात भर टीवी देखती हो, पंखे कूलर चालू करके छोड़ जाती हो तो बिजली का बिल इतना आएगा ही ना। वैसे भी पाँच हजार तो बहुत कम है। कई बार तो आठ हजार दस हजार का बिल आता था, जो मैं भरता था"
अब तो सुनीता की आवाज तक नहीं निकल रही थी।
" ऐसे कैसे घर चलेगा भला"
अचानक सूरज ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा
" बेटा तुम्हें लगता है ना कि घर के बड़े बुजुर्ग बहुत टोका टाकी करते हैं। असल में वो लोग होते हैं तो तुम कई चीजों से बच जाते थे। कई चीजों के खर्चे तो हम ही करते थे पर तुम्हें लगता था कि तुम हमें संभाल रहे हो। हमारी जिम्मेदारी उठा रहे हो। पर बहु तुम ये भूल गई कि तुम हमारे साथ रहती थी, हम तुम्हारे साथ नहीं"
" माँ जी मुझे माफ कर दो। मुझे सब समझ में आ गया। मायके वालों से रिश्ते बिगड़े सो अलग, यहाँ खुद की गृहस्थी भी नहीं संभाल पाई"
सुनीता ने माफी मांगते हुए कहा तो सूरज बोला,
" मां क्या हम दोबारा साथ नहीं रह सकते"
" नहीं बेटा, तुम अपने आजादी के साथ रहो। हमें अपने हिसाब से रहने दो"
अब की बार भँवरलाल जी ने कहा।
" पर पापा गलती तो बच्चों से ही होती है। माफ कर दो"
सूरज ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
" देख बेटा, तू मेरा बेटा है इसलिए तुझे माफ भी कर दिया। लेकिन रही बात साथ रहने की तो अब नहीं। एक बार बर्दाश्त कर चुके पर अब बर्दाश्त नहीं होगा। और वैसे भी तुम्हें गृहस्थी संभालनी आनी ही चाहिए। हम लोगों की छांव में तुम ये सब नहीं सीख पाए। एक ही मकान में तो है, माले अलग हुए तो क्या हुआ। भविष्य का मुझे पता नहीं। लेकिन अभी फिलहाल तो दोबारा एक साथ नहीं"
आखिर भंवर लाल जी के कहने पर सूरज उनकी बात को समझ गया और चुपचाप उनके पैर छूकर ऊपर वाले माले पर चला गया।
अब कम से कम एक ही बिल्डिंग में अलग-अलग माले पर रहने के बावजूद वो लोग एक तो थे।

01/10/2023

*बहू मैं अपने बेटे से भरण पोषण मांगने का हक रखती हूं *
नेहा अंदर कमरे में तैयार हो रही थी और विनीत उसका बाहर इंतजार कर रहा था। घड़ी की तरफ देखते हुए उसने नेहा को आवाज लगाई,
"अरे मैडम, और कितनी देर लगेगी? पार्टी खत्म हो जाएगी तब आओगी क्या?"
" हां हां आ रही हूँ। इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो? अब तैयार भी ढंग से ना होऊँ क्या?"नेहा तैयार होती होती अंदर कमरे में से ही बोली।
" अब देख लो, तुम्हारा ही मायका है। वो लोग क्या सोचेंगे कि मैं तुम्हें इतना लेट लेकर आया हूं। कहीं ये ही ना सोच ले कि तुम्हें मायके नहीं आने देता"
विनीत ने सोफे पर बैठते हुए कहा तो नेहा ने अंदर से ही जवाब दिया,
" अरे जनाब, अगर अच्छे से तैयार होकर नहीं जाऊंगी तो वो लोग ये भी कह सकते हैं कि तुम मुझे ढंग से नहीं रखते हो। फिर ना कहना कि तुमने तो अपने मायके मेरी हँसाई करा दी"
और जोर से हँस दी। विनीत भी मुस्कुरा कर रह गया। तभी अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई तो नेहा ने अंदर से विनीत को आवाज लगाई,
" विनीत जरा देखना तो कौन आया है"
" जैसा आप कहें मालकिन"
कहता हुआ विनीत उठा और जाकर दरवाजा खोला तो सामने कोई कुरियर वाला खड़ा था। उसने विनीत को देखते ही उससे पूछा,
" मिस्टर विनीत के नाम कोरियर है। क्या वो यहीं रहते हैं?"
" हां हां, मैं ही हूं। लाओ दो भाई किसने क्या भेजा है। जरा देखूँ तो"
कोरियर वाले ने उसे वो कुरियर पकड़ाया। उसके सिग्नेचर लिए और वहां से निकल गया। विनीत कुरियर खोल कर देखने लगा तो उसके नाम एक नोटिस था। जिसे पढ़ते ही उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी।
तभी अंदर से आते हुए नेहा ने कहा,
" लो हो गई तैयार। बस अब निकलते हैं। वैसे कौन आया था विनीत"
पर विनीत ने कोई जवाब नहीं दिया। अभी भी वो उस पेपर को दोबारा पढ़ रहा था। उसे बिल्कुल चुप देखकर नेहा ने फिर पूछा,
" क्या हुआ विनीत, मैं तुमसे पूछ रही हूं। ऐसे क्या आँखे फाड़कर इस पेपर को पढ़ रहे हो। अब देर नहीं हो रही है क्या?"
विनीत ने नेहा की तरफ देखा और वो पेपर उसके हाथ में पकड़ा दिया। नेहा ने भी उस पेपर को पढ़ा तो उसके चेहरे पर गुस्सा दिखने लगा। और वो विनीत से बोली,
" ये औरत ऐसा कैसे कर सकती है? बिल्कुल चैन नहीं है इसे। खुद की जिंदगी तो सुख चैन से जी ली, अब हमारी जिंदगी को जहान्नुम बना रखा है। पूरा मूड अपसेट कर दिया। कह देती हूँ एक पैसा नहीं देने वाली मैं उस औरत को"
विनीत अब भी चुप ही खड़ा था। उसको चुप देखकर नेहा भड़कते बोली,
" अब बोलो भी करना क्या है?"
" मैंने पहले ही कहा था कि रबड़ को भी उतना ही खींचो जितना वो खींच सकें। लेकिन नहीं, तुम्हें तो पूरा रबड़ तोड़ने की लगी थी। अब मुझसे क्या पूछ रही हो कि करना क्या है?"
विनीत ने भी भड़कते हुए कहा।
विनीत के चिल्लाने पर नेहा भी गुस्से में पैर पटकती हुई अंदर कमरे में चली। दोनों ने अपना जाना कैंसल कर दिया। थोड़ी देर बाद विनीत उस नोटिस को लेकर कमरे में गया और नेहा से बोला,
" अब बैठी क्या हो? चलो मामा जी के घर चलते हैं"
" मुझे नहीं जाना तुम्हारे मामा के घर पर। और उस औरत की शक्ल तो मुझे बिल्कुल भी नहीं देखनी। पता नहीं अपने आप को समझती क्या है? "
" कोर्ट के चक्कर लगाओ, उस से बेहतर है मामा जी के घर चले चलो"
विनीत में जब दो टूक बात की तो नेहा मन मार कर उठी और विनीत के साथ उसके मामा जी के घर के लिए रवाना हो गई।
कार चलाते समय विनीत को याद हो आया अपना बचपन जो कि काफी गरीबी और तंगहाली में गुजरा था। पिता की जब मौत हुई थी तो ले देकर उनके पास दो कमरे का घर था। मां शिमला भी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, इस कारण वो दूसरों के घर खाना बनाने का काम करने लगी। हालांकि उसके नाना जी ने काफी कहा कि विनीत को हम रख लेंगे और तुम्हारी दूसरी शादी करवा देते हैं। पर विनीत के लिए वो तैयार नहीं हुई।
विनीत पढ़ने में अच्छा था। इसलिए वो उसमें ही अपना भविष्य देखती थी। उसे पढ़ा-लिखा करके बड़ा आदमी बनाना चाहती थी। ऐसा नहीं था कि उन्होंने अकेले ने मेहनत की विनीत को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में उसके ननिहाल का बहुत योगदान रहा इन सब में।
नाना नानी के बाद मामा मामी ने भी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। आखिर सब की मेहनत रंग लाई और वो पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पा गया।
नौकरी लगने के साथ ही शिमला ने अपने बेटे विनीत के लिए नेहा को पसंद कर लिया और उसे अपने घर की बहू बनाकर अपने घर ले आई। विनीत ने काफी मेहनत करके अपना बड़ा सा मकान भी बना लिया। दो साल बाद दोनों एक बेटे के माता-पिता भी बन गए। कहते हैं जब सब कुछ अच्छा होता है तो इंसान का दिमाग भी घूमता हैं।
अब नेहा का स्वभाव बदलने लगा था। उससे शिमला जी की सेवा नहीं होती थी। बात-बात पर उन्हें ताने सुनाना उसकी आदत हो चुकी थी। धीरे-धीरे उसने विनीत को भी अपने ही रंग में रंग लिया।
लेकिन हालात तब ज्यादा बिगड़ गए जब चार महीने पहले मामा जी की मृत्यु हुई। इधर शिमला जी तो अपने मायके आई हुई थी, उधर नेहा ने उनके आने के सारे रास्ते बंद कर दिए। नेहा जानती थी कि शिमला जी को सबसे बड़ा संबल अपने मायके वालों का था।पर अब मायके में ही कोई बोलने वाला नहीं है क्योंकि मामा जी तो अब रहे नहीं, तो जब पंद्रह दिन का सारा कार्यक्रम निपटा तो नेहा ने विनीत से कहकर शिमला जी को वृद्ध आश्रम ही भेज दिया।
पर अब छह महीने बाद शिमला जी की तरफ से नोटिस मामा जी के बेटे राजेश ने भेजा था। दोनों इसी बात को लेकर सकते में आ चुके थे। मतलब मां राजेश भैया के पास उनके घर पर है।
सोचते सोचते मामा जी का घर भी आ गया। वहां पहुंचे तो देखा की दरवाजा खुला हुआ है। राजेश और माँ बाहर सोफे पर ही बैठे हुए हैं। विनीत और नेहा को आया हुआ देखकर राजेश मुस्कुरा कर बोला,
" हमें पता था कि तुम लोग जरूर आओगे इसलिए तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे"
राजेश को इग्नोर करते हुए विनीत मां से बोला,
" मां यह सब क्या है? आपने अपने ही बेटे को नोटिस भेज दिया?"
माँ उस की तरफ देखते हुए बोली,
" इसमें गलत क्या है विनीत? मैंने तो नोटिस ही भेजा है तुमने तो मुझे वृद्धाश्रम भेज दिया था। यह तो शुक्र मनाओ कि मेरे भाई की छमाही थी तो मेरा भतीजा वृद्ध आश्रम में उस दिन लोगों को खाना खिलाने गया था जहां मैं उसे मिल गई। नहीं तो मेरी पूरी जिंदगी वृद्ध आश्रम में ही बीतती"
तभी नेहा बोली,
" हां तो शौक से रहिए ना अपने मायके में। हमारी छाती पर मूंग क्यों दल रही है आप"
" मेरे मायके वालों को तो मैं अखर नहीं रही हूं बहू। वो मुझे किसी चीज के लिए मना नहीं करते। कम से कम मेरी किस्मत इतनी अच्छी तो है। लेकिन मुझे भी तो रहने के लिए अपनी छत चाहिए, अपने खर्च के लिए पैसे चाहिए। जब मैंने अपनी पूरी जिंदगी इस को पालने पोसने में लगाई है तो उसका हर्जाना दूसरों से क्यों मांगू"
विनीत के कुछ कहने से पहले ही नेहा बीच में बोल उठी,
" किस चीज के पैसे दे आपको? आपके पास था ही क्या? कोई प्रॉपर्टी नहीं थी आपके पास और मकान भी हमने बनवाया है। विनीत पति है मेरा। एक पैसा नहीं देने दूँ मैं आपको"
" बहु तेरा पति तुझे मुबारक हो, मुझे तो मेरे भरण-पोषण के पैसे चाहिए। भीख नहीं मांग रही हूं, हक मांग रही हूं। तुम लोग खुद नहीं दोगे तो कोर्ट जा कर लूंगी, पर लूंगी जरूर। आखिर मैंने अपनी पूरी जिंदगी स्वाहा की है इसके लिए। चाहती तो मैं भी दूसरी शादी कर सकती थी। पर इसके लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया"
नेहा भी कहाँ चुप रहने वाली थी। बात को पलटते हुए बोली,
" आखिर आप भी दुनिया वालों के भड़काने में आ गई। अरे ये लोग तो पराए है माँ जी, लेकिन हम तो आपके अपने थे। आप हम लोगों से कोर्ट के चक्कर लगवाओगी?"
उसकी बात सुनकर मां मुस्कुराते हुए बोली,
" वाह बहू! आज ये पराए हो गए और तुम अपनी?जब कि तुम भूल गई मुझे घर से भी तुमने ही निकाला था। दर बदर की ठोकर खाने के लिए मुझे छोड़ दिया। यह तो भला हो इन लोगों का कि इन लोगों ने मुझे घर में जगह दी। तब तुम्हें याद नहीं आया था कि जो तुम काम कर रही हो वो कोर्ट से चक्कर लगाने के लायक ही है"
तभी राजेश बोला,
" देख विनीत, मुझे नेहा से कोई बात नहीं करनी। अब तू बता, बाहर ही सेटलमेंट करेगा या कोर्ट चलेगा। तुम लोगों को बुआ को घर में रहने के लिए छत देनी ही पड़ेगी, भरण पोषण के पैसे देने पड़ेंगे, उनके खर्चे उठाने पड़ेंगे। नहीं तो हम कानून का सहारा ले रहे हैं। और तुम पढ़े लिखे हो, कानून तुम भी जानते हो। क्या होगा, तुम्हें भी अच्छे से पता है"
इससे पहले नेहा कुछ कहती विनीत ने उसे इशारा करके चुप करा दिया और राजेश ने बोला,
" ठीक है, मैं तैयार हूं। क्या चाहते हैं आप"
" ज्यादा कुछ नहीं। तुम्हें बुआ को रहने के लिए अपने घर में कमरा देना पड़ेंगा। साथ ही उनके गुजर बसर के लिए भरण पोषण देना पड़ेगा"
" जब घर में ही रह रही है तो गुजर-बसर के लिए अलग से पैसे क्यों?"
बीच में ही नेहा बोल पड़ी। तभी मां बोली,
" बहु मैं वहां रहूंगी जरूर पर अपना खाना पीना खुद ही कर लूंगी। मुझे तेरे टुकड़ों की जरूरत नहीं है"

आखिरकार पूरा मामला कोर्ट के बाहर ही सेटल किया गया। जिसके तहत शिमला जी को घर में रहने के लिए दो कमरे दे दिए गए। और भरण पोषण और बाकी खर्चा विनीत को ही उठाना पड़ा।

01/10/2023

एक इलेक्ट्रिशियन ऐसा भी
- जीवन भर की कमाई, साइकिल के थैले में समाई
- 84 साल की उम्र में भी स्वाभिमान से जीने की चाहत

17 सितम्बर, प्रेस क्लब में धाद संस्था की महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक गोष्ठी थी। यहीं मुझे एक बुजुर्ग मिले। काली पैंट, नीली शर्ट और उस पर मैचिंग टाई। लेडीज साइकिल पर सवार। उनके सलीके और साफ-सफाई को देख मैं प्रभावित हो गया। मैंने रोका और उनके बारे में जानना चाहा। कहने लगे, कभी फुरसत मिलेगी तो बात करेंगे। मैंने नंबर मांग लिया। कल दोपहर बाद खाली तो सोचा बात करूं। फोन किया तो पता चला कि वे सुभाष रोड पर हैं। मैं भी धर्मपुर में था तो मैंने उनसे कहा कि आता हूं। गुरुनानक वेडिंग प्वाइंट पहुंचा तो उन्हें साइकिल के साथ खड़ा पाया। काली पैंट, व्हाइट शर्ट और मैचिंग टाई पहने। हम दोनों वैडिंग प्वाइंट चले गये। मैं वहां दीवार के साथ बनी एक सीमेंट की सिल्ली पर बैठ गया और उन्हें एक कुर्सी पर बिठा दिया।

मैंने नाम पूछा, बोले प्रकाश नांगिया। क्या करते हो? इलेक्ट्रिशियन हूं। मैंने उन्हें उत्तरजन टुडे मैगजीन दी और कहा कि मैं उनका इंटरव्यू करना चाहता हूं। वह गौर से पत्रिका के पन्ने पलटने लगे। दो-तीन स्कूलों के एड थे। उन्हें देखकर बोले, इन स्कूलों में काम दिला दो। मैंने कहा, आप क्या काम कर सकते हो, बोले, बिजली का हर काम आता है। मसलन, पंखा, फ्रिज, एसी, वायरिंग आदि। बिजली वायर भी सप्लाई कर लेता हूं। इस बीच उनकी नजर पैंट पर गयी तो कुछ हल्की सी मिट्टी लगी थी। उसे झाड़ने लगे।

प्रकाश नांगिया 84वें साल में हैं। गर्व से बताते हैं कि उनके पिता युधिष्ठिर नांगिया पांच भाई थे। सभी के नाम महाभारत के थे। पिता बिजली का काम करते थे। प्रकाश की स्कूलिंग सेंट थॉमस, सेंट जोजफ और दून कल्चरल सेंटर जो कि अब हेरिटेज स्कूल है, उससे हुई। तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े थे। राजपुर रोड पर इलेक्ट्रिशियन की दुकान थी। मुझे कहा, लिखो नांगिया एंड कंपनी और हां, ब्रैकेट में लिखना (1932)। मैं होले से मुस्करा दिया। 1932 से शुरू की गयी दुकान वह आज भी चला रहे हैं लेकिन जीवन के थपेड़ों से पता नहीं क्या मिला कि आज भी किराए के मकान में रह रहे हैं। नांगिया सामाजिक मुद्दों में लगातार भागीदारी करते रहे हैं।

प्रकाश नांगिया ने शादी नहीं की। मैंने छेड़ा, ‘क्या किसी से प्यार हो गया था? धोखा दिया उसने?‘ बोले, निजी बातों में मत जाओ, लंबी कहानी है। वह कहते हैं कि संयुक्त परिवार था तो उतनी ही समस्याएं भी थी। पिता अक्सर बीमार रहते थे तो स्कूल से आने के बाद दुकान संभालते। मैंने कहा कि जवानी में कमाया धन कहां है? हौले से मुस्करा कर बोले, नुकसान हो गया। बताऊंगा फिर कभी। नांगिया सुबह नाश्ते में एक परांठा और चाय लेते हैं। दिन में कुछ नहीं खाते। रात को भी परांठा ही खाते हैं।

मैंने पूछा, अब महीने में कितना कमा लेते हो? बोले, कुछ तय नहीं। आज कितना कमाया, बोले, आज तो काम ही नहीं मिला। मैंने पूछा क्या आप चाय पीएंगे? स्वाभिमानी ऐसे कि बोले, चलो, पीते हैं, लेकिन बिल मैं दूंगा। हैं मेरे पास पैसे, कहकर पर्स निकालने लगे। मैंने कहा, नहीं, बिल मैं दूंगा, लेकिन वह नहीं माने तो मैंने चाय की बात यह कहकर टाल दी कि आपके घर आउंगा तो पियूंगा।

मैं और कुरेदना चाहता था लेकिन मंजे हुए खिलाड़ी की तर्ज पर उन्होंने कहा कि घर आओगे तो बताउंगा। फिर कुछ विजिटिंग कार्ड निकालकर मुझे दिये और कहने लगे, मुझ पर कुछ लिखना-विखना बाद में, पहले मुझे काम दिलवाओ। मैंने उन्हें वादा किया कि हरसंभव कोशिश करूंगा। जाते समय मैंने उनकी साइकिल के हैंडिंल में लटके बैग की ओर इशारा किया कि इसमें क्या है, मासूम सी हंसी के साथ बोले, बिजली के औजार हैं और कुछ कागज-पतर। मेरे जीवन भर की जमा-पूंजी..

01/10/2023

* मां भी बूढ़ी होती है*
" हे भगवान! मैं क्या दिन भर यही काम करने के लिए हूँ। सबके पास अपने काम है बस मैं ही अकेली फ्री हूं इस घर में "
सुलक्षणा जोर जोर से चिल्ला रही थी। उसकी आवाज सुनकर उसका पति मोहन कमरे के बाहर आया,
" क्या हो गया? तुम ऐसे क्यों चिल्ला रही हो?"
" संभालो अपनी मां को। फिर से सारा सामान बिखेर दिया। जब कोई काम होता ही नहीं है तो करती ही क्यों हैं?"
" सुलक्षणा क्या कह रही हो तुम? माँ बूढ़ी हो गई हैं। उनसे अब इतना काम नहीं होता है। हाथ काँपते हैं तो सामान बिखर जाता है"
" तो ना ही करें काम। हमने कब कहा काम करने के लिए। खामखाँ मेरा काम तो बढ़ जाता है ना"
" ठीक है, तुम चुप हो जाओ। मैं मां को समझाता हूं"
" क्या समझाते हो? एक तो सूरज और सुमित्रा ने वैसे ही दिमाग खराब कर रखा है ऊपर से मां। क्या करूं कुछ समझ में नहीं आता"
" तुम बस शांति बनाए रखो। नहीं तो बीमार पड़ जाओगी। बाकी मैं देखता हूं"
कहकर मोहन माँ के कमरे में चला गया। देखा तो मां कमरे की खिड़की के पास बैठी हुई खिड़की में से बाहर झांक रही थीं और खुश हो रही थीं। कभी ताली बजाती तो कभी उदास हो जातीं। मोहन ने खिड़की के पास जाकर देखा तो कुछ बच्चे बाहर खेल रहे थे। मां शायद उन्हीं को देख देख कर खुश हो रही थीं।
मोहन ने मां के सिर पर हाथ फेरा तो मां ने उसका हाथ पकड़ लिया और अपने पास ही बिठा लिया। दस मिनट तक दोनों मां-बेटे बस ऐसे ही बैठे रहे। फिर मोहन ने पूछा,
"मां खाना खाया?"
मां मोहन की तरफ एकटक देखने लगी। शायद उनकी आंखों में यह सवाल था कि बेटा तूने आज तक तो पूछा नहीं। भला आज कैसे? मोहन मां के इस सवाल को समझ चुका था। मन ही मन ग्लानि करते हुए मोहन ने दोबारा पूछा,
" मां तुमने खाना खाया?"
माँ ने नहीं में सिर हिला दिया। मोहन में सुलक्षणा को आवाज देकर मां के लिए खाना मंगाया। सुलक्षणा एक थाली में मां के लिए खाना डाल कर ले आई। माँ थाली लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाने लगी तो मोहन ने थाली अपने हाथ में ले ली,
" आज मैं अपनी मां को खाना खुद खिलाऊंगा, जैसे मां मुझे बचपन में खिलाती थीं"
मां अभी भी एकटक मोहन को देखे जा रही थीं पर कुछ कहा नहीं। मोहन ने रोटी का ग्रास मां के मुंह में डाला। रोटी खाते खाते मां की आंखों में आंसू आ गए,
" क्या हुआ मां, खाने में मिर्ची तेज है क्या?"
माँ ने नहीं में सिर हिला दिया।
" तो फिर?"
मां ने कुछ नहीं कहा। बस मोहन को गौर से देख रही थी,
" जानता हूं। बहुत इंतजार करवाया है, पर अब नहीं। अब हर रोज थोड़ी देर ही सही, मैं अपनी मां के साथ कुछ वक्त जरूर बिताऊंगा"
मां मुस्कुरा दी। मोहन ने खाना खिलाया और मां को लेटा कर अपने कमरे में आ गया जहां सुलक्षणा पहले से ही बैठी हुई थी।
" मां सो गई?"
" नहीं, बस अभी लेटा कर आया हूं। सो जाएगी। पता है, वह मुझे पहचान नहीं पा रही है, पर फिर भी आज मां के चेहरे पर सुकून था"
" क्यों नहीं होगा? एक मां तो अपने बच्चे के इर्द-गिर्द ही अपनी पूरी दुनिया बसा लेती है। जब वह दुनिया उसे छोड़कर जाती है ना, तो ऐसा लगता है कि सब कुछ छूट गया है। बस जान निकलना बाकी रहती है। और जब वह दुनिया उसके पास लौट कर आती है तो उसके मृत प्राय शरीर के अंदर जैसे किसी ने जान फूंक दी हो। वह वापस जिंदा हो जाती है"
कहते कहते सुलक्षणा की आंखों में आंसू आ गए,
" तुम सूरज को याद कर रही है"
" मां हूं। अब जाकर एहसास हुआ कि मैंने अपनी सास से क्या-क्या छीना था, जब मेरा बेटा मेरी बहु छिनकर ले गई। सच, हमारे कर्म वापस लौटकर आ रहे हैं"
" भगवान के लिए अब तुम रोओ मत। जब समझना चाहिए था तब हम लोग समझे नहीं। आज जब बेटा बहू घर से गए, तब जाकर समझ में आ रहा है कि हम कितने गलत थे। गलती तुम्हारी अकेली की कहाँ थी, मैं तो बेटा होकर भी नहीं समझ पाया। जो अपनी बीमार और बूढ़ी मां को वृद्धाश्रम छोड़ कर आ गया"
मोहन को याद हो आया वह दिन, जब अपनी बूढ़ी मां को वृद्ध आश्रम छोड़ कर आया था। कारण सिर्फ इतना सा था कि मां अब बूढ़ी हो चुकी थीं। पिताजी के जाने के बाद उनसे अब ना पहले जितना काम होता था और ना ही घर की देखभाल। इसलिए अपने बेटे बहु को वह बोझ लगने लगी थीं। इस कारण घर में आए दिन कलह होती रहती थी। तंग आकर आखिरकार मोहन मां को वृद्धाश्रम छोड़ ही आया। मां ने कितना रोई थी,
" मुझे अकेला छोड़कर मत जा। तेरे अलावा मेरा इस दुनिया में है ही कौन? भगवान के लिए अपनी मां पर तरस खा"
पर मोहन अपनी रोती बिलखती मां को अकेला छोड़ ही गया। बस यह सदमा मां के दिल पर बैठ गया था। अब वृद्धाश्रम से फोन आते थे,
"आपकी मां की तबीयत ठीक नहीं है। आपसे मिलना चाहती हैं"
पर मोहन और सुलक्षणा कोई ना कोई बहाना बनाकर टाल देते। एक दो बार वृद्धाश्रम वालों ने फोन किया कि आपकी मां की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। लेकिन जब मोहन और सुलक्षणा में मिलने की भी जहमत ना उठाई, तो आखिरकार उन लोगों ने फोन करना बंद कर दिया। और इधर मोहन और सुलक्ष्णा ने तो माँ का अस्तित्व ही भुला दिया।
लेकिन समय का पहिया तो चलता ही रहता है, आज आप जवान है तो कल आप भी बूढ़े होंगे ही। आखिर इतने सालों बाद खुद की बेटे बहू ने सिर्फ इसलिए अपनी अलग दुनिया बसा ली कि हमसे बूढ़े लोगों की सेवा नहीं होती। तब जाकर एहसास हुआ कि उन्होंने मां के साथ कितना गलत किया था।
जब दिल नहीं माना तो आखिर एक दिन मां को ढूंढते हुए वृद्धाश्रम पहुंच ही गए। जाकर देखा तो मां अब सिर्फ हड्डियों का पंजर रह गई थी। ना कोई होश था और ना ही कोई जिंदा रहने की ललक। हाथ पैर पहले से भी ज्यादा काँपने लगे थे। किसी से कुछ कहती नहीं, चुपचाप सी रहती है। जैसे तैसे मां को लेकर घर आए।
मां को लाए हुए भी एक महीने से ऊपर हो चुके थे पर अब भी वह मोहन को पहचानती ना थी। बस एक चीज थी, मां सबसे ज्यादा खुश होती थी जब आसपास के छोटे बच्चों को खेलते हुए देखती थी।
अचानक गिलास गिरने की आवाज से मोहन की तंद्रा टूटी। सुलक्षणा और मोहन दोनों उठकर मां के कमरे में गए। देखा तो गिलास गिरा पड़ा है और पानी फैला हुआ है। माँ एक कपडा लेकर पानी साफ करने की कोशिश कर रही थीं,
" रहने दो मां, हम साफ कर लेंगे"
" मेरा मोहन... खेलते हुए ......फिसल जाएगा। बहुत.... मस्ती करता है "
मां बराबर बड़बड़ाएं जा रही थीं। देखकर मोहन की आंखों में आंसू आ गए। सुलोचना की भी निगाहें नीचे हो गईं।
माँ सब कुछ भूल चुकी थीं। बस नहीं भूली थीं तो यह कि वह मां हैं। मां होने का एहसास अभी तक जिन्दा है। सच है, मां बूढ़ी होती है, पर मां होने का एहसास कभी बूढ़ा नहीं होता।

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