राष्ट्रीय समाज,जाति धर्म से परे राष्ट्र को मानने वाला समाज

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14/05/2020

#राष्ट्रीय_समाज_के_छत्रपति_संभाजी_महाराज_जयंती.. #अंग_अंग_काटते_रहे_मुगल_पर_हर_घाव_से_आवाज_आई_जय_भवानी_नमन_वन्दन_आदरांजलि 🙏🏻🙏🏻💐🇬🇫

राष्ट्र के रक्षार्थ राष्ट्रीय समाज के अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। राष्ट्रीय समाज के ही छत्रपति शिवाजी महाराज के बड़े पुत्र सम्भाजी भी इस मणिमाला के एक गौरवपूर्ण मोती हैं। उनका जन्म आज ही के दिन अर्थात 14 मई, 1657 को मां सोयराबाई की कोख से हुआ था। तीन अप्रैल 1680 को शिवाजी के देहान्त के बाद सम्भाजी ने हिन्दवी साम्राज्य का भार सँभाला; हिन्दुस्थान में हिंदवी स्वराज ,हिंदवी पातशाही की गौरवपूर्ण स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन को यदि चार पंक्तियों में संजोया जाए तो यही कहा जाएगा कि:

देश धरम पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था।

महा पराक्रमी परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।।'

राष्ट्रीय समाज के छत्रपति संभाजी महाराज का जीवन एवं उनकी वीरता ऐसी थी कि उनका नाम लेते ही औरंगजेब के साथ तमाम मुगल सेना थर्राने लगती थी। उनके घोड़े की टाप सुनते ही मुगल सैनिकों के हाथों से अस्त्र-शस्त्र छूटकर गिरने लगते थे। यही कारण था कि छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद भी संभाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज को अक्षुण्ण रखा था। वैसे शूरता-वीरता के साथ निडरता का वरदान भी संभाजी को अपने पिता शिवाजी महाराज से मानों विरासत में प्राप्त हुआ था। राजपूत वीर राजा जयसिंह के कहने पर, उन पर भरोसा रखते हुए जब छत्रपति शिवाजी औरंगजेब से मिलने आगरा पहुंचे थे तो दूरदृष्टि रखते हुए वे अपने पुत्र संभाजी को भी साथ लेकर पहुंचे थे। कपट के चलते औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया था और दोनों पिता-पुत्र को तहखाने में बंद कर दिया। फिर भी शिवाजी ने कूटनीति के चलते औरंगजेब से अपनी रिहाई करवा ली, उस समय संभाजी अपने पिता के साथ रिहाई के साक्षी बने थे। अत्याचारी, हैवान , दानव मुगल औरंगजेब के शासन और करतूतों को भले ही झोलाछाप इतिहासकारों ने छिपाने की कोशिश की हो मगर सम्भाजी महाराज के विरुद्ध उसके निकृष्टतम कार्य को जानकर आपके आखों से अंगार आ जाएंगे।
राष्ट्रीय समाज के छत्रपति संभाजी राजे भोसले या सम्भाजी जिनका शासन काल 1657 से 1689 तक रहा मराठा सम्राट और छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी थे. अपने समय में मराठाओं के सबसे प्रबल शत्रु मुगल बादशाह औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा का शासन हिन्दुस्तान से समाप्त करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही. सम्भाजी अपनी शौर्यता के लिये काफी प्रसिद्ध थे. सम्भाजी महाराज ने अपने कम समय के शासन काल मे 120 युद्ध किये और एक भी युद्ध में परास्त नहीं हुए।
1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्य के बाद संभाजी ने गद्दी संभाली. अपनी प्रबल सौर्यता के कारण उन्होंने मुग़ल बादशाह औरंगजेब की नाक में दम करना शुरू कर दिया. उनके पराक्रम की वजह से परेशान हो कर दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने कसम खायी थी कि जब तक छत्रपती संभाजी पकडे नहीं जायेंगे, वो अपना मुकुट सर पर नहीं धारण करेगा. शिवाजी के दुसरे पुत्र राजाराम को छत्रपति बनाने में असफल रहने वाले राजाराम समर्थकों ने औरंगजेब के पुत्र अकबर से राज्य पर आक्रमण करके उसे मुग़ल साम्राज्य का शासक बनाने की गुजारिश करने वाला पत्र लिखा. किन्तु छत्रपति संभाजी के पराक्रम से परिचित और उनका आश्रित होने के कारण अकबर ने वह पत्र छत्रपति संभाजी को भेज दिया. इस राजद्रोह से क्रोधित छत्रपति संभाजी ने अपने सामंतो को मृत्युदंड दिया. संभाजी 1683 में पुर्तगालियों को पराजित किया. इसी समय वह किसी राजकीय कारण से संगमेश्वर में रहे थे. जिस दिन वो रायगड के लिए प्रस्थान करने वाले थे उसी दिन कुछ ग्रामीणों ने अपनी समस्या बतायी. जिसके चलते छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख बाकी सेना को रायगड भेज दिया. उसी वक्त उनके साले गनोजी शिर्के, ने गद्दारी कर मुग़ल सरदार मुकरब खान के साथ गुप्त रास्ते से 5000 के फ़ौज के साथ संभाजी पर हमला कर दिया. यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठों को पता था. इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था के शत्रु इस तरफ से आ सकेगा. उन्होंने लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का साहस काम कर न पाया और अपने मित्र तथा एकमात्र सलाहकार कविकलश के साथ वह बंदी बना लिए गए संभाजी से बुरी तरह खफा औरंगजेब ने अपने कब्जे में उन्हें पाकर क्रूरता और अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी. दोनों की जुबान कटवा दी, आँखें निकाल दी. उनपर इस्लाम धर्म को ग्रहण करने का दबाव डाला गया. बदले में औरंगबजेब ने उन्हें जान बख्शने का भी वचन दिया. औरंगजेब का जो हरकारा ये प्रस्ताव लेकर संभाजी के पास आया उन्होंने उसके मुँह पर थूक दिया. 11 मार्च 1689 हिन्दू नववर्ष दिन औरंगजेब ने संभाजी और उनके साथी के शरीर के टुकडे-टुकड़े करवा दिए. हत्या से पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा के मेरे चार बेटों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता. जब छत्रपति संभाजी महाराज के टुकडे तुलापुर की नदी में फेंकें गए तो उस किनारे रहने वाले राष्ट्रीय समाज के लोगों ने शव के टुकड़ों को इकठ्ठा कर के सिला के जोड़ दिया (इन लोगों को आज " शिवले " इस नाम से भी जाना जाता है). शरीर के अंगों को आपस में जोड़े जाने के बाद उनका विधिपूर्वक अंतिम संस्कार किया. औरंगजेब ने सोचा था की मराठी साम्राज्य छत्रपति संभाजी महाराज के मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाएगा. छत्रपति संभाजी महाराज के हत्या की वजह से सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे. अत: औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा. उसका दक्खन जीतने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया.. आज सनातन धर्म और राष्ट्र के रक्षक उस महान वीर बलिदानी को उनके जन्मदिवस पर राष्ट्रीय समाज पार्टी उन्हें बारम्बार नमन और वन्दन करते हुए चाटुकार इतिहासकारो द्वारा उनकी छिपाई गयी वीरगाथा को अनंत काल तक गाते रहने का संकल्प लेता है .. जय भवानी जय शिवाजी हर हर महादेव ।।।

Photos from राष्ट्रीय समाज,जाति धर्म से परे राष्ट्र को मानने वाला समाज's post 09/05/2020

#जिसकी_तलवार_की_छनक_से_अकबर_का_दिल_घबराता_था_वो_अजर_अमर_वो_शूरवीर_वो_महाराणा_कहलाता_था।

#राष्ट्रीय_समाज_के_महाप्रतापी_रणयोद्धा_मेवाड़_के_शूरवीर_महाराणाप्रताप_की_जयंती_पर_सादर_नमन

राष्ट्रीय समाज के महान योद्धा और मेवाड़ के राजा – महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को उदयपुर के संस्थापक उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के घर हुआ था । प्रताप ऐसे योद्धा थे जो मुग़लों के आगे कभी नहीं झुके । उनका संघर्ष इतिहास में अमर है ।
महाराणा प्रताप की लम्बाई 7.5 फ़ीट थी। महाराणा प्रताप का भाला 80 किलो और उनकी छाती का कवच 71 किलो का था । उनका भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलकर 208 किलो का था । ये आज भी मेवाड़ राजघराने के म्यूजियम में सुरक्षित है।
महाराणा प्रताप ने मायरा की गुफा में घास की रोटी खा कर दिन गुजारे थे । गुफा आज भी मौजूद है, हल्दीघाटी युद्ध के समय प्रताप ने हथियार छुपाये थे और यहाँ एक मंदिर भी मौजूद है । मेवाड़ अकबर के लिए दिल्ली से महत्वपूर्ण था, गंगा मार्ग के व्यापर मार्ग को ये पश्चिमी तट को ये जोड़ता था । अकबर को कुछ भी बाहर से लाने ले जाने के लिए “मेवाड़” पार करना पड़ता था । अकबर ने महाराणा को लालच भी देने कि कोशिश कि थी कि आधा हिंदुस्तान तुम्हारा होगा अगर वो अकबर का आधिपत्य स्वीकार कर लें लेकिन महाराणा प्रताप नहीं माने और उन्होंने अपनी छोटी से सेना से अकबर के दाँत खट्टे कर दिए थे। हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर के सेनापति ‘बहलोल खान’ पर ऐसा वार किया की सिर से घोड़े तक के दो टुकड़े हो गए थे ।
महाराणा प्रताप का घोडा ‘चेतक ‘ जब दौड़ता था तो उसके पैर जमीन पे दौड़ते दिखाई ही नहीं पड़ते थे ।हल्दीघाटी के युद्ध में मान सिंह के हाथी के सिर पर उछलकर पैर रख दिया था और प्रताप ने अपने भाले से मानसिंह पर जानलेवा वार किया।हल्दीघाटी का युद्ध इतना विनाशकारी था की अकबर सपने में महाराणा प्रताप को देख कर जाग जाया करता था । ३० वर्षो के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर ‘महाराणा प्रताप’ को बंदी न बना सका । अकबर ‘प्रताप’ की बहादुरी का कायल था और ये भी कहा जाता है की महाराणा प्रताप की मौत की खबर सुन कर अकबर के आँखें नम हो गयी थी।महाराणा प्रताप ने अपने वंशजो को वचन दिया था कि जब तक वो चित्तौड़ वापस नहीं ले लेते तब तक वो पुआल पर सोयेंगे और पेड़ के पत्ते खाएंगे। महाराण प्रताप और अकबर कि सेना के बीच हल्दीघाटी का महायुद्ध 1576 ईस्वी में लड़ा गया । इस युद्ध में महाराणा प्रताप कि सेना में सिर्फ 20 हज़ार सैनिक थे तथा अकबर कि सेना में 85 हज़ार सैनिक थे । अकबर कि विशाल सेना और संसाधनों के ताक़त के बावजूद महाराण प्रताप ने हार नहीं मानी और मातृभूमि के सम्मान के लिए संघर्ष करते रहे। माना जाता है कि हल्द्घाटी के युद्ध में किसी कि विजय नहीं हुई लेकिन अगर देखा जाये तो विजय महाराणा कि हुई थी। बादशाह अकबर की विशाल सेना के सामने प्रताप की मुट्ठी भर सेना थी, लेकिन महारणा के युद्ध कौशल और बेहतरीन रणनीति के कारण अकबर की सेना को पीछे हटने और भागने पे मजबूर कर दिया था। हल्द्घाटी के युद्ध की सबसे बड़ी बात थी की यह युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। हल्दीघाटी का युद्ध इतना भयंकर था कि युद्ध के 300 वर्षों बाद आज भी वहां पर तलवारें दिखाई देती हैं ।महाराणा के जीवन काल के इतिहास में दिवेर का युद्ध एक बहुत महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है क्यूंकि इस युद्ध में जीत के बाद प्रताप ने अपने खोये हुए राज्यों को पुनः प्राप्त किया था।१५७९ से १५८५ तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशो में विद्रोह होने लगे थे और इधर महाराणा प्रताप एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे और अकबर अपने विद्रोह को दबाने में पूरी तरह उलझ सा गया था और उसका ध्यान मेवाड़ पर से कम हो गया । इस बात का फायदा पूरी तरह से प्रताप ने उठाया और मुग़ल चौकियों पे हमला करके उदयपुर समेत ३६ महत्वपूर्ण स्थान पर अपना अधिकार कर लिया। महाराणा ने जब सिंघासन लिया उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था वो वापस से उनपर आधिपत्य स्थापित कर लिया था । १२ वर्ष के निरंतर संघर्ष के बाद भी अकबर मेवाड़ राज्य और प्रताप का कुछ नहीं कर पाया।इतनी लम्बी अवधि के कड़े संघर्ष के बाद मेवाड़ को अकबर से मुक्त रखने में पूरी तरह सफल रहे और यह काल मेवाड़ का स्वर्ण युग साबित हुआ। सन १५८५ ईस्वी में मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर की काली छाया का अंत हुआ और उसके बाद महाराणा प्रताप अपने राज्य के सुख सुविधा को जुटाने में लग गए, परन्तु दुर्भाग्य वश उनकी ग्यारह साल बाद 19 जनवरी 1597 अपनी राजधानी चावंड में मृत्यु हो गयी।कहा जाता है कि जब महाराणा कि मृत्यु हुई थी उस समय अकबर लाहौर में था और प्रताप कि मृत्यु कि खबर सुन कर बादशाह अकबर को बेहद दुःख हुआ था और वो रहस्यमयी तरीके से मौन हो गया और आँखें नम हो गयी थी। विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🏻🙏🏻🙏🏻💐💐💐🇬🇫

06/05/2020

#राष्ट्रीय_समाज_के_महानायक_छत्रपति_शाहूजी_महाराज_की_पुण्यतिथि_पर_विनम्र_श्रद्धांजलि🙏🏻💐💐🇬🇫

“डिप्रेस्ड वर्ग के लोगों को सामंतवादी नेताओं के नेतृत्व पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, और ना ही ऐसे किसी व्यक्ति को अपना नेता बनाना चाहिए, जिसके पास लोकतान्त्रिक उद्देश्य ना हो, इन समुदायों के लोगों को अपने समुदाय में से ही नेतृत्व का चुनाव करना चाहिए.।” राष्ट्रीय समाज के महानायक छत्रपति शाहूजी महाराज ने इस बात का जिक्र अपने समय के प्रसिद्ध समाज सुधारक जी ए गवई से 01 फरवरी 1920 को लिखे अपने एक पत्र में किया था। आज राष्ट्रीय समाज के इस महानायक का यह संदेश बहुत कुछ कहता है, जिससे राष्ट्रीय समाज को सीख लेने की जरूरत है।अगर हम शाहूजी महाराज को उनके समय काल में देखें तो भारतीय राजनीति में उनका उदय ऐसे समय हुआ, जब राष्ट्रीय समाज के अग्रदूत महात्मा ज्योतिराव फुले का नेतृत्व नहीं रहा था , शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर राज्य की बागडोर 1894 में संभाली थी, जिसके चार वर्ष पूर्व 28 नवंबर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले का परिनिर्वाण हो चुका था, महात्मा ज्योतिबा फुले के बाद राष्ट्रीय समाज के मानवातावादी विचारों को जनमानस में पहुंचाने की ज़िम्मेदारी छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने मजबूत कंधों पर तब तक उठाया। राष्ट्रीय समाज के इस नायक शाहूजी महाराज ने ना केवल राष्ट्रीय समाज के अग्रदूत महात्मा ज्योतिराव फुले के आंदोलन को आगे बढ़ाया बल्कि दलितों के उद्धारक डॉ. आम्बेडकर समेत हर उस राजनेता और समाज सुधारक की नैतिक और आर्थिक दोनों ही तरह से मदद भी की जोकि आगे बढ़ रहे थे ,खुदको या समाज को आगे ले जाने का प्रयास कर रहे थे. इससे पता चलता है कि छत्रपति शाहूजी महाराज भारत में राष्ट्रीय समाज के मानवातावादी आंदोलन की ‘नीव के वह ईंट’ हैं, जिनके बिना इस आंदोलन की परिकल्पना भी करना असंभव है।प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ही यह कोशिश हो रही थी कि सभी तरह के आंदोलनों की कमान गांधीजी के हाथों में दे जी जाए और ऐसा उनको पूरे देश का भ्रमण कराके किया भी जा रहा था. लेकिन उस दौरान छत्रपति शाहूजी महाराज पूरे तन-मन-धन से इस कोशिश में लगे रहे कि सामाजिक आंदोलन का नेतृत्व किसी ऐसे कुशल व्यक्ति के नेतृत्व में दिया जाये, जोकि ‘उच्च जाति का ना हो एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाला हो.’ शाहूजी महाराज का मानना था कि ‘नेता को दूरदृष्टा होना चाहिए, उसके पास भविष्य हेतु विजन होना चाहिए।राजनैतिक नेतृत्व की जरूरत पर महाराज ने 1920 में मानगांव की सभा में यह तक कहा था कि …. जानवरों के पास भी अपना नेतृत्व है, लेकिन आज तुम्हारे पास नहीं हैं।दलितों के उद्धारक बाबासाहब आम्बेडकर जब लंदन में अपनी पढ़ाई कर रहे थे, तो उन्होंने शाहूजी महाराज को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि वहां उनकी माली हालत काफी खराब है. यहां तक कि इंडिया वापस आने तक के लिए पैसे नहीं हैं,इसका जिक्र 04 सितंबर 1921 को बाबासाहब द्वारा शाहूजी महाराज को लिखे पत्र में मिलता है. इस पत्र के जरिए डॉ. आम्बेडकर ने शाहूजी से लोन के रूप में 200 पाउंड मांगे. तब शाहूजी महाराज ने डॉ. आम्बेडकर को ना केवल लंदन में वित्तीय मदद भिजवाई, बल्कि उनकी पत्नी रमाबाई आम्बेडकर को भी वित्तीय मदद भिजवाई. इसके अलावा बाबासाहब आम्बेडकर ने अपने पहले अखबार ‘मूकनायक’ को चलाने के लिए भी शाहूजी महाराज से समय-समय पर दरख्वास्त की और महाराज ने हमेशा दिल खोलकर अखबार के प्रकाशन को सुचारु रूप से जारी रखने में वित्तीय मदद दी।जिस आरक्षण पर हमला कर के इसे समाप्त किया जा रहा है, उस आरक्षण की अवधारणा छत्रपति शाहूजी महाराज के राज्य कोल्हापुर से ही आई, जब उन्होंने 26 जुलाई 1902 को अपने एक आदेश से कोल्हापुर रियासत की पचास प्रतिशत सीटों को पिछड़ी जाति के लोगों के लिए आरक्षित कर दिया था. उनका कहना था कि इससे राष्ट्रीय समाज में संवृद्धि आएगी और इनका आत्मबल भी बढ़ेगा, जिसके फलस्वरूप राष्ट्र सुखी और सम्पन्न होगा।राष्ट्रीय समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में भी उनका विशेष योगदान रहा. उन्होंने फरवरी 1908 में शिक्षा के विस्तार के लिए एक सोसाइटी का गठन करवाया. महाराज ने राष्ट्रीय समाज लिए तमाम शहरों में हॉस्टल खुलवाएं एवं बच्चों में जाति आधारित सामाजिक विद्वेष ना फैले, इसके लिए अछूतों के लिए अलग स्कूल के प्रावधान को समाप्त करके एक सार्वजनिक स्कूल शुरू किया गया।
इसी तरह छुआछूत से भी उनको खासी चिढ़ थी। अपने राजतिलक के समय वो खुद पाखंडवादियो के छुआछूत का शिकार हो चुके थे। इस दर्द को महसूस करते हुए 15 जनवरी 1919 के अपने एक आदेश में शाहूजी महाराज ने रियासत के सभी अधिकारियों को यह आदेश जारी किया कि कोई भी अधिकारी अगर छुआछूत करते हुए मिला तो उसे राज्य की सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा. इसी क्रम में उन्होंने राज्य के डाक्टरों के लिए 18 जनवरी 1919 को अलग से एक आदेश निकाल कर ना केवल उनको व्यावसायिक कर्तव्यों की याद दिलाई बल्कि यह भी बताया कि अगर उन्होंने अछूतों का इलाज करने से मना किया तो कठोरतम सजा होगी।
उनकी दूरदर्शिता और न्यायप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शाहूजी महाराज ने 03 मई 1920 को ही अपने एक आदेश से कोल्हापुर राज्य में बंधुआ और बेगार मजदूरी पर प्रतिबंध लगा दिया था।अपने जीवन का सिद्धान्त बताते हुए शाहूजी महाराज ने कहा था- ‘जो व्यक्ति अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं, वो कभी भी अपने प्रयास में सफलता प्राप्त नहीं करते और जो लोग अपने आप पर विश्वास करते हैं वो जरूर सफल होते हैं.’ वर्तमान वक्त में देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हालात को देखते हुए शाहूजी महाराज का यह सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज आपकी पुण्यतिथि के अवसर पर आपको विनम्र श्रद्धांजलि।।।।

आपका
कुमार सुशील
राष्ट्रीय महासचिव
राष्ट्रीय समाज पार्टी
9999525007

01/05/2020

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस (International Workers' Day) और मई दिवस (May Day) के साथ महाराष्ट्र दिवस (Maharashtra Day) की हार्दिक शुभकामनाएं ।।

एक मई को दुनिया के देशों में अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस (International Labour Day 2019) मनाया जाता है। इन दिन को लेबर डे, मई दिवस, श्रमिक दिवस और मजदूर दिवस भी कहा जाता है। ये दिन पूरी तरह श्रमिकों को समर्पित है। इस दिन भारत समेत कई देशों में मजदूरों की उपलब्धियों को और देश के विकास में उनके योगदान को सलाम किया जाता है। ये दिन मजदूरों के सम्मान, उनकी एकता और उनके हक के समर्थन में मनाया जाता है। मजदूर दिवस या मई दिवस से जुड़ी खास बातें:-
अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की शुरुआत एक मई 1886 को अमेरिका में एक आंदोलन से हुई थी। इस आंदोलन के दौरान अमेरिका में मजदूर काम करने के लिए 8 घंटे का समय निर्धारित किए जाने को लेकर आंदोलन पर चले गए थे। 1 मई, 1886 के दिन मजदूर लोग रोजाना 15-15 घंटे काम कराए जाने और शोषण के खिलाफ पूरे अमेरिका में सड़कों पर उतर आए थे। इस दौरान कुछ मजदूरों पर पुलिस ने गोली चला दी थी जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद 1889 में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की दूसरी बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें यह ऐलान किया गया कि 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा। इसी के साथ भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में काम के लिए 8 घंटे निर्धारित करने की नींव पड़ी।और उस संघर्ष त्याग और बलिदान की याद में अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है ।

महाराष्ट्र दिवस को महाराष्ट्र स्थापना दिवस (Maharashtra Foundation Day) भी कहा जाता है. साल 2020 में महाराष्ट्र की स्थापना के 60 साल पूरे हो गए हैं. दरअसल, 1 मई 1960 को तत्कालीन नेहरू सरकार ने बॉम्बे प्रदेश को बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम 1960 के तहत महाराष्ट्र और गुजरात इन दो राज्यों में विभाजित कर दिया। तत्कालीन बॉम्बे (मुंबई) को महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया।
महाराष्ट्र की यश गाथा,
महाराष्ट्र की शौर्य गाथा,
इस पवित्र मिट्टी को माथे लगाएं,
धरती मां के चरणों में शीश झुकाएं.
पत्थर बनूंगा तो सहयाद्री का बनूंगा,
मिट्टी बनूंगा तो महाराष्ट्र की मिट्टी बनूंगा,
तलवार बनूंगा तो मां भवानी का बनूंगा,
जय भवानी... जय शिवाजी...
अगर पुनर्जन्म हुआ तो महाराष्ट्र में ही जन्म लूंगा,
और इस मिट्टी पर जन्में वीरों की तरह शूरवीर बनूंगा.
धन्य है महाराष्ट्र की मिट्टी...
कोटी-कोटी नमन इस पवित्र धरती को...

महाराष्ट्र दिवस की शुभकामनाएं

28/04/2020

28/04/2020

सम्पूर्ण भारत को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए देश की चार दिशाओं में हमारी पौराणिकता एवं आध्यात्मिक परम्परा के सर्वोच्च प्रतीक,चार पीठों को स्थापित करने वाले हिन्दू धर्म के महान प्रचारक,अद्वैत वेदान्त के प्रणेता "आदि गुरु शंकराचार्य जी" की जयंती पर उन्हें अनंत कोटि नमन।

28/04/2020

#राष्ट्रीय_समाज_के_महान_कवि_
#सूरदास_जी_जिन्होंने_जगत_को_दिखाई_सजीव_श्री_कृष्णलीला_की_जयंती_पर_सादर_नमन_वन्दन_अभिनंदन

राष्ट्रीय समाज के महाकवि सूरदास जिन्होंने जन-जन को भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से परिचित करवाया। जिन्होंनें जन-जन में वात्सल्य का भाव जगाया। नंदलाल व यशोमति मैया के लाडले को बाल गोपाल बनाया। कृष्ण भक्ति की धारा में राष्ट्रीय समाज के महान कवि सूरदास का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। राष्ट्रीय समाज महाकवि सूरदास जिन्हें बताया तो जन्मांध जाता है लेकिन जो उन्होंने देखा वो कोई न देख पाया। गुरु वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग पर सूरदास ऐसे चले कि वे इस मार्ग के जहाज तक कहाये। अपने गुरु की कृपा से भगवान श्री कृष्ण की जो लीला सूरदास ने देखी उसे उनके शब्दों में चित्रित होते हुए हम भी देखते हैं। वैशाख शुक्ल पंचमी को सूरदास जी की जयंती मनाई जाती है।राष्ट्रीय समाज के महान कवि सूरदास का संपूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में बीता है। उन्होंने कृष्ण की लीलाओं पर पद लिखे व गाये। यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी उनके गुरु वल्लभाचार्य ने। सूरदास के जन्म को लेकर विद्वानों के मत अलग-अलग हैं। कुछ उनका जन्म स्थान गांव सीही को मानते हैं जो कि वर्तमान में हरियाणा के फरीदाबाद जिले में पड़ता है तो कुछ मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक ग्राम को उनका जन्मस्थान मानते हैं। मान्यता है कि 1478 ई. में इनका जन्म हुआ था। राष्ट्रीय समाज के इस महान कवि सूरदास एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्में थे। इनके पिता रामदास भी गायक थे। इनके जन्मांध होने को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं। दरअसल इनकी रचनाओं में जो सजीवता है जो चित्र खिंचते हैं, जीवन के विभिन्न रंगों की जो बारीकियां हैं उन्हें तो अच्छी भली नज़र वाले भी बयां न कर सकें इसी कारण इनके अंधेपन को लेकर शंकाएं जताई जाती हैं। इनके बारे में प्रचलित है कि ये बचपन से साधु प्रवृति के थे। इन्हें सगुन बताने कला वरदान रूप में मिली थी। जल्द ही ये बहुत प्रसिद्ध भी हो गये थे। लेकिन इनका मन वहां नहीं लगा और अपने गांव को छोड़कर समीप के ही गांव में तालाब किनारे रहने लगे। जल्द ही ये वहां से भी चल पड़े और आगरा के पास गऊघाट पर रहने लगे। यहां ये जल्द ही स्वामी के रूप में प्रसिद्ध हो गये। यहीं पर इनकी मुलाकात वल्लभाचार्य जी से हुई। उन्हें इन्हें पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी और श्री कृष्ण की लीलाओं का दर्शन करवाया। वल्लभाचार्य ने इन्हें श्री नाथ जी के मंदिर में लीलागान का दायित्व सौंपा जिसे ये जीवन पर्यंत निभाते रहे।
मान्यता है कि इन्हें अपने देहावसान का आभास पहले से ही हो गया था। इनकी मृत्यु का स्थान गांव पारसौली माना जाता है। मान्यता है कि यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने रासलीला की थी। श्री नाथ जी की आरती के समय जब सूरदास वहां मौजूद नहीं थे तो वल्लाभाचार्य को आभास हो गया था कि सूरदास का अंतिम समय निकट है। उन्होंने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए इसी समय कहा था कि पुष्टिमार्ग का जहाज़ जा रहा है जिसे जो लेना हो ले सकता है। आरती के बाद सभी सूरदास जी के निकट आये। तो अचेत पड़े सूरदास जी में चेतना आयी। कहते हैं कि जब उनसे सभी ज्ञान ग्रहण कर रहे थे तो चतुर्भुजदास जो कि वल्लाभाचार्य के ही शिष्य थे ने शंका प्रकट की कि सूरदास ने सदैव भगवद्भक्ति के पद गाये हैं गुरुभक्ति में कोई पद नहीं गाया। तब उन्होंने कहा कि उनके लिये गुरु व भगवान में कोई अंतर नहीं है जो भगवान के लिये गाया वही गुरु के लिये भी। तब #भरोसो_दृढ़_इन_चरनन_केरो नामक पद गाया। इसके बाद चित्त और नेत्र की वृति को लेकर विट्ठलनाथ जी द्वारा पूछे प्रश्न पर #बलि_बलि_हों_कुमरि_राधिका_नंद_सुवन_जासों_रति_मानी और #खंजन_नैन_रूप_रस_माते पद गाये। यही उनके अंतिम पद भी थे जो उन्होंने गाये। इसके बाद पुष्टिमार्ग का जहाज़ गोलोक को गमन कर गया।
ऐसे राष्ट्रीय समाज के महान कवि सूरदासजी की जयंती पर नमन वन्दन 💐💐💐💐🇬🇫

26/04/2020

#रासपाई_की_क्या_पहचान!
#हरा_पिला_झंडा_जानकर_निशान !!

हर रासपाई युवा को सबसे पहले इस सलाह को मानना चाहिए ।
#युवा_भाईओ
#करोड़ो की #गाड़ी, #करोड़ो का ा
#मात्र_पांच_रुपल्ली_का_गैरो_का_झंडा पहले अपने ाड़ी_गांव_और_दिमाग_से_उखाड़_फेको

पुरखो की मेहनत को किसी अन्य का पांच रुपये का झंडा लगाकर गिरवी रखना अब बन्द करो ।आपका
ईमान अपना स्वाभिमान अपना झंडा भी अब आपका अपना #रासपा होना चाहिए ।

26/04/2020
राष्ट्रीय समाज पक्ष on Twitter 25/04/2020



थाना बीवी नगर जिला बुलंदशहर उत्तरप्रदेश में कोरोना वारियर्स रूप मे तैनात उपनिरीक्षक SI विजेंद्र पाल को रात गोली मारी गयी,ड्यूटी के दौरान गोलीबारी में SI विजेंद्र हुए शहीद,घटना की त्वरित जांच की जाय तथा आरोपियो को सजा दी जाय तथा शहीद के परिवार को 1 करोड़ रुपये जीवनायपन के लिए आर्थिक मदद और पत्नी/बच्चों को नौकरी देकर कोरोना वारियर्स SI विजेंद्र सिंह को न्याय दिलाये ।
#बुलंदशहर_SI_पुलिस_न्याय


https://twitter.com/Rastriyasamajp/status/1254052908779225089?s=08

आपका
महादेव जानकर
विधायक , पूर्व कैबिनेट मंत्री महाराष्ट्र
संस्थापक राष्ट्रीय समाज पार्टी

राष्ट्रीय समाज पक्ष on Twitter “ त्वरित न्याय तथा एक करोड़ की आर्थिक मदद बच्चो को नौकरी देकर कोरोना वारि...

Photos from राष्ट्रीय समाज,जाति धर्म से परे राष्ट्र को मानने वाला समाज's post 25/04/2020

#खुद_को_खुद_ही_परखे

्रबुद्ध_चिंतक_न्याय__के_पंच_है_या_हंस_हंसिनी_की_कहानी_वाले_बेशहुरपुरी_उल्लू_पंच

इस देश में कई पार्टियां बनी ...बिगड़ी ..चली.... नैतिकता का और सैद्धान्तिक न्याय का तकाजा है आज जिसके पास इस देश मे परिणाम है ...रिजल्ट है जो देश राज्य की सबसे बड़ी पार्टी हो उसे चुनो और उसके साथ चलो ...नही तो वही रोज संघटन बनाओ ...अपना ईगो बचाओ अध्य्क्ष बन जाओ ...और ढांक के तीन पात पाओ ...वाली हाल होगी ...जो देश राज्य में सबमे सबसे बड़ी पार्टी हो उसे चुनो न्यायोचित फैसला करो नही तो .....रोज दुकान खोलो ...अध्य्क्ष बनो फिर जैसे भूतकाल में हुआ उसे भुगतो ....अब फैसला तर्क पर करो ...ईगो पर नही जो सत्य हो सही हो जिसके पास परिणाम हो रीजल्ट उसके साथ चलो और आप ही नही मैं भी आपके साथ ...
एक उदाहरण आज एक राज्य में 2 विधायक ,दोपूर्व मंत्री ,90 से ज्यादा जिलापंचत सदस्य, 3 जिलापंचायत अध्यक्ष तथा दूसरे राज्य में 3 दर्जन से ज्यादा जिलापंचायत सदस्य , सभापति, सपा शिवसेना जैसी पार्टीयो से चुनाव में आगे तीसरे राज्य उत्तरप्रदेश में पहली बार विधानसभा तथा लोकसभा में दर्जन से ज्यादा सीट पर चुनाव लड़ना धनगर गडरिया पाल,के साथ साथ पंडित, हरिजन पाशी को चुनाव में उतारना ..जैसे कई उदाहरण है एक और उदाहरण देता हूं ....राजे यशवंत राव होल्कर बकरी पालन योजना के बारे में जानते होंगे न जाने तो पता कर जानते हुए भी अनजान बने कोई बात नही...मदद अगर नही कर सकते तो कोई गम नही पर किसी के इशारे पर सुपारी ले कर ....रास्ते मे रुकावट न बने तो अच्छा , पता है आप ईगो में नही हो...पर कुछ लालची लोमड़ी जैसे उच्चके अब रुकावट बनेंगे इस समाज को इस हालत में ले जाने में भी बड़ा योगदान देंगे है ।उन्हें अध्य्क्ष ही बनना है पद.. मंच माला माइक के भूखे ये लालची आपके पास आएंगे कुछ सियारो को साथ लाएंगे..कुतर्क करेंगे ...तर्क है ही नही ...अंदर अंदर पुड़ी पोयेगे..चिकनी चुपड़ी वाले गुरु घंटाल भी हां जी हां करेंगे ।। पर न्याय का सिद्धांत कहता है जो सबसे बड़ी हो , जिसके पास परिणाम हो , रिजल्ट हो उसके साथ चलो , पर इन्हें पद, मंच माला माइक चाहिए और आपसे कुल मिलाकर चंदा जिससे चले इनका धंधा उसी जुगाड में है #ये_फेल_लोग_कभी_आप_को_प्रदेश_के_नाम_पर_बांटेंगे_फिर_देखना_ये_जिले_के_नाम_पर_बांटेंगे_और_तो_और_ये_घर_ घर भी बांटेंगे । इनका #दोगलापन है #बात #देश_के_समाज_की_करेंगे_और_बाटने_से_भी_चूकेंगे_नही_ये #बेशहुरपुरी और इनके #बागड़बिल्ले जो #लबादा तो #समाजसेवा का #ओढ़ते है लेकिन #माल_मेवा_मलाई अपने अपने #घर मे #भरते है ।

पर ये काफिला चल चुका है

परिणाम है रिजल्ट हैआइये देखिये परखिइये....फिर चलिए।

तय करे बकलोली के साथ आप है या रिजल्ट परिणाम के साथ ।।एक हकीकत से वाकिफ हम सब है कि दो दशक पहले जब कोई आई ए एस पीसीएस की परीक्षा मात्र देने जाता था तो उस अशिक्षा के दौर में उसे भी आई ए एस या सफल मान लिया जाता था और खूब हर्षोल्लाश होता था जश्न होता था यहाँ तक कि फार्म भरने भर स्व लोग विहाह भी कर देता था और जब परिणाम आता था तो दोनों पक्षो में जूतमपैजार भी होता था ।। क्योंकि #परीक्षा_देने_से_ही_बन_नही_जाता_कलेक्टर , #बनने_में_परिणाम_का_अहम_महत्व_होता ।
आज इस दो राहे पर खड़ा राष्ट्रीय समाज आपसे जानना चाहता है कि आप राष्ट्रीय समाज को कहा ले जाना चाहता है परीक्षा हॉल में या जिसके साथ आज परिणाम है जिसे आपके सहयोग से सफलता मिल चुकी है । क्योंकि आपका फैसला एक नज़ीर होगा आने वाली पीढ़ियों के लिए और आपकी तटस्थता की कसोटी भी ।
्र_कर_रहे_है_राष्ट्रीय_समाज_को_या_तोड़_रहे_है_इसका_भान_रखिये_आप

एक कहानी जो आजपर एकदम सटीक

एक बार की बात है, एक हंस और हंसिनी सुरम्य वातावरण से भटकते हुए एक उजड़े, वीरान इलाके में जा पहुंचे.

हंसिनी ने हंस से कहा, ‘हम किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं? यहाँ तो जीना भी मुश्किल है.’भटकते-भटकते शाम हो गयी. हंस ने हंसिनी से कहा, ‘प्रिये, किसी तरह आज की रात यहीं बिता लेते है, सुबह हम लोग लौट चलेंगे.’

हंस और हंसिनी जिस पेड़ के नीचे ठहरे थे, उस पर एक उल्लू भी बैठा था. आधी रात होते ही उल्लू जोर-जोर से चिल्लाने लगा.

हंसिनी ने हंस से कहा, ‘अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते, ये उल्लू इसी पेड़ पर बैठा चिल्ला रहा है.’

इस पर हंस ने हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही. पेड़ पर बैठा उल्लू भी दोनों की बात सुन रहा था.

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया, और बोला, ‘हंस भाई, मेरी वजह से रात में आपको तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो.’

हंस ने कहा, `कोई बात नहीं भैया, आपका धन्यवाद.’

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, `अरे देखो वह हंस मेरी पत्नी को भगाकर लिये जा रहा है.’

यह सुनकर हंस चौंका. वह रुका और उसने उल्लू से पूछा, `आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, और मेरे साथ जा रही है. ’
इस पर उल्लू ने कहा, `खामोश, यह मेरी पत्नी है.’
और दोनों झगड़ने लगे. दोनों के बीच विवाद बढ़ गया. उस इलाके में बच रहे इक्के-दुक्के अन्य पशु-पक्षी भी इक्कठा हो गये. पंचायत बुलाई ली गयी. सरपच और पंच भी आ गये. मामला न्याय पंचायत में पेश हुआ. हंस हंसिनी को अपनी पत्नी बतला रहा था तो उल्लू अपनी पत्नी.
न्याय पंचायत ने हंस और उल्लू के बयान सुने. फिर सरपंच और पंचों ने आपस में मंत्रणा की-बात तो सही है यही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे. हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है. इसलिए फैसला उल्लू के पक्ष में ही देना चाहिये. न्याय पंचायत ने अपना फैसला सुनाया-सारे तथ्य व बयानों के आधार पर पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि यह हंसिनी उल्लू की पत्नी है.
न्याय पंचायत का फैसला सुनकर हंस हैरान था. वह रोने, चीखने, चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला गलत है. वह इसी हाल में हरिद्वार की ओर उड़ चला.
उल्लू ने हंस को आवाज देकर रोका. हंस ने रोते हुए कहा, `भैया, मेरी पत्नी तो तुमने ले ही ली है, अब और क्या लेने का इरादा है?’
इस पर उल्लू बोला, `मित्र, हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी, लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है. मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है. यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे सरपंच और पंच/ नैतिक पतित पशु-पक्षी रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं / जिन्हें सही और गलत का विवेक नहीं है.’
हंस को उस क्षेत्र के उजाड़ होने का सही बोध हो गया था. उल्लू ने हंसिनी को मुक्त कर दिया. हंस हंसिनी को लेकर अपने गन्तव्य की ओर उड़ चला.
मित्रो आप राष्ट्रीय समाज के प्रबुद्ध ..और विचारवंत सम्मानित व्यक्ति है आज राष्ट्रीय समाज एक अनिश्चितता के चौराहे पर खड़ा है जहाँ उसे आपके मार्गदर्शन की जरूरत है । विगत सत्तर वर्षो से हम भटक रहे थे लेकिन आपके हमारे पूर्वजो अभिभावकों ने कड़ी मेहनत मस्कत से हमे और आपको शिक्षित किया एक आधार दिया और आज हम अपने अधिकार को लेकर सचेत हो रहे है चाहे सामाजिक हो या राजनीतिक ....
सामाजिकता की दशा दिशा अपने उन्नत काल मे है और राजनीति में आजतक कई कोशिशें हुई लोगो ने कोशिश भी की और कुछ चले #कुछ_कुल्हाड़ी_के_बेट_बन_अपनो_को_ही_काटने_में_तल्लीन_रहे!!
आप सभी को आज तय करना चाहिए कि आखिर कब यह ठगी का खेल चलता रहेगा कब तक ये समाज ऐसे ठगा जाएगा ....अब आप तय करे ।

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नही सकते।।


आपका
कुमार सुशील
राष्ट्रीय समाज पार्टी
राष्ट्रीय महासचिव
9999525007

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