03/10/2018
शेरे किसान
This page is about providing political,sociological and economic updates happening in the western UP. Currently we will focus on 2017 election majorly.
03/10/2018
शेरे किसान
18/01/2018
(छपरौली में जन्मे आईपीएस अनुराग आर्य का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू)
माँ के एक थप्पड़ ने दी जिंदगी की बडी सीख!
आरबीआई की नौकरी छोड आईपीएस बन गया ये युवा!
पढिये अनुराग आर्य का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू!
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मिडनाइट एक्सप्रेस
18 जनवरी 2018
नई दिल्ली।
कहते हैं कि सच्चे दिल से की गई मेहनत परिणाम की मोहताज नही होती बल्कि रिजल्ट और वक्त खुदबखुद ऐसे इंसान की प्रतीक्षा करता है । ये बात एकदम सटीक बैठती है आईपीएस अनुराग आर्य के ऊपर!
अनुराग ने अपनी मेहनत से पहले आरबीआई जॉइन किया लेकिन उनकी सफलता की यात्रा यंही खत्म नही हुई बल्कि अपनी लग्न और मेहनत के दम पर अनुराग ने वर्ष 2013 में आईपीएस का तमगा हासिल कर लिया।
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दैनिक भास्कर द्वारा लिया गया इंटरव्यू!
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6 फीट लंबी हाइट और एथलेटिक बॉडी वाला ये IPS जब कभी घोड़े पर बैठकर या साइकिल पर पेट्रोलिंग करने निकलता है तो सुर्खियां बन जाती हैं। ये ऑफिसर अक्सर ही अपने ऐसे एक्शन की वजह से चर्चा में रहता है। पिछले 10 महीने से एसपी कानपुर ईस्ट के पद पर तैनात इस ऑफिसर को युवा इंस्पिरेशन के तौर पर भी देखते हैं। हम आपको इस IPS के लाइफ अचीवमेंट्स के बारे में बताने जा रहे हैं।
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नेशनल लेवल तक खेला बास्केटबॉल
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-यूपी के बागपत जिले के छपरौली गांव में 10, दिसम्बर 1987 को जन्में 2013 बैच के IPS ऑफिसर अनुराग आर्य ने खास बातचीत में बताया कि उनके माता-पिता दोनों ही डॉक्टर हैं।
- उनकी क्लास 5 तक की पढ़ाई गांव में ही हुई, लेकिन आगे की पढ़ाई देहरादून के आर्मी स्कूल से हुई।
- अनुराग को बचपन से ही स्पोर्ट्स का बहुत शौक था। स्कूल टाइम से ही वो बास्केटबॉल और क्रिकेट खलते रहे और आगे चलकर उन्होंने बास्केटबॉल नेशनल लेवल तक खेला।
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डेली 8 घंटे की पढ़ाई
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- वहीं, अनुराग ने वाराणसी के बीएचयू से फिजिक्स ऑनर्स से ग्रैजुएशन भी कम्प्लीट किया और इसके साथ ही कम्पटेटिव एग्जाम्स की तैयारी करते रहे।
- लेकिन, अनुराग के अंदर बचपन से ही पुलिस की वर्दी का काफी क्रेज था। वो हमेशा से खुद को वर्दी पहने देखना चाहते थे।
- अनुराग ने बताया कि वो 8 घंटे डेली पढ़ाई करते थे। किसी काम से अगर पढ़ाई छूट जाती थी तो उसे अगले दिन ज्यादा समय देते थे।
- उनका कहना है कि सिविल सर्विसेज के दिनों में हमारे 6-7 दोस्त थे, जिनसे काफी सपोर्ट मिलता था। सिविल सर्विसेज के लिए 3-4 घंटे न्यूज पेपर पढ़ता था, जिससे एग्जाम के दौरान काफी मजबूती मिली।
- इस पढ़ाई में एक चीज़ बहुत आवश्यक है, वो है आत्मविश्वास।
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छोड़ दी थी बैंक की नौकरी
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- दिल्ली विश्वविद्यालय से एमएससी की पढ़ाई के दौरान ही 2012 में अनुराग का सिलेक्शन RBI बैंक में मैनेजर के पद पर हो गया। इसके बाद उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी।
- कानपुर स्थित RBI ब्रांच ऑफिस में अनुराग ने 5 महीने काम किया।
- लेकिन, वर्दी पहनने की ललक में अनुराग ने 2012 में सिविल सर्विसेज का एग्जाम दिया और फर्स्ट एटेम्पट में ही उन्हें सफलता मिल गई।
- 2013 में उनका रिजल्ट आया और उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी। 2014 में वो IPS की 11 महीने की ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद चले गए।
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जहां थे बैंक मैनेजर, वहीं बने एसपी
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- 2015 में अनुराग को ट्रेनी के तौर पर पहली पोस्टिंग गाजियाबाद में मिली।
- यहां 5 महीने गुजारने के बाद 2016 में उनकी पोस्टिंग वाराणसी में हो गई। यहां, उन्होंने 16 महीने बतौर सीओ गुजारे।
- फिर 2017 में उन्हें उसी शहर में बतौर एसपी पोस्टिंग मिल गई, जहां उन्होंने कभी बैंक मैनेजर के तौर पर काम किया था।
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पेट्रोलिंग का है यूनीक स्टाइल
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- एसपी कानपुर ईस्ट का कार्यभार संभालते ही अनुराग का वर्किंग स्टाइल लोगों को काफी पसंद आने लगा।
- सरकारी गाड़ी छोड़ कभी घोड़े पर सवार होकर तो कभी रात के समय साइकिल पर पेट्रोलिंग करने निकल जाना और पुलिस चौकियों पर औचक निरीक्षण करने की वजह से अनुराग की शहर में काफी चर्चाएं होती रहती हैं।
- इस पर अनुराग ने बताया कि अचानक चेकिंग के लिए निकलने से काफी नई चीजें पता चलती हैं। जमीनी हकीकत को जानने का मौका मिलता है।
- अनुराग ने वाक्या याद करते हुए बताया कि जब मैं गाजियाबाद में अंडर ट्रेनिंग था, उस वक्त मेरे पास एक मजदूर आया जिसके 700 रुपए किसी ने रख लिए थे। मैंने उसके पैसे वापस दिलवाए तो वो मुझे काफी दिनों तक धन्यवाद बोलने आता रहा।
- उस दिन एहसास हुआ कि उस व्यक्ति के 700 रुपए, किसी के 7 करोड़ से ज्यादा एहमियत रखते हैं। मैं ऐसे लोगों की मदद करना चाहता हूं।
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'मां के थप्पड़ से मिली ये सीख'
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- इस IPS ने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताया कि "एक बार बिना बताए मां के पर्स से 50 रुपए का नोट निकालकर टॉफी खाने के लिए चला गया। उस वक्त ये भी पता नहीं था कि ये नोट 50 का है या 10 का!
- "फिर ये बात दुकानदार ने मां को बता दी और मां ने इस बात को लेकर थप्पड़ भी मारे। मां ने कहा किसी का सामान लेने से पहले उससे परमिशन लेनी चाहिए।"
- उस दिन एक बात समझ आई कि गलत काम करोगे तो दंड मिलेगा और सही काम करते हो तो शाबाशी| उनकी कही हुई बात से मुझे बहुत हेल्प मिली। मेरी मां मेरे लिए प्रेरणास्रोत हैं।
साभार: दैनिक भास्कर
नीचे देखिए अनुराग आर्य के जीवन से जुडी कुछ तस्वीरें😍
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17/01/2018
17/01/2018
नीचे लिंक से आप ग्राम प्रधान द्वारा आपके गाँव में कराये गये कार्य को देख सकते हैं, जो उन्होंने आपके गाँव में खर्च दिखाये हैं। भले हो व्यवहारिक स्तर पर वह कुछ भी न कराये हों।
http://www.planningonline.gov.in/ReportData.do?ReportMethod=getAnnualPlanReport
इस लिंक पे आप अपने गांव मे हुए सभी कार्यो की जानकारी देख सकते है किस काम मे कितना पैसा खर्च हुआ।
यह देखकर हैरान हो गया कि एक छोटे से भी काम के लिए सरकार कितना पैसा देती है। अब हमको जागरूक होने की जरूरत है। सभी जानकारियां सरकार ने ऑनलाइन वेबसाइट पे उपलब्ध करा दी है बस हमें उन्हें जानने की जरूरत है, यदि हर गांव के सिर्फ 2-3 युवा ही इस जानकारी को अपने गांव के लोगो को बताने लगे, समझ लो 50% भ्रष्टाचार तो ऐसे ही कम हो जाएगा। इसलजिए आपसे गुजारिश है कि आप अपने गांव में वर्षय 2016-17 मे हुए कार्यो को जरूर देखें और इस लिंक को देश के हर गांव तक भेजने की कोशिश करे ताकि गांव के लोग अपना अधिकार पा सके।
15/01/2018
- 4 साल वाजपेयी सरकार:
देश की जीडीपी = 6%; कृषि जीडीपी = 2. 9%
- 10 साल मनमोहन सरकार:
देश की जीडीपी = 7.9%; कृषि जीडीपी = 3.7%
- 4 साल मोदी सरकार:
देश की जीडीपी= 7.2%; कृषि जीडीपी = 1.9%
पूरी तरह से किसानों को नष्ट करना के अलावा यह मेरी समझ से परे है, की इस सरकार ने क्या किया है.
जितेंद्र मलिक
Bhatta Parsaul-भटटा पारसौल
14/01/2018
जब मैं छोटा था तो मेरे छोटे से गाँव में गन्ने के रस की सामूहिक खीर बना करती थी बड़े से पतीले में, बड़ी स्वादिष्ट खीर होती थी..बच्चा पार्टी में बड़ी उछलकूद होती थी। मतलब ये समझो पूरा खरदू करने का मौका होता था मकर संक्रांति का दिन। घर वाले सुबह सुबह जगा देते थे और हम सब में नहाने की होड़ हुआ करती थी। इस दिन ट्यूबवेल पे जाके सुबह सुबह ताज़ा गुनगुने पानी से नहाना एक अलग ही सुखद अनुभव होता था। अच्छा जल्दी उठकर नहाना इसलिए भी मजबूरी होता था कहीं अगले जन्म में गधे न बन जाएं, कभी ना नहाने वाले भी गधे बनने के डर से इस दिन जरूर नहा लिया करते थे।
सभी को हैप्पी मकर संक्रांति।
05/01/2018
अलग राज्य क्यों ? - भाग 2 .
यूपी हमारे देश की सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य के साथ साथ कोर्ट में सबसे जयादा पेंडिंग पड़े मामलों की संख्या वाला राज्य भी है जहाँ उन्हें संभालने के लिए सब से कम बेंच हैं। यूपी में अपराध की घटनाओं का प्रतिशत देश के कुल में 30 प्रतिशत है , जो अपने आप में ही कितनी बुरी चीजों का सबसे बड़ा प्रमाण है.
अगर सरकार ने यूपी में केवल एक हाई कोर्ट की बेंच बनाने(लखनऊ में) और उसे इलाहाबाद से केवल 150 किलोमीटर दूर बना कर चूक की है तो क्या सरकार या मशीनरी का मजाक नै है ? राज्य और केंद्र सरकार दोनों इस मुद्दे पर पूरी तरह से कुछ नहीं कर रहे हैं, जो सबसे अफसोसजनक है। ज्ञात होना चाहिए की मेरठ से पाकिस्तान-लाहौर हाई कोर्ट की दूरी 500 किमी है, जबकि मेरठ से इलाहाबाद तक 607 किमी है। सहारनपुर से इलाहाबाद तक 752 किमी और सहारनपुर से लाहौर हाई कोर्ट 380 किमी है। गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद की दूरी दिल्ली हाई कोर्ट सिर्फ 25-30 किमी है. हाई कोर्ट की बेंच के लिए बहुत बार रिकमेन्डेशन भी हुआ पर केंद्र और सर्कार पूरी तरह नाकाम रहे जबकि उसी दौरान महाराष्ट्र के औरंगाबाद में बेंच बनायीं गयी।
खैर ये तो रही अलग बात अब जरा कुछ तथ्यों को देखें जो इस प्रकार हैं।
- देश में हाई कोर्ट सहित विभिन्न अदालतों में लंबित ३ करोड़ पेंडिंग केस सोल्व करने के लिए न्यायपालिका को 300 साल लगेंगे।
- इलाहाबाद हाई कोर्ट में 15 लाख मामले पेंडिंग हैं और इनमें से लगभग 57% मामले पश्चिम उत्तर प्रदेश से हैं.
- उत्तर प्रदेश के हाई कोर्ट में 160 जज हैं, केवल एक बेंच है, जबकि महाराष्ट्र में 40 जज हैं वहां 3 बेंच हैं ,
राजस्थान एचसी के 40 जजों के लिए 2 बेंच हैं और मध्यप्रदेश एचसी के 42 जज हैं और 3 बेंच हैं।
- नार्मल बेंच तो छोड़ो वेस्ट यूपी को सर्किट बेंच भी नै मिली है जबकि नार्थ ईस्ट स्टेट्स में ये है।
खैर अभी और भी है लिखने को पर इन शार्ट यही कहूंगा की लॉ कमीशन की रिपोर्ट पर, महाराष्ट्र में औरंगाबाद में एक एचसी बेंच पहले से ही स्थापित हो चुका है, जबकि उसी कमीशन द्वारा रेकमेंडेड पश्चिम यूपी को बेंच नै मिली।
बेंच की स्थापना के लिए अधिकतम विरोध मुख्य रूप से अल्लाहाबाद के वकीलों से होता है। खैर ऐसे लॉ कमीशन का क्या फ़ायद यदि उनकी सिफारिशें लागू नहीं की गई हैं.
पश्चिम उत्तर प्रदेश में एक लम्बे समय से बेंच की मांग उठ रही है जो अभी तक पूरी नै हुई है । यह संविधान के आर्टिकल 21 और आर्टिकल 39 ए का घृणित मजाक है जो पूरे देश में सबको सामान न्याय प्रदान करने की गारंटी देता है।
इसीलिए हाई कोर्ट एक राजनैतिक ही नै वेस्ट यूपी के लोगो का मौलिक आधार भी है।
Jitender Malik
Bhatta-parsaul
03/01/2018
अलग राज्य क्यों - भाग 1 ?
यूपी देश का सबसे पिछड़ा और सबसे धीमी गति से प्रगतिशील प्रदेश है
राज्य का पुनर्गठन राज्य की नई सरकारों को उनकी समस्याओं ,संसाधनों और विकास के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सक्षम हो सकता है
छोटे राज्य बेहतर विकास के लिए आगे बढ़ते हैं यह दुसरे राज्यों के अनुभव ने दर्शा दिया है
पंजाब, हरियाणा, और हिमाचल प्रदेश जो 1960 के मध्य में पंजाब से बने थे आज विकास की दौड़ में सबसे अग्रिम हैं।
इसके अलावा उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़, जो कि जोकि अभी बने हैं ने हाल की अवधि में तेजी से वृद्धि दिखायी है।
जब राज्य डिसइंटिग्रेटे होता है तो छोटे क्षेत्रों में क्षमता होती है अपनी ताकत से अधिक एफ्फिसिएंट और एकजुट तरीके से काम करने और अपनी कमजोरियों को ठीक करने के लिए।
कभी-कभी यह तर्क दिया जाता है कि बड़े राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कारण संसद और राष्ट्रीय राजनीति में यूपी अपना स्ट्रांग स्टैंड रखने में सक्षम है। हालांकि, तथ्य इसका समर्थन नहीं करते हैं।
कांग्रेस शासन के पहले दो दशक में, यूपी को शायद ही कोई प्रमुख केंद्रीय परियोजना मिली और न ही राज्य के मुख्यमंत्रियों ने ऐसा किया था
केंद्र के विशाल व्यक्तित्व के खिलाफ उनकी आवाज नीची ही रही। यूपी के राष्ट्रीय राजनीति के विपरीत, अन्य राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व जैसे गुजरात और तमिलनाडु ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जहाँ इन रज्यो ने केंद्रीय संसाधनों और परियोजनाओं के लिए काफी लॉबिंग की थी।
उत्तर प्रदेश क्षेत्रीय समस्या की समस्या को हल करने में भी सक्षम नहीं रहा। जैसे की सामाजिक और आर्थिक विकास में असमानताओं का ।
इसके चलते वित्त आयोग की योजनयएं ज्यादातर गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए पूर्वी क्षेत्र का पक्ष लेती हैं जिसके चलते पश्चिमी प्रदेश के लोग इन योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।
प्रशासनिक और विकास के आधार पर प्रदेश का विभाजन छोटे राज्यों में करना एक बेहद जरूरी है।
हालांकि, हाल के वर्षों में, राज्य के विभाजन का मुद्दा राजनीतिक दलों के एजेंडे से कम हो गया है
पिछले पांच सालों में, राज्य का विभाजन सक्रिय रूप से किसी राजनैतिक दल ने नहीं लिया है।
Jitender Malik
Bhatta Parsaul-भटटा पारसौल
11/12/2017
अभी इन्सानियत जिंदा है
एक हस्पताल में एक महिला ने दो जुड़वाँ बच्चियो को जन्म दिया और जन्म देतेे ही जुड़वा बेटियों को माँ ने ठुकरा दिया तो उनका इलाज कर रही अविवाहिता डॉक्टर कोमल यादव ने उन्हे अपना लिया .औपचारिकताएं पूरी कर सोमवार को वह दोनों बेटियों को लेकर अपने गांव पहुंची तो पूरे गांव ने उसे हाथोंहाथ लिया। बेटी बचाने की यह मिसाल पेश की गुलावठी के गांव ईसेपुर निवासी सीताराम यादव की 29 वर्षीय अविवाहित बेटी डॉ. कोमल ने।
डॉ. कोमल यादव वर्तमान में फर्रुखाबाद के एक निजी अस्पताल में तैनात हैं। डॉक्टर कोमल के मुताबिक उनकी ड्यूटी के दौरान 10 दिन पहले एक महिला ने अस्पताल में जुड़वां बेटियों को छोड़ दिया था के स्टाफ ने मना भी किया पर फिर भी इरादे की पक्की इस बिटिया ने किसी की नही सुनी किसी के भी समझाने पर वो नही मानी ओर दोनो बेटियों को लेकर अपने गाँव गई जहाँ पर उनका गाँव वालो ने भव्य स्वागत किया इसको बोलते है दिल ओर इंसानियत ...मै प्रणाम करता हूँ इस महान डॉक्टर बिटिया को । परमात्मा इस बिटिया को बहुत बहुत शक्ति दे और सामर्थ्य बनाये ।Salute to Dr Komal Yadav 🙏🙏
09/06/2017
होश संभाला तो बड़े भाइयों को खेती करते देखा, आमदनी का ज़रिया भी वही था, मेरी नौकरी और दूसरे कारोबार सब बाद मे हुए, मैने अपनी 40 साला ज़िंदगी मे अपने भाइयों को सुबह कभी सोते नही पाया . सूरज निकलने तक तो वो खेतों पर होते, कभी मै खाना लेकर खेत पर जाता तो उन्हे ज़मीन का सीना चीरते देखता, पसीना बहाते देखता, ठंडा खाना और बाद मे पानी न मिलना आम बात होती, फिर से काम मे लगना और मुझे जल्दी से घर भेजना, इसी वक़्त मे मैने उनका सफ़ेद रंग काला और काले बाल वक़्त से पहले सफ़ेद होते देखे, चिलचिलाती धूप मे तपती मिटटी को हमवार करना या अपनी फ़सल की प्यास बुझाने की फ़िक्र उन्हे हमेशा बैचेन रखती, उसके लिये चाहे हाड कंपाने वाली ठंड की अंधेरी रात मे ही खेत पर क्यों न जाना पड़े, मै अपने गर्म बिस्तर मे लेटा उनकी ठंड महसूस करता, इस सबमे सांप, सुअर, गीदड़ और दूसरे जंगली जानवरों का ख़तरा हमेशा बना रहता, कभी कभी बारिश के लिए आसमान तांकना और तैयार फ़सल पर बारिश के आसार देखकर अपनी फ़सल को बचाने की फ़िक्र किसान को वक़्त से पहले बूढ़ा करती है, वही भाइयों के साथ था उनके लिये फ़सल उनकी औलाद की तरह होती, फ़सल ठीक ठाक घर पहुंचती तो बेटी की विदाई जैसा सुकून चेहरे पर दिखाई देता ,यह हर किसान की कहानी है इसलिए जब कभी भी कहीं भी किसानो पर ज़ुल्म होता है तो मुझे लगता है वो लाठियां वो गोलियां मेरे भाइयों पर चल रही हैं, वो अलग बात कि व्यापारी वर्ग जिसने समाज का ख़ून जोंक की तरह चूसा हो या वो अधिकारी जो इस देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं या वो खादीधारी नेता जो लोमड़ी की तरह अपनी चालाकी से भोले भाले देशवासियों को बेवकूफ़ बना रहे हैं, कभी भी इन मेहनतकश स्वाभिमानी किसानो को दर्द न समझ पाये,
किसान का पुरस्कार सिर्फ़ उसकी अपनी आत्मसंतुष्टि है कि वो दुनिया भर के लिए अन्न उगाता है।।
09/06/2017
1987 की बातें हैं जी। 29 मई 1987 को महान किसान नेता चौधरी चरण सिंह दुनिया को अलविदा कह गये थे। केन्द्र में राजीव गाँधी की सरकार थी। चौधरी चरण सिंह के अनुयायी दिल्ली में उनकी समाधि के लिए जमीन की माँग कर रहे थे। राजीव गाँधी ने साफ मना कर दिया था कि दिल्ली में चौधरी चरण सिंह की समाधि नहीं बन सकती। तब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बङे किसान नेता रहे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में लाखों किसानों ने दिल्ली कूच किया और राजीव गाँधी को धमकी दी कि अगर किसानों के भगवान चौधरी चरण सिंह की समाधि के लिए 48 घंटे में जमीन नहीं दी गयी तो वे गैंती और कुदालियों से इंदिरा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू की समाधियों को खोदना चालू कर देंगे। टिकैत के पीछे खङे अपार जन समर्थन को देखते हुए मजबूरी में राजीव गाँधी को चौधरी साहब की समाधि के लिए 48 घंटे में जमीन देनी पङी थी।
देश के किसानों को आज ऐसे ही किसी महेंद्र सिंह टिकैत की जरूरत है.