#पढ़ें_कहानी स्तंभ में आज एक उड़िया कहानी सादर प्रस्तुत कर रहा हूँ। समकालीन भारतीय साहित्य के एक पुराने अंक में यह कहानी पढ़ते हुए सोच रहा हूँ कि हमारी भारतीय भाषाओं के कितने ही अच्छे लेखक और उनकी रचनाएँ हमसे अलक्षित रह जाती हैं!
● प्रेमिका
● सदानन्द त्रिपाठी
स्मृति का विवाह संपन्न हो चुका था। सारे वैदिक कर्म समाप्त होने के बाद वह एक छोटे-से कमरे में सिर झुकाए गुमसुम बैठी थी। ससुराल जाने का मुहूर्त नहीं हुआ था। विदाई में अभी थोड़ी देर थी। घर में सभी लोग दुखित थे। आगजनी की घटना होने पर जैसे चारों ओर हो-हल्ला होता है और युद्ध-स्तर पर काम चलता है, ठीक वैसा ही घर का माहौल था। इस शोरोगुल के बीच स्मृति को अपने दुःख और कारुण्य की भावनाओं में भी बिखराव महसूस हो रहा था। उसकी भावनाओं में अभी भी सोमू एक उद्वेलित समुद्र का रूप लिए था। वह जानती थी कि अगले किसी भी क्षण उसे डोली में बैठना है, पर वह अभी तक सोमू की स्मृति को अपने मन से पोंछ नहीं पाई थी। वह यह भी जानती थी कि अब सोमू को याद करना उस के लिए अनुचित, अशोभनीय तथा आपत्तिजनक ही सिद्ध होगा।
यह ठीक है कि वह निश्चय कर चुकी है कि वह सोमू को अब याद नहीं करेगी पर वह उसके सिर का कोई सफ़ेद बाल तो है नहीं, जिसे वह तुरत उखाड़ फेंके या फिर कोई मूल्यवान गहना भी नहीं है जिसे वह तुरत उतारकर किसी को दान कर दे?
न जाने यह जीवन भी क्या चीज़ है! लगता है प्रलय के बाद भी या पृथ्वी के ध्वंस हो कर राख बन जाने के बाद भी जीवन बचा रहेगा। चारों ओर सुनसान होगा। पेड़-पौधे, नदी-नाले जीव-जंतु कुछ भी नहीं होंगे। चारों ओर रेत ही रेत होगा और बीच में अथाह, असीम जल, जल में जलचर भी नहीं होंगे; लेकिन वहाँ दो पैर रखने की ज़मीन बची होगी तो वहाँ पर भी यह जीवन खड़ा मिलेगा।
स्मृति को बड़ा अजीब लग रहा था कि वह ज़िन्दा कैसे है? हाँ, निर्लज्ज होने पर ज़िन्दा रहा जा सकता है। और फिर उस से ज्यादा निर्लज्ज दूसरा कोई कहाँ होगा? उस ने अपने विवाह की खबर सोमू को दी थी। उस ने सोमू को निमंत्रण दिया था। वह नहीं आया।
सोमू यदि कोई अपरिचित व्यक्ति होता तो कभी-न-कभी उस से मिलने की संभावना रहती। परिचय होता या न होता कभी तो किसी बस में, रेल में, सिनेमा घर के पास, बाज़ार के आसपास, कहीं भीड़ में उस से मुलाकात तो होती।
पर अब सोमू के साथ मुलाकात की बात तो दूर उस के बारे में सोचना भी पाप होगा।
जब ऐसे अजीबोगरीब भाव स्मृति के मन को मथ रहे थे उसी समय उस के मुहल्ले की एक लड़की नमिता जो स्मृति की सहेली भी थी, उस के पास आई। गोद में उस की डेढ़ साल की लड़की थी जो चीख-चीख कर रोए जा रही थी। नमिता चिढ़ उठी थी, "ओफ्फ ! यह लड़की तो उठने-बैठने भी नहीं देगी।"
नमिता विवाह से पहले एक लड़के से प्रेम करती थी। उन के प्यार के किस्से गली-गली में किसी शराबी की तरह डोल रहे थे। उस का एक दिन विवाह हो गया। उस के चोट खाए प्रेमी ने उसके पति के पास एक बेनामी चिट्ठी भी लिखी थी।
एक बार स्मृति ने नमिता से पूछा था, "तब तो तू बहुत दुखी हुई होगी रे?"
नमिता बोली, "किसी लुहार के घर यदि सूप की ठक-ठक से कबूतर उड़ाने का प्रयत्न किया जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ता। वह दिलजला आज भी जो चाहे सो लिखता रहता है, परंतु ये क्या सहज ही विश्वास कर लेंगे? और फिर मेरे पास पुरुष को वश में करने की जड़ी है। और ये मरद लोग? ये सब तो एक-एक धामिन साँप होते हैं, धामिन। फिर ब्याह हो जाने के बाद तो आत्मरक्षा के लिए लगाई जाने वाली इन की दौड़ की गति भी कम हो जाती है। हाँ, करोड़ों में कोई एक आध ही नाग का बच्चा हो तो हो। मेरे पास वशीकरण मंत्र तो है ही। ब्याह के बाद तू ये सब समझ जाएगी, जान जाएगी। सुनी-सुनाई और भोगी हुई बात में कितना फर्क होता है, यह तू केवल सुन कर नहीं समझ सकती।"
स्मृति और सोमू के संबंध के बारे में बहुत कम लोग जानते थे। स्मृति ने इस बारे में कई बार नमिता को बताया था और उस की राय भी माँगी थी। नमिता कहती, "पहले प्रेम करना फिर शादी करना ठीक नहीं है। उस से असली आनंद का पता नहीं चल पाता है। इतना बढ़िया जीवन निष्फल चला जाता है। एक प्रेमी और पति में बहुत अंतर होता है। जैसे असली मंत्री और अख़बार के मंत्री में। अखबार के मंत्री लोग कितने अच्छे होते हैं, है न?"
नमिता की बेटी ने रोना बंद नहीं किया था। नमिता बाहर जाकर अपनी बेटी को किसी को दे आई। उसने स्मृति के पास आकर धीरे से कहा, "मैंने सुना है, तेरे होने वाले पति को सोमू के बारे में कुछ-कुछ पता है?"
स्मृति अचानक चौंक पड़ी थी पर सिहरन की रेखाओं को अपने चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया। वह सारी बातें नमिता के सामने नहीं उघारती थी। वह जानती थी कि नमिता अपने विशाल हृदय में यह सब पचा नहीं पाएगी। उसने नमिता की आँखों में आँखें डालते हुए कहा, "मैंने तो सोच लिया है, उसे सब कह दूँगी।'
स्मृति जानती थी- उसका यह विचार नमिता को पसंद नहीं आएगा। दोनों ने ही अतीत में किसी एक से प्रेम किया था और दूसरे से विवाह। फिर भी दोनों में जो अंतर था, वह स्मृति जानती थी।
नमिता बोली, "क्या फालतू बात करती है? पागल हो गई है क्या? क्या कोई लड़की ऐसा कहती है? जिससे प्यार किया उससे तो शादी हो नहीं पाई और जिससे शादी की, उसे थोड़ा प्यार देने में परेशानी क्या है? जिससे प्यार किया उससे शादी नहीं हो पाई तो चल जाएगा पर जिससे शादी की है वह तो प्यार चाहेगा। तुम्हारे प्यार पर उस का अधिकार है।" स्मृति उस से तर्क नहीं करना चाहती थी। वह बोली, "मैं उन्हें प्यार नहीं करूँगी, ऐसा तो मैंने नहीं कहा।"
"और नहीं तो क्या कह रही है?" नमिता ज़ोर से बोली। एक लंबी साँस लेकर उसने फिर धीरे-से कहा, "तू उसे सोमू की बात बता देगी तो तू सोचती है कि वह तेरी बात पर विश्वास कर लेगा कि तू उसे दिल से सच्चा प्यार करेगी? अरे बुद्धू, पति के साथ एकदम सफेद झूठ बोलना चाहिए। मैंने अनुभव किया है, तभी बता रही हूँ। यदि वो सोमू के बारे में पूछे भी तो तुझे बोलना होगा कि तू केवल इस नाम के व्यक्ति को पहचानती है। बस उससे आगे कुछ पूछे तो हँसी में उड़ा देना। कहना, घर की दुश्मनी के कारण ही लोगों ने बदनाम करने के लिए ये बातें उड़ाई है। यदि और ज़्यादा पूछताछ करे तो बस रोने लगना। और तुझे तो रोने के लिए ही कॉलेज में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला था।"
स्मृति चुप थी। नमिता ने अपने अनुभव के आधार पर कुछ गूढ़ बातें बताई, "शादी के बाद का जीवन छलनापूर्ण जीवन होता है। शादी के बाद एक इंसान दो इंसानों में बँट जाता है। एक अंदर वाला और एक बाहर वाला। और विवाह के बाद यदि नारी सुखी रहना चाहती है तो उसे हर परिस्थिति में मुस्कराना होगा। पति चाहे पूरी तरह पत्नी का न हो पर पत्नी को बराबर यह प्रमाणित करना पड़ता है कि वह एड़ी से ले कर चोटी तक पूरी अपने पति की है, चाहे वह झूठ ही क्यों न हो।"
नमिता की बातों से स्मृति को लगा कि उसे भी शायद यह छलनापूर्ण जीवन ही जीना होगा। अपने लिए न सही पर उसके लिए जिसका हाथ थामकर वह चारों ओर गुरुजनों के आशीर्वादों, शुभेच्छाओं के बीच विवाह की वेदी पर बैठी थी। उसके जीवन की शांति के लिए उसे प्रमाणित करना होगा; हो सकता है उसे कहना पड़े कि वह ही उस के जीवन में आया पहला पुरुष है, उसका उसके तन पर ही नहीं, मन पर भी पूरा अधिकार है, चाहे उस के मन के कण-कण पर लिखा हो- सोमू.... सोमू... सोमू...। इसलिए सोमू को भूल जाना ही उसका सबसे पहला काम है। सोमू से प्यार होने के बाद ऐसे कई दिन बीते थे जब वह उसे याद भी नहीं आया था, पर जिस दिन से उसका विवाह तय हो गया उस दिन से ऐसा कोई पल न था जब सोमू उस की स्मृति में कौंधा न हो, उसकी हर धड़कन के साथ धड़का न हो।
सुहागरात के दिन ही, उसने सोचा था, श्रीदेव को सोमू की सारी बात बता देगी। पर शुरू से ही उसके मस्तिष्क में चोट करने से न जाने कितना विस्फोट होगा या श्रीदेव न जाने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे, यह सोच-सोचकर वह चुप रह जाती थी। पर एक तरफ़ ऐसा विचार और दूसरी तरफ न कह पाने के अपराधबोध की भावना उसे खाए जा रही थी। और अंत में उस ने निर्णय किया कि वह श्रीदेव के वैवाहिक जीवन की आरंभिक रंगीन कल्पनाओं को शापग्रस्त नहीं करेगी। उसने निर्णय किया कि अपने विषाद की महाजनी में वह अपने पति को साझेदार नहीं बनाएगी। यह अनुचित होगा। तभी उसने देखा कि मूँगफली के छिलके-सी ललाई श्रीदेव की आँखों में छाए जा रही है। वह पसीना-पसीना हो गई। एक अनजान भय ने उसे घेर लिया था। उसे सब अतार्किक और अरुचिकर लग रहा था।
उसे फिर एक बार महसूस हुआ कि पंखा चल रहा है। पश्चिम वाली दीवार पर श्री जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा का फ्रेमजड़ा फोटो टँगा है। उसे जीवन का तिक्त विलाप सुनाई दे रहा था। उसे लगा जैसे शरीर के अंदर कहीं कुछ टूट गया है, कई युगों से बना प्रस्तर-प्रासाद धसक गया है। और इस नये कारुणिक अनुभव ने उसकी चेतना को सचेतनता के लबादे से ढँक दिया था।
विषदंतों के टूटने की तरह एक निर्लज्ज हँसी श्रीदेव के होंठों पर खेल रही थी। पंखा चल रहा था। स्मृति सोचने लगी, यही उचित समय है जब वह अपने और सोमू के विषय में श्रीदेव को बता कर उससे क्षमायाचना कर लेगी। काले घूमते हुए सीलिंग फैन की ओर टकटकी लगाए उसने साहस सँजोया और करवट बदली, पर उसने देखा कि श्रीदेव एक परितृप्त स्वार्थपरता की गहरी निद्रा में डूब चुके हैं।
रोज स्मृति निश्चय करती कि आज ज़रूर वह श्रीदेव से सब कुछ कह देगी पर शयन कक्ष में जाते ही रोज़ वह एक एक्वेरियम की मछली बन कर रह जाती थी। उसकी बात अनकही रह जाती थी।
धीरे-धीरे श्रीदेव की छुट्टियाँ समाप्त हुई जा रही थीं। इस बीच वे कई बार कह चुके थे कि अपनी नौकरी की जगह पर जाने के बाद अब उन्हें वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। बहुत तकलीफ़ होगी। वैसे तो वे स्मृति को अपने साथ ले जाते पर अभी-अभी तो ब्याह हुआ है। लोग क्या कहेंगे? जब तक घर का कोई सदस्य स्मृति को ले जाने को नहीं कहता तब तक खुद लपक कर कहना अच्छा नहीं लगता। और फिर कंपनी ने उसे जो रहने की जगह दी है, वह एक हॉस्टल की तरह है। वहाँ और भी अनेक अविवाहित लोग रहते हैं। वैसे तो वहाँ कुछ शादीशुदा लोग भी रहते हैं पर वहाँ एकांत परिवेश का घोर अभाव है। किसी एक की पत्नी को अनेक की भाभी हो कर रहना पड़ता है। श्रीदेव ने तो स्मृति को यहाँ तक कह दिया था कि पत्नी मिलनसार हो तो दोस्तों का आना-जाना बना ही रहता है और पति महोदय की जेब पर भी उस का असर होता है। फिर भी वे स्मृति को अपने साथ ले जाना चाहते थे, नहीं तो उनका सारा समय अन्यमनस्कता में ही बीतेगा। क्या पता समय बीतेगा भी या नहीं! इसके अलावा खाने-पीने में भी परेशानी होगी।
स्मृति ने भी सुना था कि विवाह होते ही बाहर नौकरी करने वाले युवकों को अचानक खाने-पीने की परेशानियाँ सामने आने लगती हैं और वे लोग कुछ ही दिनों में दुबले-पतले भी हो जाते हैं। श्रीदेव को भी ऐसी ही परेशानियों का सामना करना पड़ेगा, यह सुनकर उसे हँसी आ गई थी। वह कुछ शरमा भी गई थी। उसने अपना शर्म से झुका चेहरा उठाकर और हँसी दबा कर धीरे-से श्रीदेव से पूछा, "क्यों जी, इतने दिन तो तुम अकेले ही रहते थे न, फिर भोजन-पानी तुम्हारा कैसे चलता था?" उसकी बात और उसकी नज़रों के भाव को पढ़कर श्रीदेव ने प्रेमपूर्ण पराजय स्वीकार करते हुए अभिनयपूर्ण मान दिखाते हुए उस की ओर तकिया फेंका।
श्रीदेव वास्तव में एक अच्छे व्यक्ति थे। वे स्मृति को बहुत चाहते थे। स्मृति हमेशा द्वंद्व और मानसिक संघर्ष से जूझती रहती थी। इतने हँसमुख, खुशदिल इंसान के सामने सोमू की बात बताना क्या ठीक होगा। पर नमिता तो कहती थी कि श्रीदेव सोमू के विषय में कुछ-कुछ जानते हैं।
कल श्रीदेव अपनी नौकरी के स्थान पर चले जाएँगे। रात को स्मृति ने कहा, "सोमू मेरा दूर का रिश्तेदार है। मेरा और उसका दिल का रिश्ता था।"
श्रीदेव ने धीरे- से मुस्कराकर कहा, "वो मैं जानता हूँ।"
स्मृति को अचानक ऐसा लगा, जैसे पास ही कहीं तोप का भयंकर विस्फोट हुआ हो। कुछ समय के लिए उस के कान सुन्न पड़ गए। अगले ही क्षण उसने स्वयं को सँभाल लिया था। वह खुद को समझा रही थी : इस में इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है? नमिता भी तो कह रही थी कि वे सोमू के बारे में कुछ-कुछ जानते है। उसने एक गहरी साँस ली और बोली, "सच?"
"हाँ, " श्रीदेव ने कहा। उन्होंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, "बल्कि मैं तो यह सोच रहा था कि तुम्हारी जैसी निष्कपट लड़की ने आज तक मुझसे इस बारे में कुछ क्यों नहीं कहा। हाँ, यदि तुम न कहती तो मैं पूछता भी नहीं। ठीक है, फिर भी मैंने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। तुमने मेरा बोझ हल्का कर दिया स्मृति!"
स्मृति की आँखों में आँसू भर आए थे। कमरे की नीली मद्धिम रोशनी में अपने आँसू छिपा जाने में उसे ज़्यादा कठिनाई न हुई थी। उसने पूछा, "सब कुछ जानने के बाद भी तुम्हें मुझ पर कभी गुस्सा नहीं आया?"
"आया। कभी-कभी आता था। पर सारी बात न जानकर गुस्सा करने से मेरी भी तो क्षति होती।"
"तुम तो बोले कि तुम सब जानते हो?"
"सब जानता हूँ, ऐसा मैंने कब कहा? मैं तो जितना जानता था, वह न जानने जैसा ही था। तुम्हारे साथ मेरी सगाई हो जाने के बाद मुझे एक बेनामी चिट्ठी मिली थी।"
"बेनामी चिट्ठी!" स्मृति धीरे से बुदबुदाई।
"हाँ। किसी ने लिखी थी। यही सब आलतू-फालतू बातें, हाँ, उसने यह लिखा था कि इस चिट्ठी के पाने के बाद भी यदि मेरा विवाह तुमसे हो जाए तो यह चिट्ठी न दिखाई जाए क्योंकि तुम उन अक्षरों को पहचान जाओगी।"
"तुमने वो चिट्ठी कहाँ रखी है?" स्मृति ने अत्यंत उद्वेग से पूछा।
"रखी नहीं। मैंने फाड़ दी।"
स्मृति अंदर-ही-अंदर मथी जा रही थी। उसे लग रहा था जैसे हज़ार हज़ार लोगों के पैरों तले वह रौदी जा रही हो। उसे साँसे लेना भी दूभर हो रहा था। कुछ समय चुप रहकर बड़े ही दयनीय स्वर में उसने पूछा, "चिट्ठी मुझे दिखाने से पहले ही फाड़ दी?"
श्रीदेव ने उसके स्वर में छिपे मान-भाव को पहचान लिया। बोले, "हाँ। चिट्ठी पाकर पढ़ने के तुरंत बाद ही मैंने उसे फाड़ दिया था, क्योंकि बेकार की चिन्ता करना मुझे अच्छा नहीं लगता। और फिर हो सकता था इससे हमारी सगाई टूट जाती। पर मैं तुमसे शादी करना चाहता था।"
"चिट्ठी पाने के बाद भी ?"
"चिट्ठी लिखने वाले को तो जानता नहीं था। उस का उद्देश्य भी मुझे नहीं पता था। उस की बात झूठी भी हो सकती थी। हाँ, यदि मैं तुम से सोमू के बारे में पूछता तो हो सकता था कि तुम कहती, 'मैं इस नाम के किसी व्यक्ति को नहीं जानती।' उस चिट्ठी में यह भी लिखा था कि कभी यदि मैं तुमसे सोमू के बारे में पूछूँगा तो तुम यह भी उत्तर दे सकती हो कि इस नाम के व्यक्ति को मैं बस पहचानती हूँ जैसे कि जाने-अनजाने अनेक लोग पहचान के होते हैं।
पर मेरे कुछ पूछने से पहले ही तुमने सब कुछ कह दिया। अब मैं जान गया हूँ, तुम बहुत पवित्र और महान हो। मैं खुश हूँ।"
स्मृति रुआँसी हो गई थी। आज पहली बार वह अपनी इच्छा से श्रीदेव की छाती से लिपट गई थी। श्रीदेव कहे जा रहे थे, "स्मृति ! विवाह वेदी तक भी मैं किसी भी परिस्थिति का सामना करने को तैयार था। पर मुझे यह आशा थी कि कोई भी ऐसी दुर्घटना नहीं घटेगी, क्योंकि जब तुम सगाई के लिए राज़ी हो गई तो शादी के लिए मना क्यों करोगी! और तुम तो जानती हो विवाह मंडप में शिशुपाल हो जाना या सगाई के बाद शिशुपाल होना एक ही बात है। और ऐसी-वैसी किसी भी अनहोनी से तुम ने मुझे बचा लिया, मेरा अपमान होने से बचा लिया, इसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।"
अब की बार स्मृति सचमुच ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी थी। श्रीदेव ने उस का सिर सहलाते हुए कहा, "देखो स्मृति, प्रेम की कोई भी परिभाषा देना मेरे जैसे अकिंचन के लिए कठिन है। पर मैंने एक अजीब प्रेम-कहानी सुनी है। ऐसे भी प्रेम-संबंध जुड़ जाते हैं। एक लड़की को कई बार कई लड़के वाले देखने आए। पर वह अपनी योग्यता प्रमाणित करने में हर बार असफल हो जाती। फिर एक बार एक ऐसे लड़केवाले उसके सामने आए, जिस में बड़े-बूढ़ों ने तो लड़की को नापसंद किया पर लड़के ने लड़की पंसद की और उसे मन-ही-मन प्रेम भी करने लगा। लड़की के दिल ने भी इसे महसूस किया। उसने अपने प्रेमी को अनेक पत्र लिखकर उसका हृदय आवेग और आँसुओं से भिगो दिया। हाँ, पर अंत में उनका विवाह न हो सका।"
श्रीदेव ने कुछ रुककर कहा, "सोचो कि मैं कपड़ा खरीदने किसी दुकान पर गया। वहाँ जो कपड़ा मैंने पंसद किया उसे खरीद न सका तो कोई और भी उस कपड़े को पसंद कर नहीं खरीदेगा, यह तो कोई ज़रूरी नहीं। और यदि कपड़ा बोल पाता तो कहता, मेरी शोभा बढ़ाने को वो मेरे साथ रहता, जैसे कि अभी-अभी तुमने मेरी इज़्ज़त बढ़ाई है।" इतना कहकर श्रीदेव दिल खोल कर हँसने लगे।
स्मृति आँसू पोंछ कर कहने लगी, "देव, मैं इतनी उदारता और खुशी बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी।"
श्रीदेव गंभीर हो गए। बोले, "स्मृति, यह उदारता नहीं है। मैंने मन-ही-मन एक ख़्वाब सँजो रखा था कि मेरी बिल्कुल तुम्हारी तरह ही एक प्रेमिका होती। क्योंकि उस बेनामी चिट्ठी को पाने के बाद मैं सोमू के पास गया था।"
स्मृति ने अचानक पूछा, ''चिट्ठी क्या सोमू ने लिखी थी?"
श्रीदेव ने चकित हो कर कहा, "सोमू के संबंध में क्या तुम्हारे विचार इतने छोटे हैं? क्या तुम सचमुच सोच सकती हो कि सोमू इस तरह की चिट्ठी लिख सकते हैं?"
स्मृति का मुँह हल्का-सा म्लान पड़ गया था। थोड़ा रुककर, स्मृति की आँखों में आँखें डालते हुए श्रीदेव बोले, "जानती हो स्मृति ? सोमू ने अपने घर की दीवार पर एक तैलचित्र टाँग रखा है। वह चित्र तुम्हारा है। उस चित्र के नीचे लिखा है 'काश, तुम मेरी माँ बन कर पैदा हुई होती!'"
[ अनुवाद: मंजु महापात्र ]
● समकालीन भारतीय साहित्य के जनवरी-फरवरी 2000 अंक से साभार
साहित्य त्रिवेणी
इस देश की समृद्ध साहित्यिक विरासत की एक छोटी सी झलक ।
#पढ़ें_कहानी स्तंभ में आज एक उड़िया कहानी सादर प्रस्तुत कर रहा हूँ। समकालीन भारतीय साहित्य के एक पुराने अंक में यह कहानी पढ़ते हुए सोच रहा था कि इन भारतीय भाषाओं के कितने अच्छे लेखक और उनकी रचनाएँ अलक्षित रह जाती हैं।
● प्रेमिका
● सदानन्द त्रिपाठी
स्मृति का विवाह संपन्न हो चुका था। सारे वैदिक कर्म समाप्त होने के बाद वह एक छोटे-से कमरे में सिर झुकाए गुमसुम बैठी थी। ससुराल जाने का मुहूर्त नहीं हुआ था। विदाई में अभी थोड़ी देर थी। घर में सभी लोग दुखित थे। आगजनी की घटना होने पर जैसे चारों ओर हो-हल्ला होता है और युद्ध-स्तर पर काम चलता है, ठीक वैसा ही घर का माहौल था। इस शोरोगुल के बीच स्मृति को अपने दुःख और कारुण्य की भावनाओं में भी बिखराव महसूस हो रहा था। उस की भावनाओं में अभी भी सोमू एक उद्वेलित समुद्र का रूप लिए था। वह जानती थी कि अगले किसी भी क्षण उसे डोली में बैठना है, पर वह अभी तक सोमू की स्मृति को अपने मन से पोंछ नहीं पाई थी। वह यह भी जानती थी कि अब सोमू को याद करना उस के लिए अनुचित, अशोभनीय तथा आपत्तिजनक ही सिद्ध होगा।
यह ठीक है कि वह निश्चय कर चुकी है कि वह सोमू को अब याद नहीं करेगी पर वह उस के सिर का कोई सफ़ेद बाल तो है नहीं जिसे वह तुरत उखाड़ फेंके या फिर कोई मूल्यवान गहना भी नहीं है जिसे वह तुरत उतार कर किसी को दान कर दे?
न जाने यह जीवन भी क्या चीज़ है! लगता है प्रलय के बाद भी या पृथ्वी के ध्वंस हो कर राख बन जाने के बाद भी जीवन बचा रहेगा। चारों ओर सुनसान होगा। पेड़-पौधे, नदी-नाले जीव-जंतु कुछ भी नहीं होंगे। चारों ओर रेत ही रेत होगा और बीच में अथाह, असीम जल, जल में जलचर भी नहीं होंगे; लेकिन वहाँ दो पैर रखने की ज़मीन बची होगी तो वहाँ पर भी यह जीवन खड़ा मिलेगा।
स्मृति को बड़ा अजीब लग रहा था कि वह ज़िन्दा कैसे है? हाँ, निर्लज्ज होने पर ज़िन्दा रहा जा सकता है। और फिर उस से ज्यादा निर्लज्ज दूसरा कोई कहाँ होगा? उस ने अपने विवाह की खबर सोमू को दी थी। उस ने सोमू को निमंत्रण दिया था। वह नहीं आया।
सोमू यदि कोई अपरिचित व्यक्ति होता तो कभी-न-कभी उस से मिलने की संभावना रहती। परिचय होता या न होता कभी तो किसी बस में, रेल में, सिनेमा घर के पास, बाज़ार के आसपास, कहीं भीड़ में उस से मुलाकात तो होती। वैसे सिर्फ एक बार ही के लिए भी लोग मिलते हैं, परिचय होता है, बातचीत होती है और एक साधारण संपर्क हो जाता है। कभी-कभी दुबारा मुलाकात हो भी सकती है। संपर्क बने या न बने पर इतने दयनीय और निरुपाय होकर वे टूट नहीं जाते।
पर अब सोमू के साथ मुलाकात की बात तो दूर उस के बारे में सोचना भी पाप होगा।
जब ऐसे अजीबोगरीब भाव स्मृति के मन को मथ रहे थे उसी समय उस के मुहल्ले की एक लड़की नमिता जो स्मृति की सहेली भी थी, उस के पास आई। गोद में उस की डेढ़ साल की लड़की थी जो चीख-चीख कर रोए जा रही थी। नमिता चिढ़ उठी थी, "ओफ्फ ! यह लड़की तो उठने-बैठने भी नहीं देगी।"
नमिता विवाह से पहले एक लड़के से प्रेम करती थी। उन के प्यार के किस्से गली-गली में किसी शराबी की तरह डोल रहे थे। उस का एक दिन विवाह हो गया। उस के चोट खाए प्रेमी ने उस के पति के पास एक बेनामी चिट्ठी भी लिखी थी।
एक बार स्मृति ने नमिता से पूछा था, "तब तो तू बहुत दुखी हुई होगी रे?"
नमिता बोली, "किसी लुहार के घर यदि सूप की ठक-ठक से कबूतर उड़ाने का प्रयत्न किया जाये तो कोई फर्क नहीं पड़ता। वह दिलजला आज भी जो चाहे सो लिखता रहता है, परंतु ये क्या सहज ही विश्वास कर लेंगे? और फिर मेरे पास पुरुष को वश में करने की जड़ी है। और ये मरद लोग? ये सब तो एक-एक धामिन साँप होते हैं, धामिन। फिर ब्याह हो जाने के बाद तो आत्मरक्षा के लिए लगाई जाने वाली इन की दौड़ की गति भी कम हो जाती है। हाँ, करोड़ों में कोई एक आध ही नाग का बच्चा हो तो हो। मेरे पास वशीकरण मंत्र तो है ही। ब्याह के बाद तू ये सब समझ जाएगी, जान जाएगी। सुनी-सुनाई और भोगी हुई बात में कितना फर्क होता है, यह तू केवल सुन कर नहीं समझ सकती।"
स्मृति और सोमू के संबंध के बारे में बहुत कम लोग जानते थे। स्मृति ने इस बारे में कई बार नमिता को बताया था और उस की राय भी माँगी थी। नमिता कहती, "पहले प्रेम करना फिर शादी करना ठीक नहीं है। उस से असली आनंद का पता नहीं चल पाता है। इतना बढ़िया जीवन निष्फल चला जाता है। एक प्रेमी और पति में बहुत अंतर होता है। जैसे असली मंत्री और अख़बार के मंत्री में। अखबार के मंत्री लोग कितने अच्छे होते है, है न?"
नमिता की बेटी ने रोना बंद नहीं किया था। नमिता बाहर जा कर अपनी बेटी को किसी को दे आई। उस ने स्मृति के पास आ कर धीरे से कहा, "मैं ने सुना है, तेरे होने वाले पति को सोमू के बारे में कुछ-कुछ पता है?"
स्मृति अचानक चौक पड़ी थी पर सिहरन की रेखाओं को अपने चेहरे पर प्रकट नहीं होने दिया। वह सारी बातें नमिता के सामने नहीं उघारती थी। वह जानती थी कि नमिता अपने विशाल हृदय में यह सब पचा नहीं पाएगी। उस ने नमिता की आँखों में आँखें डालते हुए कहा, "मैं ने तो सोच लिया है, उसे सब कह दूँगी।'
स्मृति जानती थी - उसका यह विचार नमिता को पसंद नहीं आएगा। दोनों ने ही अतीत में किसी एक से प्रेम किया था और दूसरे से विवाह। फिर भी दोनों में जो अंतर था, वह स्मृति जानती थी।
नमिता बोली, "क्या फालतू बात करती है? पागल हो गई है क्या? क्या कोई लड़की ऐसा कहती है? जिस से प्यार किया उस से तो शादी हो नहीं पाई और जिस से शादी की उसे थोड़ा प्यार देने में परेशानी क्या है? जिस से प्यार किया उस से शादी नहीं हो पाई तो चल जाएगा पर जिस से शादी की है वह तो प्यार चाहेगा। तुम्हारे प्यार पर उस का अधिकार है।" स्मृति उस से तर्क नहीं करना चाहती थी। वह बोली, "मैं उन्हें प्यार नहीं करूँगी, ऐसा तो मैं ने नहीं कहा।"
"और नहीं तो क्या कह रही है?" नमिता ज़ोर से बोली। एक लंबी साँस ले कर उस ने फिर धीरे-से कहा, "तू उसे सोमू की बात बता देगी तो तू सोचती है कि वह तेरी बात पर विश्वास कर लेगा कि तू उसे दिल से सच्चा प्यार करेगी? अरे बुद्ध, पति के साथ एकदम सफेद झूठ बोलना चाहिए। मैंने अनुभव किया है, तभी बता रही हूँ। यदि वो सोमू के बारे में पूछे भी तो तुझे बोलना होगा कि तू केवल इस नाम के व्यक्ति को पहचानती है। बस उस से आगे कुछ पूछे तो हँसी में उड़ा देना। कहना, घर की दुश्मनी के कारण ही लोगों ने बदनाम करने के लिए ये बातें उड़ाई है। यदि और ज़्यादा पूछताछ करे तो बस रोने लगना। और तुझे तो रोने के लिए ही कॉलेज में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला था।"
स्मृति चुप थी। नमिता ने अपने अनुभव के आधार पर कुछ गूढ़ बातें बताई, "शादी के बाद का जीवन छलनापूर्ण जीवन होता है। शादी के बाद एक इंसान दो इंसानों में बँट जाता है। एक अंदर वाला और एक बाहर वाला। और विवाह के बाद यदि नारी सुखी रहना चाहती है तो उसे हर परिस्थिति में मुस्कराना होगा। पति चाहे पूरी तरह पत्नी का न हो पर पत्नी को बराबर यह प्रमाणित करना पड़ता है कि वह एड़ी से ले कर चोटी तक पूरी अपने पति की है, चाहे वह झूठ ही क्यों न हो।"
नमिता की बातों से स्मृति को लगा कि उसे भी शायद यह छलनापूर्ण जीवन ही जीना होगा। अपने लिए न सही पर उस के लिए जिस का हाथ थाम कर वह चारों ओर गुरुजनों के आशीर्वादों, शुभेच्छाओं के बीच विवाह की वेदी पर बैठी थी। उस के जीवन की शांति के लिए उसे प्रमाणित करना होगा; हो सकता है उसे कहना पड़े कि वह ही उस के जीवन में आया पहला पुरुष है, उस का उस के तन पर ही नहीं, मन पर भी पूरा अधिकार है, चाहे उस के मन के कण-कण पर लिखा हो- सोमू.... सोमू... सोमू...। इसलिए सोमू को भूल जाना ही उस का सबसे पहला काम है। सोमू से प्यार होने के बाद ऐसे कई दिन बीते थे जब वह उसे याद भी नहीं आया था, पर जिस दिन से उस का विवाह तय हो गया उस दिन से ऐसा कोई पल न था जब सोमू उस की स्मृति में कौधा न हो, उसकी हर धड़कन के साथ धड़का न हो।
सुहागरात के दिन ही, उस ने सोचा था, श्रीदेव को सोमू की सारी बात बता देगी। पर शुरू से ही उस के मस्तिष्क में चोट करने से न जाने कितना विस्फोट होगा या श्रीदेव न जाने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे, यह सोच-सोच कर वह चुप रह जाती थी। पर एक तरफ़ ऐसा विचार और दूसरी तरफ न कह पाने के अपराधबोध की भावना उसे खाए जा रही थी। और अंत में उस ने निर्णय किया कि वह श्रीदेव के वैवाहिक जीवन की आरंभिक रंगीन कल्पनाओं को शापग्रस्त नहीं करेगी। उस ने निर्णय किया कि अपने विषाद की महाजनी में वह अपने पति को साझेदार नहीं बनाएगी। यह अनुचित होगा। तभी उस ने देखा कि मूँगफली के छिलके -सी ललाई श्रीदेव की आँखों में छाए जा रही है। वह पसीना-पसीना हो गई। एक अनजान भय ने उसे घेर लिया था। उसे सब अतार्किक और अरुचिकर लग रहा था।
उसे फिर एक बार महसूस हुआ कि पंखा चल रहा है। पश्चिम वाली दीवार पर श्री जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा का फ्रेमजड़ा फोटो टॅगा है। उसे जीवन का तिक्त विलाप सुनाई दे रहा था। उसे लगा जैसे शरीर के अंदर कहीं कुछ टूट गया है, कई युगों से बना प्रस्तर-प्रासाद धसक गया है। और इस नये कारुणिक अनुभव ने उसकी चेतना को सचेतनता के लबादे से ढँक दिया था।
विषदंतों के टूटने की तरह एक निर्लज्ज हँसी श्रीदेव के होंठों पर खेल रही थी। पंखा चल रहा था। स्मृति सोचने लगी, यही उचित समय है जब वह अपने और सोमू के विषय में श्रीदेव को बता कर उस से क्षमायाचना कर लेगी। काले घूमते हुए सीलिंग फैन की ओर टकटकी लगाए उस ने साहस सँजोया और करवट बदली, पर उस ने देखा कि श्रीदेव एक परितृप्त स्वार्थपरता की गहरी निद्रा में डूब चुके हैं।
रोज स्मृति निश्चय करती कि आज ज़रूर वह श्रीदेव से सब कुछ कह देगी पर शयन कक्ष में जाते ही रोज़ वह एक एक्वेरियम की मछली बन कर रह जाती थी। उस की बात अनकही रह जाती थी।
धीरे-धीरे श्रीदेव की छुट्टियाँ समाप्त हुई जा रही थीं। इस बीच वे कई बार कह चुके थे कि अपनी नौकरी की जगह पर जाने के बाद अब उन्हें वहाँ बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। बहुत तकलीफ़ होगी। वैसे तो वे स्मृति को अपने साथ ले जाते पर अभी-अभी तो ब्याह हुआ है। लोग क्या कहेंगे? जब तक घर का कोई सदस्य स्मृति को ले जाने को नहीं कहता तब तक खुद लपक कर कहना अच्छा नहीं लगता। और फिर कंपनी ने उसे जो रहने की जगह दी है, वह एक हॉस्टल की तरह है। वहाँ और भी अनेक अविवाहित लोग रहते हैं। वैसे तो वहाँ कुछ शादीशुदा लोग भी रहते हैं पर वहाँ एकांत परिवेश का घोर अभाव है। किसी एक की पत्नी को अनेक की भाभी हो कर रहना पड़ता है। श्रीदेव ने तो स्मृति को यहाँ तक कह दिया था कि पत्नी मिलनसार हो तो दोस्तों का आना-जाना बना ही रहता है और पति महोदय की जेब पर भी उस का असर होता है। फिर भी वे स्मृति को अपने साथ ले जाना चाहते थे, नहीं तो उन का सारा समय अन्यमनस्कता में ही बीतेगा। क्या पता समय बीतेगा भी या नहीं! इस के अलावा खाने-पीने में भी परेशानी होगी।
स्मृति ने भी सुना था कि विवाह होते ही बाहर नौकरी करने वाले युवकों को अचानक ही खाने-पीने की परेशानियाँ सामने आने लगती हैं और वे लोग कुछ ही दिनों में दुबले-पतले भी हो जाते हैं। श्रीदेव को भी ऐसी ही परेशानियों का सामना करना पड़ेगा, यह सुन कर उसे हँसी आ गई थी। वह कुछ शरमा भी गई थी। उस ने अपना शर्म से झुका चेहरा उठा कर और हँसी दबा कर धीरे-से श्रीदेव से पूछा, "क्यों जी, इतने दिन तो तुम अकेले ही रहते थे न, फिर भोजन-पानी तुम्हारा कैसे चलता था?" उस की बात और उस की नज़रों के भाव को पढ़ कर श्रीदेव ने प्रेमपूर्ण पराजय स्वीकार करते हुए अभिनयपूर्ण मान दिखाते हुए उस की ओर तकिया फेंका।
श्रीदेव वास्तव में एक अच्छे व्यक्ति थे। वे स्मृति को बहुत चाहते थे। स्मृति हमेशा द्वंद्व और मानसिक संघर्ष से जूझती रहती थी। इतने हँसमुख, खुशदिल इंसान के सामने सोमू की बात बताना क्या ठीक होगा। पर नमिता तो कहती थी कि श्रीदेव सोमू के विषय में कुछ-कुछ जानते हैं।
कल श्रीदेव अपनी नौकरी के स्थान पर चले जाएँगे। रात को स्मृति ने कहा, "सोमू मेरा दूर का रिश्तेदार है। मेरा और उस का दिल का रिश्ता था।"
श्रीदेव ने धीरे से मुस्करा कर कहा, "वो मैं जानता हूँ।"
स्मृति को अचानक ऐसा लगा जैसे पास ही कहीं तोप का भयंकर विस्फोट हुआ हो। कुछ समय के लिए उस के कान सुन्न पड़ गए। अगले ही क्षण उस ने स्वयं को सँभाल लिया था। वह खुद को समझा रही थी : इस में इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है? नमिता भी तो कह रही थी कि वे सोमू के बारे में कुछ-कुछ जानते है। उस ने एक गहरी साँस ली और बोली, "सच?"
"हाँ, " श्रीदेव ने कहा। उन्होंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, "बल्कि मैं तो यह सोच रहा था कि तुम्हारी जैसी निष्कपट लड़की ने आज तक मुझ से इस बारे में कुछ क्यों नहीं कहा। हाँ, यदि तुम न कहती तो मैं पूछता भी नहीं। ठीक है, फिर भी मैं ने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ। तुम ने मेरा बोझ हल्का कर दिया स्मृति!"
स्मृति की आँखों में आँसू भर आए थे। कमरे की नीली मद्धिम रोशनी में अपने आँसू छिपा जाने में उसे ज़्यादा कठिनाई न हुई थी। उस ने पूछा, "सब कुछ जानने के बाद भी तुम्हें मुझ पर कभी गुस्सा नहीं आया?"
"आया। कभी-कभी आता था। पर सारी बात न जान कर गुस्सा करने से मेरी भी तो क्षति होती।"
"तुम तो बोले कि तुम सब जानते हो?"
"सब जानता हूँ, ऐसा मैं ने कब कहाँ? मैं तो जितना जानता था, वह न जानने जैसा ही था। तुम्हारे साथ मेरी सगाई हो जाने के बाद मुझे एक बेनामी चिट्ठी मिली थी।"
"बेनामी चिट्ठी!" स्मृति धीरे से बुदबुदाई।
"हाँ। किसी ने लिखी थी। यही सब आलतू-फालतू बातें, हाँ, उस ने यह लिखा था कि इस चिट्ठी के पाने के बाद भी यदि मेरा विवाह तुम से हो जाए तो यह चिट्ठी न दिखाई जाए क्योंकि तुम उन अक्षरों को पहचान जाओगी।"
"तुम ने वो चिट्ठी कहाँ रखी है?" स्मृति ने अत्यंत उद्वेग से पूछा।
"रखी नहीं। मैं ने फाड़ दी।"
स्मृति अंदर-ही-अंदर मथी जा रही थी। उसे लग रहा था जैसे हज़ार हज़ार लोगों के पैरों तले वह रौदी जा रही हो। उसे साँसे लेना भी दूभर हो रहा था। कुछ समय चुप रह कर बड़े ही दयनीय स्वर में उस ने पूछा, "चिट्ठी मुझे दिखाने से पहले ही फाड़ दी?"
श्रीदेव ने उस के स्वर में छिपे मान-भाव को पहचान लिया। बोले, "हाँ। चिट्ठी पाकर पढ़ने के तुरंत बाद ही मैं ने उसे फाड़ दिया था, क्योंकि बेकार की चिन्ता करना मुझे अच्छा नहीं लगता। और फिर हो सकता था इस से हमारी सगाई टूट जाती। पर मैं तुम से शादी करना चाहता था।"
"चिट्ठी पाने के बाद भी ?"
"चिट्ठी लिखने वाले को तो जानता नहीं था। उस का उद्देश्य भी मुझे नहीं पता था। उस की बात झूठी भी हो सकती थी। हाँ, यदि मैं तुम से सोमू के बारे में पूछता तो हो सकता था कि तुम कहती, 'मैं इस नाम के किसी व्यक्ति को नहीं जानती।' उस चिट्ठी में यह भी लिखा था कि कभी यदि मैं तुम से सोमू के बारे में पूहूँगा तो तुम यह भी उत्तर दे सकती हो कि इस नाम के व्यक्ति को मैं बस पहचानती हूँ जैसे कि जाने-अनजाने अनेक लोग पहचान के होते हैं।
पर मेरे कुछ पूछने से पहले ही तुम ने सब कुछ कह दिया। अब मैं जान गया हूँ, तुम बहुत पवित्र और महान हो। मैं खुश हूँ।"
स्मृति रुआँसी हो गई थी। आज पहली बार वह अपनी इच्छा से श्रीदेव की छाती से लिपट गई थी। श्रीदेव कहे जा रहे थे, "स्मृति ! विवाह वेदी तक भी मैं किसी भी परिस्थिति का सामना करने को तैयार था। पर मुझे यह आशा थी कि कोई भी ऐसी दुर्घटना नहीं घटेगी, क्योंकि जब तुम सगाई के लिए राज़ी हो गई तो शादी के लिए मना क्यों करोगी! और तुम तो जानती हो विवाह मंडप में शिशुपाल हो जाना या सगाई के बाद शिशुपाल होना एक ही बात है। और ऐसी-वैसी किसी भी अनहोनी से तुम ने मुझे बचा लिया, मेरा अपमान होने से बचा लिया, इस के लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।"
अब की बार स्मृति सचमुच ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी थी। श्रीदेव ने उस का सिर सहलाते हुए कहा, "देखो स्मृति, प्रेम की कोई भी परिभाषा देना मेरे जैसे अकिंचन के लिए कठिन है। पर मैंने एक अजीब प्रेम-कहानी सुनी है। ऐसे भी प्रेम-संबंध जुड़ जाते हैं। एक लड़की को कई बार कई लड़के वाले देखने आए। पर वह अपनी योग्यता प्रमाणित करने में हर बार असफल हो जाती। फिर एक बार एक ऐसे लड़केवाले उस के सामने आए, जिस में बड़े-बूढ़ों ने तो लड़की को नापसंद किया पर लड़के ने लड़की पंसद की और उसे मन-ही-मन प्रेम भी करने लगा। लड़की के दिल ने भी इसे महसूस किया। उस ने अपने प्रेमी को अनेक पत्र लिख कर उस का हृदय आवेग और आँसुओं से भिगो दिया। हाँ, पर अंत में उन का विवाह न हो सका।"
श्रीदेव ने कुछ रुक कर कहा, "सोचो कि मैं कपड़ा खरीदने किसी दुकान पर गया। वहाँ जो कपड़ा मैं ने पंसद किया उसे खरीद न सका तो कोई और भी उस कपड़े को पसंद कर नहीं खरीदेगा, यह तो कोई ज़रूरी नहीं। और यदि कपड़ा बोल पाता तो कहता, मेरी शोभा बढ़ाने को वो मेरे साथ रहता, जैसे कि अभी-अभी तुमने मेरी इज़्ज़त बढ़ाई है।" इतना कह कर श्रीदेव दिल खोल कर हँसने लगे।
स्मृति आँसू पोंछ कर कहने लगी, "देव, मैं इतनी उदारता और खुशी बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी।"
श्रीदेव गंभीर हो गए। बोले, "स्मृति, यह उदारता नहीं है। मैंने मन-ही-मन एक ख़्वाब सँजो रखा था कि मेरी बिल्कुल तुम्हारी तरह ही एक प्रेमिका होती। क्योंकि उस बेनामी चिट्ठी को पाने के बाद मैं सोमू के पास गया था।"
स्मृति ने अचानक पूछा, ''चिट्ठी क्या सोमू ने लिखी थी?"
श्रीदेव ने चकित हो कर कहा, "सोमू के संबंध में क्या तुम्हारे विचार इतने छोटे हैं? क्या तुम सचमुच सोच सकती हो कि सोमू इस तरह की चिट्ठी लिख सकते हैं?"
स्मृति का मुँह हल्का-सा म्लान पड़ गया था। थोड़ा रुक कर, स्मृति की आँखों में आँखें डालते हुए श्रीदेव बोले, "जानती हो स्मृति ? सोमू ने अपने घर की दीवार पर एक तैलचित्र टाँग रखा है। वह चित्र तुम्हारा है। उस चित्र के नीचे लिखा है 'काश, तुम मेरी माँ बन कर पैदा हुई होती!'"
[ अनुवाद: मंजु महापात्र ]
● समकालीन भारतीय साहित्य के जनवरी-फरवरी 2000 अंक से साभार
27/09/2023
धर्मपाल महेंद्र जैन मौजूदा समय के प्रखर व्यंग्य लेखकों में एक हैं। व्यंग्य के परिदृश्य पर उनकी विनम्र, सतत सक्रिय उपस्थिति इस विधा के लिए आश्वस्तिकारक है। किताबगंज प्रकाशन से उनका ताज़ा व्यंग्य संचयन छपकर मेरे पास पहुँचा तो 'गणतंत्र के तोते' देखते ही मुम्बई के तोते उड़ गए। इधर मैं किताब में रमा हूँ, उधर सारे तोते महात्मा गाँधी भवन से सौ क़दम आगे बढ़कर अरब महासागर के किनारे 'क्वीन्स नेकलेस' की रौनक का लुत्फ़ उठा रहे हैं।
मज़बूत बाइंडिंग, उम्दा काग़ज़ और बढ़िया छपाई के लिए किताबगंज प्रकाशन के हमारे चेयरमैन साहब प्रमोद सागर जी को धन्यवाद पहुँचे🙏
तो हाज़रीन! यह किताब मुझे फ़ुरसत दे और मैं तोतों की तलाश में समन्दर तक जाऊँ, तब तक आप अपने तोतों को उड़ने से बचाते हुए इस संग्रह के शीर्षक व्यंग्य का एक हिस्सा ख़ुशी-ख़ुशी पढ़ जाइये➡️
मैंने मालिक से पूछा- आप जुगनू क्यों पकड़ते हैं?
-'ये हवा में तैरते हैं। इनके तैरने से हमें आपत्ति नहीं है, पर ये अंधेरे में लावारिस चमकते हैं। अरे, चमकना है तो हमारा अँगना है। हमारी अपारदर्शी विचारधारा की पारदर्शी बोतलें हैं। हमारी चखो, और अपनी रौशनी की निष्ठा हमें दे दो।' यह कहते हुए मालिक की आँखें हीरे जैसी चमक रही थीं।
-पर सवेरे तक तो ये मर जाते हैं।
'नहीं, सब नहीं मरते। कई जुगनू जिंदा रहने के लिए तोते बन जाते हैं।' मालिक ने रौबदार आवाज में कहा।
आप जुगनू को ... तोता बना देते हैं। मैंने विस्मय से पूछा।
-अरे आप हकलाते क्यों हैं! हमारी पार्टी में कोई नहीं हकलाता। डंके की चोट बोलता है और डंके की चोट ठोकता है। आप हमारे तोते ही देख लीजिए। कितने समझदार और आज्ञाकारी हैं। उन्होंने जोर से आवाज लगाई, ऐ घमंडवा, दो ठो तोते ला ।
दो सोने के पिंजरे आ गए। पिंजरे चमकदार थे। मालिक ने बताया सत्ता के पिंजरे बहुत कम लोगों के पास थे। वे केवल सौभाग्यशालियों को 'अलॉट' किये जाते थे। मैं देखता रहा, पिंजरे में दाने थे, पानी था, झूले थे जिस पर तोते मस्ती में बैठे थे। भीतर से उन्हें राजमहल की अनुभूति हो रही थी। गर्वोन्नत तोते अपने ठाठ देख रहे थे, पिंजरों की सलाखें उन्हें चिंतित नहीं कर रही थीं। तोतों का गुण है मिट्ठू-मिट्ठू सुनना और मालिक जो कहे दोहराना। मालिक ने तोतों से कहा-मिठू बेटे बोल, असली आजादी। - असली आजादी, असली आजादी, असली आजादी ।
पूरे आँगन में असली आजादी का ऐसा स्वर गूँजा कि घर में बंद सारे तोते एक स्वर में असली आजादी चिल्लाने लगे। मोहल्ले से नगर में गूँजा असली आजादी का शोर सारे देश में गुंजायमान हो गया। तोतों के बोलने से असली आजादी आ रही थी।
मालिक नए और मौलिक संवाद लिख रहे थे कि हमें असली आजादी नया पिंजरापोल बनाने के बाद मिली। मालिक के लिखे संवाद बोलते-बोलते तोते यकायक चिंतक होने का ढोंग करने लगे। तोते गांधी को कायर कह कर नया इतिहास लिखने को आतुर थे। भ्रम फैलाने के लिए भीख में सम्मान पा कर वे जय-जयकार कर रहे थे, अर्थहीन पैरोडी गा रहे थे–
दे दी हमें आजादी ले कर कटोरा थाल,
एक साबरमती के संत ने किया देश बेहाल।
तोतों के करतब पर मालिक ताली बजाते हँस रहे थे। मैंने मालिक से पूछा- आपके लिए आजादी का क्या मतलब है? वे फैल कर बोले- हमें तो केवल अपनी पॉवर के हिसाब से जैसा चाहें उल्टा-सीधा कहने और कराने की आजादी मिली है। पर, बदले में आम जनता को कितनी सारी आजादी मिली है। खामोश रहने के लिए सम्मान निधि पाने की आजादी, गुपचुप कृपा से बैंकों से कर्जा ले कर ऋण माफी पाने की आजादी, श्रम और परिश्रम के बदले बेरोजगार रह कर भत्ता पाने की आजादी, विधर्मी मिल जाए तो उसे जिंदा जला देने की आजादी, मुफ्त में अनाज, कपड़ा और शराब पाने की आजादी, मालिक की शक्ति के प्रदर्शन के लिए भारत को बंद करने की आजादी ।
◆किताब: गणतंत्र के तोते
◆लेखक: धर्मपाल महेंद्र जैन
◆प्रकाशक: किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी, राजस्थान
◆ पृष्ठ: 160
◆ मूल्य: ₹ 250/-
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