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13/01/2026
Badhai ho Ram lala viraj gaye🌹🙏🙏
22/01/2024

Badhai ho Ram lala viraj gaye🌹🙏🙏

16/01/2024
18/03/2023

ब्राह्मण समाज सेवा समिति नोएडा

18/03/2021



#सुप्रभात

"I want to remember your Face so that when I meet you in Heaven, I will be able to recognize you and Thank you once again."

In a telephonic interview,
the Radio Announcer
asked his guest,
a millionaire,
"What made you
Happiest in life ?"

The millionaire replied :
I have gone through
Four stages of
Happiness in my Life
Finally I understood the
Meaning of True Happiness.

The First Stage was
to Accumulate
Wealth and Means.
But at this Stage
I did not get the
Happiness I wanted.

Then came the Second
Stage of Collecting
Valuables and Items.
But I realized that the
Effect of this thing
is also Temporary & the
Lustre of Valuable Things
Does not last long.

Then came the
Third Stage of Getting
Big Projects like
Buying a football team,
Buying a tourist resort etc.
But even here I did not
Get the Happiness
I had imagined.

The Fourth time
A Friend of mine
Asked me to buy
Wheelchairs for
Disabled children.
At the Friend's request, I immediately bought some Wheelchairs.
But My Friend insisted
That I go with him and
Hand over the Wheelchairs
To the Children myself.
So,I went with him &
Gave the Wheel chairs
To those Children
with my own hands.
I saw the Great
Glow of Happiness
On the Faces of
Those Children.
I saw them all
Sitting on the Chairs,
Moving around
And having fun.

It was as if they had
Arrived at a Picnic.

But I felt Real Joy
When I started to leave
And one of the Kids
Grabbed my leg.

I gently tried to
Free my leg - but the
Child stared at my face
And held my leg tightly.

I bent down and
Asked the Child :
"Do you need
Anything else?"

The answer the Child
Gave me not only
Made me Happy
but also Changed
My Life forever.

The Child said :
"I want to remember
Your Face, so that
When I meet you
in Heaven, i will be
Able to recognize you
& Thank you once again."

💐🙂

*"THE JOY OF GIVING".*

जब पेशावर पर भगवा फहराया - 14 मार्च, 1823पेशावर पर बलपूर्वक कब्जा कर अफगानी अजीम खाँ की सेनाएँ नौशेहरा मैदान तक आ चुकी थ...
16/03/2021

जब पेशावर पर भगवा फहराया - 14 मार्च, 1823

पेशावर पर बलपूर्वक कब्जा कर अफगानी अजीम खाँ की सेनाएँ नौशेहरा मैदान तक आ चुकी थीं। यह सुनकर महाराजा रणजीत सिंह ने हरिसिंह नलवा एवं दीवान कृपाराम के नेतृत्व में उनका मुकाबला करने को स्वराजी सैनिकों के जत्थे खैराबाद भेज दिये। महाराजा के साथ बाबा फूलासिंह अटक नदी के किनारे डट गये; पर शत्रुओं ने अटक पर बना एकमात्र पुल बारूद से उड़ा दिया। इससे दोनों समूहों का आपसी सम्पर्क कट गया।

रणजीत सिंह ने नदी पर नावों का पुल बनाने का आदेश दिया। तभी एक गुप्तचर ने समाचार दिया कि अटक पार वाले दल शत्रुओं से घिर गये हैं। उन्हें यदि शीघ्र सहायता नहीं मिली, तो सबकी जान जा सकती है। रणजीत सिंह ने चिन्तित नजरों से बाबा फूलासिंह की ओर देखा। बाबा ने संकेत समझकर अपना सिर झुका दिया। फिर घोड़े पर बैठे-बैठे ही उन्होंने हाथ को ऊँचा उठाकर अपने सैनिकों को आगे बढ़ने का आदेश दिया।

आदेश पाकर 500 निहंग साथियों ने तेज बहती नदी में घोड़े उतार दिये। एक ओर नदी की विकराल धारा थी, तो दूसरी ओर शेर जैसे कलेजे वाले साहसी वीर। पानी के जहाज की तरह धाराओं को चीरकर वे अफगानों पर टूट पड़े। शत्रु सैनिक सिर पर पाँव रखकर भागे। जहाँगीरा का दुर्ग भी सिक्ख सैनिकों के पास आ गया। यह सुनकर अजीम खाँ बहुत आगबबूला हुआ। उसने सैनिकों को बहुत भला-बुरा कहा। कुरान की कसम दिलाकर फिर से लड़ने और इस अपमान का बदला लेने को तैयार किया।

अफगान सेनापति मुहम्मद खान लुण्डा ने तीस हजार सैनिकों के साथ तरकी की पहाडि़यों पर मोर्चा बाँधा। रणजीत सिंह ने फिर से बाबा फूलासिंह के नेतृत्व में 1,500 सैनिक भेज दिये। लेकिन फूलासिंह जरा भी चिन्तित नहीं हुए।

उन्होंने सैनिकों को ललकारा - गुरू गोविन्द सिंह ने चिडि़यों से बाज लड़ाने की बात कही थी। आज उसी का अवसर आया है। मत भूलो कि एक-एक स्वराजी सैनिक सवा लाख के बराबर होता है। हमें भगवा फहराकर स्वराज्य की सीमाएँ पेशावर तक पहुँचानी हैं।

फूलासिंह की घनगर्जना से सैनिकों का खून गरम हो गया और उनमें उत्साह की लहर दौड़ गयी। घनघोर संग्राम शुरू हो गया। तलवारें आपस में टकराने लगीं। निहंगों के जौहर देखते ही बनते थे। शीघ्र ही महाराजा ने एक और बड़ी टुकड़ी इनकी सहायता के लिए भेज दी। इससे सिक्ख सैनिकों का हौसला बढ़ गया। वे‘बोले सो निहाल, सत् श्री अकाल’ कहकर शत्रुओं पर टूट पड़े। अफगान सैनिक‘या खुदा, या खुदा’ कहकर भागने लगे।

वह 14 मार्च, 1823 का दिन था। बाबा फूलासिंह की तलवार मुसलमानों पर कहर ढा रही थी। इसी बीच उन्हें एक गोली आ लगी। कुछ सैनिक उनकी सहायता को आगे बढ़े; पर बाबा चिल्लाये - मेरी चिन्ता मत करो। अपना कर्तव्य निभाओ। याद है न, हमें पेशावर पर भगवा झण्डा फहराना है।

इसी समय एक और गोली ने उनके घोड़े को भी गिरा दिया। अब बाबा हाथी पर चढ़ गये। तभी एक अफगान सैनिक ने एक साथ कई गोलियाँ बाबा की ओर चलायीं। इस हमले को वे नहीं झेल पाये। बाबा के बलिदान होते ही सिक्ख सैनिकों ने पूरी ताकत से हमला बोल दिया। अफगान सेना पीछे हटने लगी। कुछ समय बाद अन्ततः पेशावर पर भगवा फहरा ही गया।

Happy Republic Day to all of us
26/01/2021

Happy Republic Day to all of us

 #जीजाबाईजन्मदिवस शिवा – माँ जन्मदिवस पर क्या उपहार चाहिये । माँ जीजाबाई  – वो जो किला दिख रहा है जिस पर मुगलो का राज़ है...
12/01/2021

#जीजाबाईजन्मदिवस

शिवा – माँ जन्मदिवस पर क्या उपहार चाहिये ।
माँ जीजाबाई – वो जो किला दिख रहा है जिस पर मुगलो का राज़ है मुझे बस उस पर #भगवाध्वज लहराते हुए देखना है ….......

#स्वामिविवेकानंदजन्मदिवस

अभूतपूर्व विवेक द्वारा अनहद आनंद की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हुए स्वयं अपनी इन्द्रियों का स्वामी हो जाना ही #स्वामीविवेकानंद होना है।
🙏🙏

देश के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली आजाद हिन्द फौज के स्थापना दिवस पर सभी प्रदेशवासियों को हार्दि...
21/10/2020

देश के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली आजाद हिन्द फौज के स्थापना दिवस पर सभी प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई।

तेजस्वी सूर्या 4 साल की उम्र में उस समय चल रहे कारगिल युद्ध में संभव मदद पहुंचाने के लिए पेंटिंग बना बना कर बेचकर पैसे इ...
20/10/2020

तेजस्वी सूर्या 4 साल की उम्र में उस समय चल रहे कारगिल युद्ध में संभव मदद पहुंचाने के लिए पेंटिंग बना बना कर बेचकर पैसे इकट्ठा कर भेजा करते थे।

15 अक्तूबर/जन्म-दिवसमिसाइल मैन डा. अब्दुल कलामक्या हम कल्पना कर सकते हैं कि उस युवक के मन पर क्या बीती होगी, जो वायुसेना...
15/10/2020

15 अक्तूबर/जन्म-दिवस

मिसाइल मैन डा. अब्दुल कलाम

क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि उस युवक के मन पर क्या बीती होगी, जो वायुसेना में विमान चालक बनने की न जाने कितनी सुखद आशाएं लेकर देहरादून गया था; पर परिणामों की सूची में उसका नाम नवें क्रमांक पर था, जबकि चयन केवल आठ का ही होना था। कल्पना करने से पूर्व हिसाब किताब में यह भी जोड़ लें कि मछुआरे परिवार के उस युवक ने नौका चलाकर और समाचारपत्र बांटकर जैसे-तैसे अपनी शिक्षा पूरी की थी।

देहरादून आते समय केवल अपनी ही नहीं, तो अपने माता-पिता और बड़े भाई की आकांक्षाओं का मानसिक बोझ भी उस पर था, जिन्होंने अपनी अनेक आवश्यकताएं ताक पर रखकर उसे पढ़ाया था; पर उसके सपने धूल में मिल गये। निराशा के इन क्षणों में वह जा पहुंचा ऋषिकेश, जहां जगतकल्याणी मां गंगा की पवित्रता, पूज्य स्वामी शिवानन्द के सान्निध्य और श्रीमद्भगवद्गीता के सन्देश ने उसेे नये सिरे से कर्मपथ पर अग्रसर किया। उस समय किसे मालूम था कि नियति ने उसके साथ मजाक नहीं किया, अपितु उसके भाग्योदय के द्वार स्वयं अपने हाथों से खोल दिये हैं।

15 अक्तूबर, 1931 को धनुष्कोटि (रामेश्वरम्, तमिलनाडु) मंे जन्मा अबुल पाकिर जैनुल आबदीन अब्दुल कलाम नामक वह युवक भविष्य में ‘मिसाइल मैन’ के नाम से प्रख्यात हुआ। उनकी उपलब्धियों को देखकर अनेक विकसित और सम्पन्न देशों ने उन्हें मनचाहे वेतन पर अपने यहां बुलाना चाहा; पर उन्होंने देश में रहकर ही काम करने का व्रत लिया था। चार दशक तक उन्होंने ‘रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन’ तथा ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन’ में विभिन्न पदों पर काम किया। यही डा. कलाम 2002 ई. में भारत के 11वें राष्ट्रपति बने और अपनी सादगी के कारण ‘जनता के राष्ट्रपति’ कहलाये।

डा. कलाम की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे राष्ट्रपति बनने के बाद भी आडम्बरों से दूर रहे। वे जहां भी जातेे, वहां छात्रों से अवश्य मिलते थे। वे उन्हें कुछ निरक्षरों को पढ़ाने तथा देशभक्त नागरिक बनने की शपथ दिलाते थे। उनकी आंखों में अपने घर, परिवार, जाति या प्रान्त की नहीं, अपितु सम्पूर्ण देश की उन्नति का सपना पलता था। वे 2020 ई. तक भारत को दुनिया के अग्रणी देशों की सूची में स्थान दिलाना चाहते थे। साहसी डा. कलाम ने युद्धक विमानों से लेकर खतरनाक पनडुब्बी तक में सैनिकों के साथ यात्रा की।

मुसलमान होते हुए भी वे सब धर्मों का आदर करते थे। वे अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर गये, तो श्रवण बेलगोला में भगवान बाहुबलि के महामस्तकाभिषेक समारोह में भी शामिल हुए। उनकी आस्था कुरान के साथ गीता पर भी थी तथा वे प्रतिदिन उसका पाठ करते थे। उनके राष्ट्रपति काल में जब भी उनके परिजन दिल्ली आये, तब उनके भोजन, आवास, भ्रमण आदि का व्यय उन्होंने अपनी जेब से किया। उन्होंने राष्ट्रपति भवन में होने वाली ‘इफ्तार पार्टी’ को बंदकर उस पैसे से भोजन सामग्री अनाथालयों में भिजवाई। उनके नेतृत्व में भारत ने पृथ्वी, अग्नि, आकाश जैसे प्रक्षेपास्त्रों का सफल परीक्षण किया, जिससे सेना की मारक क्षमता बढ़ी। भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनाने का श्रेय भी डा. कलाम को ही है। शासन ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

आजीवन अविवाहित रहे डा. कलाम अत्यधिक परिश्रमी और अनुशासन प्रेमी थे। वे कुछ वर्ष रक्षामंत्री के सुरक्षा सलाहकार भी रहे। राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद भी वे विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों से बात करते रहते थे। वे चाहते थे कि लोग उन्हें एक अध्यापक के रूप में याद रखें। 27 जुलाई, 2015 को शिलांग में छात्रों के बीच बोलते समय अचानक हुए भीषण हृदयाघात से उनका निधन हुआ। 30 जुलाई को उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ रामेश्वर में ही दफनाया गया। उन्नत भारत के स्वप्नद्रष्टा, ऋषि वैज्ञानिक डा. कलाम द्वारा लिखित पुस्तकें युवकों को सदा प्रेरणा देती रहेंगी।

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