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हमारा क्या है, फिर नया लिख लेंगे,
हम फ़क़ीर नहीं हैं कि झोला उठाकर चल देंगे,
हम लकीर ह

सच बोलने वाले चैनल को बंद करके कुछ नहीं कर पाओगे सच छुपता नहीं
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मोहम्मद आरिफ बाबू on Twitter 09/03/2020

अस्सलाम अलैकुम वा रहेम तुल्ला वा बरकात हूँ

प्यार और सम्मान दो ऐसे तोहफे हैं,

अगर देने लग जाओ तो,

बेजुबान भी झुक जाते है,

ये दोनों चीजें सिर्फ नेक और अच्छे इंसान में होती हैं,

मोहम्मद आरिफ बाबू on Twitter “अस्सलाम अलैकुम वा रहेम तुल्ला वा बरकात हूँ प्यार और सम्मान दो ऐसे तोहफे हैं, अगर देने लग जाओ तो, बेजुबान भी झुक जात.....

इसी मंदी में बीजेपी को 7 करोड़ नए सदस्य मिले हैं, 5 फीसदी जीडीपी पर हंसिए मत 06/09/2019

इसी मंदी में बीजेपी को 7 करोड़ नए सदस्य मिले हैं, 5 फीसदी जीडीपी पर हंसिए मत मुझसे हंसा नहीं जा रहा है। बहुत लोग हंस रहे हैं। सकल घरेलु उत्पाद जीडीपी की दर 5 फ़ीसदी पर आ गई है। यह हंसी कहीं मुझे .....

27/11/2018

प्रधानमंत्री का अपमान हर चुनाव से पहले होता है। मोदीजी इमोशनल होकर जनता को बताते हैं-- देखो मुझे नीच बोला, मुझे चायवाला बोला।

इस बार अपमान के सारे रिकॉर्ड टूट गये। राजस्थान से लेकर मध्य-प्रदेश तक हर जनसभा में राहुल गांधी खुलेआम चोर बोल रहे हैं। लेकिन इस बार मोदीजी अपमान के घूंट कटिंग चाय की तरह फूंक-फूंक पी रहे हैं। बोल कुछ नहीं रहे हैं।
मध्य प्रदेश में मोदीजी अपनी माताजी के कथित अपमान को ले आये। माताजी को आराम करने दीजिये और एक बार अपने बारे में जनता से पूछकर देखिये मोदीजी। पूछिये कि क्या मेरे जैसे ईमानदार आदमी को राफेल चोर बुलाया जाना चाहिए?

पूछकर देखिये सोई जनता जाग जाएगी। बीस-पच्चीस सीटें यूं ही बढ़ जाएंगी। लेकिन ना जाने क्यों मोदीजी एकदम चुप हैं। चाणक्य जी भी उन्हें यह तरकीब नहीं बता रहे हैं।

क्या विचार भक्तों पूछना चइये कि नई पूछना चइये?

28/10/2018

भारत में कुछ चीज़ें तेज़ी से बढ़ रही हैं -
भाजपाईयों की सम्पत्ति
युवाओं की बेरोज़गारी
मीडिया की बेशर्मी
तड़ीपार की ख़रीद- फरोत
ग़रीबों और किसनो कीं आत्म-हत्या
अनपढ़ो की मिनिस्ट्री
दंगो को क़हर
लोकतंत्र की हत्या
महिलाओ पर अत्याचार
मंहगाई ,भ्रष्टाचार
Agree ?

07/11/2017

pando.com के बिना अधूरा है एक्सप्रेस में छपे पैराडाइस पेपर्स और द वायर की रिपोर्ट
हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए। एक पाठक के रूप में आप बेहतर होंगे। हिन्दी में तो यह सब मिलेगा नहीं क्योंकि ज्यादातर हिन्दी अख़बार के संपादक अपने दौर की सरकार के किरानी होते हैं।
कारपोरेट के दस्तावेज़ों को समझना और उसमें कमियां पकड़ना ये बहुत ही कौशल का काम है। इसके भीतर के राज़ को समझने की योग्यता हर किसी में नहीं होती है। मैं तो कई बार इस कारण से भी हाथ खड़े कर देता हूं। न्यूज़ रूम में ऐसी दक्षता के लोग भी नहीं होते हैं जिनसे आप पूछकर आगे बढ़ सकें वर्ना कोई आसानी से आपको मैनुपुलेट कर सकता है।
इसका हल निकाला है INTERNATIONAL CONSORTIUM OF INVESTIGATIVE JOURNALISTS ने। दुनिया भर के 96 समाचार संगठनों को मिलाकर एक समूह बना दिया है। इसमें कारपोरेट खातों को समझने वाले वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। एक्सप्रेस इसका हिस्सा है। आपको कोई हिन्दी का अख़बार इसका हिस्सेदार नहीं मिलेगा। बिना पत्रकारों के ग्लोबल नेटवर्क के आप अब कोरपोरेट की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते हैं।
1 करोड़ 30 लाख कारपोरेट दस्तावेज़ों को पढ़ने समझने के बाद दुनिया भर के अख़बारों में छपना शुरू हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में आज इसे कई पन्नों पर छापा है। आगे भी छापेगा। पनामा पेपर्स और पैराडाइस पेपर्स को मिलाकर देखेंगे तो पांच सौ हज़ार लोगों का पैसे के तंत्र पर कब्ज़ा है। आप खुद ही अपनी नैतिकता का कुर्ता फाड़ते रह जाएंगे मगर ये क्रूर कुलीन तंत्र सत्ता का दामन थामे रहेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके यहां कोई नैतिकता नहीं है। वो नैतिकता का फ्रंट भर है।
राज्य सभा में सबसे अमीर और बीजेपी के सांसद आर के सिन्हा का भी नाम है। जयंत सिन्हा का भी नाम है। दोनों ने जवाब भी दिया है। नोटबंदी की बरसी पर काला धन मिटने का जश्न मनाया जाने वाला है। ऐसे मौके पर पैराडाइस पेपर्स का यह ख़ुलासा हमें भावुकता में बहने से रोकेगा। अमिताभ बच्चन, अशोक गहलोत, डॉ अशोक सेठ, कोचिंग कंपनी फिट्जी, नीरा राडिया का भी नाम है। आने वाले दिनों में पता नहीं किस किस का नाम आएगा, मीडिया कंपनी से लेकर दवा कंपनी तक मालूम नहीं।
एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जयंत सिन्हा की सफाई पढ़ेंगे तो लगेगा कि कोई ख़ास मामला नहीं है। जब आप इसी ख़बर को PANDO.COM पर 26 मई 2014 को MARKS AMES के विश्लेषण को पढ़ेंगे तो लगेगा कि आपके साथ तो खेल हो चुका है। अब न ताली पीटने लायक बचे हैं न गाली देने लायक। जो आज छपा है उसे तो MARK AMES ने 26 मई 2014 को ही लिख दिया था कि ओमेदियार नेटवर्क मोदी की जीत के लिए काम कर रहा था। यही कि 2009 में ओमेदियार नेटवर्क ने भारत में सबसे अधिक निवेश किया, इस निवेश में इसके निदेशक जयंत सिन्हा की बड़ी भूमिका थी।
2013 में जयंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर मोदी के विजय अभियान में शामिल होने का एलान कर दिया। उसी साल नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की एक सभा मे भाषण दिया कि ई-कामर्स को खोलने की ज़रूरत है। यह भाजपा की नीति से ठीक उलट था। उस वक्त भाजपा संसद में रिटेल सेक्टर में विदेश निवेश का ज़ोरदार विरोध कर रही थी। भाजपा समर्थक व्यापारी वर्ग पार्टी के साथ दमदार तरीके से खड़ा था कि उसके हितों की रक्षा भाजपा ही कर रही है मगर उसे भी नहीं पता था कि इस पार्टी में एक ऐसे नेटवर्क का प्रभाव हो चुका है जिसका मकसद सिर्फ एख ही है। ई कामर्स में विदेश निवेश के मौके को बढ़ाना।
मुझे PANDO.COM के बारे में आज ही पता चला। मैं नहीं जानता हूं क्या है लेकिन आप भी सोचिए कि 26 मई 2014 को ही पर्दे के पीछे हो रहे इस खेल को समझ रहा था। हम और आप इस तरह के खेल को कभी समझ ही नहीं पाएंगे और न समझने योग्य हैं। तभी नेता हमारे सामने हिन्दू मुस्लिम की बासी रोटी फेंकर हमारा तमाशा देखता है।
जब मोदी जीते थे तब ओमेदियार नेटवर्क ने ट्वीट कर बधाई दी थी। टेलिग्राफ में हज़ारीबाग में हे एक प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता शिव शंकर प्रसाद गुप्त कहते हैं कि जयंत सिन्हा 2012-13 में दो साल मोदी की टीम के साथ काम कर चुके हैं। इस दौरान जयंत सिन्हा ओमिदियार नेटवर्क में भी काम कर रहे थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि 2013 में इस्तीफा दिया।
इसमें मार्क ने लिखा है कि जयंत सिन्हा ओमेदियार नेटवर्क के अधिकारी होते हुए भी बीजेपी से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में निदेशक हैं। इसी फाउंडेशन के बारे में इन दिनों वायर में ख़बर छपी है। शौर्य डोवल जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बेटे हैं, वो इस फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। जयंत सिन्हा ई कामर्स में विदेशी निवेश की छूट की वकालत करते रहते थे जबकि उनकी पार्टी रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर ज़ोरदार विरोध करने का नाटक करती थी। जनता इस खेल को कैसे देखे। क्या समझे। बहुत मुश्किल है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट को the wire.in और PANDO.COM के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
क्या सही में आप इस तरह के खेल को समझने योग्य हैं? मेरा तो दिल बैठ गया है। जब हम वायर की रिपोर्ट पढ़ रहे थे तब हमारे सामने PANDO.COM की तीन साल पुरानी रिपोर्ट नहीं थी। तब हमारे सामने पैराडाइस पेपर्स नहीं थे। क्या हम वाकई जानते हैं कि ये जो नेता दिन रात हमारे सामने दिखते हैं वे किसी कंपनी या नेटवर्क के फ्रंट नहीं हैं? क्या हम जानते हैं कि 2014 की जीत के पीछे लगे इस प्रकार के नेटवर्क के क्या हित रहे होंगे? वो इतिहास का सबसे महंगा चुनाव था। क्या कोई इन नेटवर्कों को एजेंट बनकर हमारे सामने दावे कर रहा था? जिसे हम अपना बना रहे थे क्या वो पहले ही किसी और का हो चुका था?
इसलिए जानते रहिए। किसी हिन्दी अख़बार में ये सब नहीं मिलने वाला है। इसलिए गाली देने से पहले पढ़िए। अब मैं इस पर नहीं लिखूंगा। यह बहुत डरावना है। हमें हमारी व्यक्तिगत नैतिकता से ही कुचल कर मार दिया जाएगा मगर इन कुलीनों और नेटवर्कों का कुछ नहीं होगा। इनका मुलुक एक ही है। पैसा। मौन रहकर तमाशा देखिए।

03/11/2017

व्यापारियों का जीएसटी दर्द: कहा जा रहा है न सहा जा रहा है
जीएसटी की मार व्यापारियों पर इस तरह पड़ रही है कि वे उफ्फ़ तो कर रहे हैं मगर आह नहीं कर रहे। टैक्स प्रशासन के भय के कारण वे खुलकर बोल नहीं पा रहे हैं। वित्त मंत्री ने कहा कि जुलाई में जीएसटी से 95,000 करोड़ आ गया। कर देने वाले व्यापारियों में से 70 फीसदी ने टैक्स भर दिया है। गोदी मीडिया ने इसे वाहवाही का सुर दे दिया। लेकिन अब जीएसटी के भीतर के तनाव सतह पर उभर कर सामने आ रहे हैं। कई व्यापारियों और वकीलों से जीएसटी को लेकर बात कर रहा था। जितना समझा है, उसे लिखना चाहता हूं।
इन दिनों आप ख़बरें देख रहे होंगे कि जीएसटी के तहत व्यापारियों ने इनपुट क्रेडिट का क्लेम लिया है। इसे TRAN-1 कहते हैं। इसके तहत 30 जून के पहले के स्टाक और उस पर दिए गए टैक्स का हिसाब देना होता है। मान लीजिए पुराने स्टाक के हिसाब से जुलाई में आपके यहां रखे माल का आउटपुट 1000 रुपया बनता है। चूंकि आपने ये स्टाक 800 रुपये में जीएसटी लागू होने से पहले ख़रीदा था, और उस वक्त 200 रुपये टैक्स भी दे दिया है। अब इसी स्टाक पर जीएसटी के कारण मान लीजिए 100 रुपया और टैक्स देना है तो कायदे से आपको 100 ही देना चाहिए मगर हिसाब किताब करने की वक्त की कमी के कारण आपको 300 टैक्स देने की छूट दी गई है। कहा गया कि आप पहले जमा कर दो, बाद में 200 रुपया वापस ले लेना।
यही हुआ व्यापारियों ने अपने पहले दिए हुए टैक्स की राशि को वापस लेने का क्लेम किया तो सरकार के कान खड़े हो गए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार TRAN-1 के तहत क्लेम की राशि 65000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। जमा हुआ था 95,000 करोड़ इसमें से 65000 रुपये वापस लेने पर दावा ठोंक दिया। जीएसटी के लिए काम करने वाले चार्टेड अकाउंटेंट और टैक्स वकील मानते हैं कि अभी 15 फीसदी व्यापारियों ने भी अपना क्लेम नहीं किया है। जीएसटीएन की दिक्कतों के कारण इसलिए सरकार ने ट्रांस वन भरने की तारीख 31 अक्तूबर तक बढ़ा दी है। जब सभी भर लेंगे तो पता चलेगा कि व्यापारियों ने 1 लाख करोड़ से अधिक का दावा कर दिया है।
65000 करोड़ की ये राशि सरकार के खाते में दोबारा आ गई। व्यापारियों को दो दो बार टैक्स देना पड़ गया। उनके पास से करीब एक लाख करोड़ रुपया सरकार के यहां अटक गया क्योंकि क्लेम की राशि मिल नहीं रही है। उसमें भी कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं। जब व्यापारियों का पैसा कहीं अटक जाएगा तो क्या होगा। व्यापार मंदा होगा। निवेश कम होगा।
सरकार क्यों नहीं तुरंत का तुरंत 65000 करोड़ लौटा देना चाहती है, दावा तो यही था कि इस हाथ से दीजिए, और उस हाथ से लीजिए। Central Board of Excise and Customs (CBEC) ने सभी टैक्स अधिकारियों को पत्र लिखा है कि वे 162 कंपनियों द्वारा 1 करोड़ से अधिक के दावे की जांच करें। फील्ड अधिकारियों से कहा गया है कि वे मौके पर जाकर देखें कि जो स्टाक है और जो क्लेम दावा किया गया है उसमें मिलान होता है या नहीं।
इससे व्यापारियों का पैसा भी रूक गया है और उनके सामने टैक्स अधिकारी फिर खड़े हो गए। जिसके लिए उन्हें टैक्स वकील हायर करना पड़ेगा। ख़र्च बढ़ा? उनका काम बढ़ा? बिजनेस पर ये बोझ किसने डाला? कई व्यापारियों की शिकायत है कि जीएसटीएन नेटवर्क भी ठीक से काम नहीं कर रहा है। कुछ लोग दबी ज़ुबान में कहते हैं कि दिसंबर तक इसके दुरुस्त होने की कोई उम्मीद नहीं है। जीएसटी काउंसिल ने इससे जुड़ी शिकायतों पर नज़र रखने के लिए मंत्रियों का एक समूह भी बनाया है।
सुशील कुमार मोदी के नेतृत्व में बने इस समूह ने जीएसटीएन को लेकर 25 प्रकार की शिकायतों की सूची बनाई है। समय पर जीएसटी न भर पाने के कारण व्यापारी परेशान हैं। सज़ा भी सख़्त है क्योंकि जीएसटी का कानून कहता है कि GSTR-1 दस अगस्त तक भर देना है। इसलिए कई हाईकोर्ट में व्यापारियों ने याचिका भी दायर की है। इसमें जीएसटीन को लेकर तमाम तरह की शिकायतें हैं। Central Board of Excise and Customs (CBEC) ने निर्देश जारी किया है कि हाईकोर्ट में पूरा विरोध करना है। इस तनातनी में जीएसटी को लेकर मुकदमेबाज़ी बढ़ सकती है। व्यापारी और परेशान हो सकता है। मुकदमें का ख़र्च भी जोड़ते चलिए।
जीएसटी से जुड़े एक अनुभवी टैक्स वकील ने कहा कि सरकार को इसे पूरी तैयारी और सरलता से लांच करना चाहिए था। लेकिन 2019 से पहले इसकी दिक्कतों से बचने के लिए इसका बोझ व्यापारियों पर डाल दिया गया। जिसका ख़र्चा व्यापारी उठा रहे हैं। जीएसटी सरल टैक्स नहीं है जैसा कि दावा किया जा रहा है। इसकी जटिलता जब व्यापारियों को समझ आएगी तब पता चलेगा। टैक्स वकीलों को भी एक घंटे की बजाए जीएसटी भरने में चार चार घंटे लगाने पड़ रहे हैं। ज़ाहिर है शहीर और वकील की क्षमता के अनुसार फीस भी होगी जिसका बोझ व्यापारियों पर डाला गया है। व्यापारियों का कोई न कोई टैक्स वकीलों और सीए के दफ्तर में हमेशा बैठा होता है। टैक्स वसूलने को लेकर सरकार और व्यापारियों के बीच एक तरह की जंग चल रही है। व्यापारी डर के मारे बोल नहीं पा रहे हैं। कैमरा आन होता है तो तारीफ करने लगते हैं। अपनी तकलीफ कम बताते हैं।
बिजनेस स्टैंडर्ड में दिलीप झा की एक रिपोर्ट देखी। देश में 2000 आटा मिले हैं। 600 ब्रांड आटा की मिले हैं जिन पर 5 परसेंट जीएसटी है। टैक्स से बचने के लिए ब्रांड का लाइसेंस सरेंडर करने लगे तो जीएसटी काउंसिल ने नियम बना दिया कि बिना ब्रांड वाले भी जीएसटी देंगे और अब ब्रांड वाले लाइसेंस जमा नहीं कर पाएंगे। अब हुआ यह है कि बिना ब्रांड वाले या लोकल ब्रांड वाली आटा मिलें जिनकी संख्या 1400 है, उनका कहना है कि बंद होने के कगार पर पहुंच गई हैं। क्योंकि अब उन्हें भी बैक डेट से जीएसटी देनी होगी। जो आटा बिना जीएसटी के बिक चुका है, उसका खरीदने वाले का हिस्सा कैसे लेंगे। हो सकता है उन्हें अपनी जेब से जीएसटी देनी पड़े।

29/10/2017

GST world rates
australia ----10%
Bahrain -----5%
Canada -----15%
china---------17%
japan --------8%
Korea ------10%
Kuwait -----5%
Malaysia ----6%
Mauritius -----15%
Mexico ----16%
Myanmar----3%
New Zealand ---15%
Phillipines ---12%
Russian federation--18%
Singapore 7%
South Africa ---14%
Thailand ---7%
UAE-----5%
America (usa). ----7.5%
Vietnam ----10%
Zimbabwe ---15%
Greatest India---28%
(and for petrol & diesel we are paying separate tax of 33%)
Forwarded as received
[22/10, 22:59] ADFC Yuvaraj: Read all msgs please
PETROL PRICES AROUND D WORLD
Pakistan. Rs 26.00
Bangladesh Rs 22.00
Cuba Rs 19.00
Italy. Rs 14.00
Nepal. Rs. 34.00
Burma. Rs. 30.00
Afghanistan. Rs 36.00
Sri Lanka. Rs. 34.00
INDIA. Rs. 73.00
What a great job by the GOVT. Of INDIA !!!!!!!!
PASS THIS MESSAGE TO ALL INDIANS.
We have a wonder country
Where pizzas delivery
Reach before ambulance
And Car Loan is
7% and
Education Loan
Is 12%..
Where rice is
Rs. 40/kg and
Sim card is given free
By the govt.
They worship
Durga god mother
And murder.when a baby girl is born
Where olympic gold medalist
(Gold medal)
Given 3 crore
And another medalist who
Sacrifice his life
Figting terrorist in the border
Is given rs 1 lakh
Really india is amazing.....
Every body should read this
Message​
it should reach to PM modi
Wake up indiia wake up..
Forward to all INDIANS:-)
Jai HIND..
It wont take even Rs 1.to forward this message
Forward this sms please .....

18/10/2017

बलों में बल मनोबल ही है। बिन मनोबल सबल दुर्बल। संग मनोबल दुर्बल सबल। मनोबल बग़ैर किसी पारंपरिक और ग़ैर पारंपरिक ऊर्जा के संचालित होता है। मनोबल वह बल है जो मन से बलित होता है। मनोबल व्यक्ति विशेष हो सकता है और परिस्थिति विशेष हो सकता है। बल न भी रहे और मनोबल हो तो आप क्या नहीं कर सकते हैं. ये फार्मूला बेचकर कितने लोगों ने करोड़ों कमा लिये और बहुत से तो गवर्नर बन गए। जब से सर्जिकल स्ट्राइक हुई है तमाम लेखों में यह पंक्ति आ जाती है कि देश का मनोबल बढ़ा है। हमारा मनोबल स्ट्राइल से पहले कितना था और स्ट्राइक के बाद कितना बढ़ा है,इसे कोई बर्नियर स्केल पर नहीं माप सकता है। तराजू पर नहीं तौल सकता है। देश का मनोबल क्या होता है, कैसे बनता है, कैसे बढ़ता है, कैसे घटता है।
स्ट्राइक से पहले बताया जा रहा था कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है,क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, विदेशी निवेश के अरबों गिनाये जा रहे थे, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, दुनिया में पहली बार भारत का नाम हुआ था, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, इतने शौचालय बन गए, सस्ते में मंगल ग्रह पहुंच गए, रेल बजट भी समाप्त हो गया, योजना आयोग नीति आयोग बन गया, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा। मनोबल कितना होता है कि इन सबसे भी पूरा नहीं बढ़ता है। हम कैसे मान लें कि सेना के सर्जिकल स्ट्राइक से मनोबल पूरी तरह बढ़ गया है। अब और बढ़ाने की गुज़ाइश नहीं है। देश का मनोबल एक चीज़ से बढ़ता है या कई चीज़ों से बढ़ता है। एक बार में बढ़ता है या हमेशा बढ़ाते रहने की ज़रूरत होती है। इन सब पर बात होनी चाहिए। मनोबल को लेकर अलबल नहीं होना चाहिए।
सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश का मनोबल बढ़ा हुआ बताने वाले तमाम लेखकों के ढाई साल पुराने पोस्ट देखिये। उनके जोश और उदंडता से तो नहीं लगेगा कि मनोबल की कोई कमी है। सोशल मीडिया पर गाली देने वालों का कितना मनोबल बढ़ा हुआ है। वो लगातार महिला पत्रकारों को भी तरह तरह से चित्रित कर रहे हैं। उनका कोई बाल बांका नहीं कर पा रहा है। फिर हम कैसे मान लें कि देश का मनोबल बढ़ा हुआ नहीं था। ये देश का मनोबल कहीं किसी दल का मनोबल तो नहीं है। 80 फीसदी गौ रक्षकों को फर्ज़ी बताने के बाद भी मनोबल नहीं घटा। रामलीला में नवाज़ुद्दीन को मारीच बनने से रोकने वालों का मनोबल क्या सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से बढ़ा हुआ है या पहले से ही उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। क्या इसलिए मनोबल बढ़ा है कि नवाज़ को रामलीला से निकाल देंगे। हत्या के आरोप में बंद नौजवान की दुखद मौत पर क्या लिखा जाए। लेकिन उसे तिरंगे से लिपटाना क्या ये भी बढ़े हुए मनोबल का प्रमाण है।
सरकार परस्ती करने वाले चैनलों का मनोबल तो पहले से ही बढ़ा हुआ था। आपको कब लग रहा था कि उनमें मनोबल की कमी है। कुछ डर गए तो सुरक्षा बल भी प्रदान कर दिया गया। जिनसे सरकार को डर लगता है उन्हें खुला छोड़ दिया गया। क्या किसी मनोबल की कमी के कारण दर्शक पाठक पत्रकारिता के इस पतन को स्वीकार कर रहे है। इतिहास उन्हें कभी न कभी अपराधी ठहरायेगा। वक्त इंसाफ करेगा कि जब पत्रकारिता सरकार की भांड हो रही थी तब इस देश के लोग चुपचाप पसंद कर रहे थे क्योंकि उनका मनोबल इतना बढ़ गया था कि वे अपनी पसंद की सरकार और पत्रकारिता की स्वायत्तता में फर्क नहीं कर सके। वे चैनलों को ही सरकार समझ बैठे थे। कहना मत कि वक्त पर नहीं बताया। इसी कस्बा पर दस साल से लिख रहा हूं। चैनल ग़ुलाम हो गए हैं। हम मिट चुके हैं। हम मिटा दिए गए हैं।
जब जनता ही साथ नहीं है तो पत्रकार क्या करे। बेहतर है अख़बार के उस कागज़ पर जूता रगड़ दिया जाए जिस पर लिखकर हम कमाते हैं। उसे न तो पत्रकारिता की ज़रूरत है न पत्रकार की। एक भांड चाहिए,सो हज़ारों भांड दे दो उसे। ठूंस दो इस देश के दर्शकों के मुंह में भांड। दर्शकों और पाठकों की ऐसी डरपोक बिरादरी हमने नहीं देखी। इन्हें पता नहीं चल रहा है कि हम पत्रकारों की नौकरी की गर्दन दबा कर लाखों करोड़ों को ग़ुलाम बनाया जा रहा है। मेरे देश की जनता ये मत करो। हमारी स्वतंत्रता के लिए आवाज़ तो उठाओ। हमारी कमर तोड़ दी गई है। हमीं कितना तपे आपके लिए। आप रात को भांडगिरी का नाच देखिये और हम नैतिकता का इम्तहान दे। कौन से सवाल वहां होते हैं जो आप रातों को जागकर देखते हैं। सुबह दफ्तर में इस भांडगिरी की बात करते हैं। खुजली है तो जालिम लोशन लगाइये। टीवी के डिबेट से और पत्रकारिता की भांडगिरी से मत ठीक कीजिए। आपके सवालों को ठिकाने लगाकर आपको चुप कराया जा रहा है और आप खुश हैं कि मनोबल बढ़ गया है।
फिर कौन कहता है कि मनोबल गिरा हुआ था। फिर कैसे मान ले कि मनोबल बढ़ा हुआ है। जब देश का मनोबल बढ़ा था तब लुधियाना के किसान जसवंत का मनोबल क्यों नहीं बढ़ा। क्यों वह पांच साल के बेटे को बांहों में भर कर नहर में कूद गया। तब तो सर्जिकल स्ट्राइक हो गई थी। क्या फिर भी उसका जीने का मनोबल नहीं बढ़ा। क्या तब भी उसे यकीन नहीं हुआ कि वह भी एक दिन भारत से भाग सकता है। जब भारत की सरकार माल्या को सात महीने से वतन नहीं ला सकी तो दस लाख वाले कर्ज़े के किसान को भारत लाने के लिए करोड़ों खर्च कभी कर सकती है। कभी नहीं करेगी। काश जसवंत माल्या होता। अपने जिगर के टुकड़े को सीने से दबाये नहर में नहीं कूदता। लंदन भाग जाता। जसंवत की मौत पर पंजाब की चुप्पी बताती है कि वाकई उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। उन्हें अब जसवंत जैसे किसानों की हालत से फर्क नहीं पड़ता है। लोगों को मनोबल मिल गया है। कोई बताये कि कर्ज़ से दबे किसानों का भी मनोबल बढ़ा होगा क्या। हम इस पंजाब को नहीं जानते। हम इस पंजाबीयत को नहीं जानना चाहते। लंदन कनाडा की चाकरी करते करते, हमारा वो जाबांज़ पंजाब ख़त्म हो गया है। आप कहते हैं देश का मनोबल बढ़ा हुआ है।
मान लीजिए मनोबल बढ़ा है। ये भी तो बताइये कि इस बढ़े हुए मनोबल का हम क्या करने वाले हैं। यूपी चुनाव में इस्तमाल करेंगे या कुछ निर्यात भी करेंगे। दुनिया के कई देशो में भी मनोबल घटा हुआ होगा। हम मनोबल निर्यात कर उनका हौसला तो बढ़ा सकते हैं। क्या हम मनोबल के सहारे पांच साल में बेरोज़गारी के उच्चतम स्तर पर पहुंचने का कार्यकाल और दस साल बढ़ा सकते हैं। क्या हमारे युवा इस बढ़े हुए मनोबल के सहारे और दस साल घर नहीं बैठ सकते हैं। क्या उत्तराखंड के उस दलित परिवार का भी मनोबल बढ़ा होगा जिसके बेटे की गरदन एक मास्टर ने काट दी। सिर्फ इस बात के लिए कि उसने चक्की छू दी। वो भी ठीक उसी दौरान जब सेना की कार्रवाई के कारण देश का मनोबल बढ़ा हुआ था।
सर्जिकल स्ट्राइक से जब देश का मनोबल बढ़ा हुआ है तब फिर यज्ञ कराने की ज़रूरत क्यों है। क्या देश का मनोबल बढ़ाने वाली सेना का मनोबल घट गया है। क्या सेना को भी यज्ञ की ज़रूरत पड़ गई। हर साल बारिश न होने पर यज्ञ की ख़बरें चलती हैं। टीवी चैनलों पर। किसी मैच से पहले यज्ञ होने लगता है। बारिश नहीं होती है। टीम हार जाती है। ये कौन से यज्ञ हैं जो होते हैं मगर होता कुछ नहीं है। देश का मनोबल बढ़ा है। मनोबल के नाम पर राजनीतिक उत्पात बढ़ा है। पदों पर बैठे लोगों की शालीनता रोज़ धूल चाट रही है। आप बयान में कुछ और सुनते हैं। होते हुए कुछ और देखते हैं। आप देखेंगे कैसे जब कोई सवाल करेगा तब न। आप पत्रकार से क्यों पूछते हो। उनसे पूछो जिन्हें आप वोट देते हैं। उनसे पूछिये कि आपके राज में प्रेस की स्वतंत्रता क्यों ख़त्म हो गई। पत्रकार क्यों भांड हो गया। क्या पत्रकारों का चैनलों का भांड होना मनोबल का बढ़ना है। मुबारक हो आप सभी को। आपका मनोबल बढ़ चुका है। बलों में इस बल का जश्न मनाइये। हम भी मनाते हैं। एलान कीजिए। बर्तन ख़ाली हैं। गर्दन में फांसी हैं। फ़िक्र नहीं है हमको। हमारा मनोबल बढ़ा हुआ है।

16/10/2017

हम तेज़ी से तरक्की कर रहे हैं: नरेंद्र मोदी

लानत है ऐसी तरक्की पर! हमने भुखमरी मे बंगलादेश और नेपाल तक को पीछे छोड़ दिया है:

12/10/2017

नांदेड़ महानगरपालिका चुनाव का रिजल्ट
कुल 37 सीटें

कांग्रेस- 33
बीजेपी- 03
एमआईएम- 01

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