Sunil Darda

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Sunil Darda ex प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य
भारतीय जनता पार्टी
आई टी प्रकोष्ठ
राजस्थान
महामंत्री
भाजपा मदनगंज मंडल

08/08/2026

#आईना_किशनगढ़
बेहाल मार्बल एरिया किशनगढ़

"जिस दिन बेटे ने 1.8 करोड़ की नौकरी ठुकराई... उसी दिन पिता पहली बार उसके सामने रो पड़े"मेरा नाम आर्यन तिवारी है।उम्र 29 ...
04/08/2026

"जिस दिन बेटे ने 1.8 करोड़ की नौकरी ठुकराई... उसी दिन पिता पहली बार उसके सामने रो पड़े"

मेरा नाम आर्यन तिवारी है।
उम्र 29 साल।

आज मैं प्रयागराज में अपने पिता के साथ एक छोटी-सी पुस्तक दुकान चलाता हूँ। दुकान के ऊपर एक कमरा है, जहाँ शाम को मैं गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता हूँ।

जब कोई मेरी दुकान पर लगी मेरी आईआईटी की डिग्री देखता है तो एक ही सवाल पूछता है—

"इतनी बड़ी पढ़ाई करके... किताबें बेच रहे हो?"

मैं सिर्फ मुस्कुरा देता हूँ।

क्योंकि उन्हें नहीं पता...

कि पाँच साल पहले मेरे पास लंदन की एक बड़ी टेक कंपनी का ऑफर था, जिसकी सालाना सैलरी भारतीय पैसों में लगभग 1 करोड़ 80 लाख रुपये थी।

ऑफर लेटर आज भी मेरे पास है...

लेकिन उस पर मेरे हस्ताक्षर कभी नहीं हुए।

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मेरी कहानी 2003 की है।

प्रयागराज के कटरा इलाके में हमारे पिता शिवनारायण तिवारी की एक छोटी-सी पुरानी किताबों की दुकान थी।

दुकान इतनी छोटी कि एक समय में तीन ग्राहक भी आ जाएँ तो चौथा बाहर खड़ा रहता था।

मेरी माँ सावित्री तिवारी घर में पापड़ और अचार बनाकर बेचती थीं।

हम दो भाई-बहन थे।

मैं और मेरी छोटी बहन राधिका।

घर में पैसे कम थे...

लेकिन किताबों की कमी कभी नहीं थी।

पिताजी कहते थे—

"बेटा, पैसा खत्म हो जाए तो फिर कमाया जा सकता है... लेकिन सीखने की आदत खत्म हो जाए, तो आदमी अंदर से गरीब हो जाता है।"

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मैंने पढ़ाई को ही अपना रास्ता बना लिया।

दसवीं में जिले में पहला स्थान।

बारहवीं में 97.8 प्रतिशत।

फिर आईआईटी दिल्ली।

जिस दिन मेरा चयन हुआ...

पिताजी ने दुकान दो घंटे पहले बंद कर दी।

उन्होंने पहली बार अपने लिए नया कुर्ता खरीदा।

माँ ने पूरे मोहल्ले में लड्डू बाँटे।

और राधिका पूरे मोहल्ले में यही कहती फिर रही थी—

"मेरा भैया इंजीनियर बन गया!"

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कॉलेज में मेरी दुनिया बदल गई।

दिन-रात पढ़ाई।

प्रोजेक्ट।

हैकाथॉन।

इंटरनशिप।

फाइनल ईयर में लंदन की कंपनी का इंटरव्यू हुआ।

सात राउंड।

आखिरी कॉल में उन्होंने कहा—

"आर्यन... वेलकम टू द टीम।"

मैं खुशी से रो पड़ा।

घर फोन किया।

पिताजी बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।

फिर धीरे से कहा—

"अब मेरी दुकान भी तेरे बिना चल जाएगी बेटा..."

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जॉइनिंग में सिर्फ डेढ़ महीना बाकी था।

पासपोर्ट बन चुका था।

वीजा भी आ गया था।

तभी एक सुबह दुकान से फोन आया।

राधिका रो रही थी।

"भैया... जल्दी आओ..."

मैं भागकर घर पहुँचा।

दुकान बंद थी।

पिताजी अस्पताल में थे।

दिल का दौरा पड़ा था।

डॉक्टर ने कहा—

"हार्ट की तीन नसें ब्लॉक हैं। ऑपरेशन करना होगा।"

मैंने बिना सोचे अपने सारे पैसे जमा कर दिए।

ऑपरेशन सफल हुआ।

लेकिन डॉक्टर ने साफ कहा—

"अब इन्हें अकेला मत छोड़िए। तनाव बिल्कुल नहीं होना चाहिए।"

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मैंने सोचा...

सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन जिंदगी शायद अभी और इम्तिहान लेना चाहती थी।

दो महीने बाद माँ की रिपोर्ट आई।

किडनी खराब होने लगी थी।

हर हफ्ते अस्पताल।

दवाइयाँ।

जाँच।

डायलिसिस का खतरा।

राधिका बी.कॉम. कर रही थी।

वह पढ़ाई छोड़कर घर संभालने लगी।

एक दिन मैंने उसे चुपके से रोते देखा।

वह माँ के पुराने गहने बेचने की सूची बना रही थी।

उस रात मेरी नींद नहीं लगी।

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अगले दिन कंपनी की एचआर का फोन आया।

"आर्यन... आपकी फ्लाइट अगले सप्ताह है।"

मैंने कहा—

"क्या मैं छह महीने बाद आ सकता हूँ?"

उन्होंने मना कर दिया।

मैंने पूछा—

"क्या मैं भारत से काम कर सकता हूँ?"

उत्तर फिर वही था—

"नहीं।"

फोन कट गया।

मैंने पासपोर्ट हाथ में लिया।

फिर अस्पताल में माँ का चेहरा देखा।

पिताजी व्हीलचेयर पर बैठे थे।

राधिका बिल भरने की लाइन में खड़ी थी।

उस एक पल में...

मुझे समझ आ गया...

कुछ फैसले दिमाग नहीं...

दिल लेता है।

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मैंने उसी शाम कंपनी को मेल भेज दिया।

"मुझे यह अवसर देने के लिए धन्यवाद... लेकिन मैं अपने परिवार को इस समय छोड़कर नहीं जा सकता।"

मेल भेजते समय मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।

लेकिन भेजने के बाद...

मन पहली बार शांत था।

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दोस्तों ने कहा—

"तू पागल है।"

रिश्तेदार बोले—

"ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता।"

मैंने किसी से बहस नहीं की।

मैंने बस पिताजी की दुकान संभाल ली।

सुबह दुकान।

दोपहर अस्पताल।

रात को ऑनलाइन बच्चों को पढ़ाना।

धीरे-धीरे दुकान में कंप्यूटर की किताबें, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें और स्टेशनरी भी रखनी शुरू की।

कमाई बढ़ने लगी।

---

एक दिन एक गरीब लड़का दुकान पर आया।

उसके पास किताब खरीदने के पैसे नहीं थे।

मैंने उसे किताब मुफ्त दे दी।

उसने कहा—

"सर... बड़ा होकर मैं भी किसी की मदद करूँगा।"

उसी दिन मैंने दुकान के ऊपर मुफ्त कोचिंग शुरू कर दी।

पहले पाँच बच्चे आए।

फिर बीस।

फिर पचास।

---

तीन साल बाद...

उन्हीं बच्चों में से आठ बच्चों का चयन सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में हुआ।

अखबार में खबर छपी—

"किताब बेचने वाले आईआईटीयन ने गरीब बच्चों की जिंदगी बदल दी।"

यही खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

कुछ ही दिनों बाद...

उसी लंदन वाली कंपनी के सीईओ का ईमेल आया।

उन्होंने लिखा—

"आर्यन, हमें आपकी कहानी पता चली। अगर आप चाहें तो भारत में रहते हुए हमारे एजुकेशन प्रोग्राम का नेतृत्व कर सकते हैं।"

इस बार...

मुझे अपना घर छोड़ना नहीं पड़ा।

---

पिछले महीने पिताजी 70 साल के हुए।

दुकान पर छोटा-सा कार्यक्रम रखा गया।

उन्होंने सबके सामने मेरा हाथ पकड़कर कहा—

"मैंने इसे हमेशा बड़ा आदमी बनने को कहा था... लेकिन इसने मुझे समझाया कि बड़ा आदमी बनने और बड़ा इंसान बनने में बहुत फर्क होता है।"

माँ की आँखों में आँसू थे।

राधिका मुस्कुरा रही थी।

और मैं...

चुप था।

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आज भी कभी-कभी रात को अलमारी खोलता हूँ।

वह पुराना ऑफर लेटर हाथ में लेता हूँ।

फिर नीचे दुकान से पिताजी की आवाज आती है—

"आर्यन... ज़रा दो कप चाय बना देना।"

मैं मुस्कुराकर वह कागज़ वापस रख देता हूँ।

क्योंकि अब मुझे समझ आ गया है...

हर सपना विदेश जाकर पूरा नहीं होता।

कुछ सपने...

अपने घर लौटकर पूरे होते हैं।

और अगर भगवान मुझे फिर वही दिन वापस दे...

तो मैं फिर वही फैसला करूँगा।

क्योंकि करोड़ों रुपये कमाकर शायद मैं अमीर बन जाता...

लेकिन उस दिन अपने माता-पिता का साथ छोड़ देता...

तो जिंदगी भर अपने आप को कभी माफ़ नहीं कर पाता।

कुछ फैसले करियर नहीं बदलते... इंसान की पहचान बना देते हैं।

#अच्छे_लोग_अच्छे_काम

04/08/2026
08/07/2026
03/11/2025

RSS की 100 वर्ष की यात्रा के प्रमुख घटनाक्रम..

1925 : डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितम्बर को विजया दशमी के दिन हिन्दुओं के लिए एक संगठन की नींव रखी, जिसका कोई नाम नहीं दिया गया।
1926 : 17 अप्रैल को संगठन को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम मिला जब हेडगेवार के अनुयायियों के एक छोटे समूह ने चार प्रस्तावित नामों में से इस नाम को सबसे ज्यादा मत दिये।
1926 : पहली नित्य शाखा नागपुर में 28 मई से शुरू हुई।
1927 : पदाधिकारियों का पहला प्रशिक्षण शिविर मई में शुरू हुआ जिसमें 17 प्रतिभागी शामिल हुए।
1928 : मार्च में पहले प्रतिज्ञा समारोह में 99 स्वयंसेवक शामिल हुए।
1929 : नवम्बर में हुई दो दिवसीय बैठक में हेडगेवार को आरएसएस सरसंघ चालक, बालाजी हुद्दार को सरकार्यवाह और मार्तंडराव जोग को सरसेनापति नियुक्त किया गया।
1930 : कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। हेडगेवार ने सभी शाखाओं को 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्देश दिया। हेडगेवार ने कई स्वयंसेवकों के साथ जंगल सत्याग्रह में भाग लिया और गिरफ्तार हुए। खाकी टोपी के स्थान पर काली टोपी को आरएसएस के गणवेश के हिस्से के रूप में अपनाया गया।
1940 : ब्रिटिश सरकार ने संघ गणवेश और रूट मार्च पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हिन्दी और मराठी प्रार्थना के स्थान पर संस्कृत प्रार्थना शुरू की गयी। हेडगेवार का 21 जून को निधन हो गया। माधव सदाशिव गोलवलकर को तीन जुलाई को आरएसएस का दूसरा सरसंघचालक नियुक्त किया गया।
1947 : आरएसएस स्वयंसेवकों ने केन्या में भारतीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। ऑर्गनाइजर और पांचजन्य साप्ताहिक पत्रिकाएँ शुरू की गयीं।
1948 : 30 जनवरी को महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। तत्कालीन आरएसएस प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर और हजारों स्वयंसेवकों को गिरफ्तार कर लिया गया।
1949 : जब कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ तो सरकार ने 12 जुलाई 1949 को प्रतिबन्ध हटा लिया। संघ का संविधान तैयार किया गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की गयी।
1950 : आरएसएस की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की पहली बैठक मार्च में हुई। पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों की मदद के लिए वास्तुहारा सहायता समिति की स्थापना की गयी।
1952 : गोरक्षा आन्दोलन का प्रारम्भ। वनवासी कल्याण आश्रम प्रारम्भ। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना।
1954 : दादरा नगर हवेली को पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त कराने में स्वयंसेवकों ने मदद की।
1955 : गोवा मुक्ति संग्राम में स्वयंसेवकों की प्रभावी सहभागितता। भारतीय मजदूर संघ की स्थापना।
1963 : 26 जनवरी को दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रण मिलने पर लगभग 3000 आरएसएस स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश और बैण्ड के साथ भाग लिया।
1964 : विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई।
1973 : पाँच जून को माधव सदाशिव गोलवलकर का निधन हो गया। छह जून को बालासाहब देवरस तृतीय सरसंघचालक बने।
1975 : इन्दिरा गांधी सरकार ने 25 जून को आपातकाल लागू कर दिया। चार जुलाई को आरएसएस पर दूसरी बार प्रतिबन्ध लगा दिया गया। बालासाहब को गिरफ्तार कर लिया गया। आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष हेतु अखिल भारतीय लोक संघर्ष समिति की स्थापना की गयी।
1977 : भारतीय जनसंघ का नवगठित जनता पार्टी में विलय हो गया और वह सत्ता में आई। सरकार ने 22 मार्च को संघ पर से प्रतिबन्ध हटा लिया। जयप्रकाश नारायण ने 3 नवम्बर को पटना में आरएसएस की बैठक को सम्बोधित किया।
1978 : दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना हुई।
1980 : भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठन हुआ।
1981 : संस्कार भारती की स्थापना हुई।
1992 : अयोध्या में विवादित ढाँचे के विध्वंस के बाद 10 दिसम्बर को केन्द्र ने आरएसएस पर तीसरी बार प्रतिबन्ध लगा दिया।
1993 : सरकार द्वारा नियुक्त न्यायाधिकरण ने चार जून को संघ पर प्रतिबन्ध को गलत ठहराते हुए इसे निरस्त किया। अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद का गठन।
1994 : 11 मार्च प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य रज्जू भइया सरसंघचालक घोषित हुए। संघ के अखिल भारतीय सेवा विभाग का प्रारम्भ। लघु उद्योग भारती का गठन।
1998 : भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन ने केन्द्र में सरकार बनायी, जिसके प्रधानमंत्री आरएसएस के पूर्व प्रचारक अटल बिहारी वाजपेयी थे।
2000 : कुपहल्ली सीतारमैया सुदर्शन को 11 मार्च को आरएसएस का पाँचवाँ सरसंघचालक नियुक्त किया गया।
2009 : डॉ. मोहन भागवत को संघ का छठा सरसंघचालक नियुक्त किया।
2016 : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वयंसेवकों की वर्दी के लिये खाकी निकर की जगह भूरे रंग की पतलून को अपनाया।

30/10/2025

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Muni Pushkar Colony
Madanganj
305801

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9414010795

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