Vaishy 2 Vaishy 【V2V】

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सर्व वैश्य वैवाहिक परिचय मंच (V2V) ग्रुप

Photos from Vaishy 2 Vaishy 【V2V】's post 28/09/2022

🌹🌹🌹 #परोपकार 🌹🌹🌹
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एक समय एक मोची को रात में भगवान ने सपने में दर्शन दिए और कहा कि कल सुबह मैं तुझसे मिलने तेरी दुकान पर आऊंगा।

मोची की दुकान काफी छोटी थी और उसकी आमदनी भी काफी सीमित थी।

वह एक सच्चा ईमानदार और परोपकार करने वाला इंसान था इसलिए ईश्वर ने उसकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

उसने सुबह उठते ही तैयारी शुरू कर दी।
भगवान को चाय पिलाने के लिए दूध, चायपत्ती और नाश्ते के लिए मिठाई ले आया।

दुकान को साफ कर वह भगवान का इंतजार करने लगा।
उस दिन सुबह से भारी बारिश हो रही थी।

थोड़ी देर में उसने देखा कि एक सफाई करने वाली बारिश के पानी में भीगकर ठिठुर रही है।

मोची को उसके ऊपर बड़ी दया आई और भगवान के लिए लाए गए दूध से उसको चाय बनाकर पिलाई।

दिन गुजरने लगा.....

दोपहर बारह बजे एक महिला बच्चे को लेकर आई और कहा कि मेरा बच्चा भूखा है इसके लिए कुछ मिल जाए तो बहुत दया होगी।

मोची ने सारा दूध उस बच्चे को पीने के लिए दे दिया।

इस तरह से शाम के चार बज गए....

मोची दिन भर बड़ी बेसब्री से भगवान का इंतजार करता रहा।

तभी एक बूढ़ा आदमी जो चलने से लाचार था आया और कहा कि मै भूखा हूं और अगर कुछ खाने को मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी।

मोची ने उसकी बेबसी को समझते हुए मिठाई उसको दे दी।

इस प्रकार दिन बीत गया और रात हो गई।

रात होते ही मोची के सब्र का बांध टूट गया और वह भगवान को उलाहना देते हुए बोला- "वाह! भगवान सुबह से रात कर दी मैंने तेरे इंतजार में लेकिन तू वादा करने के बाद भी नहीं आया। क्या मैं गरीब ही तुझे बेवकूफ बनाने के लिए मिला था।"

तभी आकाशवाणी हुई और भगवान ने कहा-" मैं आज तेरे पास एक बार नहीं तीन बार आया और तीनों बार तेरी सेवाओं से बहुत खुश हुआ और तू मेरी परीक्षा में भी पास हुआ है क्योंकि तेरे मन में परोपकार और त्याग का भाव सामान्य मानव की सीमाओं से परे हैं।"

यही बात हम सबको भी अपने जीवन में शामिल करनी चाहिए, क्या पता भगवान किस रूप में हमसे मिल लें और हम जान भी नही पाऐं। अतः अच्छे कर्म करते रहें।

आप सभी को राधे राधे

28/09/2022
Photos from Vaishy 2 Vaishy 【V2V】's post 21/08/2021

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16/08/2021

नमो शनिश्चराय नमः 💐

15/08/2021

अपनी शादी के पहले दिन पति और
पत्नी के बीच
शर्त रखी जाती है
कि किसी के लिए
भी दरवाजा नहीं खोला जायेगा !
..
उसी दिन उस लड़के के माता पिता आये और
अन्दर जाने के
लिए दरवाजा खट खटाया !
.
पति पत्नी एक दुसरे की तरफ देखते है।
..
पति अपने माता पिता के लिए
दरवजा खोलना चाहता है लेकिन उसे शर्त
याद आ जाती है। वह
दरवाज़ा नहीं खोलता है ओर उसके
माता पिता चले जाते है ।
..
कुछ समय के बाद उसी दिन लड़की के
माता पिता आते है और अन्दर जाने के लिए
दरवाजा ख़त खटाते है ।
.
पति पत्नी फिर एक दुसरे की तरफ देखते है
और उस समय भी वो शर्त याद करते है ।
.
पत्नी की आँखों में आंसू आ जाते हे वो अपने
आंसू पूछते हुए कहती हे : मै अपने माता पिता के
लिए
ऐसा नहीं कर सकती और दरवाजा खोल
देती है ।
.
पति कुछ नहीं कहता है ।।
.
कुछ समय के बाद उनके दो पुत्र जन्म लेते है ।
..
इसके बाद उनको तीसरा बच्चा होता है जो एक
लड़की (बेटी) होती है ।।
.
वह पति अपनी पुत्री के जन्म लेने के
अवसर पर एक बहुत बड़ी और शानदार
पार्टी का आयोजन करता है और
अपने सभी दोस्तों और रिश्तेदारों को बुलाता है ।
.
...
..
फिर उसकी पत्नी उससे
पूछती है कि क्या कारण था जो उसने बेटी के
जन्म पर
इतनी बड़ी पार्टी का आयोजन
किया जबकि इससे पहले दोनों दोनों भाइयो के
जन्म पर ऐसा कुछ
नहीं किया ।।
..
पति अपने साधारण से शब्दों में बड़े प्यार से
उत्तर देता है :
क्योकि यही वो है जो एक दिन मेरे लिए
दरवाजा खोलेगी ।।
..
"बेटिया बहुत स्पेशल होती है,
आपकी छोटी सी बेटी भले
ही आपके साथ कुछ समय के लिए
ही रहे .... लेकिन उसका दिल और प्यार
जीवनभर अपने माता पिता के लिए रहता है.......
🙏🙏🙏 #वैश्य2वैश्य 🙏🙏🙏

15/08/2021

सरहद पर तैनात समस्त सैनिकों को समर्पित🙏

फ़ौजी की पाती......

जब से गए हो तुम सीमा पे
तुम्हारा कोई संदेस न आया है
कैसे बतलाऊँ तुम्हें मैं कि
देवी माँ की अनुकंपा ने मुझे
माँ और तुम्हें पिता बनाया है
हमारे इस नवजात ने हुबहू
तुम्हारा रूप ही पाया है ।

माँ ने तेरी चार दिन तो जैसे-तैसे
खींच लिए पर क्या दिलासा दूँ उसको
उसके नयन तो बस तुझे देखने को ही
तरस रहे ,कैसे करूँ सम्पर्क तुझे मैं
उसकी साँसों का तुझसे जुड़ा कोई नाता है
उसका ये दर्द अब मुझसे न देखा जाता है।

याद है पापा जब मैं बड़ी हो रही थी
सखियों को उनके पापा के संग
देख अपना मन मसोस रही थी
आपकी हर विदाई पर मैं कितना रोती थी
माफ़ किया तुम मेरे हर जन्मदिन पर न आते थे
पर पापा दो दिन बाद अपनी इस गुड़िया का कन्यादान करने तो आप समय से आओगे ना
बोलो आ पाओगे ना?

क्या बताऊँ तुम्हें प्रिये,विरह
में मैं भी तुम बिन तड़पा हूँ
तारे गिन मैंने रातें हैं काटी
तुम्हें एक पल भी न भूला हूँ किंतु
ये प्रेम देश-प्रेम के आगे बहुत है छोटा
देश के लिए कुछ कर गुज़रूँ
ये ही मेरा जज़्बा है,चाह है
मेरी औलाद सीना ठोक कहे गर्व से
देखो,मैं इस वीर का बेटा हूँ।

बाबा ,सीमा पर जंग छिड़ी है
मुझसे लाखों माँओं की आस जुड़ी है
माँ मुझे है अपनी जान से प्यारी
लेकिन फ़र्ज़ है जज़्बात पर भारी
माँ को दो हौसला उसका बेटा जीतकर
तुरन्त लौटेगा,उसको बाहों में भर लेगा
उसके लिए दुश्मन क्या वो यम से भी लड़ लेगा

बेटी ,जब भी मौत को सामने पाया
तेरा चेहरा सबसे पहले सामने आया
तू है मेरे कलजे का टुकड़ा ,
तुझे क्या सुनाऊँ अपना दुखड़ा
तुझे रोता छोड़ जब भी ड्यूटी लौटता था
मन मेरा भी तेरी तरह ही बिलखता था
फ़ौजी हूँ भला सामने कैसे रो सकता था?
आ रहा हूँ तेरे पास,पाएगी मुझे अपने साथ
तेरे हर गिले-शिकवे को कल मैं मिटाऊँगा
विदा तुझे कर आँसुओं की गंगा से मैं नहाऊँगा।

दिल से क़लम तक✍️


#वैश्य2वैश्य

15/08/2021



15/08/2021

,जीवन के 20 साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई नोकरी की खोज । ये नहीं वो, दूर नहीं पास । ऐसा करते करते 2 3 नोकरियाँ छोड़ते एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।

फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का चेक। वह बैंक में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। 2- 3 वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र 25 हो गयी।

और फिर विवाह हो गया। जीवन की राम कहानी शुरू हो गयी। शुरू के एक 2 साल नर्म, गुलाबी, रसीले, सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए।

और फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना बैठना खाना पीना लाड दुलार ।

समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।
इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते करना घूमना फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला।

बच्चा बड़ा होता गया। वो बच्चे में व्यस्त हो गयी, मैं अपने काम में । घर और गाडी की क़िस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शुन्य बढाने की चिंता। उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी

इतने में मैं 35 का हो गया। घर, गाडी, बैंक में शुन्य, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।

इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब 10वि आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक दोनों ही चालीस बयालीस के हो गए। बैंक में शुन्य बढ़ता ही गया।

एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।"

उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि "तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है ।"
कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।

तो फिर आया पैंतालिसवा साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।

बेटा उधर कॉलेज में था, इधर बैंक में शुन्य बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश।

उसके बालो का काला रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे चश्मा भी लग गया। मैं खुद बुढा हो गया। वो भी उमरदराज लगने लगी।

दोनों पचपन से साठ की और बढ़ने लगे। बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।

अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।

एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा।

उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। और आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।

मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी दिया बाती ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी "चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं "
वो तुरंत बोली " अभी आई"।

मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा ख़ुशी से चमक उठा।आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए !!

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी "बोलो क्या बोल रहे थे?"

लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।

क्षण भर को वो शून्य हो गयी।
" क्या करू ? "

उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।

मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली
"चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे ?" बोलो ना !!

ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......
वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। वह ठंडी हवा का झोंका आज भी चल रहा है ।

क्या ये ही जिन्दगी है ? नहीं ??

सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो और अपनों के लिए भी निकालो अन्यथा सब धरा का धरा रह जाएगा ।
जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा,,,

#वैश्य2वैश्य
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