नदी से - पानी नहीं , रेत चाहिए
पहाड़ से- औषधि नहीं , पत्थर चाहिए
पेड़ से - छाया नहीं , लकड़ी चाहिएघ
खेत से - अन्न नहीं , नकद फसल चाहिए
उलीच ली रेत, खोद लिए पत्थर,
काट लिए पेड़, तोड़ दी मेड़
रेत से पक्की सड़क , पत्थर से मकान बनाकर लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर,
अब भटक रहे हैं.....!!
सूखे कुओं में झाँकते,
रीती नदियाँ ताकते,
झाड़ियां खोजते लू के थपेड़ों में,
बिना छाया के ही हो जाती सुबह से शाम....!
और गली-गली ढूंढ़ रहे हैं आक्सीजन
फिर भी सब बर्तन खाली l
सोने के अंडे के लालच में ,
मानव ने मुर्गी मार डाली !
प्रकृति का दोहन मत कीजिए, प्रेम कीजिए तो ही हम सब उसका संरक्षण कर सकते हैं, और यही वक्त की माँग है।
Back To School Mrs Savita Khosla
Hi Dear students this is Savita kosha I am a teacher from Ludhiana Punjab....
💐🙏 मीरा का मान रखने के लिये स्वयं श्री कृष्ण ने स्त्री रूप धारण किया। राणा सांगा के पुत्र और अपने पति राजा भोजराज की मृत्यु के बाद जब संबन्धीयों के मीरा बाई पर अत्याचार अपने चरम पे जा पहुँचे तो मीरा बाई मेवाड़ को छोड़कर तीर्थ को निकल गई। घूमते-घूमते वे वृन्दावन धाम जा पहुँची। जीव गोसांई वृंदावन में वैष्णव संप्रदाय के मुखिया थे। मीरा जीव गोसांई के दर्शन करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने मीरा बाई से मिलने से मना कर दिया। उन्होंने मीरा को संदेशा भिजवाया कि वह किसी औरत को अपने सामने आने की इजाजत नहीं देंगे। मीराबाई ने इसके जवाब में अपना संदेश भिजवाया कि 'वृंदावन में हर कोई औरत है। अगर यहां कोई पुरुष है तो केवल गिरिधर गोपाल आज मुझे पता चला कि वृंदावन में कृष्ण के अलावा यहाँ कोई और भी पुरुष है। जीव गुसाई ने सुबह जब भगवान कृष्ण के मंदिर के पट खोले तो हैरत से उनकी आँखें फटी रह गई. सामने विराजमान भगवान कृष्ण की मूर्ति घाघरा चोली पहने हुये थी, कानों में कुंडल, नाक में नथनी, पैरों में पाजेब, हाथों में चूड़ियाँ मतलब वे औरत के संपूर्ण स्वरूप को धारण किये हुये थे। जीव गुसाई ने मंदिर सेवक को आवाज लगाई. किसने किया ये सब ? कृष्ण की सौगंध पुजारी जी मंदिर में आपके जाने के बाद किसी का प्रवेश नहीं हुआ ये पट आपने ही बंद किये और आपने ही खोले। जीव गुसाई अचंभित थे, सेवक बोला कुछ कहूँ पुजारी जी वे खोए-खोए से बोले हाँ बोलो पास ही धर्मशाला में एक महिला आई हुई हैं जिसने कल आपसे मिलने की इच्छा जताई थी आप तो किसी महिला से मिलते नहीं इसलिये आपने उनसे मिलने से मना कर दिया, परन्तु लोग कहते हैं कि वो कोई साधारण महिला नही उनके एकतारे में बड़ा जादू हैं कहते हैं वो जब भजन गाती हैं तो हर कोई अपनी सुधबुध बिसरा जाता हैं, कृष्ण भक्ति में लीन जब वो नाचती हैं तो स्वयं कृष्ण का स्वरूप जान पड़ती हैं, आपने उनसे मिलने से इंकार किया कही ऐसा तो नही भगवान जी आपको कोई संदेश देना चाहते हो ? जीव गुसाई तुरंत समझ गए कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गई हैं, मीरा बाई कोई साधारण महिला नहीं अपितु कोई परम कृष्णभक्त हैं। वे सेवक से बोले भक्त मुझे तुरंत उनसे मिलना है। चलो कहाँ ठहरी हैं वो में स्वयं उनके पास जाऊँगा । जीव गुसाई मीरा जी के सामने नतमस्तक हो गये और भरे कंठ से बोले मुझ अज्ञानी को आज आपने भक्ति का सही स्वरूप दिखाया है देवी इसके लिये मैं सदैव आपका आभारी रहूंगा। आईए चलकर स्वयं अपनी भक्ति की शक्ति देखिये। मीरा बाई केवल मुस्कुराई वे कृष्ण कृष्ण करती उनके पीछे हो चली। मंदिर पहुँचकर जीव गोसाई एक बार फिर अचंभित हुये कृष्ण भगवान वापस अपने स्वरूप में लौट आये थे, पर एक अचम्भा और भी था उन्हें कभी कृष्ण की मूर्ति में मीरा बाई दिखाई पड़ती तो कभी मीराबाई में कृष्ण । राधे राधे 🙏💐
#72घंटे_चैलेंज
#कविता_मंगलवार
#हिंदी_हैं_हम
✍️ मेरी हिंदी ✍️
भाषा किसी की धात्री नहीं, नहीं यह किसी विशेष की दास
भाषा से बनती संस्कृति, भाषा से विकसित हास परिहास
मैं हिंदी हूं, हिंदी में मैं बसा, मेरे जीवन का आधार है हिंदी
हिंदी साधक, हिंदी मादक, सार्थक जीवन व्यवहार है हिंदी
संस्कृत के गर्भ से जन्मी सूता, भाषाओं के माथे की बिंदी है
जीवन मंत्र एक, सदा अग्रसारित पथ पर, ऐसी मेरी हिंदी है
जग सजे ऋतुओं से, ऋतुओं में जैसे श्रेष्ठ कहलाता है वसंत
भावों से समृद्ध वैसी यह हिंदी है, भाषाओं का समर अनंत
मैं हिंदी का प्रेमी हूं, है हिंदी ही मेरे इस जीवन का हस्ताक्षर
परिचय मेरा हिंदी है, रुधिर,वायु, हृदय सब हिंदी और अक्षर
गर्व है मुझे इस हिंदी पर, ये हिंदी ही तो मेरी प्रिय भाषा है
आधुनिकता के इस अंध दौर में, भावी भविष्य की आशा है
परिचय जैसे होता शब्दों भावों से, होता अपनत्व का बोध
समुद्र के निश्चल गहराइयों सी, ये हिंदी जीवन का है शोध
हिंदी संग जब मैं रहता हूं, लगता जैसे साथ मिलता मां का
मां जैसी ही दुलारती ये हिंदी, संवारे यह भविष्य का खाका
हिंदी है तो अस्तित्व सुरक्षित, न मेरा अपितु भारतवर्ष का
नवीन गाथाएं लिखी जाएंगी, मान सम्मान और संघर्ष का
एक दिवस तक ही क्यों अब हम, हिंदी का उत्सव मनाएं
हिंदी को समाहित कर मन दर्पण, जीवन को सजल बनाए
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित
अमित किशोर श्रीवास्तव
धनबाद (झारखंड)
हंँसिये की हंँसना जीवन है ...
हंँसी जीवन का प्रभात है । यह शीतकाल की मधुर धूप है ,तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। हंँसने से आत्मा खिल उठती है। इससे आप तो आनंद पाते हैं ,दूसरों को भी आनंदित करते हैं। हास- परिहास पीड़ा का दुश्मन है ,निराशा- चिंता का अचूक इलाज और दुखों के लिए रामबाण औषधि है। हंसना एक मानवीय लक्षण है। सृष्टि का कोई भी जीवधारी नहीं हंँसता। लेकिन एक मनुष्य ही हंँसने वाले प्राणी हैं। जीवन में निरोगी रहने के लिए हमेशा मुस्कुराते रहना चाहिए। खाना खाते समय मुस्कुराइए, आप को महसूस होगा कि खाना अब अधिक स्वादिष्ट लग रहा है। प्रसन्नता सूर्य कि वह किरण है जो सारी निराशा के अंधेरे को दूर कर देती है। यह एक जादुई एहसास है जिसे आप एक बार चख लेंगे तो आपके पूरे शरीर तथा मस्तिष्क पर हावी हो जाएगा। थैकर और शेक्सपियर जैसे विचारकों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि प्रसन्नचित व्यक्ति अधिक जीता है। मनुष्य की आत्मा की संतुष्टि, शारीरिक स्वच्छता व बुद्धि की स्थिरता को नापने का एक पैमाना है और वह है चेहरे पर खिली प्रसन्नता। #सविता खोसला
बुजुर्गों का साथ नेमत है....
इनका हर बोल दुआ है......
आपके घर में भी ऐसे कई लोग होंगे जिनके कांँपते हाथों में आपके हाथों से ज़्यादा मज़बूती होगी, जिनकी दुआओं ने पीढ़ियांँ तार दी होंगी । जिन की छांँव तले ना जाने कितनी रातों को राहत बख्शी होगी । यह है घर के बुज़ुर्ग इन्हें गुजरे कल की नज़र से नहीं, अपने भविष्य के तौर पर देखिए।
सच जानिए, एक उम्र के बाद ना तो खाना ज़्यादाखा पाते हैं, ना कपड़ों का शौक रहता है। बुजुर्गों के पास तो उनका सुदृढ़ अतीत होता है और होती है उनकी भावनाओं की भाषा। उस अतीत को बाँटने ,भावनाओं को समझने की आवश्यकता । क्या होता है, यदि एक बात को यह बार-बार बताते हैं कि आपको लगता है उनके पास दूसरी कोई बात नहीं। आप अपना बचपन याद कीजिए, आप एक प्रश्न कितनी बार पूछा करते थे और उन्होंने हर बार उसका उत्तर दिया होगा। ‘ क’ कबूतर को सीखने के लिए बीसियों बार आपको उंँगली पकड़कर दोहराया होगा। आपके पोपले मुंँह की हंँसी और किलकारी से वह कितने आनंदित होते होंगे ? आज उनके अपने मुँह की हंँसी से आपको मित्रों के बीच शर्मिंदगी क्यों ? आपकी जो हंँसी उनके जीवन की उल्लास तथा प्रेरणा थी ,आज ड्राइंग रूम में आपकी पार्टी और ठहाके होते हैं, तो किसी बंद कमरे में उपेक्षित बैठे उनके हृदय पर हथौड़े बरसते हैं। ऐसा क्यों ? समय आगे जरूर बढ़ गया ,पर इतना नहीं की भावनाशून्य हो जाए ।घर में पूजा या कोई अन्य आयोजन हो रहा है, पड़ोसी पधारे हैं तो यहांँ उन्हें भी नए कपड़ों के साथ सम्मान से विराजमान होने को कहें । इसमें ही आपकी प्रतिष्ठा है । होली में अबीर उनके चरणों पर रखकर आशीर्वाद लीजिए और बच्चों को भी दादा- दादी का स्नेहिल स्पर्श दिलवालें। यह आपके भविष्य का सुरक्षा चक्र हैं, जो सकारात्मकता की लहर से वातावरण को भर देते हैं । दीपावली का पहला दीप उनसे जलवाओ, सबके चेहरे देदीप्यमान हो उठेंगे
क्योंकि बड़े घर की छत होते हैं आपके संरक्षक बड़ों का साया सिर पर हो तो किसी भी रिश्ते की कड़वाहट या क्रोध कि आँच आप तक नहीं पहुंँच पाती । फिर यह छत हट जाए तो बच्चे चाहे 50 साल के ही क्यों ना हो गए हैं उतना ही असुरक्षित महसूस करते हैं जितना उन्होंने मेले में पिता का हाथ छूट जाने पर महसूस किया था ।बुजुर्गों के प्रति नज़रिया बदलिए, हमारी संस्कृति गौरवमयी है। संसार में कहीं भी रिश्तो को इतनी अहमियत नहीं दी जाती , जितनी भारत में हम पैदाइश से एक दूसरे के भावात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। #सविता खोसला
17/05/2023
Back To School Mrs Savita Khosla - YouTube Hi Dear Students This is Savita Khosla .Iam A Teacher From Ludhiana,Punjab. This youtube Channel Is Related To Educational Purpose So,if you are reading thi...
17/05/2023
कक्षा- 2 के छात्रों के लिए
SURAJ JALDI AANA JI CLASS-2 (RIM JHIM ) | NCERT SOLUTION | W/M & Extra Q/A | Mcqs BACK TO SCHOOL MRS SAVITA KHOSLA - WELCOME YOU *PLZ LIKE | SHARE | SUBSCRIBE*--------------------------------------------------------------------------------...
पेड़ों से मुझे लगाव क्यों?
मैं तो कहती हूंँ पेड़ों के बारे में कुछ जानना है तो पेड़ से नहीं, उस पर घोंसला बनाए बैठे पंछियों से पूछो, पेड़ की उस फुनगी पर झूला -झूलते व मीठे रसीले फल चबाते पंछियों से पूछो, पूछो... उस थके- हारे मुसाफिर से जो उसकी छाया में बैठा सुसता रहा है ,कैसे ? वृक्षों ने उसके बोझिल कदमों को रोककर उसे शीतल छांँव प्रदान की,पूछो उसकी शाखाओं पर झूला बांँधती बालाओं से, जो तीज तथा सावन का आनंद उठाती हैं, पूछो उन नटखट लड़कों से जो उसे मारते हैं पत्थर, पर पाते हैं ...मीठे रसीले फल । लकड़ी बीनती लकड़हारिन से पूछो, पहाड़ तोड़ती पहाड़िन से पूछो, पेड़ों से प्रेम है तो पूछो उसके नीचे बैठ पगुराती गाय, भैंस, बकरियों से, गांँव में 40- 40 कोस तक पालकी ढ़ोकर ले जा रहे कहारों से पूछो, इन पेड़ों से प्रेम करने का कारण। पेड़ से पेड़ के बारे में मत पूछो क्योंकि वह अपनी खूबियों का बखान नहीं करते। आदमी को जहांँ इनकी जरूरत हो वहांँ यह हाज़िर हैं। यह अपना सब कुछ बिना धर्म- जाति भेदभाव के अर्पण करते हैं ।पेड़ों का अपना घर नहीं होता पर वे स्वयं घर होते हैं-अनेक पशु, पक्षी, आदमी, कीट, पतंगों के लिए । यह आंँधी- पानी में डटे रहकर भी मानव मात्र को अडिग रहने की शिक्षा देते हैं। यह चिरैया को घोंसला, पशुओं को चारा, मुसाफ़िरों को छाया, भूखों को फल देते हैं। पेड़ धूल- तूफानों के लिए प्राकृतिक बाधा है। वायुशोधक, धरती पुत्रों, हरा- सोना ,परमार्थी ,परोपकारी, ईश्वर के वरदान, जानवरों के आश्रय दाता के प्रति मेरा लगाव क्यों ना हो ? हाउसबोट, साबुन, शहद, लकड़ी ,झाड़ू, गोंद ,खाद, दवाइयांँ, इत्र ,सजावटी चीजे़ं इनसे ही तो मिलती हैं। यह अमृत तुल्य, दिव्य एवं महान हैं। इनके सुखों के कारण ये देव रूप में पूजे जाते हैं। इनकी अहमियत में - इतना कहना काफी है यह हमारे आजीवन साथी हैं । #सविता खोसला
दौड़ा दौड़ा......... भागा भागा सा........
अंको के पीछे ना भागें... व्यवहारिक भी बनें
आज के विद्यार्थी जो 90 से 95% अंक लाते हैं वास्तविक ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं। मेरे एक रिश्तेदार का बड़ा भाई है जो 90 से 95% अंक नहीं लाता था। उसके माता-पिता रोज़ उसे ताने मारते -खूब खेलो ,टी.वी देखो, तुम्हें यही तारेंगे, नतीजा यह हुआ कि रोज़-रोज़ के तानों से तंग आकर उसने पढ़ना -लिखना शुरू कर दिया। दसवीं में 85%, 12वीं में 90% ,अंक लाकर आगे बढ़ता चला गया। स्कूल से स्कॉलरशिप भी मिली। उसने सी .ए की डिग्री भी प्राप्त कर ली, लेकिन जब नौकरी या काम धंधे के लिए कहा गया तो, उसका जवाब दे दिया। 90% से खुश हूंँ,पर इन्होंने मेरा शरीर जर्जर कर दिया, चश्मा लग गया है ,कोई काम करूंँगा तो नंबर कहांँ से आएँगे, तो आप लोग नाराज़ हो जाएंँगे । मैं आपको नाराज़ नहीं करना चाहता।अब हो गया है- पागल।
हमेशा किताबों में उलझा रहता है। किताबें उसकी दोस्त हैं, उसकी मौज- मस्ती हैं। किताबी उसका क्रिकेट हैं, किताबें उसका धर्म। खाना तभी अच्छा लगता है जब उसमें बदलाव होता रहे, रोज़- रोज़ एक सब्ज़ी खाकर जैसे मन ऊब जाता है, वैसे ही लगातार कोर्स की किताबें पढ़ने पर ऊब होती है। विद्यार्थी को वास्तविक जीवन का बौध प्राप्त करना चाहिए। सुबह जल्दी उठना, ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, पालन करते हुए सादा एवं पौष्टिक भोजन खाना, समाज से जुड़े रहना, खेलों में हिस्सा लेना, स्कूल- कॉलेज के विद्यार्थियों के संग टूर(trip) जाने पर, जीवन का आनंद, कुदरती माहौल में प्राप्त करना।
90 से 95% नंबरों की सार्थकता तभी है जब व्यावहारिक जीवन में भी 90%से 95% का ज्ञान हो।
जैसे थ्योरी और प्रैक्टिकल का संबंध है ,वैसे ही किताबी ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान का समन्वय अनिवार्य है।
पैसा आदमी के लिए है ना कि पैसे के लिए आदमी। ठीक वैसे ही ज्ञान आदमी के लिए है ना कि आदमी ज्ञान के लिए। इसलिए 90% अंक लाने में व्यवहारिक ज्ञान होनी चाहिए।घूमना फिरना, समाज के कार्यकलापों की जानकारी रखना ,जरूरतमंदों की मदद करना आदि कुछ ऐसे कार्य हैं जिनके बिना मनुष्य का जीवन एक “मशीनी जीवन" बन जाता है। कहने का तात्पर्य है कि कुएंँ से बाहर निकल कर जैसे मेंढ़क को पता चलता है कि दुनिया कितनी विशाल है।
ठीक उसी प्रकार विद्यार्थी “किताबी कीड़ा "ना बनकर सामाजिक प्राणी बनते हुए, विद्यार्थी जीवन का निर्वाह करेगा, तभी उसके ज्ञान का दायरा बढ़ेगा, जो उसे किताबी ज्ञान का भी एहसास दिलाएगा और जीवन क्षेत्र में उन्नति के शिखर पर भी पहुंँचाएगा।
ज्ञान का महत्व - कहा गया है कि हमें सीमित ज्ञान में सिकुड़ना नहीं चाहिए क्योंकि यह विष का काम करता है । “विषय " का गहराई से अध्ययन करना चाहिए। ।उस विषय की जो जानकारी मिले उसे प्राप्त कर लेना चाहिए। यही एक अच्छे विद्यार्थी की पहचान होती है। विषय जानें, लेकिन जानना ज़्यादा से ज़्यादा अंक लाने के लिए नहीं होता, उसे कितनी गहराई से समझा गया है ,यही योग्यता की असली कसौटी है। #सविता खोसला
दरकते रिश्ते....टूटते परिवार
क्यों भूल बैठे हैं वे कि इन्हें वृक्षों की घनी छांँव के नीचे स्वर्गीय आनंद ले के वे जवान हुए हैं ? तो क्यों यही घने वृक्ष और “कोल्हू के बैल" बने माता-पिता आज के बच्चों पर बोझ बन गए हैं। पर मांँ-बाप आज भी शुक्रगुजार हैं तथा कहते नहीं थकते “पुत्तर मिठड़े मेवे, रब सब नू देवे"।“ भाई -भाई के बाजू होते हैं" क्या यह सत्य है ? शायद आज के ज़माने में यह कोरा स्वप्न तथा झूठ प्रतीत होता है। भाई तो सिर्फ राम- लक्ष्मण थे या भरत था, जो 14 साल तक वनवास काटने गये, श्रीराम के लौट कर आने का इंतजार करता रहा , पर राज सिंहासन पर ना बैठा। आज कहीं भी भरत- मिलाप नहीं होता। आज तो भाई- भाई के खून के प्यासे हैं। पैसे के पुजारी हैं। तेरे- मेरे की भावना ने उनका खून सफ़ेद कर दिया है । पति पत्नी के रेशम के रिश्ते की डोरी आज कच्चे- धागे में बदल रही है। शादी विवाह एक व्यापार बन गया है। आज शादी -ब्याह की बुनियाद कच्ची है जो धोखे से उसारी (निर्मित की )गई है। चाहे बिचौलियों का होना खत्म हो चुका है ,पर अखबारों के रास्ते से शादियों के विज्ञापन देकर रिश्तो में ओहला(पर्दा) रखा जाता है। अजीबोगरीब शर्तों से रिश्ते तय किए जाते हैं । रिश्तो के द्वारा विदेश गमन की राहें सँवारी जाती है। विवाह संबंधी विज्ञापनों में अंदर की बात या शर्त; “ विदेशी वर के लिए सिर्फ वही संपर्क करें जो लड़के या लड़की की मौसी या बुआ के लड़के के लिए, विदेशी रिश्ता करवा सकें" “ क्या विवाह जैसे पवित्र बंधन" पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाते? टी.वी सीरियल्स ने पति- पत्नी के रिश्ते को मज़ाक बना दिया है ।प्रेम, प्यार,चाव,उमंगों से किया गया पुत्र का विवाह कुछ एक कारणों से मानसिक संघर्ष का कारण बनता जा रहा है। कहीं दहेज की समस्या, कहीं नई और पुरानी पीढ़ी के विचारों में तकरार, कहीं शराबी व नशेड़ी पति या फिर नई- नवेली दुल्हन, जो पढ़ी-लिखी होते हुए घरेलू जिम्मेदारियों से अनजान है, आदि कारणों से परिवारों में दरारें पड़ रही हैं। बहू- सास की नोकझोंक वाला रिश्ता स्थाई रूप धारण कर गया है। शायद बेटी के अत्याचार का बदला सास ,बहू के आंँसू बहा कर ,अपना अंतर्मन ठंडा करती है। परिवर्तन कुदरत का नियम है। पर रिश्तों में आ रहा भारी बदलाव किसी प्राकृतिक विपदा,क्रोप,भूचाल, से कम नहीं, जिसके साथ सब कुछ नष्ट -भ्रष्ट हो जाता है तथा नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करनी पड़ती है ।जिसके लिए लंबा समय लग जाता है । इसलिए आवश्यकता है समय रहते संभलने की तथा इस विषय पर विचार करने की कि “किधर को चली जा रही है ,आज की दुनिया।" इस कलयुग में तेज़ अंधेरी पर सवार मनुष्य को यह भी नहीं खबर कि उसने जाना कहांँ है और उसकी मंजिल कौन सी है ?
“पुरानी रोशनी और नई में फ़र्क इतना है ,उसे कश्ती नहीं मिलती , इसे साहिल नहीं मिलता।"
सविता खोसला
ग्राम्य जीवन....
गाँव की चौपाल का यह नीम बूढ़ा,
पिता की याद से पहले खड़ा,
सघन छाया में बिछी हैं खाट कितनी,
इन जड़ों में बैठकर हुआ नवनिर्माण ।।
भारत का सुधार गांँव के सुधारों से ही संभव है। ऐसे गंभीर विषय के अनदेखी नहीं की जा सकती। आज का समाज अगर सही मायने में बचा है, तो वह गाँव में ही बचा है ।वहांँ पर सुख-दुख पूछने से लोगों का सरोकार रहता है ,हर्षोल्लास का समय हो या तकलीफ़ ग्रामीण ढांँचे में सहयोग कर पाना संभव है । गांँव तो भारतीय समाज की रीढ़ की हड्डी हैं ।शहर में रिश्ते-नाते सब ताक पर रख दिए गए हैं । सारे रिश्ते, ढ़ोंग, दिखावा मात्र तथा ‘टेलिफोनिक' होते जा रहे हैं । गांँव में जीवन अपनी तरह की शांति तथा विपन्नता का स्वामी है। भारत का सही विकास देखना है, तो ग्रामों को सक्षम बनाना होगा। एक समय था जब गांँव में जन्म लेने वाला हर प्राणी रोज़गार लेकर पैदा होता था । आज घटती ज़मीन ,उद्योगों के कारण, गांँव के परंपरागत रोज़गार घटते चले जा रहे हैं। आज गांँव में व्यापारी के लिए व्यापार, किसानों के लिए खेती नहीं रही ।आजकल की विद्या के क्षेत्र में हो रही उन्नति भी, कुछ हद तक ज़िम्मेदार है। पढ़े-लिखे छात्रों को जहाँ, ग्रामीण वातावरण रास नहीं आता ।वहीं वे छोटे-मोटे काम करना भी ना पसंद करते हैं । बाप -दादाओं की चली आ रही किसानी को वे नाक- भौं चिढ़ाने लगे हैं। लड़कियांँ भी पढ़- लिखकर घर के कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, कटाई, रसोई के कामों में दिलचस्पी नहीं दिखाती । गांँव का उद्धार ना हुआ तो? शहरों की चकाचौंध से, गाँवों से पलायन और हो जाएगा। काम- काज अधिक ना होने के कारण, पढ़े-लिखे ग्रामवासी उदासी के गर्त में डूबते जा रहे हैं। ग्रामीण जीवन अगर ना बच पाया तो, किसी का भी जीवन सुखमय नहीं रहेगा । गांँव की प्राकृतिक शोभा ईश्वर की देन है । नगरों की कृत्रिम शोभा, मनुष्य की उपज है । भारत माता को ‘ग्रामवासिनी' कहना कोई अतिशयोक्ति न होगी। आज भी भारत की 70% जनता गांँव में निवास करती है । मेक -इन-इंडिया को ,यदि मेक -इन -विलेज का पर्याय बना दें तो, वर्तमान समय में नर्क का पर्याय बनते जा रहे ग्राम, स्वर्ग का पर्याय बन जाएंँगे । सड़कों से गाँवों को जोड़ा जाए ,तकनीकी तथा खेती के किसानों को उत्तम तरीके सिखाए जाएंँ, शिक्षा की अच्छी व्यवस्था की छाए, ग्रामीण औरतों को हथकरघा के काम उपलब्ध कराने होंगे। उनके लिए समय-समय पर मनोरंजन के कार्यक्रमों का आयोजन करना होगा ,तभी लोग गांँव के सुखद वातावरण को नहीं त्यागेंगे। गांँव के तो दृश्य ही मंत्रमुग्ध कर देने वाले होते हैं, कहीं बैलों को हाँकते किसान ,सादी वेशभूषा ,दही बिलोती ग्वालिनों के हाथों की चूड़ियों की खनक, बैलों के गले की घंटियों से बना मदहोश करने वाला वातावरण , गौधूलि बेला, बस क्या नहीं है हमारे गांँवों में ? कुछ हल्के-फुल्के कदम उठाने ही तो बाकी हैं। यह स्वयंसेवी- संस्थाएंँ भागीदारी करके आसानी से कर सकती हैं। कर भी रही हैं। कुछ तो मदद सरकार को भी करनी होगी। आदर्श गांँव से ही, आदर्श भारत का सपना देखा जा सकता है। आह! ग्राम्य जीवन भी क्या है, क्यों ना इसे सबका जी चाहे। थोड़े में निर्वाह यहांँ, ऐसी सुविधाएंँ और कहांँ हैं।।
सविता खोसला
भारत –माता
भारत मांँ तेरा रूप मनोहर
तेरे वस्त्रों के हैं -लगते तीन रंग
मानो सोरठा, चौपाई और छंद
एक हस्त थामें पुष्प बेल
एक में धारण किए चार वेद
साम ,यजुर्वेद ऋग्वेद अथर्ववेद
चारों वेदों का गुण- गान यहांँ
ग्रंथों -शास्त्रों का मान ,यहांँ
थामा हाथ में जो कमंडल
समाया उसमें- यमुना गोदावरी ,सरस्वती,
नर्मदा,सिंधु, कावेरी ,सुरसरि का जल
भानु ,दिवाकर- तेरे सारथी
दिन रात गाते मांँ ,तेरी आरती
ऊपर अंबर, नीचे पाताल
चरण पखारते जलधि विशाल
भूगर्भ में खनिज हैं समाए
रत्न ,माणिक ,मुक्तक हम पाएँ
पीयूष, दधि, नवनीत दुग्ध
तू कामधेनु - हमें करे मुग्ध
सविता सा आभामंडल
सुंदर पुष्प तेरे कर्ण कुंडल
रंग-बिरंगे सुंदर उपवन
मांँ भारती तेरे हैं -नयन
ऋषियों की तू तपोभूमि
चक्रधर कृष्ण की कर्मभूमि
तेरी वंदना गाएंँगे
चरणों में शीश झुकाएंँगे
तुझ पर वारी जाएँगे
तेरा कर्ज चुका ना पाएंँगे
स्वरचित
सविता खोसला ,लुधियाना पंजाब
34 वर्ष का कार्यकालीय अनुभव कविता लेखन में रुचि, अध्ययन अध्यापन में विशेष रूचि
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Ludhiana
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