23/04/2024
|| जय हनुमंत संत हितकारी ||
श्रीहनुमान जन्मोत्सव की आपसभी को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं!
अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता, प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त, श्रीहनुमान जी की कृपा सभी पर बनी रहे। संपूर्ण सृष्टि में सुख-शांति व समृद्धि का वास हो, उनसे यही प्रार्थना है।
दूसरों की संकट की घड़ी में संकट निवारक बन उनके संकटों को अपना संकट मानकर उसके निवारण के लिए प्राणों तक को दाँव पर लगा देना श्रीहनुमान जी महाराज का जीवन हमें सीख देता है। प्रभु का प्रिय बनने के लिए मानव को सदा कृतज्ञ भाव से पर सेवा और परमार्थ में निरत रहना चाहिए।
दूसरों को जीतने वालों को वीर और जो स्वयं को भी जीत जाए उसे महावीर कहते हैं। श्रीहनुमान जी महाराज का जीवन मानवमात्र को जितेंद्रिय बनने की प्रेरणा भी प्रदान करता है। बलवान होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु विवेकवान होना भी जीवन की अनिवार्यता है। बल, बुद्धि, विद्या, विनय, विवेक एवं स्वामी भक्ति का गुण ही श्रीहनुमान जी महाराज के जीवन को जन-जन का आदर्श एवं प्रभु श्रीराम - माँ जानकी का प्रिय बनाता है।
बुद्धि - विवेक के भंडार, ज्ञानियों में भी अग्रगण्य भक्त शिरोमणि हनुमान जी महाराज के मंगलमय पावन प्राकट्य उत्सव की आप सभी को एक बार पुनः अनंत शुभकामनाएं एवं मंगल बधाई।
ॐ हनुमते नमः!
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श्रीराम मारुति मंदिर, पवई
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13/12/2017
हनुमान कवच मंत्र-
“संकट तै हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै”
हनुमान चालीसा की इस पंक्ति से आशय है कि जो भी भक्त हनुमान जी का नाम जपेगा, उनका ध्यान करेगा, हनुमान जी उसके जीवन के हर संकट को हर लेंगे। उसे कभी किसी पीड़ा का सामना नहीं करना पड़ेगा।
ॐ श्री हनुमते नम:
फ़ोटो: आज संध्या की आरती के समय लिया गया।
25/11/2017
प्रातः काल दर्शन - श्री मारुति पवई
।। श्री हनुमते नमः ।।
श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ||
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
।। सियावर रामचंद्र जी की जय ।।
।। संकटमोचन हनुमानजी की जय।।
Maruti Mandir Powai
18/11/2017
।। जय राम जय राम जय जय राम ।।
17/11/2017
श्री राम, लक्ष्मण विश्वामित्र जी के संग संग जा रहे हैं यज्ञ रक्षा के निमित्त ।मार्ग में सरोवर मिला, बड़े सुंदर कमल के फूल खिले हुए ।
राम जी ने कहा -- गुरुदेव ! अगर आज्ञा हो तो सरोवर के अंदर जाकर कमल के फूल ले आएं, बड़े सुंदर फूल खिले हैं ।गुरु जी ने कहा -- जाओ, जाओ। अब राम जी गये तो और आगे बढ़ते जायँ और आगे बढ़ते जायँ ।
गुरु जी बोले -- अरे राम, राम ! ज्यादा गहराई है आगे मत जाना, डूब जाओगे।डर लगता है, निकलो बाहर। राम जी निकल आये।थोड़ा आगे बढ़े।यह शिला बहुत सुंदर है, इसके पीछे मयूर नृत्य कर रहे हैं। यहाँ से नहीं दिखते हैं, जरा इस शिला पर चढ़ कर मयूरों का नृत्य देख लें?
हाँ, हाँ ठीक है, जाओ।अब राम जी एक शिला पर चढ़ गये, दूसरी शिला पर, तीसरी पर।गुरु जी बोले - अरे, अरे, राम ! उतरो, गिरोगे तो चोट लग जायेगी, हमें बड़ा डर लग रहा है। तुलसीदास जी कहते हैं -
पैठनि सरनि शिलनि चढ़ि चितवनि।
उस समय विश्वामित्र जी क्या करते हैं?
सभय मुनि पुनि पुनि लेत बुलाई।
डर के मारे बार बार बुला लेते हैं, इधर आओ, इधर आओ। मौका देखकर राम जी ने कहा - गुरुदेव! आप तो हमारे पिता जी को उपदेश दे रहे थे-
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।
आप तो पिता जी से कह रहे थे कि यह अज्ञानजन्य जो मोह है, इसका त्याग करो, ममता छोड़ो।इनसे मोह ममता मत करो। आप उनको तो ज्ञान का उपदेश कर रहे थे, पर आपमें मोह कहाँ से आ गया? आप तो ज्ञानी हैं, आपमें ममता कहाँ से आ गई?
विश्वामित्र महा मुनि ज्ञानी।
पिता जी तो ज्ञानी नहीं थे, इसलिए उन्हें मोह था, पर आप तो ज्ञानी हैं, आपके मन में मोह कहाँ से आया? विश्वामित्र जी की आँखें सजल हो गयीं।राम जी बोले -- गुरु जी! क्या कुछ मैंने गलत कह दिया? विश्वामित्र जी बोले- तुमने कुछ नही कहा। राम! बात यह है कि जब मैं तुम्हारे पिता को उपदेश दे रहा था, तब मेरे मन में मोह नहीं था, उस समय यह ज्ञानी विश्वामित्र ही बोल रहा था, तजहु मोह अग्यान।.... तो महाराज! आपको पता है कि मैं ब्रह्म हूँ, यही तो आपने पिता जी को बताया था। अब ममता क्यों, मोह क्यों?
क्या ब्रह्म भी सरोवर में डूबता है, ब्रह्म भी शिला पर से गिरता है तो उसे चोट लगती है?
यह मोह कहाँ से आया?
यही तो मैं पूछ रहा हूँ। विश्वामित्र जी बोले - राघवेन्द्र! मेरे मन में तब मोह नहीं था, जब मैं तुम्हारे पिता को उपदेश दे रहा था।
मेरे मन में मोह जानते हो कब आया?
.. कब से?
बोले - जिस क्षण तुम्हारे पिता ने तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में दिया, लक्ष्मण का हाथ मेरे हाथ में देकर कहा-
मेरे प्राण नाथ सुत दोऊ।
तुम मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।
जब आपके पिता ने कहा कि आज से आप ही इनके पिता हैं।तो कहा कि जब मैं ज्ञानी था तो तुमको ब्रह्म के रूप में देख रहा था। जब से आपके पिता ने कह दिया कि आज से आप ही इनके पिता हैं। बस! तब से मेरी ब्रह्म दृष्टि नहीं रही। मेरी तुम्हारे प्रति बालक की दृष्टि हो गयी। मेरा मन वात्सल्य से भर गया। इसीलिए मेरे मन में तुम्हारे प्रति ममता हो गयी।
राम जी मन ही मन बड़े खुश हुए कि अगर मुझसे ममता हो गयी, तो ब्रह्मज्ञानी विश्वामित्र आज से भक्त हो गये।भगवान से ममता सम्बन्ध के कारण होती है।
।। श्रीराम जी हमारे, हम श्रीराम जी के।।
जय श्रीराम... जय हनुमान...