15/11/2025
धर्म - संस्कृति के लिए
अविरत संघर्षरत योद्धा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बिरसा मुंडा यह एक ऐसा नाम था, जिसने मात्र 25 वर्ष की आयु में अपनी अद्भुत संगठन कुशलता एवं धर्म-संस्कृति के प्रति समर्पण भाव के आधार पर संपूर्ण जनजाति समाज में नई चेतना का संचार किया था। 15 नवंबर 1875 को झारखंड के उलिहातु में जन्मे बिरसा मुंडा नाम के बालक ने गरीबी, भुखमरी, अज्ञानता, अंधश्रद्धा के घोर अन्धकार में डूबे हुए अपने मुंडा - उरांव समाज को न केवल इस दलदल से बाहर निकाला बल्कि अपनी सनातन परंपरा को बिरसायत नाम से एक अलग रूप देकर आध्यात्मिक आधार पर अपनी प्राचीन विरासत से समाज को अवगत कराया।
बिरसाइयत नाम से उन्होंने एक अध्यात्मिक आंदोलन की शुरुआत की। मुंडा - उरांव और अन्य कई समाज के हजारों लोग इस आंदोलन में शामिल होने लगे। शराब मत पिओ, चोरी मत करो, गौ हत्या मत करो, पवित्र यज्ञोपवीत पहनो, तुलसी का पौधा लगाओ, ईसाइयों से ब्याह मत करो ऐसी छोटी-छोटी बातों से लोगों में एक आध्यात्मिक चेतना जागृत होने लगी। बिरसायत केवल धार्मिक पहचान नहीं थी, तो वह एक माध्यम था, दबे हुए और कुचले गए इसी भूमि के पुत्ररूप समाज को संगठित करने का, जो न केवल आक्रमणकारी अंग्रेजों के दमनकारी नीतियों का शिकार हुए थे, साथ - साथ ब्रिटिश सरकार के प्रमुख अंग के रूप में जनजाति क्षेत्र में कार्यरत ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरन के जाल में भी वह बुरी तरह से फंस गए थे। ' साहब - साहब एक टोपी' इस सत्य को बिरसा मुंडा ने वैसे काफी कम आयु में समझा था। अपनी सनातन परंपरा के प्रतीक शिखा तोड़ने, जबरन गोमांस खिलाने की जब बात आयी और और अपने मुंडा समाज को ठग, बेईमान कहने तक का ईसाइयों का साहस बना तब बिरसा मुंडा का स्वाभिमान जाग उठा और चाइबासा के पादरी को खरी खरी सुनाकर उन्होंने ईसाई स्कूल और ईसाई धर्म हमेशा के लिए त्याग दिया।
सामाजिक सुधार, आध्यात्मिक चेतना का जागरण, अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त कराना, ईसाइयों की गतिविधियों से समाज का संरक्षण, अपनी धर्म - संस्कृति की रक्षा, जड़ी बूटियों के माध्यम से प्राचीन ज्ञान परंपरा का संरक्षण ऐसे अनेक मोर्चों पर बिरसा मुंडा आयु के अंतिम क्षण तक लड़ते रहे। जिसके कारण जनजाति समाज की दृष्टि से वह भगवान बने। इतनी कम आयु में लाखों लोगोंके मन में भगवान का स्थान प्राप्त करना कोई आसान बात नहीं होती। लेकिन बिरसा ने यह साध्य करके दिखाया।
140 करोड़ के अपने देश में लगभग 12 करोड़ से अधिक जनजाति समाज है। प्राचीन भारतीय मूल्यों के संरक्षक इस समाज के अनेक महानायकों ने जिस प्रतिकूल परिस्थिति में अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए संघर्ष किया वह अपने आप में एक अद्भुत उदाहरण है। तिलका मांझी से लेकर रानी गाईदिनल्यू तक सैकड़ो जनजाति क्रांतिकारियों ने देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सुदूर वनों पर्वतों में अंग्रेजों से संघर्ष किया। भगवान बिरसा मुंडा को इसी सनातनी जनजाति परंपरा के महानायक के रूप में देखा जाता है।
यह वर्ष भगवान बिरसा मुंडा के जन्म जयंती का 150 वा वर्ष है। भारत सरकार ने भी 15 नवंबर यह भगवान बिरसा मुंडा का जन्म जयंती दिवस जनजाति गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। बिरसा मुंडा का प्रेरणादायी जीवन केवल जनजाति समाज के लिए ही नहीं तो संपूर्ण देश के लिए गौरव का विषय है। जनजाति समाज की पहचान को लेकर जनजाति युवाओं में आज विभिन्न भ्रांतियां खड़ी की जा रही है। प्राचीन सनातन परंपरा का अभिन्न घटक होते हुए भी युवाओं में अलगता का भाव निर्माण करने के प्रयास हो रहे है। धर्म - संस्कृति की गौरवमयी नींव पर बना बिरसा मुंडा का तपस्वी जीवनचरित्र इन गलत भ्रांतियों को तोड़ने में सक्षम है। जनजाति समाज के बारे में शेष समाज में बनी नकारात्मक प्रतिमा तोड़कर कृतज्ञता के भाव से जनजाति समाज की ओर देखने का सामर्थ्य बिरसा के जीवन में है।
अपने साहस, शौर्य के आधार पर संपूर्ण देश का गौरव बने भगवान बिरसा मुंडा को उनकी 150वी जन्म जयंती वर्ष पर शत शत वंदन।
