07/04/2026
शब्दों के दांत नहीं होते, फिर भी जब वे काटते हैं तो गहरा दर्द दे जाते हैं। कई बार उनके घाव इतने गहरे होते हैं कि समय बीत जाता है, पर दर्द पूरी तरह नहीं भरता। इसलिए जीवन में बोलते समय सजग रहना अत्यंत आवश्यक है।
एक मधुर शब्द औषधि की तरह काम करता है टूटे मन को जोड़ देता है, और एक कठोर शब्द सैकड़ों घाव दे सकता है।
इसलिए हमेशा ऐसा बोलें, जिसमें प्रेम हो, संवेदना हो और सम्मान हो क्योंकि हमारे शब्द ही हमारे व्यक्तित्व की सबसे सच्ची पहचान होते हैं।🙏🙏
।। राधे राधे।।
23/11/2025
“चैरिटी असल में वही है—अमीर लोग थोड़ी-सी सहायता के नाम पर गरीबों को उसी गरीबी में, बस एक अधिक सुंदर पिंजरे में, रहने पर मजबूर कर देते हैं।”
26/08/2025
जिस दिन point to point बात करना शुरू कर दोगे.. तो लोगो को joint to joint दर्द शुरू होने लगेगा..!
😁😁
24/08/2025
ध्यान हरदम जरूरत के हिसाब से घूमता रहता है
बस देखना यह है कि घूम कहां रहा है साक्षी बनना है
23/08/2025
कानून ये भी बनाओ कि चुनाव के समय जनता से किये गए वादे जीतने के बाद नेता पूरे ना कर सके तो..
उसे 5 साल की सज़ा और आजीवन चुनाव लडने पर बैन लगे
23/08/2025
अंतःकरण के विषय में अंश अगर अंधेरा खत्म करना है तो प्रकाश के साथ जूझना पड़ेगा,
क्योंकि अंधेरे के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि अंतः करण कभी अशुद्ध होता ही नहीं है, अगर अंतःकरण अशुद्ध हो गया तो अत: करण को शुद्ध करेगा कौन, अगर सही समझे तो अंतःकरण ही शुद्ध है, क्योंकि अंतःकरण के विषय में हमें पता ही नहीं होता है, जब कोई चोरी करने जाता है भीतर से कोई कहता है चोरी मत करो, और आप कहते हो की अत:करण बोल रहा है, यह सब समाज के द्वारा डाली गई धारणा है,अंतःकरण नहीं, चोरों का है तो ऐसा नहीं होगा जिसको हिंसा अहिंसा का सामाजिक बोध कहते हैं, उसे डालने का बचपन में प्रयास नहीं किया गया, एक हिंदू से कहे कि चचेरी बहन से शादी कर लो तो उसका अंत:करण इंकार कर देगा, अगर मुसलमान से कहो की चचेरी बहन से शादी कर लो तो इनकार नहीं करेगा, कारण यह नहीं कि उसके पास अंतःकरण नहीं है, केवल चचेरी बहन से शादी करने से धारणा का भेद है, यह समाज देता है वह अंतःकरण नहीं है, समाज ने एक इंतजाम किया है, उसी को हम अंतःकरण समझ बैठते हैं, अंत:करण का मतलब आत्मा नहीं, क्योंकि आत्मा तो वह है जो बाहर और भीतर दोनों में नहीं है दोनों से बाहर है, अंतःकरण तो वह है जो आत्मा के जो निकट उपकरण है, जिसके द्वारा हम बाहर से जुड़ते हैं, समझ ले आत्मा के पास एक दर्पण जिसमें आत्मा प्रति फलित होती है, वह अंता करण है, निकटतम आत्मा तक पहुंचने के लिए अंत:करण आखरी सीढ़ी है, और अंत:करण आत्मा के इतने निकट है वह कभी अशुद्ध नहीं हो सकता है, आत्मा की निकटता ही उसकी शुद्धि है,
यह नहीं है जो हमारे भीतर जब हम सड़क पर चलते हैं, बाय न चल के दाएं चल रहे हैं तो कोई भीतर से कोई कहता है की दाएं चलना ठीक नहीं है, बाय चलना ठीक है, यह अंत: करण की आवाज नहीं है, यह केवल सामाजिक आंतरिक व्यवस्था है, अमेरिका में चलते हैं तो बात चलने की जरूरत नहीं है वहां दाएं चलते हैं, वहां का नियम दाएं चलने का है, बाएं चलने का नहीं है, अंतःकरण नैतिक धारणा नहीं है अंतःकरण एक ही तरह का होता है, नैतिकता हजार हैं, अंतःकरण एक है अंतःकरण शुद्ध ही है, आत्मा के निकट रहकर कोई चीज अशुद्ध नहीं हो सकती है
अध्यात्म की कलम से🙏🙏
23/08/2025
यह पोस्ट नास्तिकों के लिए जो भगवान को नहीं मानते
भगवान को खोजने से पहले स्वयं को जान लो !
खुद को जानने में ही वह जान लिया जाता है जो परमात्मा है
एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था | एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ |
उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :
स्वामी , एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं | कोई उत्तर नहीं मिलता |
क्या आप मुझे उत्तर देंगे ?
स्वामी ने कहा : निश्चित दूंगा |
उस संन्यासी ने उस राजा से कहा : नहीं , आज तुम खाली नहीं लौटोगे | पूछो |
उस राजा ने कहा : मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं | ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना | मैं सीधा मिलना चाहता हूं |
उस संन्यासी ने कहा : अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर ?
राजा ने कहा : माफ़ करिए , शायद आप समझे नहीं | मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं , आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं ; जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो ?
उस संन्यासी ने कहा : महानुभाव , भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है | मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं | अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं , सीधा जवाब दें |
बीस साल से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो |
राजा ने हिम्मत की , उसने कहा : अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए |
संन्यासी ने कहा : कृपा करो , इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं |
राजा ने लिखा —- अपना नाम , अपना महल , अपना परिचय , अपनी उपाधियां और उसे दीं |
वह संन्यासी बोला कि महाशय , ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं |
उस संन्यासी ने कहा : मित्र , अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे ?
तुम्हारी चेतना , तुम्हारी सत्ता , तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा ?
उस राजा ने कहा : नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा ? नाम नाम है , मैं मैं हूं |
तो संन्यासी ने कहा : एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है , क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं | आज तुम राजा हो , कल गांव के भिखारी हो जाओ तो बदल जाओगे ?
उस राजा ने कहा : नहीं , राज्य चला जाएगा , भिखारी हो जाऊंगा , लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा ?
मैं तो जो हूं हूं | राजा होकर जो हूं , भिखारी होकर भी वही होऊंगा |
न होगा मकान , न होगा राज्य , न होगी धन- संपति , लेकिन मैं ? मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं |
तो संन्यासी ने कहा : तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है , क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं | तुम्हारी उम्र कितनी है ?
उसने कहा : चालीस वर्ष |
संन्यासी ने कहा : तो पचास वर्ष के होकर तुम दुसरे हो जाओगे ? बीस वर्ष या जब बच्चे थे तब दुसरे थे ?
उस राजा ने कहा : नही | उम्र बदलती है , शरीर बदलता है लेकिन मैं ? मैं तो जो बचपन में था , जो मेरे भीतर था , वह आज भी है |
उस संन्यासी ने कहा : फिर उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा , शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा |
फिर तुम कौन हो ? उसे लिख दो तो पहुंचा दूं भगवान के पास , नहीं तो मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ |
यह कोई भी परिचय तुम्हारा नहीं है|
राजा बोला : तब तो बड़ी कठिनाई हो गई | उसे तो मैं भी नहीं जनता फिर ! जो मैं हूं , उसे तो मैं नहीं जनता ! इन्हीं को मैं जनता हूं मेरा होना |
उस संन्यासी ने कहा : फिर बड़ी कठिनाई हो गई , क्योंकि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं , बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है , तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलना चाहता है ?
तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो | और मैं तुमसे कहे देता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो ,
उस दिन तुम आओगे नहीं भगवान को खोजने |
क्योंकि खुद को जानने में वह भी जान लिया जाता है जो परमात्मा है |
इस लेख को वही नहीं समझ सकता जो मूर्ख
मूर्ख को कभी समझाया नहीं जा सकता
क्योंकि परमेश्वर कहते हैं
मूरख को समझाते समझाते
ज्ञान गाँठी का जाए
कोयला भी ना हो उजला
सौ मन साबुन लगाए
अध्यात्म की कलम से
23/08/2025
जिनको भी झुठ बोलना है
उन्हें सच बोलने का दावा करना होता है,
नही तो उनका झुठ मानेगा कौन,