Dr. Yashpal Yadav

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Dr. Yashpal Yadav IAS 2011, Ph.D

आराम का असली अहसास दर्द के बाद ही होता है। जब तक कष्ट नहीं होता, सुकून बस एक सामान्य अवस्था लगती है; दर्द के बाद वही अवस...
08/10/2026

आराम का असली अहसास दर्द के बाद ही होता है। जब तक कष्ट नहीं होता, सुकून बस एक सामान्य अवस्था लगती है; दर्द के बाद वही अवस्था राहत बन जाती है।
यह बात मनोविज्ञान और अनुभव दोनों में सच है। मन चीज़ों को निरपेक्ष नहीं, अंतर से नापता है। जो हमेशा से सहज है, वह ध्यान में नहीं आता। जब दर्द, थकान, बेचैनी या तनाव आता है और फिर हटता है, तब शरीर और मन दोनों उस अंतर को तेज़ी से पकड़ते हैं। बुखार उतरने के बाद की नींद, लंबी बीमारी के बाद की पहली आसान साँस, भारी काम के बाद की ख़ामोशी — ये आराम इसलिए गहरा लगता है क्योंकि उससे ठीक पहले उसका अभाव था।
दर्शन में भी यही सूत्र बार-बार आता है। बुद्ध ने दुख को जीवन की मूल स्थिति माना, और शांति को उसके पार जाने की अवस्था। गीता में भी सुख-दुख को आने-जाने वाली लहरें कहा गया है; जो व्यक्ति दोनों को समान देखना सीखता है, वही स्थिर रहता है। स्टोइक विचार भी यही कहता है कि कठिनाई सहने के बाद ही व्यक्ति जान पाता है कि मानसिक शांति क्या चीज़ है। दर्द यहाँ सज़ा नहीं, पैमाना है।
रोजमर्रा में यह कई रूपों में दिखता है। प्यास लगने के बाद पानी का पहला घूँट, रात भर जागने के बाद की नींद, किसी रिश्ते में टूटन के बाद मिली समझ — सबमें आराम दर्द की स्मृति से तीखा हो जाता है। गाँव की ज़िंदगी में यह और साफ़ है: दिन भर खेत या धूप में रहने के बाद पेड़ की छाया या तालाब का पानी सिर्फ़ ठंडक नहीं, पूरे दिन का इनाम लगता है।
एक सीमा भी है। हर आराम के लिए दर्द ज़रूरी नहीं। जो व्यक्ति सजग है, वह बिना बड़े कष्ट के भी साँस, स्वास्थ्य और साधारण दिन की क़ीमत पहचान सकता है। फिर भी यह वाक्य उस अनुभव को ठीक पकड़ता है जो ज़्यादातर लोग जीते हैं: सुकून अक्सर तब शब्द बनता है, जब उससे पहले बेचैनी रही हो। दर्द सिखाता है कि आराम क्या है; आराम याद दिलाता है कि दर्द हमेशा नहीं रहता।

01/10/2026

आपातकाल में ही मनुष्य का वास्तविक चरित्र प्रकट होता है।

इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर की असाधारण वीरता को नमन किया है।

फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 में कॉकपिट में चाकू से घायल होने के बावजूद उन्होंने संघर्ष किया, कॉकपिट का दरवाज़ा खोला और यात्रियों व कर्मीदल को हमलावर पर काबू पाने का अवसर दिया। एक बड़ी दुर्घटना टल गई। 174 जीवन बच गए।

यह साहस की सर्वोच्च मिसाल है।
भारत कैप्टन स्मित के साथ है। शीघ्र और पूर्ण स्वास्थ्य लाभ की कामना।
वे सच्चे नायक हैं।

महीने का पहला दिन हवन के लिए निश्चित है।अग्नि बिना भेदभाव के सब कुछ स्वीकार कर लेती है। जो भी अर्पित किया जाए, वह ग्रहण ...
01/10/2026

महीने का पहला दिन हवन के लिए निश्चित है।

अग्नि बिना भेदभाव के सब कुछ स्वीकार कर लेती है। जो भी अर्पित किया जाए, वह ग्रहण करती है और गर्मी देती है।

जीवन भी यही सिखाता है। प्रेम आए या द्वेष — दोनों को ग्रहण करना सीखें। फिर अग्नि की तरह अपने चारों ओर गर्मी और सहारा दें। करुणा फैलाएँ। अपने आस-पास का वातावरण ऐसा बनाएँ जिसमें सबको सुकून मिले।

द्वेष, ईर्ष्या और नापसंदगी का हृदय में स्थान नहीं होना चाहिए।

As a hardcore Revenue officer, field visits have always been close to my heart — crop inspection especially so.In 2023, ...
30/09/2026

As a hardcore Revenue officer, field visits have always been close to my heart — crop inspection especially so.

In 2023, after crop damage from a natural calamity in Rohtak, I visited the fields. Prompt presence of senior officers motivates the entire machinery to move faster.

This visit remains special. It was my last crop inspection as a field officer.

Service is not complete in the file. It is complete in the field, standing with the farmers.

On 11 September 1967, at Nathu La, Indian soldiers laying a fence on an unmarked crest were met with machine-gun fire. L...
30/09/2026

On 11 September 1967, at Nathu La, Indian soldiers laying a fence on an unmarked crest were met with machine-gun fire. Lt Col Rai Singh Yadav of 2 Grenadiers stood in the open with his men. He was wounded. Capt Dagar and Maj Harbhajan Singh charged the guns and fell.

Maj Gen Sagat Singh held the pass when others had been told to yield. Indian guns from Sebu La and Camel’s Back then spoke. For three days the northern bunkers burned. Cho La followed on 1 October. The line held.

We remember 1962. We should also remember 1967 — when the Army did not blink, and Nathu La remained ours.

आज शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जी की 119वीं जयंती पर हम मातृभूमि के इस अमर सपूत को नमन करते हैं।जब अधिकांश युवक जीवन के सपने दे...
28/09/2026

आज शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जी की 119वीं जयंती पर हम मातृभूमि के इस अमर सपूत को नमन करते हैं।

जब अधिकांश युवक जीवन के सपने देखते हैं, तब इन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में फाँसी के फंदे को मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए चुन लिया।

लालालाजपत राय जी की हत्या का बदला हो या सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देना — भगत सिंह ने दिखा दिया कि एक युवा का साहस साम्राज्य को हिला सकता है।

वे फाँसी पर मुस्कुराते हुए चढ़े, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वतंत्र भारत में साँस ले सकें। उनका बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि युवा शक्ति, विचार और प्राणों का पूर्ण समर्पण था।
“इंकलाब जिंदाबाद” उनके लिए नारा नहीं, प्रण था।

शहीद भगत सिंह अमर रहें।
भारत माता की जय।

जय हो जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ...
23/09/2026

जय हो जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को,
जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को।
ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है,
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।

आज 23 सितंबर को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जयंती पर उनके इस अमर आवाह्न को नमन।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे॥शरीर गिर सकता ...
23/09/2026

न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

शरीर गिर सकता है, प्राण छूट सकते हैं, पर जो मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करता है, वह कभी मरता नहीं। वह अमर हो जाता है।

आज हरियाणा में वीर एवं शहीदी दिवस पर हम 1857 के महानायक राव तुलाराम जी समेत उन सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों को नमन करते हैं, जिनके रक्त से यह धरती सिंची गई। सीमा पर खड़े जवानों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों तक—उनकी कुर्बानी के बिना न तिरंगा फहराता, न हम सिर उठाकर चल पाते।
उनका बलिदान याद रखना केवल एक दिन की औपचारिकता नहीं, बल्कि हर दिन देश के प्रति ईमानदारी, अनुशासन और सेवा का संकल्प है।
जय हिंद।

यह सीधे बुद्ध का उपदेश है।वीणा की तारों को इतना मत कसो कि वे टूट जाएँ,उन्हें इतना ढीला भी मत छोड़ो कि संगीत ही न निकले।य...
19/09/2026

यह सीधे बुद्ध का उपदेश है।

वीणा की तारों को इतना मत कसो कि वे टूट जाएँ,
उन्हें इतना ढीला भी मत छोड़ो कि संगीत ही न निकले।

यह बात सिर्फ संगीत की नहीं, जीवन की है।
किसी भी रिश्ते, जिम्मेदारी या नेतृत्व में दो अतियाँ होती हैं। एक तरफ जरूरत से ज्यादा कसाव — नियम इतने सख्त, अपेक्षाएँ इतनी ऊँची, दबाव इतना निरंतर कि इंसान टूट जाता है। दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा ढील — कोई सीमा नहीं, कोई अनुशासन नहीं, कोई दिशा नहीं। फिर न लय रहती है, न संगीत।

असली कला बीच की है। तार इतने कसे हों कि उनसे स्वर निकले, और इतने लचीले भी हों कि वे टूटे नहीं। यही संतुलन घर में चाहिए, कार्यालय में चाहिए, समाज में चाहिए।
कठोरता से व्यवस्था तो बनती है, पर दिल नहीं जीते जाते। ढील से स्नेह तो दिखता है, पर काम नहीं होता। दोनों के बीच जो स्थान है — वहीं से संगीत पैदा होता है।

जीवन को भी वीणा की तरह बजाना है। न इतना कसना कि तार टूट जाएँ, न इतना छोड़ देना कि कोई सुर ही न निकले।

ध्यान आनंद है।समर्पित अभ्यास के कुछ शांत मिनट चिंता को पिघला सकते हैं, मन को स्थिर कर सकते हैं और शरीर को हल्का कर सकते ...
17/09/2026

ध्यान आनंद है।
समर्पित अभ्यास के कुछ शांत मिनट चिंता को पिघला सकते हैं, मन को स्थिर कर सकते हैं और शरीर को हल्का कर सकते हैं। यह भीतर से नवजीवन देता है। जो बोझ हम ढोते हैं—मानसिक बेचैनी, भावनात्मक भार, यहाँ तक कि शारीरिक तनाव—जब हम ईमानदार ध्यान के साथ स्थिर बैठते हैं, तो ढीले पड़ने लगते हैं।

यह मेरे लिए सिद्धांत नहीं है। मैंने इसे जिया है। ध्यान ने मुझे वह राहत, स्पष्टता और आंतरिक नवीकरण दिया है जो किसी भी भागदौड़ से नहीं मिल सकता। मैं इसे केवल इसलिए साझा कर रहा हूँ ताकि दूसरे भी इसे आजमाएँ और यही उपहार पाएँ।

यदि हममें से अधिक लोग प्रतिदिन इस अभ्यास के लिए थोड़ी सी जगह बनाएँ, तो संसार अधिक कोमल हो जाएगा। भाईचारा स्वाभाविक लगेगा। निस्वार्थता नारा नहीं, देखने का ढंग बन जाएगी।

इन स्तंभों पर बना संसार जीने में आसान होगा—अधिक न्यायपूर्ण, अधिक मानवीय और सबके लिए अधिक समृद्ध।

बैठिए। साँस लीजिए। अपने पास लौट आइए। वहाँ जो शांति मिले, वह केवल आपकी नहीं है। वह बाहर भी फलती है।

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