25/07/2021
We need Airport to save the time and connect to anywhere from champaran.
#चम्पारण_मांगे_एयरपोर्ट
�20 चिरैया विधानसभा क्षेत्र�
"Our vidhan sabha deserves better, and better is possible."
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#किसान_आंदोलन_सरकार_के_लिए_सबक_है_कि_सुधार_थोपे_न_जाएं_उनपर_पहले_समर्थन_जुटाना_जरूरी_है..
पंजाब के किसानों के मौजूदा आंदोलन में कई सबक हैं। उनमें से एक है कि राजनीति छोटा खेल है, एक 20-20 मैच, जबकि अर्थव्यवस्था लंबा, पांच दिवसीय टेस्ट मैच है। पंजाब के किसान 20-20 खेल रहे हैं और सरकार टेस्ट मैच। इस बेमेलपन के कारण दूसरा सबक यह है कि लोकतंत्र में सुधार मुश्किल है। एक लोकवादी एक रुपए प्रतिकिलो चावल देने का वादा कर सुधारक को चुनाव में हरा सकता है।
इसीलिए, सफल सुधारक, सुधारों को बेचने में ज्यादा समय खर्च करता है, उन्हें लागू करने में कम। भारत के सुधारकर्ता इस मामले में असफल रहे हैं और इसीलिए 1991 से 29 साल बाद भी भारत में सुधार चुपके से होते हैं और भारतीय अब भी सोचते हैं कि सुधार अमीरों को अमीर और गरीबों को गरीब बनाते हैं, जबकि इसके विपरीत कई प्रमाण हैं।
प्रधानमंत्री मोदी यह सबक भूल गए और जून में तीन कृषि कानूनों को बनाने में देश का समर्थन हासिल नहीं किया। उनकी सरकार ने विपक्ष, राज्यों या किसान संगठनों से बात किए बिना, संसद के जरिए कानून थोपने का रास्ता चुना। इसके ये अफवाहें फैलीं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व सरकारी खरीद बंद हो जाएगी। वे अब भी इसे सुधार सकते हैं। तीसरा सबक यह है कि जब बहुसंख्यक शांत और असंगठित हों तो छोटे, संगठित और वित्तपोषित समूह लोकतंत्र में राष्ट्रीय हित को लूट लेते हैं।
आंदोलन के पीछे आढ़तिया, कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) मंडियों के खरीद एजेंट हैं, जिनका 1500 करोड़ रुपए सालाना कमीशन का नुकसान होगा। साथ ही पंजाब के अमीर किसान हैं, जो भारत के उन 6% किसानों का हिस्सा हैं, जिन्हें एमएसपी का लाभ मिलता है। दोनों शक्तिशाली हैं। आढ़तिया चुनावों में पैसा लगाते हैं और अक्सर राजनेता और कृषि संघों के नेता होते हैं।
तीन कृषि बिल किसानों को तीन आधारभूत आजादी देते हैं। पहली, फसल कहीं भी बेचने की आजादी, जिससे मंडी के कार्टल का एकाधिकार खत्म होगा। दूसरी, स्टॉक रखने की आजादी, जिसमें अब तक आवश्यक सामग्री अधिनियम के तहत स्टॉक करने की सीमा के कारण बाधा आती थी। तीसरी, किसानों को वायादा बाजार अनुबंध करने की और अपना जोखिम व्यापारी को देने की आजादी, जिससे उम्मीद है कि अलाभकारी भूमि को अन्य काम के लिए देने और लाभ साझा करने की आजादी मिलेगी।
एपीएमसी एक बेकार संस्थान है, जिसे किसान की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, पर वही शोषण करने वाली बन रही है। एकाधिकार कार्टेल किसान की उपज की कम कीमत तय करते हैं, जिससे बिक्री प्रभावित होती है। सुधारों ने यह एकाधिकार तोड़ा है और जून के बाद से मंडी के बाहर बिक्री में इजाफा हुआ है, जबकि मंडी बिक्री में 40% गिरावट आई है। इस सुधार के बाद निर्यात पर भी स्थिर नीति की जरूरत है। मौजूदा ‘शुरू करो-बंद करो’ नीति के कारण हाल ही में प्याज के निर्यात पर रोक लग गई थी। यही कारण है कि किसान एमएसपी के लिए लालायित रहते हैं।
पंजाब के किसानों व संघों की प्रमुख मांग है कि एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाया जाए। यह बुरा विचार है क्योंकि इससे पंजाब के किसानों को वह उगाएंगे जो लोग नहीं चाहते। नतीजतन गेहूं व चावल का अतिरिक्त और दाल का कम उत्पादन होगा। हर साल देश अतिरिक्त अनाज उत्पादन के बोझ में दब जाता है। एमएसपी के कारण पंजाब का किसान पानी गटकने वाले चावल उगाता है, जिससे उसकी मिट्टी को नुकसान होता है, जलस्तर कम होता है। पंजाब के किसान का दोष नहीं है। वह वही उगा रहा है, जिसके लिए उसे प्रोत्साहन राशि मिल रही है।
ये सुधार ज्यादा उत्पादकता से किसान की आय बढ़ाना चाहते हैं। भारतीय खेतों की पैदावार प्रतिद्वंद्वियों से एक तिहाई ही है। चीन में भारत की तुलना में आधी कृषियोग्य भूमि है, जबकि पैदावार हमसे दोगुनी है। समस्या यह है कि 80% भारतीय किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। वे वैज्ञानिक विधियों के इस्तेमाल और उच्च मूल्य वाली फसलों से अपनी उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। लेकिन इसके लिए पूंजी व तकनीक का संचार जरूरी है। हालांकि किसान के पास इसके लिए पैसा नहीं है।
न ही सरकार के पास। इसीलिए, अगला सुधार ऐसा हो जो किसानों को अपनी जमीन ऐसे कृषि-पेशेवरों को लीज पर देने की आजादी दे, जिनके पास पूंजी और तकनीक हो और बदले में वे उसी जमीन में साझेदार और काम करने वाले बन सकें, जिससे दूसरी हरित क्रांति का आधार तैयार हो।
इस परिदृश्य का नकारात्मक पहलू यह डर है कि बड़े बिजनेस कृषि पर कब्जा कर लेंगे। इसका जवाब है कि किसान खुद को कोऑपरेटिव, किसान-उत्पादक संगठनों, जैसे अमूल, के जरिए संगठित करें। किसानों का एमएसपी खत्म होने का दूसरा डर निराधार है। सरकार को किसानों को बताना चाहिए कि खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाखों राशन दुकानों के लिए चावल और गेहूं की खरीद करने की जरूरत होगी ही।
कोई भी सरकार खाद्य सुरक्षा हटाने का राजनीतिक जोखिम नहीं लेगी। इसलिए किसान निश्चिंत रहें। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि एमएसपी कानूनी अधिकार बन जाए। एक आदर्श दुनिया में, कृषि सब्सिडियों के पूरे तंत्र की जगह ‘किसानों के लिए न्यूनतम आय’ को ले लेनी चाहिए। लेकिन फिलहाल तो ऐसा नहीं होगा।
- गुरचरण दास ( लेखक इंडिया अनबाउंड के लेखक और स्वतंत्र टिप्पणीकार
26/11/2020
06/11/2020
20/10/2020
18/10/2020
द प्लान: टोटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन और सबका शासन।
द प्लुरल्स पार्टी मेनिफ़ेस्टो (2020-2030): "8 दिशा आठों पहर" 👇
बिहार: टोटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन
1. आठ डिवेलप्मेंट ग्रोथ ज़ोन में विकास, एक्सप्रेसवे से जुड़े आठ नए ग्रेट सिटीज़
2. प्रत्येक डिवेलप्मेंट ज़ोन में आठ औद्योगिक ज़ोन की स्थापना
3. कृषि को उद्योग का दर्जा
4. हर ज़ोन में एक लाख स्टार्ट-अप: कृषि, उद्योग, आईटी और फ़ाइनैन्स आधारित
5. हर ज़ोन में फ़्लड एंड इरिगेशन मैनेजमेंट सिस्टम
6. प्रत्येक ज़ोन में लर्निंग के आठ स्टेट ओंफ द आर्ट शिक्षा केंद्र
7. प्रत्येक वार्ड और पंचायत में आठ बुनियादी इंफ़्रास्ट्रक्चर
8. ग़रीबी रेखा के नीचे के परिवार को जीवन की आठ बुनियादी सुविधा
बिहार: सबका शासन
1. नौकरशाही की कार्यप्रणाली-सोच में बदलाव, सभी कर्मी स्थायी, समान वेतन
2. पुलिस में आमूल-चूल बदलाव - यूनिफ़ॉर्म से मानसिकता तक, आधुनिकीकरण
3. एजुकेशनल रिफ़ॉर्म: कॉमन स्कूल सिस्टम, शिक्षा की गुणवत्ता
4. हेल्थ रिफ़ॉर्म: प्रत्येक परिवार के लिए एक निर्धारित डॉक्टर
5. शराबबंदी की समाप्ति, शराब पीकर हिंसा पर कठोर कार्रवाई
6. सभी प्रकार की वीआईपी सुविधाओं - बंगला, गाड़ी, बॉडीगार्ड, रौब का अंत
7. सभी शहर-गाँव, मुहल्ले-टोले, चौक-चौराहे, ट्रांसपोर्ट में चप्पे-चप्पे सीसीटीवी
8. सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार पर कठोरतम कार्रवाई और "लोग सर्वोपरि हैं" का सिद्धांत
द प्लान: टोटल ट्रांसफ़ॉर्मेशन और सबका शासन।
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8. सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार पर कठोरतम कार्रवाई और "लोग सर्वोपरि हैं" का सिद्धांत
16/10/2020
Schedule of phase-3
13/10/2020
अंततः....अभी समर शेष है!
"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः
Truth alone triumphs; not falsehood.
Through truth, the divine path is spread out" (मुण्डक उपनिषद्)
ा_शासन
07/10/2020
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
- दुष्यन्त कुमार
ंदोलन_समय
07/10/2020
👌
जाति-धर्म का नहीं ‘बिहार का खोंयछा’ का समीकरण - 2030 तक 1 मुठ्ठी चावल के बदले 150 मिलियन टन फ़ूडग्रेन, 1 टुकड़ा कपड़ा के बदले 100 टेक्सटाईल पार्क, और 1 आशीर्वादी सिक्का के बदले 2025 तक हर साल 8 लाख सरकारी नौकरी और 80 लाख प्राईवेट जॉब, न्यूनतम वेतन 26000 तय। एक दशक 2020-30 में 200% की अभूतपूर्व आर्थिक विकास दर! #बिहार_का_खोंयछा