22/06/2026
लखनऊ की आग: मौतों का जिम्मेदार कौन — सिर्फ़ भवन मालिक या पूरा तंत्र?
आज अलीगंज की भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर आम नागरिक की जान की कीमत क्या है? जब एक ऐसी इमारत, जो कागज़ों पर आवासीय थी अथवा नहीं, वर्षों तक व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बनी रही, तब संबंधित विभाग आखिर कर क्या रहे थे? यदि भवन अवैध था तो उसे चलने किसने दिया? यदि भवन में अग्नि सुरक्षा मानकों का अभाव था तो निरीक्षण क्यों नहीं हुआ? यदि वहां कोचिंग सेंटर और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे थे तो प्रशासन की आंखें बंद क्यों थीं? हर हादसे के बाद एक तयशुदा पटकथा दोहराई जाती है जांच समिति बनेगी, अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा, कुछ निलंबन होंगे और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाएगा। लेकिन जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए यह सिर्फ एक प्रशासनिक फाइल नहीं बल्कि जीवन भर का दर्द है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अवैध निर्माण रातोंरात नहीं खड़े होते। वे वर्षों तक विभागीय निगरानी, निरीक्षण और अनुमति की प्रक्रिया के बीच फलते-फूलते हैं। यदि संबंधित विभाग समय रहते कार्रवाई करते तो शायद यह त्रासदी टाली जा सकती थी। लखनऊ की इस घटना ने केवल एक इमारत की खामियों को नहीं बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की विफलता को उजागर किया है। जिम्मेदारी तय करने का समय अब बीत चुका है; अब जवाबदेही सुनिश्चित करने का समय है। केवल भवन मालिक को दोषी ठहराकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर उन अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी जिनकी आंखों के सामने नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं? क्या इस बार भी जांच रिपोर्ट फाइलों में दफन हो जाएगी या वास्तव में दोषियों को सजा मिलेगी? जब तक लापरवाही की कीमत केवल आम नागरिक अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे और जिम्मेदार अधिकारी सुरक्षित बने रहेंगे, तब तक ऐसी त्रासदियां रुकने वाली नहीं हैं।