22/03/2021
22 #मार्च_विश्व_जल दिवस के रूप मे मनाया जाता है।
#रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
#पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥
जीवधारियों के जीव में वायु के बाद दूसरा स्थान जल का है। आज भारतवर्ष में शुद्ध जल बहुत कम लोगों को उपलब्ध है। हमारे शहरों तक में जल की शुद्धता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता और हम अकसर पीने के पानी में कीड़े आदि तक मिलने की सूचनाओं से रू-ब-रू होते हैं। गाँवों आदि में भी प्रदुषित जल का सेवन किया जाता है। आज प्रदूषण के कारण हर नदी जिसमे गंगा, यमुना का भी समावेश है ,पीने योग्य नही बचा है। भूमिगत जल में भी विभिन्न अशुद्धियों, जैसे आर्गेनिक आदि की मात्रा बढ़ती जा रही है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। सामान्य जन जल के विशेष गुणों से परिचित नहीं हैं। अत: जल; जिसके बिना जीवन की कोई भी क्रिया संपादित नहीं हो सकती; उसकी सब तक उपलब्धता एवं शुद्धता पर ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि अस्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ राष्ट्र की कल्पना करना कठिन है।
मनुष्य के शरीर में पानी की अत्याधिक उपयोगिता है। पुरुष के शरीर का 60 प्रतिशत भाग एवं स्त्री के शरीर का 55 प्रतिशत भाग पानी होता है। एक 70 किलोग्राम के पुरुष में लगभग 40 लीटर पानी होता है, जिसमें 28 लीटर अंतरकोषीय एवं 12 लीटर बाह्यकोषीय पानी होता है। बाह्यकोषीय पानी में 2-3 लीटर पानी प्लाज़मा में होता है। हमारे नाख़ून, बाल और शरीर के कठोर भाग दाँत की बाह्य परत तक में पानी होता है।
प्राचीन यूनान के आयोनियन शहर के निवासी, उस समय के दार्शनिक एवं वैज्ञानिक मिलेटस के थेलीज़ (636-546 ई.पू.) ने कहा था- “यह पानी ही है, जो विचित्र रूपों में धरती, आकाश, नदियों, पर्वत, देवता और मनुष्य, पशु और पक्षी, घास-पात, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से लेकर कीड़े-मकोड़ों तक में मौज़ूद है। इसलिए पानी पर चिंतन करो।”
वास्तव में पानी सब जगह है। समुद्र में पाए जाने वाले जीवों के कुल भार का 95-97 प्रतिशत का पानी है। पृथ्वी की सतह पर पानी समुद्र, नदियों, झीलों से लेकर बर्फ़ से ढँके क्षेत्रों के रूप में मौज़ूद है। पानी के सबसे बड़े स्रोत, समुद्र में धरती का 97.33 प्रतिशत पानी पाया जाता है। भार के अनुसार समुद्र के जल में 3.5 प्रतिशत लवण, खनिज होते हैं जो उसे खारा बनाते हैं। इसलिए समुद्र का पानी पीने योग्य नहीं होता। धरती के कुल पानी का 2.7 प्रतिशत से भी कम हिस्सा सादा जल है, जो हमारे उपयोग का है। सादे जल का अधिकतर हिस्सा ध्रुवीय प्रदेश में बर्फ़ के रूप में जमा हुआ है। दक्षिणी ध्रुव में पानी की मात्रा सबसे ज़्यादा है, जो कि लगभग एक करोड़ पचास लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में है। यदि ध्रुवों एवं हिमनदियों पर जमी सारी बर्फ़ पिघल जाए तो समुद्र का जलस्तर 60 मीटर बढ़ जाएगा। समुद्र में 13 करोड़ 50 लाख घन किलोमीटर पानी मौज़ूद है। आख़िरकार हमारी धरती का 70.8 प्रतिशत भाग पानी ही से तो घिरा है।
धरती पर पानी, लवण जल एवं सादा जल के रूप में उपलब्ध है। लवण जल महानगर के रूप में 93.33 प्रतिशत खारे पानी एवं अंतस्थलीय सागर के रूप में 0.008 प्रतिशत, 97.34 प्रतिशत, सादा जल (ध्रुवीय बर्फ एवं हिमनद 2.04 प्रतिशत), भूमिगत जल 0.61 प्रतिशत, झीलें 0.009 प्रतिशत, मृदा आर्द्रता 0.005 वातावरणीय जलवाष्प 0.001 प्रतिशत) 2.66 प्रतिशत है।
आयुर्वेद के अनुसार पीने योग्य जल वो है जो निर्गन्ध, अवयक्तरस, तृष्णाधन, शचि, शीतल, अचछ (स्वच्छ), लघु (हल्का) हो। स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, मणिमय या मिट्टी के बर्तन में रखे हुए और पुष्पों से सुशोभित सुगंधित जल को ही पीना चाहिए। दूषित एवं प्रसाधित जल को जो पीता है, वह शोप, पाण्डुरोग, वगरोगअजीर्ण, श्वास, कास, प्रतिब्याय, शूल, गुल्म, उदर रोग तथा अनेक प्रकार के विषम रोगों से शीघ्र ही ग्रस्त होता है। अत: जल औषधि की तरह होता है।
जल को शुद्ध करने की तीन अन्य विधियाँ भी प्रचलित हैं। भौतिक क्रियाओं द्वारा जिसमें पानी का उबालना एवं आस्रवण है, रासायनिक क्रियाओं द्वारा जिसमें चूना, फिटकरी, निर्मली आदि को पानी में डालते हैं। इसमें पानी की अशुद्धता नीचे बैठ जाती है एवं स्वच्छ जल ऊपर से निथार लिया जाता है। इसी में दूसरी विधि के अनुसार पोटेशियम परमैगनेट, कॉपर सल्फेट, आयोडिन, ओज़ोन और अल्ट्रावॉयलेट किरणों का प्रयोग होता है। यांत्रिक विधि द्वारा जिसमें जल छन-छन कर आता है और जल की अशुद्धियाँ बालू आदि में ही रह जाती हैं।
महर्षि सुश्रुत के अनुसार पानी को उबालकर पीना सबसे उत्तम है।
जल प्रकृति की अनमोल एवं अलौकिक देन है जो मानव तथा अन्य जीव-जंतुओं, वनस्पतियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। हमें ये समझना चाहिए कि प्रत्येक को शुद्ध जल प्राप्त हो...
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