हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम
हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं
तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम
मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं
तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में
और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं
पस सर-ब-सर अज़िय्यत ओ आज़ार ही रहो
बेज़ार हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुम
जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो
तुम को यहाँ के साया ओ परतव से क्या ग़रज़
तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो
मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहा
तुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो
तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई
इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो
मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात
मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो
अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मिरे लिए
बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो
जब मैं तुम्हें नशात-ए-मोहब्बत न दे सका
ग़म में कभी सुकून-ए-रिफ़ाक़त न दे सका
जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं
जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बेवफ़ा के हैं
फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
Jaun alia
Mehfil-E-Mushaira
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20/03/2024
मुहब्बत में ज़रा सी बेवफ़ाई तो ज़रूरी है,
वही अच्छा भी लगता है जो वादे तोड देता है..!!
-- प्रो.वसीम बरेलवी
मुझ से बिछड़ के ख़ुश रहते हो,
मेरी तरह तुम भी झूटे हो.!!
इक दीवार पे चाँद टिका था,
मैं ये समझा तुम बैठे हो.!!
उजले उजले फूल खिले थे,
बिल्कुल जैसे तुम हँसते हो.!!
मुझ को शाम बता देती है,
तुम कैसे कपड़े पहने हो.!!
दिल का हाल पढ़ा चेहरे से,
साहिल से लहरें गिनते हो.!!
तुम तन्हा दुनिया से लड़ोगे,
बच्चों सी बातें करते हो.!!
~बशीर बद्र साहब
अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को
मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझ को
मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझ से बचा कर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझ को
तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझ को
मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मा'नी
ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को
मैं समुंदर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोता-ज़न भी
कोई भी नाम मिरा ले के बुला ले मुझ को
तू ने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुद-परस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझ को
बाँध कर संग-ए-वफ़ा कर दिया तू ने ग़र्क़ाब
कौन ऐसा है जो अब ढूँढ निकाले मुझ को
ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन दामन
कर दिया तू ने अगर मेरे हवाले मुझ को
मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे
तू दबे-पाँव कभी आ के चुरा ले मुझ को
कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तिरा आज सता ले मुझ को
बादा फिर बादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ 'क़तील'
शर्त ये है कोई बाँहों में सँभाले मुझ को
क़तील शिफ़ाई
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने
वैसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ
इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्म को तुझ से हैं उमीदें
ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए आ
अहमद फ़राज़
#शायरी #गजल #शेर #दिल #दुनिया #मोहब्बत
कई घरों को निगलने के बाद आती है
मदद भी शहर के जलने के बाद आती है
न जाने कैसी महक आ रही है बस्ती में
वही जो दूध उबलने के बाद आती है
नदी पहाड़ों से मैदान में तो आती है
मगर ये बर्फ़ पिघलने के बाद आती है
वो नींद जो तेरी पलकों के ख़्वाब बुनती है
यहाँ तो धूप निकलने के बाद आती है
ये झुग्गियाँ तो ग़रीबों की ख़ानक़ाहें हैं
कलन्दरी यहाँ पलने के बाद आती है
गुलाब ऎसे ही थोड़े गुलाब होता है
ये बात काँटों पे चलने के बाद आती है
शिकायतें तो हमें मौसम-ए-बहार से है
खिज़ाँ तो फूलने-फलने के बाद आती है
मुनव्वर रा
#घर #मदद #शहर #नींद #ख्वाब #गरीब #गुलाब #मौसम
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो.!!
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो.!!
अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा,
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो.!!
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ,
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो.!!
कभी हुस्न-ए-पर्दा-नशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में,
जो मैं बन सँवर के कहीं चलूँ मिरे साथ तुम भी चला करो.!!
नहीं बे-हिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर न हो,
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो.!!
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है,
ये तुम्हारे घर की बहार है उसे आँसुओं से हरा करो.!!
~बशीर बद्र साहब
चलते चलते ये गली बे-जान होती जाएगी
रात होती जाएगी सुनसान होती जाएगी
देखना क्या है नज़र-अंदाज़ करना है किसे
मंज़रों की ख़ुद-ब-ख़ुद पहचान होती जाएगी
उस के चेहरे पर मुसलसल आँख रुक सकती नहीं
आँख बार-ए-हुस्न से हलकान होती जाएगी
सोच लो ये दिल-लगी भारी न पड़ जाए कहीं
जान जिस को कह रहे हो जान होती जाएगी
कर ही क्या सकती है दुनिया और तुझ को देख कर
देखती जाएगी और हैरान होती जाएगी
काकुल-ए-ख़मदार में ख़म और आते जाएँगे
ज़ुल्फ़ उस की और भी शैतान होती जाएगी
आते आते इश्क़ करने का हुनर आ जाएगा
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी आसान होती जाएगी
जा चुकीं ख़ुशियाँ तो अब ग़म हिजरतें करने लगे
दिल की बस्ती इस तरह वीरान होती जाएगी
अमीर इमाम
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#गली #रात #जान #मंजर #शैतान #इश्क #जिंदगी #गम #दिल #बस्ती
ख़ंजर से करो बात न तलवार से पूछो
मैं क़त्ल हुआ कैसे मेरे यार से पूछो
फ़र्ज़ अपना मसीहा ने अदा कर दिया लेकिन
किस तरह कटी रात ये बीमार से पूछो
कुछ भूल हुई है तो सज़ा भी कोई होगी
सब कुछ मैं बता दूँगा ज़रा प्यार से पूछो
आँखों ने तो चुप रह के भी रूदाद सुना दी
क्यूँ खुल न सके ये लब-ए-इज़हार से पूछो
रौनक़ है मिरे घर में तसव्वुर ही से जिस के
वो कौन था 'राही' दर-ओ-दीवार से पूछो
सईद राही
आओ कोई तफ़रीह का सामान किया जाए
फिर से किसी वाइ'ज़ को परेशान किया जाए
बे-लग़्ज़िश-ए-पा मस्त हूँ उन आँखों से पी कर
यूँ मोहतसिब-ए-शहर को हैरान किया जाए
हर शय से मुक़द्दस है ख़यालात का रिश्ता
क्यूँ मस्लहतों पर उसे क़ुर्बान किया जाए
मुफ़्लिस के बदन को भी है चादर की ज़रूरत
अब खुल के मज़ारों पे ये एलान किया जाए
वो शख़्स जो दीवानों की इज़्ज़त नहीं करता
उस शख़्स का भी चाक गरेबान किया जाए
पहले भी 'क़तील' आँखों ने खाए कई धोके
अब और न बीनाई का नुक़सान किया
क़तील शिफ़ाई
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा
यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने
फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा
महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा
ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं
वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
बशीर बद्र
वो जो इक शख़्स मुझे ताना-ए-जाँ देता है
मरने लगता हूँ तो मरने भी कहाँ देता है
तेरी शर्तों पे ही करना है अगर तुझको क़ुबूल
ये सहूलत तो मुझे सारा जहाँ देता है
तुम जिसे आग का तिर्याक समझ लेते हो
देने लग जाए तो पानी भी धुआं देता है
जम के चलता हूं ज़मीं पर जो मैं आसानी से
ये हुनर मुझको मेरा बार ए गिरां देता है
हां अगर प्यास का ढिंढोरा न पीटा जाए
फिर तो प्यासे को भी आवाज़ कुआं देता है
अज़हर
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