03/12/2022
3dec 1884
sudhir kumar sonal
03/12/2022
3dec 1884
24/11/2022
कैंप का आयोजन......
रिपोर्ट- हीरालाल प्रसाद-
मोतिहारी।23 नवंबर।नवंबर के अंतिम रविवार को एन.सी.सी.दिवस मनाए जाने की परंपरा के मद्देनजर 1/25 कंपनी एन.सी.सी.के तत्वावधान में दिनांक 21 नवंबर से 27 नवंबर तक पर्यावरण संरक्षण,एंटी प्लास्टिक अभियान,स्टैचू क्लीनिंग,स्वच्छता अभियान और राष्ट्र निर्माण में एन.सी.सी.कैडेटों के योगदान पर सप्ताह भर कार्यक्रम आयोजित होना सुनिश्चित किया गया है।इस संदर्भ में ब्लड डोनेशन कैंप और संस्कृति कारक्रामों की भी योजना है। एम. एस कॉलेज के कंपनी कमांडर लेफ्टिनेंट (डॉ.)नरेंद्र सिंह ने बतलाया कि इस क्रम में कल दिनांक 22 नवंबर को कैडेटों ने पौधारोपण द्वारा कार्यक्रम का आगाज किया।आज महाविद्यालय परिसर में प्लास्टिक निरोध रैली निकाल कर छात्रों में जागरूकता प्रदान की गई। सोनल कुमार द्वारा इस अवसर पर प्लास्टिक बैग के विकल्प के रूप में प्लास्टिक विहीन थैले का प्रदर्शन कर कैडेटों को जागरूक किया गया।इस अवसर पर प्राचार्य प्रो.(डॉ.)अरुण कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर अमरजीत कुमार चौबे, डॉ.संजीव कुमार, डॉ.नीतेश कुमार आदि मौके पर मौजूद रहे।सीनियर अंडर ऑफिसर अनुज कुमार और प्रशांत कुमार और रौशनी कुमारी की सक्रियता ने कार्यक्रम को मजबूती प्रदान की।यह जानकारी प्रेस विज्ञप्ति जारी कर प्राचार्य ने दी है।
16/11/2022
रजिस्ट्रेशन प्रारंभ हैं
11/11/2022
बिहार इंटरमीडिएट सत्र 2022-24 का रजिस्ट्रेशन 9 नवम्बर से 30 नवम्बर तक किया जाएगा.
08/11/2022
1. दावा एक मांग है कि बीमा कंपनी को अनुबंध में निर्दिष्ट अपने वचन को पूरा करना चाहिए।
2. दावे दो प्रकार के हो सकते हैं:
a. बीमित व्यक्ति के जीवित रहने पर भी उत्तरजीविता दावे देय होते हैं और
b. मृत्यु दावा
3. दावों के प्रकार:
4. उत्तरजीविता लाभों का भुगतान
5. पॉलिसी का समर्पण
6. राइडर लाभ
7. परिपक्वता दावा: इस तरह के दावों में बीमा कंपनी अवधि के अंत में बीमाधारक को एक निर्धारित राशि का भुगतान करने का वचन देती है, अगर बीमाधारक योजना की पूरी अवधि में जीवित रहता है। इसे परिपक्वता दावे के रूप में जाना जाता है ।
a. सहभागी योजनाः किसी सहभागी योजना के अंतर्गत परिपक्कता दावे के रूप में देय राशि संचित बोनस सहित बीमा राशि होती है इसमें से बकाया रहा प्रीमियम तथा पॉलिसी ऋण ब्याज सहित कम कर दिया जाता है ।
b. प्रीमियम की वापसी (आरओपी) योजनाः कुछ मामलों में पॉलिसी की पूरी अवधि में भुगतान किए गए प्रीमियम पॉलिसी परिपक्व होने पर वापस कर दिए जाते हैं ।
c. यूनिट लिंक्ड बीमा योजना (यूलिप): यूलिप के मामले में, बीमा कंपनी परिपक्वता दावे के रूप में फंड मूल्य का भुगतान करती है ।
d. मनी-बैक योजनाः मनी-बैक पॉलिसी के मामले में बीमा कंपनी परिपक्वता दावे में से पॉलिसी की पूरी अवधि के दौरान दिये उत्तरजीविता लाभ को घटाकर भुगतान करती है। दावे का भुगतान किए जाने के बाद बीमा अनुबंध समाप्त हो जाता है।
8. मृत्यु दावा
9. बीमा अधिनियम की धारा 45 (निर्विवादिता क्लॉज) बीमा कंपनी द्वारा दावे के अस्वीकरण से बीमाधारक की रक्षा करता है, बशर्ते कि पॉलिसी ने 3 वर्ष पूरे कर लिए हों और बीमाधारक ने किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी को नहीं छुपाया हो।
आईआरडीएआई (पॉलिसीधारक के हितों का संरक्षण) विनियम, 2002 के तहत, आईआरडीएआई ने दावों के मामले में बीमाधारक या लाभार्थी की सुरक्षा / बचाव के लिए विनियम निर्धारित करता है
06/11/2022
06/11/2022
1. बीमा का इतिहास: ईसा पूर्ब 3000 वर्ष से ही बीमा किसी न किसी रूप में मान रहा है।
2. वर्तमान में प्रचलित आधुनिक वाणिज्यिक बीमा कारोबार की शुरुआत के संकेत, लंदन के लॉयड कॉफी हाउस में ढूंढे जा सकते हैं।
3. वर्ष 1706 में लंदन में शुरू की गई एमिकेबल सोसाइटी फॉर परपीचुअल एश्योरेन्स ही विश्व की सर्वप्रथम जीवन बीमा कंपनी मानी जाती है।
4. भारत: आधुनिक बीमा की शुरुआत लगभग 18 वीं सदी के आरंभिक वर्षों में हुई। इस दौरान विदेशी बीमाकर्ताओं की एजेंसियों ने मरीन बीमा समुद्री बीमा कारोबार की शुरुआत की।
5. द ओरिएंटल लाइफ इन्श्योरेन्स कंपनी लि. : भारत में स्थापित की जाने वाली पहली इंग्लिश जीवन बीमा कंपनी, की थी।
6. ट्रिटन बीमा कंपनी लि.: भारत में स्थापित पहली गैर-जीवन बीमा कंपनी।
7. बॉम्बे म्यूचुअल अश्योरेन्स सोसाइटी लि.: पहली भारतीय बीमा कंपनी। इसका गठन वर्ष 1870 में मुंबई में हुआ था।
8. नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लि.: भारत की सर्वाधिक पुरानी बीमा कंपनी। इसकी स्थापना वर्ष 1906 में की गई थी और इसका कारोबार आज भी निरंतर चल रहा है।
9. महत्वपूर्ण वर्ष 1912 में बीमा कारोबार को नियंत्रण करने हेतु जीवन बीमा कंपनी अधिनियम एवं भविष्य निधि अधिनियम पारित किए गए। जीवन बीमा कंपनी अधिनियम, 1912 के तहत यह अनिवार्य किया गया कि प्रीमियम-दर की सारणी तथा कंपनियों के सामयिक मूल्यांकन का प्रमाणीकरण बीमांकक (एक्चुअरी) द्वारा किया जाए।
10. बीमा अधिनियम 1938, पहला ऐसा कानून था जिसे भारत में बीमा कंपनियों के संचालन को नियंत्रण करने हेतु बनाया गया था।
11. जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण: 1 सितंबर, 1956 को जीवन बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण किया गया तथा भारतीय जीवन बीमा निगम(एलआईसी) की स्थापना की गई।
12. उस समय भारत में 170 कंपनियां एवं 75 भविष्य निधि समितियां जीवन बीमा कारोबार में शामिल थीं।
13. वर्ष 1956 से वर्ष 1999 तक भारत में जीवन बीमा कारोबार का एकमात्र अधिकार एलआईसी को ही प्राप्त था।
14. गैर-जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरणः वर्ष 1972 में साधारण बीमा कारोबार {जनरल इंश्योरेंस बिज़नेज़ नेशन्लाइजेशन एक्ट (जीआईबीएनए)} राष्ट्रीयकरण अधिनियम के लागू करने के साथ ही गैर-जीवन बीमा कारोबार को भी राष्ट्रीयकृत किया गया एवं भारतीय साधारण बीमा निगम (जीआईसी) तथा इसकी चार सहायक कंपनियों की स्थापना की गई।
15. जीआईसी की चार सहायक कंपनियों की स्थापना पर उस समय भारत में गैर जीवन बीमा कारोबार कर रही 106 कंपनियों का उनमें विलय कर दिया गया।
16. मल्होत्रा समिति एवं आईआरडीए: उद्योग के विकास के लिए परिवर्तन की खोज एवं सिफारिश और साथ ही प्रतिस्पर्धा की पुनः शुरुआत हेतु वर्ष 1993 में मल्होत्रा समिति का गठन किया गया। समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 1994 में प्रस्तुत की।
17. वर्ष 1997 में बीमा विनियामक प्राधिकरण (आईआरए) की स्थापना की गई।
18. वर्ष 1999 में बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम (आईआरडीए) के पारित किए जाने के बाद अप्रैल 2000 में जीवन एवं गैर-जीवन दोनों ही बीमा उद्योग की सांविधिक नियामक निकाय के रूप में भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण(आईआरडीएआई) की स्थापना की गई।
19. 2014 में जारी किए गए अध्यादेश के तहत कुछ शर्तें जोड़ी गयी हैं जो भारत में बीमा कंपनियों की परिभाषा और गठन को नियंत्रित करने से संबंधित हैं।
20. वर्तमान जीवन बीमा उद्योग इस समय वर्तमान में भारत में 24 जीवन बीमा कंपनियां परिचालनरत हैं जिसका विवरण नीचे दिया गया है :
21. भारतीय जीवन बीमा निगम(एलआईसी) सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी है।
22. निजी क्षेत्र में 23 जीवन बीमा कंपनियां हैं।
23. भारत सरकार के अधीन डाक विभाग भी डाक जीवन बीमा के ज़रिए जीवन बीमा कारोबार कर रहा है, परंतु यह नियामक के अधिकार क्षेत्र से मुक्त है।
24. बीमा किस प्रकार कार्य करता है: सर्वप्रथम, परिसंपत्ति ऐसी होनी चाहिए जिसमें आर्थिक मूल्य विद्यमान हो।
25. यह परिसंपत्तिः
a. वस्तुगत (फिजिकल) हो सकती है (जैसे गाड़ी अथवा भवन) या
b. व्यक्तिपरक (नान-फिजिकल) हो सकती है (जैसे नाम या रण्याति (गुडविल)या
c. व्यक्तिगत (पर्सनल) हो सकते हैं(जैसे किसी की आँख, हाथ-पैर एवं शरीर के अन्य अंग)
26. किसी निश्चित घटना घटित होने से संपत्ति का मूल्य नष्ट हो सकता है। हानि की इस संभावित स्थिति को जोखिम (रिस्क) कहते हैं। जोखिम भरी घटना के कारण को आपदा (पेरिल) कहते हैं।
27. एक सिद्धान्त जिसे पूलिंग धनराशि एक प्रकीया के नाम से जाना जाता है। इसके तहत, विभिन्न व्यक्तियों से वैयक्तिक अंशदान (जिसे प्रीमियम कहते हैं) एकत्रित किया जाता है। इन व्यक्तियों के पास एक जैसी सम्पत्ति जिनमें एक जैसी जोखिम की संभावना होती है ।
28. आपदा के कारण कुछ लोगों को हुई हानि की क्षतिपूर्ति हेतु इस सामूहिक निधि का प्रयोग किया जाता है ।
29. निधि (फंड) एकत्रित (पूलिंग) करना एवं कुछ दुर्भाग्यशाली लोगों की क्षतिपूर्ति करने की प्रक्रिया एक संस्था द्वारा की जाती है जिसे बीमाकर्ता कहते हैं।
30. बीमाकर्ता, प्रत्येक व्यक्ति जो इस योजना में भाग लेना चाहता है, के साथ बीमा अनुबंध करता है। ऐसे सहभागी को बीमित कहते हैं।
31. बीमा, बोझ हलका करता है: जोखिम के बोझ का आशय, किसी परिस्थिति/घटना के घटने के परिणामस्वरूप सहन की जाने वाली लागत, हानि एवं विकलांगताओं से है।
32. जोखिम बोझ: व्यक्ति दो प्रकार के जोखिम के बोझ को ढ़ोता है- महत्वपुर्ण एवं कम महत्वपुर्ण (गौण) ।
a. जोखिम का महत्वपुर्ण बोझ: जोखिम के महत्वपुर्ण बोझ में ऐसी हानियों को शामिल किया जाता है, जिन्हें शुद्ध जोखिम घटनाओं के फलस्वरूप वास्तविक रूप में परिवार(एवं कारोबारी यूनिटों) द्वारा सहन किया जाता है।
b. जोखिम का कम महत्वपूर्ण बोझ: मान लें कि कोई घटना नहीं घटी एवं किसी प्रकार की कोई हानि नहीं हुई। क्या इसका यह अर्थ हे कि जिनके समक्ष आपदा की संभावना है, उन्हें किसी प्रकार का बोझ नहीं है? इसका जवाब यह है कि महत्वपूर्ण बोझ के साथ-साथ व्यक्ति जोखिम के कम महत्वपूर्ण बोझ के भी वहन करता है।
33. जोखिम से बचाव: हानि की स्थिति से बचते हुए जोखिम को नियंत्रित करना ही जोखिम से बचाव कहा जाता है। परंतु जोखिम से बचाव, जोखिम संभालने का नकारात्मक उपाय है।
34. जोखिम अपने पास रखना (रिस्क रिटेंशन): व्यक्ति जोखिम के प्रभाव को संभालने करने की कोशिश करता है एवं स्वयं ही जोखिम तथा उस्के प्रभाव को सहने का निर्णय लेता है। यह स्व-बीमा (स्ल्फ इंश्योरंस) के रुप में जाना जाता है।
35. घटना के अवसर को कम करने के लिए उठाए गए उपायों को 'हानि रोकथाम (लॉस प्रिवेशन)' कहते हैं। हानि की मात्रा को कम करने के उपायों को 'हानि कम करना (लॉस रिडक्शन)' कहते हैं।
36. बीमा जोखिम को किसी और को दे देने का एक मुख्य स्वरूप है, और यह बीमा क्षतिपूर्ति के ज़रिए अनिश्चितता को निश्चितता में बदलने की अनुमति प्रदान करता है।
37. बीमा चयन से पूर्व ध्यान दी जाने वाली बातें:
a. थोड़े के लिए बहुत ज्यादा जोखिम न लें
b. हानि सह सकने की सामर्थ्य से ज्यादा जोखिम न लें
c. जोखिम के संभावित परिणामों के बारे में सावधानी पूर्वक सोचें
38. बीमा व्यवस्था में निम्नलिखित जैसे तत्व शामिल हैं:
a. सम्पति
b. जोखिम
c. आपदा
d. अनुबंध
e. बीमाकर्ता एवं
f. बीमित
39. जब एक जैसी सम्पति या परिसंपत्तियों के मालिक, जो एक जैसी जोखिम वहन करते हैं, निधि (फंड) के सामूहिक पूल में अपना-अपना अंश देते हैं तो उसे पूलिंग कहते हैं।
*बिहार इंटरमीडिएट सत्र 2022-24 में नामांकन कराने का आखिरी मौका।*
इंटरमीडिएट सत्र 2022-24 में ऑन-स्पॉट नामांकन कराने की तिथि बढ़ी।
3 नवंबर से 6 नवंबर तक विधार्थी करा सकते है, ऑन-स्पॉट नामांकन।