Anurag Library

Anurag Library

Share

Anurag Library

Photos from Anurag Library's post 01/06/2025

लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में आज शाम हमने चैतन्य तम्हाणे की मराठी फ़िल्म ‘कोर्ट’ देखी और उस पर बातचीत की। फ़िल्म के हिन्दी सबटाइटल्स ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ ने तैयार किये हैं।

बातचीत में कात्यायनी, एस.बी. सिंह, के.के. वत्स,रत्नेश कुमार, डॉ. उमेश, डॉ, शिवांश, डॉ. फ़ैयाज़ अहमद, मंजेश, विवेक कुमार, सुनीता यादव, अंकिता सिंह, ओशियन, तथागत, सुमन देवी, धनंजय, शिवम, पुनीत, सार्थक, प्रिया यादव,, लालचन्द्र, विकास, सत्यम आदि ने हिस्सा लिया।

फ़िल्म पर काफ़ी रोचक और गरमागरम चर्चा हुई हालाँकि लगभग सभी की राय थी कि फ़िल्म न्याय व्यवस्था की जिस संवेदनहीनता और उसके जनद्रोही हो चुके चरित्र को दिखाती है वह आज और भी नग्न रूप में हमारे सामने आ चुका है। न्याय के पूरे तंत्र में व्याप्त वर्गीय और जातीय पूर्वाग्रहों को यह सामने लाती है और न्‍यायपालिका की न्‍यायप्रियता के दावों की कलई खोलकर रख देती है। सत्ता का विरोध करने वाले लोगों को किस तरह से न्यायपालिका के सहारे चुप कराया जाता है, यह भी हम देखते हैं। इस पर चर्चा के प्रसंग में उमर खालिद से लेकर गौतम नवलखा, आनन्द तेलतुंबड़े और स्टैन स्वामी आदि की भी बात उठी। कुछ युवा दर्शकों ने कहा कि वास्तव में पिछले एक दशक में हालात और बदतर हुए हैं।

“कोर्ट” मुंबई में रहने वाले एक बुजुर्ग मराठी लोक गायक नारायण कांबले (विरा साथीदार) की कहानी है, जिन्हें एक अजीबोगरीब आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। उन पर आरोप है कि उनके गाए एक गाने ने गटर की सफ़ाई करने वाले एक सफ़ाईकर्मी को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया, और इसलिए वह उस व्यक्ति की मौत के लिए जिम्मेदार है। यह मामला सुशिक्षित और संपन्न वकील विनय वोरा (विवेक गोम्बर) के ध्यान में आता है, जो नारायण का मुक़दमा लड़ता है। उसके ख़िलाफ़ सरकारी वकील नूतन (गीतांजलि कुलकर्णी) है, जिसे नारायण की दुर्दशा या मामले के तर्क से कोई मतलब नहीं है। उसे सिर्फ़ अपने करियर से और केस के जल्दी निपटारे से मतलब है। वे दोनों जज सदावर्ते (प्रदीप जोशी) के सामने हैं, जिसे नैतिकता और क़ानून की अपनी पुरातनपंथी व्याख्या को बनाए रखने के अलावा किसी और चीज़ की परवाह नहीं है। फ़िल्म के एक दिलचस्प दृश्य में, जज एक मामले की सुनवाई करने से इनकार कर देता है क्योंकि वादी महिला, स्लीवलेस टॉप पहनकर आई थी। काम्बले पर लगे फ़र्ज़ी आरोप को साबित करने के लिए पूरा न्‍यायिक तंत्र निहायत ही संवेदनहीन ढंग से बर्ताव करता है। जिस न्‍यायाधीश पर न्‍याय करने की जिम्‍मेदारी है वह न‍िहायत ही कूपमण्‍डूक, अतार्किक और अन्धविश्‍वासी के रूप में सामने आता है। कई बार ऐसा लगता है कि जैसे ‘कोर्ट’ में असली आरोपी भारत की न्याय व्यवस्था और समाज है।

एक दर्शक ने न्यायपालिका के अपने अनुभवों के हवाले से कहा कि जो कुछ हम फ़िल्म में देखते हैं, अदालतों की वास्तविकता उससे भी कहीं गन्दी है।
कुछ दर्शकों ने फ़िल्म के कुछ दृश्यों की विशेष रूप से चर्चा की जैसे काम्बले को एक महीने के लिए जेल भेजने के बाद अदालत उठ जाती है, वकील और कर्मचारी एक-एक करके निकल जाते हैं और अन्तिम कर्मचारी बत्तियाँ बुझाकर दरवाज़े बन्द करता है और फिर अदालत का कमरा देर तक अँधेरे में डूबा दिखता रहता है।

फ़िल्म का केन्द्रीय किरदार निभाने वाले विरा साथीदार के अलावा भी कई कलाकार अप्रशिक्षित,ग़ैर-पेशेवर अभिनेता हैं। जैसे मृतक की विधवा की भूमिका निभाने वाली स्त्री। अदालत में जब वह बेहद सपाट ढंग से बताती है कि उसका पति किन हालात में रोज़ गटर में उतरता था तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। (वह महिला असल ज़िन्दगी में मैनहोल में काम करते हुए मारे गए सफ़ाई कर्मी की विधवा है।)

बातचीत की शुरुआत में सत्यम ने इससे जुड़ा एक ताज़ा प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि इसी महीने 17 तारीख़ को ‘कोर्ट’ फ़िल्म में लोक गायक नारायण काम्बले का किरदार निभाने वाले विरा साथीदार की स्मृति में नागपुर में एक आयोजन था। इस कार्यक्रम के बाद एक दक्षिणपंथी संगठन की शिकायत पर विरा साथीदार की पत्नी पुष्पा साथीदार पर देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता को ख़तरे में डालने, समाज में शत्रुता पैदा करने आदि-आदि धाराओं में एफ़आईआर दर्ज कर ली गई। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने भाषण में “फ़ासिस्ट समय” और “गद्दी हिला देने” जैसे “ख़तरनाक” शब्दों का प्रयोग किया। इतना ही नहीं, उस कार्यक्रम में फ़ैज़ की नज़्म “हम देखेंगे” के गायन को भी देशद्रोह से जोड़ दिया गया।
. ... ..

फ़िल्म के सबटाइटल्स में टाइम कोड की गई गड़बड़ियाँ हैं जिन्हें ठीक करके जल्द ही यह फ़िल्म और इसके हिन्दी व अंग्रेज़ी सबटाइटिल्स हम लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर भी शेयर करेंगे।

31/05/2025

‘कोर्ट’ फ़िल्म 2014 में आई थी। तब इसमें दिखाए अदालत के दृश्यों को देखकर कुछ लोगों को लगता था कि निर्देशक ने समस्या को उभारने के लिए ‘ब्लैक कॉमेडी’ के फ़ॉर्म में चीज़ों को थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। लेकिन पिछले एक दशक में, जब न्याय व्यवस्था ख़ुद ही एक ब्लैक कॉमेडी/ट्रेजेडी बन गई है, तब इस फ़िल्म की घटनाएँ ज़रा भी चौंकाने वाली नहीं लगतीं।

फ़िल्म में एक लोक गायक पर आरोप लगता है कि उसने अपने गीत से एक सफ़ाई कर्मी को आत्महत्या के लिए उकसाया। वह सफ़ाई कर्मी गटर की सफ़ाई करने उतरा और ज़िन्दा वापस नहीं आया। इसका ज़िम्मेदार वह गायक है जो अपने गीतों में गटर साफ़ करने वालों की व्यथा सुनाता था। आप कहेंगे कि यह तो कुछ ज़्यादा ही हो गया! ऐसा कहाँ होता है?! पर ज़रा ठहरिए!

इसी महीने 17 तारीख़ को ‘कोर्ट’ फ़िल्म में उस लोक गायक नारायण काम्बले का किरदार निभाने वाले विरा साथीदार की पत्नी पुष्पा साथीदार पर देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता को ख़तरे में डालने, समाज में शत्रुता पैदा करने आदि-आदि धाराओं में एफ़आईआर दर्ज कर ली गई। मामला क्या है? नागपुर में विरा साथीदार की स्मृति में एक आयोजन था। आरोप है कि पुष्पा जी ने उसमें अपने भाषण में “फ़ासिस्ट समय” और “गद्दी हिला देने” जैसे “ख़तरनाक” शब्दों का प्रयोग किया। इतना ही नहीं, उस कार्यक्रम में फ़ैज़ की नज़्म “हम देखेंगे” भी गाई गई!

फ़िल्म में व्यंग्य के तौर पर जिन स्थितियों को दिखाया गया है वे अब बार-बार सच होने लगी हैं।

ऐसे में हमारी न्याय व्यवस्था की हालत पर इस फ़िल्म का नश्तर और भी तीखेपन के साथ चलता महसूस होता है।

कल शाम हम अनुराग लायब्रेरी में शाम 4:30 बजे से यह फ़िल्म देखेंगे और फिर इस पर चर्चा करेंगे। आप ख़ुद आइए और अपने दोस्तों को भी लेकर आइए। अगर आपने पहले इसे देखा है, तो भी आइए, साथ बैठकर देखने और अलग-अलग नज़रियों से इसके विविध पहलुओं पर बात करेंगे।

निर्देशक चैतन्य तम्हाणे की इस फ़िल्म को अनेक राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।

फ़िल्म की अवधि 1 घंटा 50 मिनट है।

स्थान : अनुराग लायब्रेरी, डी-68, निराला नगर, लखनऊ (आईटी कॉलेज चौराहे के पास)
किसी भी जानकारी के लिए आप इन नंबरों पर फ़ोन या मैसेज कर सकते हैं – 9721481546, 9910462009

31/05/2025

*लखनऊ सिनेफ़ाइल्स की ओर से फ़ि‍ल्म प्रदर्शन और बातचीत की*
*पाक्षिक श्रृंखला में इस बार*

*चैतन्य तम्हाणे की बहुचर्चित-बहुप्रशंसित मराठी फ़िल्म‍*
*कोर्ट*
(हिन्दी सबटाइटिल्स के साथ)

'कोर्ट' फ़‍िल्‍म भारतीय गणतंत्र की तमाम संस्‍थाओं, खासकर न्‍यायपालिका की न्‍यायप्रियता के दावों की कलई खोलकर रख देती है। फ़‍िल्‍म में नारायण काम्‍बले नामक एक लोकगायक को इस फ़र्ज़ी आरोप में गिरफ़्तार कर लिया जाता है कि उसने अपने एक गीत में गटर की सफ़ाई करने वाले सफ़ाईकर्मियों को आत्‍महत्‍या के लिए प्रेरित किया जिसकी वजह से एक सफ़ाईकर्मी ने आत्‍महत्‍या कर ली। इस फ़र्ज़ी आरोप को साबित करने के लिए पूरा न्‍यायिक तंत्र निहायत ही संवेदनहीन बर्ताव करता है। जिस न्‍यायाधीश पर न्‍याय करने की जिम्‍मेदारी है वह न‍िहायत ही कूपमण्‍डूक, अतार्किक और अन्धविश्‍वासी है...

*1 जून 2025, शाम 4.30 बजे*
*अनुराग लाइब्रेरी, डी-68, निराला नगर, लखनऊ*

फ़िल्म की अवधि 1 घंटा 55 मिनट है

फ़िल्म देखने के बाद हमेशा की तरह हम फ़िल्म पर और इससे उठने वाले देश-दुनिया के तमाम सवालों पर खुली चर्चा करेंगे। आप सबका इन्तज़ार रहेगा। तारीख़ और समय अभी से अपने कैलेंडर में दर्ज कर लीजिए और अपने दोस्तों के साथ भी यह आमंत्रण ज़रूर शेयर करिएगा।

आप सब आमंत्रित हैं। कृपया समय से 10 मिनट पहले आने की कोशिश करें।
सम्पर्कः 9721481546 / 9910462009

27/05/2025

लखनऊ सिनेफ़ाइल्स की ओर से फ़ि‍ल्म प्रदर्शन और बातचीत की
पाक्षिक श्रृंखला में इस बार

चैतन्य तम्हाणे की बहुचर्चित-बहुप्रशंसित मराठी फ़िल्म‍
*कोर्ट*
(हिन्दी सबटाइटिल्स के साथ)

*भारतीय न्यायपालिका में व्याप्त निर्मम वर्गीय-जातीय पूर्वाग्रहों
और अब भी क़ायम औपनिवेशिक जनद्रोही क़ानूनों की जकड़बन्दी
पर एक ज़बर्दस्त व्यंग्य*

*1 जून 2025 (रविवार), शाम 4.30 बजे*
*अनुराग लाइब्रेरी, डी-68, निराला नगर, लखनऊ*

फ़िल्म की अवधि 1 घंटा 55 मिनट है।

फ़िल्म देखने के बाद हमेशा की तरह हम फ़िल्म पर और इससे उठने वाले देश-दुनिया के तमाम सवालों पर खुली चर्चा करेंगे। आप सबका इन्तज़ार रहेगा। तारीख़ और समय अभी से अपने कैलेंडर में दर्ज कर लीजिए और अपने दोस्तों के साथ भी यह आमंत्रण ज़रूर शेयर करिएगा।

*आप सब आमंत्रित हैं। कृपया समय से 10 मिनट पहले आने की कोशिश करें।*
सम्पर्कः 9721481546 / 9910462009

Photos from Anurag Library's post 21/05/2025

अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी और शिक्षा सहायता मण्डल के लिए रामाधीन इंटर कॉलेज के शिक्षक अजय गुप्ता जी ने गणित के पाठ्यक्रम की कई नई किताबें भेंट की हैं। कुछ अन्य शिक्षकों ने भी अपने विषयों की पुस्तकें देने का वादा किया है।

हमें इस लायब्रेरी के लिए आप सबके हर तरह के सहयोग की ज़रूरत है। बच्चों की बढ़ती संख्या और आसपास की बस्तियों के बच्चों की उत्सुकता को देखते हुए हमें जल्द ही थोड़ी बड़ी जगह की भी ज़रूरत पड़ेगी। अगर आपमें किसी की जानकारी में खदरा के बाबा का पुरवा, रूपपुर आदि मुहल्लों के आसपास ऐसी किसी जगह की जानकारी हो, या आप किसी तरह से इसमें मदद कर सकते हों तो हमें ज़रूर बताएँ।

हमें बच्चों और युवाओं के लिए बहुत-सी और किताबों, रंग, रंगीन पेंसिलों, क्रेयॉन, स्केचबुक या सादे काग़ज़ों, ड्रॉइंग बोर्ड आदि की तुरन्त ज़रूरत है। अगर आप लखनऊ में हैं तो अनुराग लायब्रेरी (डी-68, निराला नगर, IT कॉलेज चौराहे के पास) पर इन्हें पहुँचा सकते हैं। या फिर, हम आपके पास से आकर ले सकते हैं। यदि आप लखनऊ या बाहर से इन मदों में आर्थिक सहयोग करना चाहते हैं तो 9721481546 या 9910462009 पर मैसेज करें, हम आपसे सम्पर्क कर लेंगे।

नौजवान भारत सभा और अनुराग ट्रस्ट की ओर से संचालित यह लायब्रेरी हफ़्ते में पाँच दिन रोज़ शाम को खुलती है और यहाँ स्कूली बच्चों की मदद के लिए कक्षाएँ चलाई जाती हैं। लायब्रेरी में बच्चों, किशोरों और युवाओं के लिए करीब 200 किताबें अभी हैं लेकिन हम इन्हें और बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। स्कूली पढ़ाई के अलावा कई बच्चे लायब्रेरी में रखी किताबों और पत्रिकाओं में भी दिलचस्पी लेने लगे हैं। आगे यहाँ स्त्रियों और स्कूल न जाने वाले बच्चों की भी पढ़ाई शुरू की जाएगी। बीच बीच में बच्चों के लिए संगीत, कला, नाटक आदि की भी कक्षाएँ लगेंगी और गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए वर्कशॉप भी आयोजित किये जाएँगे।

अगर आप बच्चों को पढ़ाने या लायब्रेरी में उन्हें कुछ भी रचनात्मक सिखाने, कहानियाँ सुनाने, खेल खिलाने आदि में समय देकर अपने जीवन में ख़ुशियों के कुछ पल बढ़ाना चाहते हों, तो हमारे साथ चलें। आपको ज़रूर अच्छा लगेगा।

13/05/2025

दोस्तो, ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ में इस रविवार (18 मई) की फ़िल्म है प्रख्यात कन्नड़ निर्देशक गिरीश कासारवल्ली की बहुप्रशंसित फ़िल्म ‘गुलाबी टॉकीज़’। इसे हम हिन्दी सबटाइटल्स के साथ देखेंगे।
.. ... ...

2008 में आयी यह फ़िल्म कर्नाटक में मछुआरों के एक छोटे-से गाँव और वहाँ रहने वाली मिडवाइफ़ गुलाबी की कहानी कहती है। सिनेमाप्रेमी गुलाबी को एक सफल डिलीवरी कराने के बाद भेंट में एक पुराना टीवी सेट मिल जाता है और अब उसके घर में ही सिनेमा देखने वालों का जमावड़ा होने लगता है। इस बीच दूर कारगिल में लड़ाई छिड़ जाती है और उसका असर इस शान्त बस्ती में भी होने लगता है। कुछ इसमें अपना व्यावसायिक हित देखते हैं और इसे और भड़काते हैं। एक दिन गुलाबी भी गाँव से बेदखल कर दी जाती है... उन लोगों द्वारा जिनमें से कुछ को वह ख़ुद अपने हाथों से दुनिया में लायी थी...
.. ... ...

फ़िल्म देखने के बाद हमेशा की तरह हम फ़िल्म पर और इससे उठने वाले देश-दुनिया के तमाम सवालों पर खुली चर्चा करेंगे। आप सबका इन्तज़ार रहेगा। तारीख़ और समय अभी से अपने कैलेंडर में दर्ज कर लीजिए और अपने दोस्तों के साथ भी यह आमंत्रण ज़रूर शेयर करिएगा।
.. ... ...

फ़िल्म :

गुलाबी टॉकीज़
प्रख्यात कन्नड़ लेखिका वैदेही के उपन्यास पर आधारित
(कन्नड़, हिन्दी सबटाइटल्स के साथ)

निर्देशक : गिरीश कासारवल्ली

अवधि : 2 घण्टा
.. ... ...

फ़िल्म शो और बातचीत :

18 मई (रविवार), शाम 4:30 बजे

अनुराग लायब्रेरी, डी-68, निराला नगर, लखनऊ (आईटी कॉलेज चौराहे के पास)
सम्पर्क : 9721481546 / 9910462009

आप सब अपने दोस्तों के साथ आमंत्रित हैं।

हम ठीक समय से शुरू कर सकें इसलिए 10 मिनट पहले आने की कोशिश करें।

Photos from Anurag Library's post 10/05/2025

अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी में पढ़ने आने वाले बच्चों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। पहले से आने वाले बच्चे अपने मुहल्ले में दूसरे बच्चों को लायब्रेरी के बारे में बताकर उन्हें साथ ला रहे हैं।

आज छोटे बच्चों को हिन्दी लिखने में मदद के लिए कुछ सरल शब्द बोलकर लिखाए गए और मात्राओं का अन्तर बताया गया। साथी शिप्रा ने बच्चों को दो गीत भी सिखाए।

आज साथी अरग़वान रब्बही भी लायब्रेरी में आए थे और उन्होंने और साथी विकास बड़ी बच्चियों को विज्ञान पढ़ाने की शुरुआत की। अरग़वान ने हफ़्ते में दो दिन लायब्रेरी में बच्चों को पढ़ाने की पेशकश की है।

लखनऊ के खदरा इलाक़े के बाबा का पुरवा मोहल्ले में नौजवान भारत सभा और अनुराग ट्रस्ट की ओर से अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी और शिक्षा सहायता मण्डल की शुरुआत इसी सप्ताह की गई है। यह लायब्रेरी रोज़ शाम को खुलती है और यहाँ स्कूली बच्चों की मदद के लिए कक्षाएँ चलाई जाती हैं। यहाँ ज़्यादातर घरों के बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ने जाते हैं वहाँ शिक्षा का बुरा हाल है। 9वीं में पढ़ने वाली बच्चियों को जोड़-घटाना तक नहीं आता, 5वीं-6वीं में पहुँच गये कई बच्चे अक्षर जोड़-जोड़कर भी हिन्दी मुश्किल से पढ़ पाते हैं।

स्कूली पढ़ाई के अलावा कई बच्चे लायब्रेरी में रखी किताबों और पत्रिकाओं में भी दिलचस्पी लेते हैं।

आगे यहाँ स्त्रियों और स्कूल न जाने वाले बच्चों की भी पढ़ाई शुरू की जाएगी। बीच बीच में बच्चों के लिए संगीत, कला, नाटक आदि की भी कक्षाएँ लगेंगी और गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए वर्कशॉप भी आयोजित किये जाएँगे।

Photos from Anurag Library's post 07/05/2025

आम घरों के बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ने जाते हैं वहाँ शिक्षा का बुरा हाल है। 9वीं में पढ़ने वाली बच्चियों को जोड़-घटाना नहीं आता, 5वीं-6वीं में पहुँच गये कई बच्चे अक्षर जोड़-जोड़कर भी हिन्दी मुश्किल से पढ़ पाते हैं। तमाम कठिनाइयों के बावजूद माँ-बाप बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, पेट काटकर भी उन्हें तथाकथित अंग्रेज़ी मीडियम स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं या फिर बच्चे कई किलोमीटर दूर सरकारी स्कूल-कॉलेजों में जाते हैं। लेकिन वहाँ मिलने वाली शिक्षा ज़िन्दगी में आगे बढ़ने के लिए उनके किसी काम शायद ही आये।

अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी में आने वाले ज़्यादातर बच्चों के परिजन मेहनतकश लोग हैं। ज़्यादातर माँ-बाप सुबह 8बजे काम पर चले जाते हैं और रात 9 या 10 बजे लौटकर आते हैं। कई के माँ-बाप दोनों पढ़े-लिखे नहीं हैं। एक बच्चा सुबह से शाम तक चप्पल के छोटे-से कारख़ाने में काम करता है लेकिन ख़ाली होते ही पढ़ने आ जाता है।

आज लाइब्रेरी बच्चों की पढ़ाई का दूसरा दिन था, कई नये बच्चे भी आज आये। आज की क्लास भी कवयित्री कात्यायनी ने ली। पहले बच्चों को कुछ कसरत कराई गई, फिर उनकी किताब से एक पाठ पढ़ाया गया और दो कविताएँ पढ़वाई गईं। साथ ही देश-दुनिया और उनके मुहल्ले के बारे में भी बातें हुईं। बड़ी बच्चियों को साथी विकास ने गणित पढ़ाने की शुरुआत की।0

लखनऊ के खदरा इलाक़े के बाबा पुरवा मोहल्ले में नौजवान भारत सभा और अनुराग ट्रस्ट की ओर से अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी और शिक्षा सहायता मण्डल की शुरुआत कल से की गई है। यह लायब्रेरी अब रोज़ शाम को खुलेगी और यहाँ स्कूली बच्चों की मदद के लिए 'शिक्षा सहायता मण्डल' भी चलाया जायेगा। ख़ास तौर पर विज्ञान, गणित, अंग्रेज़ी में बच्चों की मदद की जायेगी और अन्य विषयों की कक्षाएँ भी चलाई जाएँगी।

आगे यहाँ स्त्रियों और स्कूल न जाने वाले बच्चों की भी पढ़ाई शुरू की जाएगी। बीच बीच में बच्चों के लिए संगीत, कला, नाटक आदि की भी कक्षाएँ लगेंगी और गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए वर्कशॉप भी आयोजित किये जाएँगे।

Photos from Anurag Library's post 06/05/2025

अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी में आज से बच्चों की पढ़ाई शुरू हो गई। आज पहले दिन छोटे बच्चे आये थे जिन्हें कवयित्री कात्यायनी ने किताबों के बारे में बताया और कुछ कविताएँ पढ़वाईं। बच्चों ने तरह-तरह के सवाल भी पूछे और उन पर बातें हुईं।

लखनऊ के खदरा इलाक़े के बाबा पुरवा मोहल्ले में नौजवान भारत सभा और अनुराग ट्रस्ट की ओर से अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी और शिक्षा सहायता मण्डल की शुरुआत की गई है।

यह लायब्रेरी अब रोज़ शाम को खुलेगी और यहाँ स्कूली बच्चों की मदद के लिए 'शिक्षा सहायता मण्डल' भी चलाया जायेगा। ख़ास तौर पर विज्ञान, गणित, अंग्रेज़ी में बच्चों की मदद की जायेगी और अन्य विषयों की कक्षाएँ भी चलाई जाएँगी।

आगे यहाँ स्त्रियों और स्कूल न जाने वाले बच्चों की भी पढ़ाई शुरू की जाएगी। बीच बीच में बच्चों के लिए संगीत, कला, नाटक आदि की भी कक्षाएँ लगेंगी और गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए वर्कशॉप भी आयोजित किये जाएँगे।

Photos from Anurag Library's post 03/05/2025

अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी

लखनऊ के खदरा इलाक़े के बाबा पुरवा मोहल्ले में नौजवान भारत सभा और अनुराग ट्रस्ट की ओर से अशफ़ाक़-बिस्मिल लायब्रेरी और शिक्षा सहायता मण्डल की शुरुआत की तैयारी हो गई है।

अगले सप्ताह से यह लायब्रेरी रोज़ शाम को खुलेगी और यहाँ स्कूली बच्चों के लिए 'शिक्षा सहायता मण्डल' भी शुरू कर दिया जायेगा। इस मोहल्ले में ज़्यादातर बच्चे सरकारी स्कूल में या छोटे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं जहाँ पढ़ाई के हाल पर कुछ न कहना ही बेहतर है।

ऐसे बच्चों के लिए ख़ास तौर पर विज्ञान, गणित, अंग्रेज़ी और अन्य विषयों की कक्षाएँ चलाई जाएँगी। आगे यहाँ स्त्रियों और स्कूल न जाने वाले बच्चों की भी पढ़ाई शुरू की जाएगी।

बीच बीच में बच्चों के लिए संगीत, कला, नाटक आदि की भी कक्षाएँ लगेंगी और गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के लिए वर्कशॉप भी आयोजित किये जाएँगे।

अभी कुछ दिनों से लायब्रेरी को सजाने और व्यवस्थित करने का ही काम चल रहा है लेकिन उत्सुक बच्चों और अभिभावकों की आवाजाही शुरू हो गई है।

Photos from Anurag Library's post 18/11/2024

लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में कल शाम ‘आइंस्टाइन ऐंड एडिंगटन’ फ़िल्म देखी गयी और उसके बाद फ़िल्म पर बातचीत की गयी। ब्रिटिश निर्देशक फ़िलिप मार्टिन की फ़िल्म हमने ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ द्वारा तैयार किये गये हिन्दी सबटाइटल्स के साथ देखी।

फ़िल्म आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धान्त से जुड़े गुरुत्वाकर्षण के एक नये सिद्धान्त की खोज और उसे सत्यापित करने के लिए ब्रिटिश वैज्ञाानिक आर्थर एडिंगटन के साथ उनकी साझेदारी की कहानी कहती है। वह समय प्रथम विश्वयुद्ध का उथल-पुथल भरा दौर था जब आइंस्टाइन और एडिंगटन दो दुश्मन देशों - जर्मनी और ब्रिटेन में रहते हुए इस साझेदारी के लिए भारी जोखिम उठाते हैं।

एडिंगटन को अपने प्रयोगों के लिए समर्थन नहीं मिलता क्योंकि बड़े ब्रिटिश वैज्ञानिक यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि आइज़क न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त और ब्रह्मांड का उनका मॉडल ग़लत भी हो सकता है। महानतम अंग्रेज़ वैज्ञानिक को कोई जर्मन ग़लत साबित करे यह उन्हें गवारा नहीं था। दूसरी ओर, आइंस्टाइन इस बात से दुःखी हैं कि बर्लिन विश्वविद्यालय, जहाँ वे मैक्स प्लैंक के आमंत्रण पर काम करने गये थे, में हुई खोजों का इस्तेमाल जर्मनी के लिए ज़हरीली गैस बनाने में किया जा रहा है। इसका विरोध करने पर उन्हें विश्वविद्यालय से प्रतिबन्धित भी कर दिया जाता है।

फ़िल्म राष्ट्रवाद, धार्मिक संकीर्णता, वैज्ञानिक समुदाय के सामने उपस्थित नैतिक सवालों और विज्ञान के लिए फ़ण्डिंग जैसे सवालों को भी असरदार ढंग से पेश करती है। दोनों वैज्ञानिकों के निजी जीवन के द्वन्द्वों को भी फ़िल्म छूती है हालाँकि यह उसका मुख्य विषय नहीं है।

आइंस्टाइन की भूमिका में एंडी सर्किस और एडिंगटन की भूमिका में डेविड टेनैंट का अभिनय बहुत विशवसनीय और गहरा असर छोड़ने वाला है।

फ़िल्म बाद इसके कलात्मक पहलुओं के साथ ही विज्ञान की सामाजिक भूमिका, राष्ट्रवाद, पूँजीवाद में विज्ञान और वैज्ञानिकों के पाँवों में पड़ी बेड़ियों आदि पर भी चर्चा हुई। विज्ञान की प्रगति के बावजूद समाज में बड़े पैमाने पर फैली अवैज्ञानिक सोच और उसके कारणों पर भी बात हुई। यह बात भी आयी कि आज से सैकड़ों साल पहले की सत्ताएँ वैज्ञानिक खोजों को लोगों तक पहुँचने से रोक रही थीं। लेकिन आज हमारे दौर में न केवल विज्ञान को दबाया जा रहा है बल्कि सचेतन रूप से अवैज्ञानिक और दकियानूसी बातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। विज्ञान और तकनोलॉजी की खोजों का ही इस्तेमाल विज्ञान-विरोधी बातों को फैलाने के लिए किया जा रहा है। इस पर भी बात हुई कि सामाजिक बदलाव के लिए आज लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार प्रसार और तमाम अवैज्ञानिक बातों का खण्डन भी बेहद ज़रूरी है।

बातचीत में अनिल श्रीवास्तव, मनोज कुमार, शशांक शेखर, एस.के. शर्मा, उमेश सचान, राज वर्मा, अनमोल शर्मा, राहुल कुमार, जावेद, पुनीत, मृत्युंजय, लालचन्द्र, अचिंत्य आदि ने हिस्सा लिया। शुरू में सत्यम ने फ़िल्म और लखनऊ सिनेफ़ाइल्स का परिचय दिया।

*यहाँ दी गयी तस्वीरों में फ़िल्म के एक दृश्य में आइंस्टाइन और एडिंगटन हैं और एक दोनों महान वैज्ञानिकों का वास्तविक फ़ोटोग्राफ़ है।

फ़िल्म और इसके हिन्दी व अंग्रेज़ी सबटाइटल्स हम जल्द ही लखनऊ सिनेफ़ाइल्स के टेलीग्राम चैनल पर शेयर करेंगे।

17/11/2024

याददिहानी, आज शाम 4 बजे...
'आइंस्टाइन ऐंड एडिंगटन'
(हिंदी सबटाइटल्स के साथ)
अनुराग लायब्रेरी, लखनऊ

Want your business to be the top-listed Government Service in Lucknow?

Click here to claim your Sponsored Listing.

Location

Category

Telephone

Address


D-68, Nirala Nagar
Lucknow
226020

Opening Hours

Monday 12pm - 8pm
Tuesday 12pm - 8pm
Wednesday 12pm - 8pm
Saturday 12pm - 8pm